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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्‌का कारण मानना

दूसरा पाद
सम्बन्ध—पहले पादमें प्रधानतासे अपने पक्षमें प्रतीत होनेवाले समस्त
दोषोंका खण्डन करके यह निश्चय कर दिया कि इस जगत्‌का निमित्त और
उपादानकारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। अब दूसरोंद्वारा प्रतिपादित जगत्-
कारणोंको स्वीकार करनेमें जो-जो दोष आते हैं, उनका दिग्दर्शन कराकर अपने
सिद्धान्तकी पुष्टिके लिये दूसरा पाद आरम्भ किया जाता है। इसमें प्रथम दस
सूत्रोंद्वारा यह सिद्ध करते हैं कि सांख्योक्त 'प्रधान'को जगत्‌का कारण मानना
युक्तिसंगत नहीं है—
रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥ २ । २ । १ ॥
च=इसके सिवा; अनुमानम्=जो केवल अनुमान है (वेदद्वारा जिसकी
ब्रह्मसे पृथक् सत्ता सिद्ध नहीं होती), वह प्रधान; न=जगत्‌का कारण नहीं है;
रचनानुपपत्तेः=क्योंकि उसके द्वारा नाना प्रकारकी रचना सम्भव नहीं है।
व्याख्या—प्रधान या प्रकृतिको जगत्‌का कारण नहीं कहा जा सकता;
क्योंकि वह जड है। कब, कहाँ किस वस्तुकी आवश्यकता है, इसका विचार
जड प्रकृति नहीं कर सकती, अतएव उसके द्वारा ऐसी विशिष्ट रचना नहीं
प्रस्तुत की जा सकती, जिससे किसीकी आवश्यकता पूर्ण हो सके। इसके सिवा,
चेतन कर्ताकी सहायताके बिना जड वस्तु स्वयं कुछ करनेमे समर्थ भी नहीं है।
गृह, वस्त्र, भाँति-भाँतिके पात्र, हथियार और मशीन आदि जितनी भी आवश्यक
वस्तुएँ हैं, सबकी रचना बुद्धियुक्त कुशल कारीगरके द्वारा ही की जाती है। जड
प्रकृति स्वयं उक्त वस्तुओंका निर्माण कर लेती हो, ऐसा दृष्टान्त कहीं नहीं मिलता
है। फिर जो पृथिवी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र आदि विविध एवं
अद्भुत वस्तुओंसे सम्पन्न है; मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष और तृण आदिसे
सुशोभित है तथा शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि आध्यात्मिक तत्त्वोंसे
अलंकृत हैं; जिसके निर्माण-कौशलकी कल्पना बड़े-बड़े बुद्धिमान् वैज्ञानिक तथा
चतुर शिल्पी मनसे भी नहीं कर पाते, उस विचित्र रचना-चातुर्ययुक्त अद्भुत
जगत्‌की सृष्टि भला जड प्रकृति कैसे कर सकती है ? मिट्टी, पत्थर आदि जड
पदार्थोंमें इस प्रकार अपने-आप रचना करनेकी कोई शक्ति नहीं देखी जाती है।
वे० द० ९—

१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का
कारण है ।
सम्बन्ध—अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं—
प्रवृत्तेश्च ॥ २ । २ । २ ॥
प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध
नहीं होता ( इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है ) ।
व्याख्या—जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड
प्रकृतिमे प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योकि साम्यावस्थामे
स्थित सत्त्व, रज और तम—इन तीनो गुणोका नाम प्रधान या प्रकृति है,* उस
जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये
प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है । कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त
हुए बिना कभी अपने आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है ।
सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी
चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं—
पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २ । २ । ३ ॥
चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति ( जड प्रधानका
सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है ); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका
सहयोग है ( अतः केवल जडमे प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्की रचना
असम्भव है ) ।
व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने आप
गायके थनमे उतर आता है † तथा अचेतन जल लोगोके उपकारके लिये अपने
आप नदी-निर्झर आदिके रूपमे बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी
जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा
कहना ठीक नहीं है; क्योकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना
चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमे प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार
थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमे भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा

  • सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । ( सा० सू० १ । ६१ )
    † अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य । ( सां० सू० ३ । १७० )