ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६८०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
स्वप्नमें जिसके पैरोंमें बेड़ी पड़ गयी, उसे प्रतिष्ठा
और पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो सपनेमें नदीके
किनारे नये अथवा फटे-पुराने कमलके पत्तेपर
दही मिला हुआ अन्न और खीर खाता है; वह
भविष्यमें राजा होता है। जलौका (जोंक), बिच्छू
और साँप यदि स्वप्नमें दिखायी दें तो धन, पुत्र,
विजय एवं प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है। सींग और
बड़ी-बड़ी दाढ़वाले पशुओं, सूअरों और वानरोंसे
यदि स्वप्नमें पीडा प्राप्त हो तो मनुष्य निश्चय ही
राजा होता और प्रचुर धन-राशि प्राप्त कर लेता है।
जो स्वप्नमें मत्स्य, मांस, मोती, शङ्ख, चन्दन,
हीरा, शराब, खून, सुवर्ण, विष्ठा तथा फले-फूले
बेल और आमको देखता है; उसे धन मिलता है।
प्रतिमा और शिवलिङ्गके दर्शनसे विजय और
धनकी प्राप्ति होती है। प्रज्वलित अग्निको देखकर
मनुष्य धन, बुद्धि और लक्ष्मी पाता है। आँवला
और कमल धनप्राप्तिका सूचक है। देवता, द्विज,
गौ, पितर और साम्प्रदायिक चिह्नधारी पुरुष स्वप्नमें
परस्पर जिस वस्तुको देते हैं; उसका फल भी वैसा
ही होता है। श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत पुष्पोंकी
माला और श्वेत अनुलेपनसे सुसज्जित सुन्दरियाँ
स्वप्नमें जिस पुरुषका आलिङ्गन करती हैं, उसे
सुख और सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है। जो पुरुष
स्वप्नमें पीत वस्त्र, पीले पुष्पोंकी माला और पीले
रंगका अनुलेपन धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन
करता है; उसे कल्याणकी प्राप्ति होती है। स्वप्नमें
भस्म, रूई और हड्डीको छोड़कर शेष सभी श्वेत
वस्तुएँ प्रशंसित हैं और कृष्णा गौ, हाथी, घोड़े,
ब्राह्मण तथा देवताको छोड़कर शेष सभी काली
वस्तुएँ अत्यन्त निन्दित हैं।
रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिव्य
ब्राह्मणजातीय स्त्री मुस्कराती हुई जिसके घरमें
आती है; उसे निश्चय ही प्रिय पदार्थकी प्राप्ति
होती है। स्वप्नमें ब्राह्मण देवताका स्वरूप है और
ब्राह्मणी देवकन्याका। ब्राह्मण और ब्राह्मणी संतुष्ट
हो मुस्कराते हुए स्वप्नमें जिसको कोई फल दें,
उसे पुत्र होता है। पिताजी! ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे
शुभाशीर्वाद देते हैं, उसे अवश्य ऐश्वर्य प्राप्त होता
है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिसके घर आ जाय;
उसके यहाँ नारायण, शिव और ब्रह्माका प्रवेश
होता है; उसे सम्पत्ति, महान् सुयश, पग-पगपर
सुख, सम्मान और गौरवकी प्राप्ति होती है। यदि
स्वप्नमें अकस्मात् गौ मिल जाय तो भूमि और
पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है। स्वप्नमें जिस पुरुषको
हाथी सूँड़से उठाकर अपने माथेपर बिठा ले; उसे
निश्चय ही राज्य-लाभ होगा। स्वप्नमें संतुष्ट
ब्राह्मण जिसे हृदयसे लगाये और फूल हाथमें दे;
वह निश्चय ही सम्पत्तिशाली, विजयी, यशस्वी
और सुखी होता है। साथ ही उसे तीर्थस्नानका
पुण्य प्राप्त होता है।
स्वप्नमें तीर्थ, अट्टालिका और रत्नमय गृहका
दर्शन हो तो उससे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति
होती है। स्वप्नमें यदि कोई भरा हुआ कलश दे
तो पुत्र और सम्पत्तिका लाभ होता है। हाथमें
कुडव या आढक लेकर स्वप्नमें कोई वाराङ्गना
जिसके घर आती है; उसे निश्चय ही लक्ष्मीकी
प्राप्ति होती है। जिसके घर पत्नीके साथ ब्राह्मण
आता है; उसके यहाँ पार्वतीसहित शिव अथवा
लक्ष्मीके साथ नारायणका शुभागमन होता है।
ब्राह्मण और ब्राह्मणी स्वप्नमें जिसे धान्य, पुष्पाञ्जलि,
मोतीका हार, पुष्पमाला और चन्दन देते हैं तथा
जिसे स्वप्नमें गोरोचन, पताका, हल्दी, ईख और
सिद्धान्नका लाभ होता है; उसे सब ओरसे
लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मण और ब्राह्मणी
स्वप्नावस्थामें जिसके मस्तकपर छत्र लगाते
अथवा श्वेत धान्य बिखेरते हैं या अमृत, दही
और उत्तम पात्र अर्पित करते हैं अथवा जो
स्वप्नमें श्वेत माला और चन्दनसे अलंकृत हो
रथपर बैठकर दही या खीर खाता है; वह
निश्चय ही राजा होता है। स्वप्नमें रत्नमय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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आभूषणोंसे विभूषित आठ वर्षकी कुमारी कन्या जिसपर संतुष्ट हो जाती है और जिस पुण्यात्माको पुस्तक देती है; वह विश्वविख्यात कवीश्वर एवं पण्डितराज होता है। जिसे स्वप्नमें माताकी भाँति वह पढ़ाती है; वह सरस्वती-पुत्र होता है और अपने समयका सबसे बड़ा पण्डित माना जाता है। यदि विद्वान् ब्राह्मण किसीको पिताकी भाँति यत्नपूर्वक पढ़ावे या प्रसन्नतापूर्वक पुस्तक दे तो वह भी उसीके समान विद्वान् होता है। जो स्वप्नमें मार्गपर या जहाँ कहीं भी पड़ी हुई पुस्तक पाता है; वह भूतलपर विख्यात एवं यशस्वी पण्डित होता है। जिसे ब्राह्मण-ब्राह्मणी स्वप्नमें महामन्त्र दें; वह पुरुष विद्वान्, धनवान् और गुणवान् होता है। ब्राह्मण स्वप्नमें जिसे मन्त्र अथवा शिलामयी प्रतिमा देता है; उसे मन्त्रसिद्धि प्राप्त होती है। यदि ब्राह्मण स्वप्नमें ब्राह्मणसमूहका दर्शन एवं वन्दन करके आशीर्वाद पाता है तो वह राजाधिराज अथवा महान् कवि एवं पण्डित होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिसे संतुष्ट होकर श्वेत धान्ययुक्त भूमि देता है; वह राजा होता है। ब्राह्मण जिसे स्वप्नमें रथपर बिठाकर नाना प्रकारके स्वर्ग दिखाता है; वह चिरंजीवी होता है तथा उसकी आयु एवं सम्पत्तिकी निश्चय ही वृद्धि होती है। सपनेमें संतुष्ट ब्राह्मण जिस ब्राह्मणको अपनी कन्या देता है; वह सदा धनाढ्य राजा होता है। स्वप्नमें सरोवर, समुद्र, नदी, नद, श्वेत सर्प और श्वेत पर्वतका दर्शन करनेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो स्वप्नमें अपनेको मरा हुआ देखता है, वह चिरंजीवी होता है। रोगी देखनेपर नीरोग होता है और सुखी देखनेपर निश्चय ही दुःखी होता है। दिव्य नारी जिससे स्वप्नमें कहती है कि आप मेरे स्वामी हैं और वह उस स्वप्नको देखकर तत्काल जाग उठता है तो अवश्य राजा होता है। स्वप्नमें कालिकाका दर्शन करके और स्फटिककी माला, इन्द्र-धनुष एवं वज्रको पाकर मनुष्य अवश्य ही प्रतिष्ठाका भागी होता है। स्वप्नमें ब्राह्मण जिससे कहे कि तुम मेरे दास हो जाओ, वह मेरी दास्यभक्ति पाकर वैष्णव हो जाता है। स्वप्नावस्थामें ब्राह्मण शिव और विष्णुका स्वरूप है। ब्राह्मणी लक्ष्मी एवं पार्वतीका प्रतीक है तथा श्वेतवर्णा स्त्री वेदमाता सावित्री, गङ्गा एवं सरस्वतीका रूप है। ग्वालिनका वेष धारण करनेवाली बालिका मेरी राधिका है और बालक बाल-गोपालका स्वरूप है। स्वप्नविज्ञानके जाननेवाले विद्वानोंने इस रहस्यको प्रकाशित किया है। पिताजी ! यह मैंने पुण्यदायक उत्तम स्वप्नोंका वर्णन किया है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ?
(अध्याय ७७)
श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन
नन्दजी बोले—जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! मैंने अच्छे स्वप्नोंका वर्णन सुना। यह वेदोंका सारभाग तथा लौकिक-वैदिक नीतिका सारतत्त्व है। वत्स ! अब मैं उन स्वप्नोंको सुनना चाहता हूँ, जिन्हें देखनेसे पाप होता है। अथवा जिस कर्मके करनेसे पाप होता है, उसका वर्णन करो। वेदका अनुसरण करनेवाले संतस मनुष्य तुम्हारे मुखसे वेद-शास्त्रोंकी बातें सुनना चाहते हैं; क्योंकि तुम वेदोंके जनक हो और वैदिक सत्पुरुषों, ब्रह्मा आदि देवताओं, मुनियों तथा तीनों लोकोंके भी जन्मदाता हो। वत्स ! अपने वियोगसे तुमने मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न कर दिया है; किंतु इस समय तुम्हारे मुखारविन्दसे जो प्रमाणभूत वचनामृत सुननेको मिला है, उससे मेरा तन, मन अभिषिक्त
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हो उठा है। तुम्हारा जो चरणकमल सम्पूर्ण
मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है तथा ब्रह्मा
आदि देवता स्वप्नमें भी जिसका दर्शन नहीं कर
पाते हैं; वही आज मेरी आँखोंके सामने है।
आजके बाद मुझ पातकीको तुम्हारे चरणारविन्दोंका
दर्शन कहाँ मिलेगा ? मेरा यह मलमूत्रधारी शरीर
अपने कर्मबन्धनसे बँधा हुआ है। बेटा! अब
ऐसा दिन कब प्राप्त होगा, जब कि ब्रह्मा आदि
देवताओंके भी स्वामी तुमसे बातचीत करनेका
शुभ अवसर मुझ-जैसे पापीको सुलभ होगा ?
महेश्वर ! कृपानाथ ! मुझपर कृपा करो। मैंने अपना
बेटा समझकर तुम्हारे साथ जो दुर्नीतिपूर्ण व्यवहार
किया है; मेरे उस अपराधको क्षमा कर दो।
ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और मुनि भी तुम्हारे
चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सरस्वती और
श्रुति भी तुम्हारी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाती
हैं; फिर मेरी क्या बिसात है?
यों कहकर नन्दजी दुःख और शोकसे
व्याकुल हो गये। पुत्रवियोगसे विह्वल हो रोते-
रोते उन्हें मूर्च्छा आ गयी। यह देख जगत्पति
भगवान् श्रीकृष्ण संत्रस्त हो उन्हें यत्नपूर्वक
समझाने-बुझाने लगे। उन्होंने नन्दको परम उत्तम
आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान्ने कहा- पिताजी ! लोकमें जितने
जन्मदाता पिता हैं, उन सबमें तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान
है। सर्वश्रेष्ठ ब्रजेश्वर ! होशमें आओ और उत्तम
कल्याणमय ज्ञान सुनो। यह श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान
ज्ञानियोंके लिये भी परम दुर्लभ है। वेद-शास्त्रमें
भी गोपनीय कहा गया है। केवल तुम्हींको इसका
उपदेश दे रहा हूँ। तात! एकाग्रचित्त हो प्रसन्नतापूर्वक
इस ज्ञानको सुनो और इसका मनन करो। इसके
अभ्याससे जन्म, मृत्यु और जरारूपी रोगसे
छुटकारा मिल जाता है। महाराज ब्रजराज !
सुस्थिर होओ और इस ज्ञानको पाकर शोक-
मोहसे रहित एवं परमानन्दमें निमग्न हो अपने
व्रजको पधारो। यह समस्त चराचर जगत् जलके
बुलबुलेकी भाँति नश्वर है; प्रातःकालिक स्वप्नकी
भाँति मिथ्या और मोहका ही कारण है। पाञ्चभौतिक
शरीर एवं संसारके निर्माणका हेतु भी मिथ्या एवं
अनित्य है। मायासे ही मनुष्य इसे सत्य मान रहा
है। वह समस्त कर्मोंमें काम, क्रोध, लोभ और
मोहसे वेष्टित है और मायासे सदा मोहित,
ज्ञानहीन एवं दुर्बल है। निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा,
पिपासा, क्षमा, श्रद्धा, दया, लज्जा, शान्ति, धृति,
पुष्टि और तुष्टि आदिसे भी वह आवृत है। जैसे
वृक्ष काक आदि पक्षियोंका आश्रय है; उसी
प्रकार मन, बुद्धि, चेतना, प्राण, ज्ञान और
आत्मासहित सम्पूर्ण देवता शरीरका आश्रय लेकर
रहते हैं। मैं सर्वेश्वर ही पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा
हूँ। ब्रह्मा मन हैं, सनातनी प्रकृति बुद्धि हैं, प्राण
विष्णु हैं तथा चेतना और उसकी अधिष्ठात्री देवी
लक्ष्मी हैं। शरीरमें मेरे रहनेसे ही सबकी स्थिति
है। मेरे चले जानेपर वे भी सब-के-सब चले
जाते हैं। हम सबके त्याग देनेपर शरीर तत्काल
गिर जाता है; इसमें संशय नहीं है। उसके पाँचों
भूत उसी क्षण समष्टिगत पाँचों भूतोंमें विलीन हो
जाते हैं। नाम केवल संकेतरूप है। वह निष्फल
और मोहका कारण है। तात ! अज्ञानियोंको ही
शरीरके लिये शोक होता है; ज्ञानियोंको किञ्चिन्मात्र
भी दुःख नहीं होता। निद्रा आदि जो शक्तियाँ हैं;
वे सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। काम, क्रोध लोभ
और मोहके साथ जो पाँचवाँ अहंकार है; वे सब
अधर्मके अंश हैं। सत्त्व आदि तीन गुण क्रमशः
विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्रके अंश हैं। ज्योतिर्मय शिव
ज्ञानस्वरूप हैं और मैं निर्गुण आत्मा हूँ। जब
प्रकृतिमें प्रवेश करता हूँ तो मैं सगुण कहा जाता
हूँ। विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि सगुण विषय हैं।
मेरे अंशभूत धर्म, शेषनाग, सूर्य और चन्द्रमा
आदि विषयी कहे गये हैं। इसी प्रकार समस्त
मुनि, मनु तथा देवता आदि मेरे कलांशरूप हैं।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८३
मैं समस्त शरीरोंमें व्याप्त हूँ; तथापि उनके द्वारा सम्पादित होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। मेरा भक्त जीवन्मुक्त होता है तथा वह जन्म, मृत्यु और जराका निवारण करनेवाला है। भक्त सम्पूर्ण सिद्धोंका स्वामी, श्रीमान्, कीर्तिमान्, विद्वान्, कवि, बाईस प्रकारका सिद्ध और समस्त कर्मोंका निराकरण करनेवाला है। उस सिद्ध भक्तको मैं स्वयं प्राप्त होता हूँ; क्योंकि वह मेरे सिवा दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा ही नहीं करता।
तात! सिद्धियोंका साधन करनेवाला सिद्ध उन सिद्धियोंके ही भेदसे बाईस प्रकारका होता है। मेरे मुखसे उसका परिचय सुनो और सिद्धमन्त्र ग्रहण करो। अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, कामावसायिता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, मनोयायित्व, सर्वज्ञत्व, अभीष्टसिद्धि, अग्निस्तम्भ, जलस्तम्भ, चिरजीवित्व, वायुस्तम्भ, क्षुत्पिपासानिद्रास्तम्भन (भूख-प्यास तथा नींदका स्तम्भन), वाक्सिद्धि, इच्छानुसार मृत प्राणीको बुला लेना, सृष्टिकरण और प्राणोंका आकर्षण—ये बाईस प्रकारकी सिद्धियाँ हैं। सिद्धमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सर्वेश्वरेश्वराय सर्वविघ्नविनाशिने मधुसूदनाय स्वाहा'। यह मन्त्र अत्यन्त गूढ़ है और सबकी मनोवाञ्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान है। सामवेदमें इसका वर्णन है। यह सिद्धोंकी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके जपसे योगी, मुनीन्द्र और देवता सिद्ध होते हैं। सत्पुरुषोंको एक लाख जप करनेसे ही यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यदि नारायणक्षेत्रमें हविष्यान्नभोजी होकर इसका जप किया जाय तो शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। तात! तुम काशीके मणिकर्णिकातीर्थमें जाकर इसका जप करो। मैं तुम्हें नारायणक्षेत्र बतलाता हूँ, सुनो। गङ्गाके जलप्रवाहसे चार हाथतककी भूमिको 'नारायणक्षेत्र' कहा है। उसके नारायण ही स्वामी हैं; दूसरा कोई कदापि नहीं है। वहाँ मनुष्यकी मृत्यु होनेपर उसे ज्ञान एवं मुक्तिकी प्राप्ति होती है। वहाँ व्रतके बिना भी मन्त्र-जप करनेसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। व्रजनाथ! व्रजको जाओ और उसे पवित्र करो।
तात! जिनके दर्शनसे पाप होता है; उन्हें बताता हूँ, सुनो। दुःस्वप्न केवल पापका बीज और विघ्नका कारण होता है। गौ और ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले कृतघ्न, कुटिल, देवमूर्तिनाशक, माता-पिताके हत्यारे, पापी, विश्वासघाती, झूठी गवाही देनेवाले, अतिथिके साथ छल करनेवाले, ग्राम-पुरोहित, देवता तथा ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, पीपलका पेड़ काटनेवाले, दुष्ट, शिव और विष्णुकी निन्दा करनेवाले, दीक्षारहित, आचारहीन, संध्यारहित द्विज, देवताके चढ़ावेपर गुजारा करनेवाले और बैल जोतनेवाले ब्राह्मणको देखनेसे पाप लगता है। पति-पुत्रसे रहित, कटी नाकवाली, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाली, पतिभक्तिहीना, विष्णुभक्तिशून्या तथा व्यभिचारिणी स्त्रीके दर्शनसे भी पाप होता है। सदा क्रोधी, जारज, चोर, मिथ्यावादी, शरणागतको यातना देनेवाले, मांस चुरानेवाले, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, ब्राह्मणीगामी शूद्र, सूदखोर द्विज और अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले दुष्ट नराधमको भी देखनेसे पाप लगता है। माता, सौतेली माँ, सास, बहिन, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, भाईकी स्त्री, मौसी, बूआ, भांजेकी स्त्री, मामी, परायी नवोढा, चाची, रजस्वला, पितामही और नानी—ये सामवेदमें अगम्या बतायी गयी हैं। सत्पुरुषोंको इन सबकी रक्षा करनी चाहिये। कामभावसे इनका दर्शन और स्पर्श करनेपर मनुष्य ब्रह्महत्याका भागी होता है; अतः दैववश यदि इनकी ओर दृष्टि चली जाय तो सूर्यदेवका दर्शन करके श्रीहरिका स्मरण करे। जो कामनापूर्वक इनपर कुदृष्टि डालते हैं, वे निन्दनीय होते हैं। ब्रजेश्वर! इसलिये शापसे डरे हुए साधु पुरुष
६१- गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
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इनकी ओर कुदृष्टि नहीं डालते। विद्वान् पुरुष ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखते। प्रथम, अष्टम, सप्तम, द्वादश, नवम और दशम स्थानमें सूर्य हों तो सूर्यका तथा जन्म-नक्षत्रमें और अष्टम एवं चतुर्थ स्थानमें चन्द्रमा हों तो चन्द्रमाका दर्शन नहीं करना चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्थीको उदित हुए चन्द्रमाको नष्टचन्द्र कहा गया है; अतः उसका दर्शन नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुषोंने ऐसे चन्द्रमाका परित्याग किया है। तात! यदि कोई उस दिन जान-बूझकर चन्द्रमाको देखता है तो वह उसे अत्यन्त दुष्कर कलङ्क देता है। यदि कोई मनुष्य अनिच्छासे उक्त चतुर्थीके चन्द्रमाको देख ले तो उसे मन्त्रसे पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिये। ऐसा करनेसे वह तत्काल शुद्ध हो भूतलपर निष्कलङ्क बना रहता है। जलको पवित्र करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
'सुन्दर सलोने कुमार! इस मणिके लिये सिंहने प्रसेनको मारा है और जाम्बवान्ने उस सिंहका संहार किया है; अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमन्तकमणिपर तुम्हारा ही अधिकार है।'
इस मन्त्रसे पवित्र किया हुआ उत्तम जल अवश्य पीना चाहिये। तात! ये सारी बातें तुम्हें बतायी गयीं। अब तुमसे और क्या कहूँ?
