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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७

सूत्र १—३ ] अध्याय ३ २२७
निर्माता भी मानते हैं; च=और (उनके मतमे); पुत्रादयः=पुत्र आदि ही 'काम'
अथवा कामनाके विषय हैं।
व्याख्या—कठोपनिषद्मे वर्णन आया है कि 'य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं ,
कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।' (२।२।८) 'यह नाना प्रकारके भोगोंकी रचना
करनेवाला पुरुष अन्य सबके सो जानेपर स्वयं जागता रहता है।' इससे पुरुषको
कामनाओंका निर्माता कहा है। क० उ० (१।१।२३-२४)के अनुसार पुत्र-पौत्र
आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है
कि स्वप्नमे सृष्टि है।
सम्बन्ध—इस प्रकार पूर्वपक्षीके द्वारा स्वप्नकी सृष्टिको सत्य सिद्ध करने-
की चेष्टा की गयी तथा उसे जीवकर्तृक बताया गया। अब सिद्धान्तीकी ओरसे
उसका उत्तर दिया जाता है—
मायामात्रं तु कात्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३।२।३॥
तु=किन्तु; कात्स्न्येन=पूर्णरूपसे; अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्=उसके
स्वरूपकी अभिव्यक्ति (उपलब्धि) न होनेके कारण; मायामात्रम्=वह माया-
मात्र है।
व्याख्या—स्वप्नकी सृष्टिका वर्णन करते हुए श्रुतिने यह बात तो पहले
ही स्पष्ट कर दी है कि जीवात्मा वहाँ जिन-जिन वस्तुओकी रचना करता है,
वे वास्तवमें नहीं है। इसके सिवा, यह देखा भी जाता है कि स्वप्नमे सब
वस्तुएँ पूर्णरूपसे देखनेमें नहीं आतीं; जो कुछ देखा जाता है, वह अनियमित
और अधूरा ही देखा जाता है। प्रश्नोपनिषद्मे तो स्पष्ट ही कहा है कि 'जाग्रद्-
अवस्थामें सुनी हुई, देखी हुई और अनुभव की हुई वस्तुओको स्वप्नमे देखता
है, किन्तु विचित्र ढंगसे देखता है। देखी-सुनी हुईको और न देखी-
सुनी हुईको भी देखता है तथा अनुभव की हुईको और न अनुभव की हुईको-
भी देखता है। इन सब कारणोंसे यही सिद्ध होता है कि स्वप्नकी सृष्टि
वास्तविक नहीं, जीवको कर्मफलका भोग करानेके लिये भगवान् अपनी योगमायासे
उसके कर्म-संस्कारोंकी वासनाके अनुसार वैसे दृश्य देखनेमे उसे लगा देते हैं,
अतः वह स्वप्न-सृष्टि तो मायामात्र है, जाग्रत्की भाँति सच्ची नहीं है। यही
कारण है कि.उस अवस्थामे किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल जीवात्माको नहीं

२२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
भोगना पड़ता। तथा पूर्वपक्षीने जो यह बात कही थी कि किसी-किसी शाखा-
वाले लोग पुरुषको पुत्र-पौत्रादि काम्य-विषयोंकी रचना करनेवाला बताते हैं,
वह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ स्वप्नावस्थाका प्रकरण नहीं है और उस
मन्त्रमें जीवात्माको काम्य-विषयोंका निर्माता नहीं कहा गया है, वहाँ यह
विशेषण परमात्माके लिये आया है।
सम्बन्ध—इससे तो यह सिद्ध होता है कि स्वप्न सर्वथा व्यर्थ है, उसकी
कोई सार्थकता नहीं है, इसपर कहते हैं—
सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॥ ३ । २ । ४ ॥
सूचकः = स्वप्न भविष्यमें होनेवाले शुभाशुभ परिणामका सूचक; च = भी
होता है; हि = क्योंकि; श्रुतेः = श्रुतिसे यह सिद्ध होता है; च = और; तद्विदः =
स्वप्नविषयक शास्त्रको जाननेवाले भी; आचक्षते = ऐसी बात कहते हैं।
व्याख्या—श्रुति (छा० उ० ५ । २ । ९) मे कहा है—
यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति ।
समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने ॥
'जब काम्य कर्मोंके प्रसङ्गमें स्वप्नोंके दृश्योंमें स्त्रीको देखे तो ऐसे स्वप्न
देखनेका परिणाम यह समझना चाहिये कि उस किये जानेवाले काम्यकर्ममें
भलीभाँति अभ्युदय होनेवाला है।' तथा यह भी कहा है कि 'यदि स्वप्नमे काले
दाँतवाले काले पुरुषको देखे तो वह मृत्युका सूचक है।' (ऐतरेय आरण्यक
३ । २ । ४ । १७) इत्यादि, श्रुतिके प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि स्वप्न
सर्वथा व्यर्थ नहीं है, वह वर्तमानके आगामी परिणामका सूचक भी होता है।
इसके सिवा, जो स्वप्नविज्ञानको जाननेवाले विद्वान् हैं, वे भी इसी प्रकार स्वप्नमे
देखे हुए दृश्योंको भविष्यमें होनेवाली शुभाशुभ घटनाओंके सूचक बताते हैं।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि स्वप्नकी घटना जीवात्माकी स्वतन्त्र रचना नहीं
है, वह तो निमित्तमात्र है; वास्तवमें सब कुछ जीवके कर्मानुसार उस परमेश्वरकी
शक्तिसे ही होता है।
सम्बन्ध—जीवात्मा भी तो ईश्वरका ही अंश है, अतः इसमें ईश्वरके ज्ञान
और ऐश्वर्य आदि गुण भी आंशिक रूपसे होंगे ही। फिर यदि ऐसा मान लें कि
स्वप्नकी सृष्टि जीवात्मा स्वयं करता है तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं—