ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १-२ ] अध्याय १ ७९
सूत्र १-२ ] अध्याय १ ७९
स्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें
सात वस्तुओंकी कल्पना हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान्
बतानेमें भी होना चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया
गया है। जैसे घास या चारा-दाना देखकर घोडे हठात् उस ओर आकृष्ट होते
हैं; उसी प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं।
फिर विषयोंसे परे मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको
खींचे रक्खे तो घोडे चारा-दानाकी ओर हठात नहीं जा सकते हैं। उसके बाद
मनसे परे बुद्धिका स्थान माना गया है; वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा
सारथिको श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है, क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती
है। बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह 'रथी' के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही
होना चाहिये। 'महान् आत्मा' का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो
दोष आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड देना और
दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना।
अत महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर महान्
आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की मायाशक्ति। उसीका
अंश कारण-शरीर है। उसे ही इस प्रसङ्गमें रथका रूप दिया गया है। अन्यथा
रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको श्रेष्ठ बतानेकी परम्परा-
में छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य तत्त्वकी अप्रासङ्गिक कल्पना
करनी पडती है। अतः कारणशरीर भगवान्की प्रकृतिका अंश होनेसे उसे
'अव्यक्त' नामसे कहना अनुचित नहीं मालूम होता।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको 'अव्यक्त' कहना कैसे
ठीक होगा; क्योंकि यह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं—
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥
तु=किन्तु; सूक्ष्मम्=(इस प्रकरणमे 'शरीर' शब्दसे ) सूक्ष्म शरीर गृहीत
होता है; तदर्हत्वात् =क्योंकि वही 'अव्यक्त' कहलानेके योग्य है।
व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन
करनेमें नहीं आती, उसीका अंश करणशरीर है; अतः उसको अव्यक्त कहना
उचित ही है।
८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको 'अव्यक्त'
नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें
क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही 'प्रधान'
या 'प्रकृति' कहता है, इसपर कहते हैं—
तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥
तदधीनत्वात्=उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत्=वह
( शक्तिरूपा प्रकृति ) सार्थक है ।
व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते
हैं । परन्तु वेदका ऐसा मत नहीं है । वेदमे उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके
ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है । शक्ति शक्तिमान्से
भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता । इस प्रकार
परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है ।
क्योकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्य
होने सम्भव है । यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह
इस जडचेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो सकता है ?
फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है ? श्वेताश्वतरोपनिषद्मे
स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमे स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूप-
भूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है ।'* वहीं
यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप
शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं ।†
सम्बन्ध—वेदमे बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको
दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं ।
ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥
ज्ञेयत्वावचनात्=वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है । इसलिये; च=
भी ( यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है ) ।
- ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।' ( श्वेता० १ । ३ )
† यह मन्त्र पृष्ठ दोमे आ गया है ।
[ सूत्र ३-५ ] अध्याय १ ८१
व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है
कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका
पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य ( मोक्ष ) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी
तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य ( भेद ) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके
मतमे प्रकृति भी ज्ञेय है। परन्तु वेदमे प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं
कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा
उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्य-
वादियोके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है।
सम्बन्ध—अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उठाकर उसका
समाधान करते हैं—
वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥
चेत्=यदि कहो; वदति=( वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय ) बताता है; इति न=
तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योकि ( वहाँ ज्ञेय तत्त्व ); प्राज्ञः=परमात्मा
ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे ( यही बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है, उस प्रकरणके
अन्तमें ( १ । ३ । १५ ) कहा गया है कि—
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥
'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य,
अनादि, अनन्त, महत्से परे तथा ध्रुव ( निश्चल ) है, उस तत्त्वको जानकर
मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।'
'इस मन्त्रमे ज्ञेय तत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमे
भी सङ्गत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही 'ज्ञेय' बताना सिद्ध होता है।' ऐसी
बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योकि यहाँ परब्रह्म
परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करने-
योग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमे बताये हुए
सभी लक्षण परमात्मामे ही यथार्थरूपसे सङ्गत होते हैं; अतः उसमे भी परमात्मा-
के ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है। इसलिये इस
वे० द० ६—