(अध्याय ७८)
दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन
तदनन्तर सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहणादिके विषयमें कहकर नन्द बाबाके पूछनेपर भगवान् कहने लगे।
**श्रीभगवान् बोले—**नन्दजी! जो स्वप्नमें हर्षातिरेकसे अट्टहास करता है अथवा यदि विवाह और मनोऽनुकूल नाच-गान देखता है तो उसके लिये विपत्ति निश्चित है। स्वप्नमें जिसके दाँत तोड़े जाते हैं और वह उन्हें गिरते हुए देखता है तो उसके धनकी हानि होती है और उसे शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। जो तेलसे स्नान करके गदहे, ऊँट और भैंसेपर सवार हो दक्षिण दिशाकी ओर जाता है; निःसंदेह उसकी मृत्यु हो जाती है। यदि स्वप्नमें कानमें लगे हुए अड़हुल, अशोक और करवीरके पुष्पको तथा तेल और नमकको देखता है तो उसे विपत्तिका सामना करना पड़ता है। नंगी, काली, नक-कटी, शूद्र-विधवा तथा जटा और ताड़के फलको देखकर मनुष्य शोकको प्राप्त होता है। स्वप्नमें कुपित हुए ब्राह्मण तथा क्रुद्ध हुई ब्राह्मणीको देखनेवाले मनुष्यपर निश्चय ही विपत्ति आती है और लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं। जंगली पुष्प, लाल फूल, भलीभाँति पुष्पोंसे लदा पलाश, कपास और सफेद वस्त्रको देखकर मनुष्य दुःखका भागी होता है। काला वस्त्र धारण करनेवाली काले रंगकी विधवा स्त्रीको हँसती और गाती हुई देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जिसे स्वप्नमें देवगण नाचते, गाते, हँसते, ताल ठोंकते और दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं; उसका शरीर मृत्युका शिकार हो जायगा। जो स्वप्नमें काले पुष्पोंकी माला और कृष्णाङ्गरागसे सुशोभित एवं काला वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसकी मृत्यु हो जायगी। जो स्वप्नमें मृगका मरा हुआ छौना, मनुष्यका मस्तक और हड्डियोंकी माला पाता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो ऐसे रथपर, जिसमें गदहे और ऊँट जुते हुए हों, अकेले सवार होता है और उसपर बैठकर फिर जागता है तो निःसंदेह वह मौतका ग्रास बन जाता है। जो अपनेको हवि, दूध, मधु, मट्ठा और गुड़से सराबोर देखता है; वह निश्चय ही
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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पीड़ित होता है। जो स्वप्नमें लाल पुष्पोंकी माला एवं लाल अङ्गरागसे युक्त तथा लाल वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; वह रोगग्रस्त हो जाता है, यह निश्चित है। गिरे हुए नख और केश, बुझा हुआ अंगार और भस्मपूर्ण चिताको देखकर मनुष्य अवश्य ही मृत्युका शिकार बन जाता है। श्मशान, काष्ठ, सूखा घास-फूस, लोहा, काली स्याही और कुछ-कुछ काले रंगवाले घोड़ेको देखनेसे अवश्यमेव दुःखकी प्राप्ति होती है। पादुका, ललाटकी हड्डी, लाल पुष्पोंकी भयावनी माला, उड़द, मसूर और मूंग देखनेसे तुरंत शरीरमें घाव या फोड़ा हो जाता है। स्वप्नमें सेना, गिरगिट, कौआ, भालू, वानर, नीलगाय, पीब और शरीरके मलका देखा जाना केवल व्याधिका कारण होता है। स्वप्नमें फूटा बर्तन, घाव, शूद्र, गलत्कुष्ठी, रोगी, लाल वस्त्र, जटाधारी, सूअर, भैंसा, गदहा, महाघोर अन्धकार, मरा हुआ भयंकर जीव और योनि-चिह्न देखकर मनुष्य निश्चय ही विपत्तिमें फँस जाता है। कुवेषधारी म्लेच्छ और पाश ही जिसका शस्त्र है, ऐसे पाशधारी भयंकर यमदूतको देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मण, ब्राह्मणी, छोटी कन्या और बालक-पुत्र क्रोधवश विलाप करते हों तो उन्हें देखकर दुःखकी प्राप्ति होती है। काला फूल, काले फूलोंकी माला, शस्त्रास्त्रधारी सेना और विकृत आकारवाली म्लेच्छवर्णकी स्त्रीको देखनेसे निस्संदेह मृत्यु गले लग जाती है। बाजा, नाच, गान, गवैया, लाल वस्त्र, बजाया जाता हुआ मृदङ्ग—इन्हें देखकर अवश्यमेव दुःख मिलता है। प्राणरहित (मुर्दे)-को देखकर निश्चय ही मृत्यु होती है और जो मत्स्य आदिको धारण करता है, उसके भाईका मरण ध्रुव है। घायल अथवा बिना सिरका धड़ अथवा मुण्डित सिरवाले एवं शीघ्रतापूर्वक नाचते हुए बेडौल प्राणीको देखकर मनुष्य मौतका भागी हो जाता है। मरा हुआ पुरुष अथवा मरी हुई काले रंगकी भयानक म्लेच्छनारी जिसका स्वप्नमें आलिङ्गन करती है; उसका मर जाना निश्चित है। स्वप्नमें जिनके दाँत टूट जायँ और बाल गिर रहे हों तो उसके धनकी हानि होती है अथवा वह शारीरिक पीड़ासे दुःखी होता है। स्वप्नमें जिसके ऊपर सींगधारी अथवा दंष्ट्रावाले जीव तथा बालक और मनुष्य टूटे पड़ते हों; उसे राजाकी ओरसे भय प्राप्त होता है। गिरता हुआ कटा वृक्ष, शिलावृष्टि, भूसी, छूरा, लाल अङ्गारा और राखकी वर्षा देखनेसे दुःखकी प्राप्ति होती है। गिरते हुए ग्रह अथवा पर्वत, भयानक धूमकेतु अथवा टूटे हुए कंधेवाले मनुष्यको देखकर स्वप्नद्रष्टा दुःखका भागी होता है। जो स्वप्नमें रथ, घर, पर्वत, वृक्ष, गौ, हाथी और घोड़ा आकाशसे भूतलपर गिरता देखता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो भस्म और अङ्गारयुक्त गड्डोंमें, क्षारकुण्डोंमें तथा धूलिकी राशिपर ऊँचाईसे गिरते हैं; निस्संदेह उनकी मृत्यु होती है। जिसके मस्तकपरसे कोई दुष्ट बलपूर्वक छत्र खींच लेता है; उसके पिता, गुरु अथवा राजाका नाश हो जाता है। जिसके घरसे भयभीत हुई गौ बछड़ेसहित चली जाती है; उस पापीकी लक्ष्मी और पृथ्वी भी नष्ट हो जाती है। म्लेच्छ यमदूत जिसे पाशसे बाँधकर ले जाते हैं; उसकी मृत्यु निश्चित है। जिसे ज्योतिषी ब्राह्मण, ब्राह्मणी तथा गुरु रुष्ट होकर शाप देते हैं; उसे निश्चय ही विपत्ति भोगनी पड़ती है। जिसके शरीरपर शत्रुदल, कौए, मुर्गे और रीछ आकर टूट पड़ते हैं; उसकी अवश्य मृत्यु हो जाती है और स्वप्नमें जिसके ऊपर भैंसे, भालू, ऊँट, सूअर और गदहे क्रुद्ध होकर धावा करते हैं; वह निश्चय ही रोगी हो जाता है।
जो लाल चन्दनकी लकड़ीको घीमें डुबोकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रद्वारा अग्निमें हवन करता है; उसका दुःस्वप्नजनित दोष शान्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक इन मधुसूदनका एक हजार जप
| ६८६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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करता है; वह निष्पाप हो जाता है और उसका दुःस्वप्न भी सुखदायक हो जाता है। जो विद्वान् पवित्र हो पूर्वकी ओर मुख करके अच्युत, केशव, विष्णु, हरि, सत्य, जनार्दन, हंस, नारायण—इन आठ शुभ नामोंका दस बार जप करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है तथा दुःस्वप्न भी शुभकारक हो जाता है। जो भक्त भक्तिपूर्वक विष्णु, नारायण, कृष्ण, माधव, मधुसूदन, हरि, नरहरि, राम, गोविन्द, दधिवामन—इन दस माङ्गलिक नामोंको जपता है; वह सौ बार जप करके नीरोग हो जाता है। जो एक लाख जप करता है; वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। दस लाख जप करके महावन्ध्या पुत्रको जन्म देती है। शुद्ध एवं हविष्यका भोजन करके जपनेवाला दरिद्र इनके जपसे धनी हो जाता है। एक करोड़ जप करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। नारायणक्षेत्रमें शुद्धतापूर्वक जप करनेवाले मनुष्यको सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं¹। जो जलमें स्नान करके ‘ॐ नमः’ के साथ शिव, दुर्गा, गणपति, कार्तिकेय, दिनेश्वर, धर्म, गङ्गा, तुलसी, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती—इन मङ्गल-नामोंका जप करता है; उसका मनोरथ सिद्ध हो जाता है और दुःस्वप्न भी शुभदायक हो जाता है।
‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा’—यह सप्तदशाक्षर-मन्त्र लोगोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। इसका पवित्रतापूर्वक दस बार जप करनेसे दुःस्वप्न सुखदायक हो जाता है²। एक करोड़ जप करनेसे मनुष्योंको मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्धमन्त्रवाला मनुष्य अपनी सारी अभीष्ट सिद्धियोंको पा लेता है। जो मनुष्य ‘ॐ नमो मृत्युञ्जयाय स्वाहा’—इस मन्त्रका एक लाख जप करता है, वह स्वप्नमें मरणको देखकर भी सौ वर्षकी आयुवाला हो जाता है³। पूर्वोत्तरमुख होकर किसी विद्वान्से ही अपने स्वप्नको कहना चाहिये; किंतु जो शराबी, दुर्गतिप्राप्त, नीच, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, मूर्ख और (स्वप्नके शुभाशुभ फलका) अनभिज्ञ हो; उसके सामने स्वप्नको नहीं प्रकट करना चाहिये। पीपलका वृक्ष, ज्योतिषी, ब्राह्मण, पितृस्थान, देवस्थान, आर्यपुरुष, वैष्णव और मित्रके सामने दिनमें देखा हुआ स्वप्न प्रकाशित करना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे इस पवित्र प्रसङ्गका वर्णन कर दिया; यह पापनाशक, धनकी वृद्धि करनेवाला, यशोवर्धक और आयु बढ़ानेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हैं? (अध्याय ७९-८२)
१-अच्युतं केशवं विष्णुं हरिं सत्यं जनार्दनम्। हंसं नारायणं चैव ह्येतन्नामाष्टकं शुभम्॥
शुचिः पूर्वमुखः प्राज्ञो दशकृत्वश्च यो जपेत्। निष्पापोऽपि भवेत् सोऽपि दुःस्वप्नः शुभवान् भवेत्॥
विष्णुं नारायणं कृष्णं माधवं मधुसूदनम्। हरिं नरहरिं रामं गोविन्दं दधिवामनम्॥
भक्त्या चेमानि भद्राणि दश नामानि यो जपेत्। शतकृत्वो भक्तियुक्तो जप्त्वा नीरोगतां व्रजेत्॥
लक्षधा हि जपेद् यो हि बन्धनान्मुच्यते ध्रुवम्। जप्त्वा च दशलक्षं च महावन्ध्या प्रसूयते।
हविष्याशी यतः शुद्धो दरिद्रो धनवान् भवेत्।
शतलक्षं च जप्त्वा च जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। शुद्धो नारायणक्षेत्रे सर्वसिद्धिं लभेन्नरः।
(८२।४४-४९)
२-ॐ नमः शिवं दुर्गां गणपतिं कार्तिकेयं दिनेश्वरम्। धर्मं गङ्गां च तुलसीं राधां लक्ष्मीं सरस्वतीम्॥
नामान्येतानि भद्राणि जले स्नात्वा च यो जपेत्। वाञ्छितं च लभेत् सोऽपि दुःस्वप्नः शुभवान् भवेत्॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पूर्वं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा। कल्पवृक्षो हि लोकानां मन्त्रः सप्तदशाक्षरः।
शुचिश्च दशधा जप्त्वा दुःस्वप्नः सुखवान् भवेत्॥ (८२।५०-५२)
३-ॐ नमो मृत्युञ्जयायेति स्वाहान्तं लक्षधा जपेत्। दृष्ट्वा च मरणं स्वप्ने शतायुश्च भवेन्नरः।
(८२।५४)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६८७
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, संन्यासी तथा विधवा और पतिव्रता नारियोंके
धर्मका वर्णन
नन्दजीने पूछा- बेटा! तुम्हारा कल्याण
हो। अब तुम वेदों तथा ब्रह्मा आदिकी उत्पत्तिका
सारा कारण वर्णन करो; क्योंकि तुम्हारे सिवा मैं
और किससे पूछूँ? साथ ही ब्राह्मणों तथा
क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंका कार्य करनेवालोंके
जो धर्म हैं तथा संन्यासियों, यतियों, ब्रह्मचारियों,
वैष्णव-ब्राह्मणों, सत्पुरुषों, विधवाओं एवं पतिव्रता
नारियों, गृहस्थों, गृहस्थपत्नियों, विशेषतया शिष्यों
और माता-पिताके प्रति पुत्रों एवं कन्याओंके जो
धर्म हैं; उन सबको बतलानेकी कृपा करो। प्रभो!
स्त्रियोंकी कितनी जातियाँ होती हैं? भक्तोंके
कितने भेद हैं? ब्रह्माण्ड कितने प्रकारका है?
वदन (बोली या मुख) किस प्रकारका होता है?
नित्य क्या है और कृत्रिम क्या है? क्रमशः यह
सब बतलाओ।
श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी! ब्राह्मण सदा
संध्यावन्दनसे पवित्र होकर मेरी सेवा करता है
और नित्य मेरे प्रसादको खाता है। वह मुझे
निवेदन किये बिना कभी भी नहीं खाता; क्योंकि
जो विष्णुको अर्पित नहीं किया गया है, वह
अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान माना जाता
है। अतः विष्णुके प्रसादको खानेवाला ब्राह्मण
जीवन्मुक्त हो जाता है। नित्य तपस्यामें संलग्न
रहनेवाला, पवित्र, शमपरायण, शास्त्रज्ञ, व्रतों
और तीर्थोंका सेवी, नाना प्रकारके अध्यापन-कार्यसे
संयुक्त धर्मात्मा ब्राह्मण विष्णु-मन्त्रसे दीक्षित
होकर गुरुकी सेवा करता है; तत्पश्चात् उनकी
आज्ञा लेकर संग्रहवान् (गृहस्थ) बनता है। उसे
गुरुको नित्य-पूजनकी दक्षिणा देनी चाहिये तथा
निःसंदेह नित्य गुरुजनोंका पालन-पोषण करना
चाहिये; क्योंकि समस्त वन्दनीयोंमें पिता ही
महान् गुरु माना जाता है, परंतु पितासे सौगुनी
माता, मातासे सौगुना अभीष्टदेव और अभीष्टदेवसे
चारगुना मन्त्रतन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु श्रेष्ठ है।
गुरु प्रत्यक्षरूपमें ऐश्वर्यशाली भगवान् नारायण हैं।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही स्वयं
शिव हैं। सभी देवता गुरुमें सदा हर्षपूर्वक निवास
करते हैं। जिसके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट
हो जाते हैं, वे श्रीहरि भी गुरुके प्रसन्न होनेपर
प्रसन्न हो जाते हैं। गुरु यदि शिष्योंपर पुत्रके
समान स्नेह नहीं करते तो उन्हें ब्रह्महत्याका पाप
लगता है और आशीर्वाद न देनेसे उन्हें भी वह
फल भोगना पड़ता है।
जो विप्र सदा अपने धर्ममें तत्पर, ब्रह्मज्ञ
तथा सदा विष्णुकी सेवा करनेवाला है; वही
पवित्र है। उसके अतिरिक्त अन्य विप्र सदा
अपवित्र रहता है। जो ब्राह्मण होकर बैलोंको
जोतता है, शूद्रोंकी रसोई बनाता है, देवमूर्तियोंपर
चढ़े हुए द्रव्यसे जीवन-निर्वाह करता है, संध्या
नहीं करता, उत्साहहीन है, दिनमें नींद लेता है,
शूद्रके श्राद्धान्नको खाता है, शूद्रोंके मुर्दोंका दाह
करता है; ऐसे सभी ब्राह्मण शूद्रके समान माने
जाते हैं। जो विधिपूर्वक शालग्राम महायन्त्रकी
पूजा करके उनके अर्पित किये हुए नैवेद्यको
खाता है तथा उनके चरणोदकको पीता है; वह
सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसे विष्णुलोककी
प्राप्ति होती है; क्योंकि श्रीहरिका चरणोदक
पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। जो
शालग्राम-शिलाके जलसे अपनेको अभिषिक्त
करता है; उसने सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया
और समस्त यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली।
व्रजेश्वर ! शालग्राम-शिलाका जल गङ्गाजलसे दसगुना
बढ़कर है। जो ब्राह्मण उसे नित्य पान करता है;
वह जीवन्मुक्त एवं देवताओंके समान हो जाता
है। जो ब्राह्मणोंका नित्यकर्म, विष्णुके निवेदित
नैवेद्यका भोजन, उनकी यत्नपूर्वक पूजा, उनके
६८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
चरणोदकका सेवन, नित्य त्रिकाल संध्या और
भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, मेरे जन्मके दिन
तथा एकादशीको भोजन नहीं करता; हे तात! जो
व्रतपरायण होकर शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके
दिन आहार नहीं करता; वह ब्राह्मण जीवन्मुक्त
है। भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी उस विप्रके
चरणोंमें नतमस्तक होते हैं; अतः उस ब्राह्मणका
चरणोदक पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है।
जबतक उस ब्राह्मणके चरणोदकसे पृथ्वी भीगी
रहती है, तबतक उसके पितर कमलपत्रके पात्रमें
जल पीते हैं। विष्णुके प्रसादको खानेवाला
ब्राह्मण पृथ्वीको, तीर्थोंको और मनुष्योंको पवित्र
कर देता है तथा स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है। जो
ब्राह्मण विष्णुमन्त्रका उपासक है; वही वैष्णव है।
उस वैष्णव ब्राह्मणकी बुद्धि उत्कृष्ट होती है;
अतः उससे बढ़कर पुरुष दूसरा नहीं है। जो
किसी क्षेत्रमें जाकर पुरश्चरणपूर्वक नारायणका
जप करता है; वह अनायास ही अपने-आपका
तथा अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर
