ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥
२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके
लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं—
अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९ ॥
चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ;
अत्ता=भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला
( परब्रह्म परमेश्वर ही है ) ।
व्याख्या—कठोपनिषद् ( १ । २ । २५) मे कहा गया है कि 'यस्य ब्रह्म
च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥' अर्थात्
'( संहारकालमे ) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर-
जङ्गम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन
( व्यञ्जन—शाक आदि ) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह
कौन जान सकता है ।' इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप
सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है । अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त
चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये
परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं ।
सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
प्रकरणाच्च ॥ १ । २ । १० ॥
प्रकरणात्=प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है ) ।
व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही
प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्णन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी
कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर-
को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण-
के अनुरूप है । अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ
परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है ।
सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति
( १ । ३ । १ ) में (कर्मफलरूप ) 'ऋत' को पीनेवाले छाया और धूपके सदृश