ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११
सूत्र १८-१९ ] अध्याय ३ ३११
संन्यासका निषेध भी किया है। जैसे—'जो अग्निहोत्रका त्याग करता है, वह
देवोंके वीरोंको मारनेवाला है' (तै० सं० १ । ५ । २ । १)। 'आचार्यको
उनकी इच्छाके अनुरूप धन दक्षिणामें देकर संतान-परम्पराको बनाये रक्खो,
उसका उच्छेद न करो।' (तै० उ० १ । ११) । इन वचनोंद्वारा संन्यास-
आश्रमका प्रतिवाद होनेसे यही सिद्ध होता है कि संन्यास-आश्रम आचरणमें लाने-
योग्य नहीं है। अतएव संन्यासीका ब्रह्मविद्यामें अधिकार बताकर यह कहना
कि 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है।' ठीक नहीं है।
सम्बन्ध—इसके उत्तरमें सूत्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं—
अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ॥ ३ । ४ । १९ ॥
बादरायणः = व्यासदेव कहते हैं कि; अनुष्ठेयम् = गृहस्थकी ही भाँति अन्य
आश्रमोंके धर्मोंका अनुष्ठान भी कर्तव्य है; साम्यश्रुतेः = क्योंकि श्रुतिमें समस्त
आश्रमोंकी और उनके धर्मोंकी कर्तव्यताका समानरूपसे प्रतिपादन किया गया है।
व्याख्या—जैमिनिके उक्त कथनका उत्तर देते हुए वेदव्यासजी कहते हैं—
उक्त श्रुतिमें चारों आश्रमोंका अनुवाद है; परन्तु अनुवाद भी उसीका होता है, जो
अन्यत्र विहित हो। दूसरी-दूसरी श्रुतियोंमें जैसे गृहस्थ-आश्रमका विधान प्राप्त होता
है, उसी प्रकार अन्य आश्रमोंका विधान भी उपलब्ध होता है, इसमें कोई अन्तर
नहीं है। अतः जिस प्रकार गृहस्थ-आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान उचित है, उसी
प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यासके धर्मोंका भी अनुष्ठान करना चाहिये।
पूर्वपक्षीने जिन श्रुतियोंके द्वारा संन्यासका निषेध सूचित किया है, उनका तात्पर्य
दूसरा ही है। वहाँ अग्निहोत्रका त्याग न करनेपर जोर दिया गया है। यह बात
उन्हीं लोगोंपर लागू होती है, जो उसके अधिकारी हैं। गृहस्थ और वानप्रस्थ
आश्रममें रहते हुए कभी अग्निहोत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। यही बताना
श्रुतिको अभीष्ट है। इसी प्रकार संतानपरम्पराका उच्छेद न करनेका आदेश भी
उन्हींके लिये है, जो पूर्णतः विरक्त नहीं हुए है। विरक्तके लिये तो तत्काल
संन्यास लेनेका विधान श्रुतिमें स्पष्ट देखा जाता है। यथा 'यदहरेव विरजेत्तद-
हरेव प्रव्रजेत्।' अर्थात् 'जिस दिन वैराग्य हो, उसी दिन संन्यास ले ले।'
अतः संन्यासीका भी ब्रह्मविद्यामे अधिकार होनेके कारण विद्याको कर्मका अङ्ग न
मानना ही ठीक है।
३१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं—
विधिर्वा धारणवत् ॥ ३ । ४ । २० ॥
वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये,
अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमे 'ऊपर धारण' की
क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है ।
व्याख्या—जैसे 'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति ।'
अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किन्तु देवताओंके
लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमे स्रुग्दण्डके अधोभागमे समिधा-धारणकी
विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर भी 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व
होनेके कारण विधि मान लिया गया है । उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमे जो चारो
आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना
चाहिये । दूसरी श्रुतिमे आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते है ।
यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद् वनी
भूत्वा प्रव्रजेत् । यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा ।....यदहरेव
विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना
चाहिये । गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना उचित है । अथवा
तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे—ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास
ग्रहण कर लेना चाहिये । जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास
ले लेना चाहिये ।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमे भी आश्रमोंके लिये विधि देखी
जाती है । अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे
ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये । यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी
चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके
लिये ही है; विरक्तके लिये नहीं है । इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मों-
के बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है ।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी । अब यज्ञकर्मके
अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये
बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध
करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—