देता है। जिसके संकल्प तो बाहर होते हैं, परंतु
क्रियाएँ विष्णुपदमें होती हैं; वह एकनिष्ठ वैष्णव
अपने एक लाख पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है।
( भगवान् कहते हैं - ) ब्राह्मण और देवता
मेरे प्राण हैं, परंतु भक्त प्राणोंसे भी बढ़कर
प्रिय है। समस्त लोकोंमें जितने प्रिय पात्र हैं,
उनमें भक्तसे अधिक प्यारा मेरे लिये दूसरा कोई
नहीं है। इसलिये विष्णु-भक्तिसे रहित होकर
विष्णु-मन्त्रकी दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये।
उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको चाहिये कि वह
उदासीन एवं दुराचारी गुरुसे मन्त्रकी दीक्षा न
ग्रहण करे। यदि दैववश ग्रहण कर लेता है तो
वह निश्चय ही धनहीन हो जाता है। ब्राह्मणोंका
भोजन सदा मांसरहित हविष्यान्न है; क्योंकि
मांसका परित्याग कर देनेसे ब्राह्मण तेजमें सूर्यके
तुल्य हो जाता है। पूजक ब्राह्मण पहले स्थानको
भलीभाँति संस्कृत करके तब भोजन तैयार करता
है, फिर लिपे-पुते स्वच्छ स्थानपर भक्तिपूर्वक
मुझे निवेदित करके तत्पश्चात् आदरपूर्वक ब्राह्मणको
देकर तब स्वयं भोजन करता है। जो ब्राह्मणको
अर्पण न करके स्वयं खा जाता है; वह शराबीके
समान माना जाता है। चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके
समय अथवा जननाशौच या मरणाशौचमें अपवित्र
मनुष्यसे स्पर्श हो जानेपर भोजन-पात्र, भ्रष्ट-द्रव्य
तथा अन्नका तुरंत परित्याग कर देना चाहिये।
फिर धुली हुई धोती और गमछा धारण करके
पैर धोकर शुद्ध स्थानपर भोजन करना चाहिये।
द्विजातियोंको चाहिये कि सूर्यके रहते अर्थात्
दिनमें दो बार भोजन न करें; क्योंकि वैसा
करनेसे वह कर्म निष्फल हो जाता है और भोक्ता
नरकगामी होता है। हविष्यान्नका भोजन करनेवाले
संयमीको उचित है कि वह श्राद्धके दिन यात्रा,
युद्ध, नदी-तट, दुबारा भोजन और मैथुनका
परित्याग कर दे। जो विष्णुभक्त एवं बुद्धिमान् हो,
उसी ब्राह्मणको पात्रका दान देना चाहिये; किंतु
जो शूद्राका पति, शूद्रका पुरोहित, संध्याहीन,
दुष्ट, बैलोंको जोतनेवाला, शुक्र बेचनेवाला और
देव-प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला
हो; उसे यत्न करके कभी भी नहीं देना चाहिये।
इन लोगोंको पात्र प्रदान करनेसे ब्राह्मण नरकगामी
होता है। उस दिन पात्रका उपभोग करके मैथुन
करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। तात! कन्या
बेचनेवाला सबसे बढ़कर पापी होता है। जो
मूल्य लेकर कन्यादान करता है, वह महारौरव
नामक नरकमें जाता है, फिर कन्याके शरीरमें
जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक पितरोंसहित
वह, उसका पुत्र और पुरोहित भी कुम्भीपाक
नरकमें कष्ट भोगते हैं। इसलिये बुद्धिमान्को
चाहिये कि योग्य वरको ही कन्या प्रदान करें।
ब्रजेश्वर ! जो पुराणों तथा चारों वेदोंद्वारा वर्णित है,
वह ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंका धर्म मैंने कह दिया।
६२- चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८९
(अब क्षत्रियोंके धर्म बतलाता हूँ-) क्षत्रियोंको
सदा यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन, नारायणकी
अर्चा, राज्योंका पालन, युद्धमें निर्भीकता, ब्राह्मणोंको
नित्य दान, शरणागतकी रक्षा, प्रजाओं और
दुःखियोंका पुत्रवत् पालन, शस्त्रास्त्रकी निपुणता,
रणमें पराक्रम, तपस्या और धर्मकार्य करना
चाहिये। जो सदसद्विवेकवाली बुद्धिसे युक्त तथा
नीति-शास्त्रका ज्ञाता हो, उसका सदा पालन
करना चाहिये और सत्पुरुषोंसे भरी हुई सभामें
उसे नित्य नियुक्त करना चाहिये। प्रतापी एवं
यशस्वी क्षत्रिय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल
सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाका नित्य यत्नपूर्वक
पालन करता है। युद्धके लिये बुलाये जानेपर वह
युद्ध-दानसे विमुख नहीं होता; क्योंकि जो क्षत्रिय
युद्धमें प्राण-विसर्जन करता है, उसे यशस्कर
स्वर्गकी प्राप्ति होती है*।
वैश्योंका धर्म व्यापार, खेती करना, ब्राह्मणों
और देवताओंका पूजन, दान, तपस्या और व्रतका
पालन है। नित्य ब्राह्मणोंकी पूजा करना शूद्रका
धर्म कहा गया है। ब्राह्मणको कष्ट देनेवाला तथा
उसके धनपर अधिकार कर लेनेवाला शूद्र
चाण्डालताको प्राप्त हो जाता है। विप्रके धनका
अपहरण करनेवाला शूद्र असंख्य जन्मोंतक गीध,
सौ जन्मोंतक सूअर और फिर सौ जन्मोंतक
हिंसक पशुओंकी योनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र
ब्राह्मणी तथा अपनी माताके साथ व्यभिचार
करता है; वह पापी जबतक सौ ब्रह्मा नहीं बीत
जाते, तबतक कुम्भीपाकमें कष्ट भोगता है। वहाँ
वह खौलते हुए तैलमें डुबाया जाता है, रात-दिन
उसे साँप काटते रहते हैं; इस प्रकार यम-यातनासे
दुःखी होकर वह चीत्कार करता रहता है।
तत्पश्चात् वह पापी सात जन्मोंतक चाण्डाल-
योनिमें, सात जन्मोंतक सर्प-योनिमें और सात
जन्मोंतक जल-जन्तुओंकी योनिमें उत्पन्न होता
है। फिर वह असंख्य जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा
तथा सात जन्मोंतक कुलटा स्त्रियोंकी योनिका
कीट होता है। पुनः वह पापी सात जन्मोंतक
गौओंके घावका कीड़ा होता है। इस प्रकार उसे
अनेक योनिमें भ्रमण करते ही बीतता है; परंतु
मनुष्यकी योनि नहीं मिलती।
अब संन्यासियोंका जो धर्म है, वह मेरे
मुखसे श्रवण करो। मनुष्य दण्ड-ग्रहणमात्रसे
नारायणस्वरूप हो जाता है। जो संन्यासी मेरा
ध्यान करता है; वह अपने पूर्वकर्मोंको जलाकर
वर्तमान-जन्मके कर्मोंका उच्छेद कर डालता है
और अन्तमें उसे मेरे लोककी प्राप्ति होती है।
व्रजराज ! जैसे वैष्णवके चरणस्पर्शसे तीर्थ तत्काल
पवित्र हो जाते हैं; वैसे ही संन्यासीके पादस्पर्शसे
पृथ्वी तुरंत पावन हो जाती है। मनुष्य संन्यासीका
स्पर्श करनेसे पापरहित हो जाता है। संन्यासीको
भोजन कराकर अश्वमेधयज्ञका फल तथा अकस्मात्
संन्यासीको देखकर उसे नमस्कार करके राजसूय-
यज्ञका फल पाता है। संन्यासी, यति और
ब्रह्मचारी-इन सबके दर्शन-स्पर्शका फल एक-
सा होता है।
संन्यासीको चाहिये कि वह भूखसे व्याकुल
होनेपर सायंकाल गृहस्थोंके घर जाय और वहाँ
गृहस्थ उसे सदन्न अथवा कदन्न जो कुछ भी दे;
उसका परित्याग न करे। न तो मिष्टान्नकी
याचना करे, न क्रोध करे और न धन ग्रहण करे।
एक वस्त्र धारण करे, इच्छारहित हो जाय,
जाड़ा-गरमीमें एक-सा रहे और लोभ-मोहका
परित्याग कर दे। इस प्रकार वहाँ एक रात
ठहरकर प्रातःकाल दूसरे स्थानको चला जाय।
*हस्त्यरथपदातं सेनाङ्गं च चतुष्टयम्। पालयेद् यत्नतो नित्यं यशस्वी च प्रतापवान् ॥
रणे निमन्त्रितश्चैव दाने न विमुखो भवेत्। रणे यो वा त्यजेत् प्राणांस्तस्य स्वर्गो यशस्करः ॥
(८३।७१-७२)
६९०
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो संन्यासी सवारीपर चढ़ता है, गृहस्थका धन
ग्रहण करता है और घर बनाकर स्वयं गृहस्थ
हो जाता है; वह अपने रमणीय धर्मसे पतित
हो जाता है। जो संन्यासी खेती और व्यापार
करके कुकर्म करता है, उसका आचरण भ्रष्ट
हो जाता है और वह अपने धर्मसे गिर जाता
है। यदि वह स्वधर्मी अपना शुभ अथवा अशुभ
कर्म करता है तो धर्म-बहिष्कृत अथवा उपहासका
पात्र होता है।
जो ब्राह्मणी विधवा हो जाय- उसे सदा
कामनारहित, दिनके अन्तमें एक बार भोजन
करनेवाली और सदा हविष्यान्नपरायण होना
चाहिये। उसे दिव्य माङ्गलिक वस्त्र नहीं धारण
करना चाहिये; बल्कि सुगन्धित द्रव्य, सुवासित
तेल, माला, चन्दन और चूड़ी-सिन्दूर-आभूषणका
त्याग करके मलिन वस्त्र पहनना चाहिये। नित्य
नारायणका स्मरण तथा नित्य नारायणकी सेवा
करनी चाहिये। वह अनन्यभक्तिपूर्वक नारायणके
नामोंका कीर्तन करती है और सदा धर्मानुसार
पर-पुरुषको पुत्रके समान देखती है। ब्रजेश्वर !
