ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
सूत्र १४-१५ ] अध्याय २ १११
सूत्र १४-१५ ] अध्याय २ १११
होता है, वास्तवमे तो कार्यरूपमे भी वह मिट्टी ही है।' इसी प्रकार यह कार्य-
रूपमे वर्तमान जगत् भी ब्रह्मरूप ही है। इस कथनसे जगत्की ब्रह्मसे अनन्यता
सिद्ध होती है; तथा सूत्रमे 'आदि' शब्दका प्रयोग होनेसे यह अभिप्राय निकलता
है कि इस प्रकरणमे आये हुए दूसरे वाक्योसे भी यही बात सिद्ध होती है। उक्त
प्रकरणमे 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्'का ( छा० उ० ६। ८ से लेकर १६ वे खण्डतक )
प्रयोग कई बार हुआ है। इसका अर्थ है कि 'यह सब कुछ ब्रह्मस्वरूप है।'
इस प्रकार श्रुतिने कारणरूप ब्रह्मसे कार्यरूप जगत्की अनन्यताका स्पष्ट शब्दोमे
प्रतिपादन किया है। उसी प्रकरणमे उपदेशका आरम्भ करके आचार्यने कहा है—
'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्।' ( छा० उ० ६ । २ । १ ) अर्थात् 'हे
सोम्य ! यह समस्त जगत् प्रकट होनेसे पहले एकमात्र अद्वितीय सत्यस्वरूप
ब्रह्म ही था।' इससे अनन्यताके साथ-साथ यह भी सिद्ध होता है कि यह जड-
चेतन भोग्य और भोक्ताके आकारमे प्रत्यक्ष दीखनेवाला जगत् उत्पत्तिके पहले भी
अवश्य था। परन्तु था परब्रह्म परमात्माकी शक्तिरूपमे। इसका वर्तमानरूप उस
समय अप्रकट था। जैसे स्वर्णके विकार हार-कंकण-कुण्डल आदि उत्पत्तिके पहले
और विलीन होनेके बाद अपने कारणरूप स्वर्णमे शक्तिरूपसे रहते है। शक्ति,
शक्तिमान्मे अभेद होनेके कारण उनकी अनन्यतामे किसी प्रकारका दोष नहीं
आता; उसी प्रकार यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् उत्पत्तिके पहले और
प्रलयके बाद परब्रह्म परमेश्वरमें शक्तिरूपसे अव्यक्त रहता है। अतः जगत्की ब्रह्मसे
अनन्यतामे किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती। गीतामे भगवान्ने स्वयं कहा है
कि 'यह आठ भेदोवाले जड प्रकृति तो मेरी अपरा प्रकृतिरूपा शक्ति है और
जीवरूप चेतन-समुदाय मेरी परा प्रकृति है, ( ७। ५ ) इसके बाद यह भी
बताया है कि ये दोनो समस्त प्राणियोके कारण है, और मैं सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति
एवं प्रलयरूप महाकारण हूँ।' ( गीता ७ । ६ ) इस कथनसे भगवान्ने अपनी
प्रकृतियोंके साथ अनन्यता सिद्ध की है। इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये।
सम्बन्ध—पहले जो यह बात कही थी कि कार्य केवल वाणीका विषय है,
कारण ही सत्य है; उससे यह भ्रम हो सकता है कि कार्यकी वास्तविक सत्ता
नहीं है। अतः इस शङ्काको दूर करनेके लिये यह सिद्ध करते हैं कि अपनी वर्तमान
अवस्थाके पहले भी शक्तिरूपमे कार्यकी सत्ता रहती है—
भावे चोपलब्धेः ॥ २ । १ । १५ ॥
११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
भावे=(कारणमे शक्तिरूपसे) कार्यकी सत्ता होनेपर; च=ही; उपलब्धेः=
उसकी उपलब्धि होती है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि (यह जगत् अपने
कारण-ब्रह्ममें शक्तिरूपसे सदैव स्थित है)।
व्याख्या-यह बात दृढ़ करते हैं कि कार्य अपने कारणमे शक्तिरूपसे
सदैव विद्यमान रहता है, तभी उसकी उपलब्धि होती है; क्योंकि जो वस्तु वास्तव-
में विद्यमान होती है, उसीकी उपलब्धि हुआ करती है। जो वस्तु नहीं होती
अर्थात् खरगोशके सींग और आकाशके पुष्पकी भाँति जिसका सर्वथा अभाव होता
है, उसकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसलिये यह जड-चेतनात्मक जगत् अपने
कारणरूप परब्रह्म परमेश्वरमे शक्तिरूपसे अवश्य विद्यमान है, और सदैव अपने
कारणसे अभिन्न है।
सम्बन्ध-सत्कार्यवादकी सिद्धिके लिये ही पुनः कहते हैं-
सत्त्वाच्चावरस्य ॥ २ । १ । १६ ॥
अवरस्य=कार्यका; सत्त्वात्=सत् होना श्रुतिमे कहा गया है, इससे; च=भी;
(प्रकट होनेके पहले उसका होना सिद्ध होता है)।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् (६। २। १) में कहा गया है कि 'सदेव
सोम्येदमग्र आसीत्- 'हे सोम्य ! यह प्रकट होनेसे पहले भी सत्य था।'
बृहदारण्यकमें भी कहा है 'तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् (१।४।७) 'उस
समय यह अप्रकट था।' इन वर्णनोंसे यह सिद्ध है कि स्थूलरूपमे प्रकट होनेके
पहले यह सम्पूर्ण जगत् अपने कारणमे शक्तिरूपसे विद्यमान रहता है और वही
सृष्टिकालमे प्रकट होता है।
सम्बन्ध-श्रुतिमे विरोध प्रतीत होनेपर उसका निराकरण करते हैं-
असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात् ॥२। १।१७॥
चेत्=यदि कहो; (दूसरी श्रुतिमे) असद्व्यपदेशात्=उत्पत्तिका पहले इस
जगत्को 'असत्' बतलाया है, इसलिये; न=कार्यका कारणमे पहलेसे ही विद्यमान
होना सिद्ध नहीं होता; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; (क्योंकि) धर्मान्त-
रेण=वैसा कहना धर्मान्तरकी अपेक्षासे है; वाक्यशेषात्=यह बात अन्तिम वाक्य-
से सिद्ध होती है।