वह न तो मिष्टान्नका भोजन करती है और न
भोग-विलासकी वस्तुओंका संग्रह करती है। उसे
पवित्र रहकर एकादशी, कृष्ण-जन्माष्टमी,
श्रीरामनवमी, शिवरात्रि, भाद्रपदमासके कृष्णपक्षकी
चतुर्दशी, नरक-चतुर्दशी तथा चन्द्रमा और सूर्यके
ग्रहणके समय भोजन नहीं करना चाहिये। वह
भ्रष्ट पदार्थोंका परित्याग करके उसके अतिरिक्त
उत्तम पदार्थोंको खाती है। श्रुतियोंमें सुना गया है
कि विधवा स्त्री, यति, ब्रह्मचारी और संन्यासियोंके
लिये पान मदिराके समान है। इन सभी लोगोंको
रक्तवर्णका शाक, मसूर, जँभीरी नीबू, पान और
गोल लौकीका परित्याग कर देना चाहिये।
विधवा नारी पलङ्गपर सोनेसे पतिको (स्वर्गसे)
नीचे गिरा देती है और सवारीपर चढ़कर वह
स्वयं नरकगामिनी होती है। उसे बाल और शरीरका
शृङ्गार नहीं करना चाहिये। जटारूपमें परिवर्तित
हुई केश-वेणीको तीर्थमें गये बिना कटाना नहीं
चाहिये और न शरीरमें तेल लगाना चाहिये। वह
दर्पण, पर-पुरुषका मुख, यात्रा, नृत्य, महोत्सव,
नाच-गान और सुन्दर वेषधारी रूपवान् पुरुषको
नहीं देखती। उसे सामवेदमें निरूपण किये गये
सत्पुरुषोंका धर्म श्रवण करना चाहिये।
अब मैं आपसे परमोत्कृष्ट परमार्थका वर्णन
करता हूँ, सुनो। सदा अध्यापन, अध्ययन,
शिष्योंका परिपालन, गुरुजनोंकी सेवा, नित्य
देवता और ब्राह्मणका पूजन, सिद्धान्तशास्त्रमें
निपुणताका उत्पादन, अपने-आपमें संतोष, सर्वथा
शुद्ध व्याख्यान, निरन्तर ग्रन्थका अभ्यास, व्यवस्थाके
सुधारके लिये वेदसम्मत विचार, स्वयं शास्त्रानुसार
आचरण, देवकार्य और नित्यकर्मोंमें निपुणता,
वेदानुसार अभीष्ट आचार-व्यवहार, वेदोक्त पदार्थोंका
भोजन और पवित्र आचरण करना चाहिये।
ब्रजेश्वर ! अब पतिव्रताओंका जो धर्म है,
उसे श्रवण करो। पतिव्रताको चाहिये कि नित्य
पतिके प्रति उत्सुकता रखकर उनका चरणोदक
पान करे; सदा भक्तिभावपूर्वक उनकी आज्ञा
लेकर भोजन करे। प्रयत्नपूर्वक व्रत, तपस्या और
देवार्चनका परित्याग करके चरण-सेवा, स्तुति
और सब प्रकारसे पतिकी संतुष्टि करे। सतीको
पतिकी आज्ञाके बिना वैरभावसे कोई कर्म नहीं
करना चाहिये। सती अपने पतिको सदा नारायणसे
बढ़कर समझती है। ब्रजनाथ ! उत्तम व्रतपरायणा
सती पर-पुरुषके मुख, सुन्दर-वेषधारी सौन्दर्यशाली
पुरुष, यात्रा, महोत्सव, नाच, नाचनेवाले, गवैय्या
और पर-पुरुषकी क्रीड़ाकी ओर कभी दृष्टि नहीं
डालती। जो आहार पतियोंको प्रिय होता है, वही
सदा पतिव्रताओंको भी मान्य होता है। पतिव्रता
क्षणभर भी पतिसे वियुक्त नहीं होती। वह
पतिसे उत्तर-प्रत्युत्तर नहीं करती। ताड़ना मिलनेपर
भी उसका स्वभाव शुद्ध ही बना रहता है; वह
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६११
क्रोधके वशीभूत नहीं होती। पतिव्रताको चाहिये कि पतिके भूखे होनेपर उसे भोजन कराये; भोजनके लिये उत्तम-उत्तम पदार्थ और पीनेके लिये शुद्ध जल दे; नींदसे माते हुए पतिको न जगावे और उसे काम करनेके लिये आज्ञा न दे। सतीको पतिके साथ पुत्रोंसे भी सौगुना अधिक प्रेम करना चाहिये; क्योंकि कुलाङ्गनाके लिये पति ही बन्धु, आश्रय, भरण-पोषण करनेवाला और देवता है। वह सुन्दरी अमृतके समान शुभकारक अपने पतिको देखकर बड़े यत्नसे भक्तिभावपूर्वक मुस्कराते हुए उसकी ओर निहारती है। सती नारी अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर देती है। पतिव्रताओंके पति समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; क्योंकि सतियोंके पातिव्रत्यके तेजसे उनका कर्मभोग समाप्त हो जाता है। इस प्रकार वे कर्मरहित होकर अपनी पतिव्रता पत्नीके साथ श्रीहरिके भवनमें आनन्द प्राप्त करते हैं।
ब्रजेश ! पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी सतीके चरणोंमें निवास करते हैं। सम्पूर्ण देवताओं और मुनियोंका तेज सतियोंमें वर्तमान रहता है। तपस्वियोंकी सारी तपस्या तथा व्रतोपवाससे व्रतियोंको एवं दान देनेसे दाताओंको जो फल प्राप्त होता है; वह सारा-का-सारा सदा पतिव्रताओंमें विद्यमान रहता है। स्वयं नारायण, शम्भु, लोकोंके विधाता ब्रह्मा, सारे देवता और मुनि भी सदा पतिव्रताओंसे डरते रहते हैं। सतियोंकी चरण-धूलिके स्पर्शसे पृथ्वी तत्काल ही पावन हो जाती है। पतिव्रताको नमस्कार करके मनुष्य पापसे छूट जाता है। पतिव्रता अपने तेजसे क्षणभरमें ही त्रिलोकीको भस्मसात् कर डालनेमें समर्थ है; क्योंकि वह सदा महान् पुण्यसे सम्पन्न रहती है। सतियोंके पति और पुत्र साधु एवं निःशङ्क हो जाते हैं; क्योंकि उन्हें देवताओं तथा यमराजसे भी कुछ भय नहीं रह जाता। सौ जन्मोंतक पुण्य संग्रह करनेवाले पुण्यवानोंके घरमें पतिव्रता जन्म लेती है। पतिव्रताके पैदा होनेसे उसकी माता पावन हो जाती है तथा पिता जीवन्मुक्त हो जाते हैं।
सती स्त्री प्रातःकाल उठकर रात्रिमें पहने हुए वस्त्रको छोड़कर पतिको नमस्कार करके हर्षपूर्वक स्तवन करती है। तत्पश्चात् गृहकार्य सम्पन्न करके नहाकर धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण करती है। फिर श्वेत पुष्प लेकर भक्तिपूर्वक पतिका पूजन करती है। पवित्र निर्मल जलसे स्नान कराकर उसे धौत-वस्त्र देकर वह हर्षपूर्वक पतिका पादप्रक्षालन करती है। फिर आसनपर बिठाकर, ललाटमें चन्दनका तिलक लगाकर, सर्वाङ्गमें (इत्र आदिका) अनुलेप करके गलेमें माला पहनाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक अमृतोपम भोग-पदार्थोंद्वारा भक्तिभावसहित भलीभाँति पूजन और स्तवन करके हर्षके साथ पतिके चरणोंमें नमस्कार करती है। ‘ॐ नमः कान्ताय शान्ताय सर्वदेवाश्रयाय स्वाहा’—इसी मन्त्रसे पुष्प, चन्दन, पाद्य, अर्घ्य, धूप, दीप, वस्त्र, उत्तम नैवेद्य, शुद्ध सुगन्धित जल और सुवासित ताम्बूल समर्पित करके स्तोत्र-पाठ करना चाहिये। जो-जो कर्म किया जाय, सभीमें इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये।
ॐ चन्द्रशेखरस्वरूप प्रियतम पतिको नमस्कार है। आप शान्त, उदार और सम्पूर्ण देवताओंके आश्रय हैं; आपको प्रणाम है। सतीके प्राणाधार एवं ब्रह्मस्वरूप आपको अभिवादन है। आप नमस्कारके योग्य, पूजनीय, हृदयके आधार, पञ्च प्राणोंके अधिदेवता, आँखकी पुतली, ज्ञानाधार और पत्नियोंके लिये परमानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। पति ही ब्रह्मा, पति ही विष्णु, पति ही महेश्वर और पति ही निर्गुणाधार ब्रह्मरूप हैं; आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। भगवन् ! मुझसे जानमें अथवा अनजानमें जो कुछ दोष घटित हुआ है; उसे क्षमा कर दीजिये। पत्नीबन्धो ! आप
६९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तो दयाके सागर हैं; अतः मुझ दासीका अपराध
स्तोत्रको सुनती है; उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो
जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त हो जाता है,
निर्धनको धन मिल जाता है, रोगी रोगसे मुक्त हो
जाता है और बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है।
ब्रजेश्वर ! पतिव्रता इसके द्वारा स्तवन करके
तीर्थस्नानका फल तथा सम्पूर्ण तपस्याओं और
व्रतोंका फल पाती है*। इस प्रकार स्तुति-
नमस्कार करके पतिकी आज्ञासे वह भोजन
करती है। व्रजराज ! इस प्रकार मैंने पतिव्रताके
धर्मका वर्णन कर दिया, अब गृहस्थोंका धर्म
सुनिये। (अध्याय ८३)
क्षमा कर दें। ब्रजेश्वर ! पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भमें
लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी और गङ्गाने इस महान्
पुण्यमय स्तोत्रका पाठ किया था। पूर्वकालमें
सावित्रीने भी नित्यशः इस स्तोत्रद्वारा ब्रह्माका
स्तवन किया था। कैलासपर पार्वतीने भक्तिपूर्वक
शंकरके लिये इस स्तोत्रका पाठ किया था।
प्राचीनकालमें मुनिपत्नियों तथा देवाङ्गनाओंने भी
इसके द्वारा स्तुति की थी। अतः सभी पतिव्रताओंके
लिये यह स्तोत्र शुभदायक है। जो पतिव्रता
अथवा अन्य पुरुष या नारी इस महान् पुण्यदायक
गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके
त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
श्रीभगवान् कहते हैं- नन्दजी ! गृहस्थ
पुरुष सदा ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन करता
है तथा चारों वर्णोंके धर्मानुसार अपने वर्ण-धर्मके
पालनमें तत्पर रहता है। इसीलिये देवता आदि
सभी प्राणी गृहस्थोंकी आशा करते हैं। गृहस्थ
अतिथिका आदर-सत्कार करके सदा पवित्र बना
रहता है। (पिण्डदान आदि) कर्मके अवसरपर
पितर और अतिथि-पूजनके समय सारे देवता
उसी प्रकार गृहस्थके पास आते हैं, जैसे गौएँ
पानीसे भरे हुए हौजके पास जाती हैं। भूखा
अतिथि सायंकाल प्रयत्नपूर्वक गृहस्थके घर आता
है और वहाँ आदर-सत्कार पाकर उसे आशीर्वाद
देनेके पश्चात् उस गृहस्थके घरसे विदा होता है।
अतिथिका पूजन न करनेसे गृहस्थ पापका भागी
होता है और उसे त्रिलोकीमें उत्पन्न सारे पाप
भोगने पड़ते हैं; इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौट जाता
है, उसके घरका उसके पितर, देवता और अग्नयाँ
भी परित्याग कर देती हैं तथा वह अतिथि
उसे अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर
- ॐ नमः कान्ताय भर्त्रे च शिरश्चन्द्रस्वरूपिणे ।
नमः शान्ताय दान्ताय सर्वदेवाश्रयाय च। नमो ब्रह्मस्वरूपाय सतीप्राणपराय च॥
नमस्याय च पूज्याय हृदाधाराय ते नमः।
पञ्चप्राणाधिदेवाय चक्षुषस्तारकाय च। ज्ञानाधाराय पत्नीनां परमानन्दरूपिणे ॥
पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः पतिरेव महेश्वरः । पतिश्च निर्गुणाधारो ब्रह्मरूपो नमोऽस्तु ते ॥
क्षमस्व भगवन् दोषं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत् । पत्नीबन्धो दयासिन्धो दासीदोषं क्षमस्व मे ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं सृष्ट्यादौ पद्माया कृतम् । सरस्वत्या च धरया गङ्गया च पुरा व्रज ॥
सावित्र्या च कृतं पूर्वं ब्रह्मणे चापि नित्यशः । पार्वत्या च कृतं भक्त्या कैलासे शङ्कराय च ॥
मुनीनां च सुराणां च पत्नीभिश्च कृतं पुरा । पतिव्रतानां सर्वासां स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं या शृणोति पतिव्रता । नरोऽन्यो वापि नारी वा लभते सर्ववाञ्छितम् ॥
अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम् । रोगी च मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥
पतिव्रता च स्तुत्वा च तीर्थस्नानफलं लभेत् । फलं च सर्वतपसां व्रतानां च ब्रजेश्वर।
(८३।१३६-१४६)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६९३
चला जाता है। इसलिये उत्तम विचारसम्पन्न धर्मज्ञ
गृहस्थ पहले देवता आदि सबकी सेवा करके
फिर आश्रितवर्गका भरण-पोषण करनेके पश्चात्
स्वयं भोजन करता है। जिसके घरमें माता नहीं
है और पत्नी पुंश्चली है, उसे वनवासी हो जाना
चाहिये; क्योंकि उसके लिये वह गृह वनसे भी
बढ़कर दुःखदायक है। वह दुष्टा सदा पतिसे द्वेष
करती है और उसे विष-तुल्य समझती है। वह
उसे भोजन तो देती नहीं; उलटे सदा डाँट-
फटकार सुनाती रहती है।
व्रजेश! अब गृहस्थ-पत्नियोंका जो सदाचार
श्रुतिमें वर्णित है, उसे श्रवण करो। गृहिणी नारी
पतिपरायणा तथा देव-ब्राह्मणकी पूजा करनेवाली
होती है। उस शुद्धाचारिणीको चाहिये कि प्रातःकाल
उठकर देवता और पतिको नमस्कार करके
आँगनमें गोबर और जलसे लीपकर मङ्गल-कार्य
सम्पन्न करे। फिर गृह-कार्य करके स्नान करे
और घरमें आकर देवता, ब्राह्मण और पतिको
नमस्कार करके गृहदेवताकी पूजा करे। इस प्रकार
सती नारी घरके सारे कार्योंसे निवृत्त होकर
पतिको भोजन कराती है और अतिथि-सेवा
करनेके पश्चात् स्वयं सुखपूर्वक भोजन करती है।
पुत्रोंको चाहिये कि वे पिताको स्नान कराकर
उनकी पूजा करें। यों ही शिष्योंको गुरुका पूजन
करना चाहिये। पुत्र और शिष्यको सेवककी
भाँति उनके आज्ञानुसार सारा कार्य करना उचित
है। पिता और गुरुमें कभी मनुष्य-बुद्धि नहीं
करनी चाहिये। पिता, माता, गुरु, भार्या, शिष्य,
स्वयं अपना निर्वाह करनेमें असमर्थ पुत्र, अनाथ
बहिन, कन्या और गुरु-पत्नीका नित्य भरण-
पोषण करना कर्तव्य है। तात! इस प्रकार मैंने
सबके उत्तम धर्मका वर्णन कर दिया।
व्रजेश! स्त्री-जाति तो वस्तुतः शुद्ध है।
उसमें वे सारी पतिव्रताएँ और भी पावन मानी
जाती हैं। सृष्टिके आदिमें ब्रह्माने एक ही प्रकारसे
सारी जातियोंकी रचना की थी। वे सभी उत्तम
बुद्धिवाली पवित्र नारियाँ प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न
हुई थीं। जब केदार-कन्याके * शापसे वह धर्म
नष्ट हो गया, तब ब्रह्माने कुपित होकर पुनः स्त्री-
जातिका निर्माण किया और उसे तीन भागोंमें
विभक्त कर दिया। उनमें पहली उत्तमा, दूसरी
मध्यमा और तीसरी अधमा कही जाती है।
धर्मसम्पन्ना उत्तमा स्त्री पतिकी भक्त होती है।
वह प्राणोंपर आ बीतनेपर भी अपकीर्ति पैदा
करनेवाले जार पुरुषको नहीं स्वीकार करती। जो
गुरुजनोंद्वारा यत्नपूर्वक रक्षित होनेके कारण
भयवश जार पुरुषके पास नहीं जाती और अपने
पतिको कुछ-कुछ मानती है, वह कृत्रिमा नारी
मध्यमा कही जाती है। नन्दजी ! ऐसी नारियोंका
सतीत्व जहाँ स्थानाभाव है, समय नहीं मिलता है
और प्रार्थना करनेवाला जार पुरुष नहीं है; वहीं
स्थिर रह सकता है। अत्यन्त नीच कुलमें उत्पन्न
हुई अधमा स्त्री परम दुष्टा, अधर्मपरायणा, दुष्ट
स्वभाववाली, कटुवादिनी और झगड़ालू होती
है। वह सदा उपपतिकी सेवा करती है और
अपने पतिकी नित्य भर्त्सना करती रहती है, उसे
दुःख देती है और विष-तुल्य समझती है। उसका
पति भले ही भूतलपर रूपवान्, धर्मात्मा, प्रशंसनीय
और महापुरुष हो; परंतु वह उपाय करके
उपपतिद्वारा उसे मरवा डालती है। उसकी प्रीति
बिजलीकी चमक और जलपर खिंची हुई
रेखाके समान क्षणभङ्गुर होती है। वह सदा
अधर्ममें तत्पर रहकर निश्चित रूपसे कपटपूर्ण
वचन ही बोलती है। उसका मन न तो व्रत,
तपस्या, धर्म और गृहकार्यमें ही लगता है और
न गुरु तथा देवताओंकी ओर ही झुकता है।
- केदार-कन्याका उपाख्यान इसी खण्डमें अन्यत्र देखना चाहिये।
६९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नन्दजी ! इस प्रकार तीन भेदोंवाली स्त्रीजातिकी
कथा मैंने कह दी, अब विभिन्न प्रकारके भक्तोंका
लक्षण सुनिये।
तृणकी शय्याका प्रेमी भक्त सांसारिक सुखोंके
कारणोंका त्याग करके अपने मनको मेरे नाम
और गुणके कीर्तनमें लगाता है। वह मेरे चरणकमलका
ध्यान करता है और भक्तिभावसहित उसका
पूजन करता है। देवगण उस निष्काम भक्तकी
अहैतुकी पूजाको ग्रहण करते हैं। ऐसे भक्त
अणिमा आदि सारी अभीष्ट सिद्धियोंकी तथा
सुखके कारणभूत ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा देवत्वकी
कामना नहीं करते। उन्हें हरिकी दासताके बिना
सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य आदि
चारों मुक्तियोंकी अभिलाषा नहीं रहती और न वे
निर्वाण-मुक्ति तथा अभीप्सित अमृत-पानकी ही
स्पृहा करते हैं। उन्हें मेरी अतुलनीय निश्चल
भक्तिकी ही लालसा रहती है। ब्रजेश्वर ! उन श्रेष्ठ
सिद्धेश्वरोंमें स्त्री-पुरुषका भेद नहीं रहता और न
समस्त जीवोंमें भिन्नता रहती है। वे दिगम्बर
होकर भूख-प्यास आदि तथा निद्रा, लोभ, मोह
आदि शत्रुओंका त्याग करके रात-दिन मेरे
ध्यानमें निमग्न रहते हैं। नन्दजी ! यह मेरे सर्वश्रेष्ठ
भक्तके लक्षण हैं। अब मध्यम आदि भक्तोंका
लक्षण श्रवण करो। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मके
प्रभावसे पवित्र हुआ गृहस्थ कर्मोंमें आसक्त न
होकर सदा पूर्वकर्मका उच्छेदक कर्म ही करता
है; वह यत्नपूर्वक कोई दूसरा कर्म नहीं करता;
क्योंकि उसे किसी कर्मकी कामना ही नहीं
रहती। वह मन, वाणी और कर्मसे सदा ऐसा
चिन्तन करता रहता है कि जो कुछ कर्म है, वह
सब श्रीकृष्णका है, मैं कर्मका कर्ता नहीं हूँ। ऐसा
भक्त मध्यम श्रेणीका होता है। जो उससे भी
नीची कोटिका है; वह श्रुतिमें प्राकृतिक अर्थात्
अधम कहा गया है। उत्तम कोटिका भक्त
अपने हजारों पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है।
उसे स्वप्नमें भी यमराज अथवा यमदूतका दर्शन
नहीं होता। मध्यम कोटिका भक्त अपनी सौ
पीढ़ियोंका तथा प्राकृत भक्त पचीस पीढ़ियोंका
उद्धारक होता है। तात ! इस प्रकार मैंने आपके
आज्ञानुसार तीन प्रकारके भक्तोंका वर्णन कर
दिया। अब सावधानतया ब्रह्माण्डकी रचनाका
आख्यान श्रवण कीजिये।
नन्दजी ! भक्तलोग यत्न करनेपर ब्रह्माण्ड-
रचनाका प्रयोजन जान लेते हैं। मुनियों, देवताओं
और संतोंको बड़े दुःखसे कुछ-कुछ ज्ञात होता
है। पूर्णरूपसे विश्वका ज्ञान तो अनन्तस्वरूप
मुझको, ब्रह्मा और महेश्वरको है। हमारे अतिरिक्त
धर्म, सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, कपिल,
गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेद, वेदमाता
सावित्री, स्वयं सर्वज्ञा राधिका-ये लोग भी
विश्व-रचनाका अभिप्राय जानते हैं, इनके अतिरिक्त
और किसीको पता नहीं है। उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न
सभी विद्वान् इसके वैषम्यार्थको पूर्णरूपसे जाननेमें
असमर्थ हैं। जैसे आकाश और आत्मा नित्य हैं;
उसी प्रकार दसों दिशाएँ नित्य हैं। जैसे प्रकृति
नित्य है, वैसे ही विश्वगोलक नित्य है। जैसे
गोलोक नित्य है, उसी तरह वैकुण्ठ भी नित्य है।
एक समयकी बात है। जब मैं गोलोकमें रास-
क्रीड़ा कर रहा था, उसी समय मेरे वामाङ्गसे
एक षोडशवर्षीया नारी प्रकट हुई। वह अत्यन्त
सुन्दरी बाला रमणियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उसके
शरीरका रंग श्वेत चम्पकके समान गौर था।
उसकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाको लज्जित
कर रही थी। वह रत्नाभरणोंसे भूषित थी और
उसके अङ्गपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ी
शोभा पा रही थी। उसके सभी अङ्ग मनोहर और
कोमल थे तथा उसका प्रसन्नमुख मन्द-मन्द
मुस्कानसे सुशोभित था। उसके चरणोंका अधोभाग
सुन्दर महावरसे उद्भासित हो रहा था। वह सुन्दर
नेत्रोंवाली सौन्दर्यशालिनी बाला गजेन्द्रकी-सी
६३- केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९५
चाल चल रही थी। उस कामिनीने रासक्रीड़ाके अवसरपर प्रकट होकर मुझे आगेसे पकड़ लिया। इसी कारण पुरातत्त्ववेत्ताओंने उसका ‘राधा' नाम रखा और उसकी पूजा की। उसकी प्रकृति परम प्रसन्न थी; इसलिये वह ईश्वरी ‘प्रकृति' कहलायी। समस्त कार्योंमें समर्थ होनेके कारण वह ‘शक्ति' नामसे कही जाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा, सर्वरूपा और सब तरहसे मङ्गलके योग्य है; सम्पूर्ण मङ्गलोंके दानमें दक्ष होनेके कारण वह ‘सर्वमङ्गला' है। वह वैकुण्ठमें ‘महालक्ष्मी' और मूर्तिभेदसे ‘सरस्वती' है। वेदोंको उत्पन्न करनेके कारण वह ‘वेदमाता' नामसे प्रसिद्ध है। वह ‘सावित्री' और तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाली ‘गायत्री' भी है। पूर्वकालमें उसने दुर्गका संहार किया था; इसी कारण वह ‘दुर्गा' नामसे विख्यात है। यह सती प्राचीनकालमें समस्त देवताओंके तेजसे आविर्भूत हुई थी, इसीसे यह ‘आद्याप्रकृति' कहलाती है। यह समस्त असुरोंका मर्दन करनेवाली, सम्पूर्ण आनन्दकी दाता, आनन्दस्वरूपा, दुःख और दरिद्रताका विनाश करनेवाली, शत्रुओंको भय प्रदान करनेवाली और भक्तोंके भयकी विनाशिका है। वही ‘सती' रूपसे दक्षकी कन्या हुई और पुनः हिमालयसे उत्पन्न होकर ‘पार्वती' कहलाती है। वह सबकी आधारस्वरूपा है। पृथ्वी उसकी एक कला है। तुलसी और गङ्गा उसीकी कलासे उत्पन्न हुई हैं। यहाँतक कि सम्पूर्ण स्त्रियोंका आविर्भाव उसकी कलासे ही हुआ है। तात! जिस शक्तिसे सम्पन्न होकर मैं बारंबार सृष्टि-रचना करता हूँ, उसे रासके मध्य स्थित देखकर मैंने उसके साथ क्रीड़ा की। उस समय रासमण्डलमें उन दोनोंके शरीरसे जो पसीनेकी बूँदें भूतलपर गिरीं, उनसे एक मनोहर सरोवर उत्पन्न हो गया, जो राधाके नामके सदृश था (अर्थात् उसका नाम राधासरोवर हुआ)। उस सरोवरसे जो पसीनेकी धारा वेगपूर्वक नीचे विश्व-गोलकमें गिरी, उससे सारा ब्रह्माण्डगोलक जलसे भर गया। ब्रजेश्वर! पहले-पहल सब कुछ जलमग्न था; उस समय सृष्टि नहीं हुई थी। तब शृङ्गारके समाप्त होनेपर मैंने राधामें वीर्यका आधान किया। तत्पश्चात् श्रीराधिकाने गर्भ धारण करके दीर्घकालके बाद एक परम अद्भुत डिम्ब प्रसव किया। उसे देखकर देवीको क्रोध आ गया; तब उन्होंने उसे पैरसे नीचे विश्व-गोलकमें ढकेल दिया। तात! वह जलमें गिर पड़ा और सबका आधारस्वरूप ‘महान् विराट्' हो गया। तब अपनी संतानको जलमें पड़ा हुआ देखकर मैंने राधाको शाप दे दिया। विभो! मेरे शापके कारण राधा संतानहीन हो गयी। ब्रजेश्वर! इसलिये जिस डिम्बसे कलाका आश्रय लेकर वह महान् विराट् पैदा हुआ था, उसीसे दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती तथा अन्यान्य जो देवियाँ और स्त्रियाँ हैं; वे सभी क्रमशः कला, कलांश और कलांशके अंशसे उत्पन्न हुई हैं।
ब्रजेश! उस महान् विराट्ने मेरे द्वारा दिये गये अंगुष्ठामृतका पान किया और फिर स्वकर्मानुसार स्थावर-रूप होकर वह जलमें शयन करने लगा। योगबलसे जल ही उसकी शय्या और उपाधान था तथा उसके रोमकूप सदा जलसे भरे रहते थे। पुनः उनमें ‘क्षुद्र विराट्' शयन करने लगा। उस क्षुद्र विराट्की नाभिसे सहस्रदल कमल उत्पन्न हुआ। उस कमलपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने जन्म लिया; इसी कारण वे कमलोद्भव कहे जाते हैं। वहाँ आविर्भूत होकर वे ब्रह्मा चिन्ताग्रस्त हो यों सोचने लगे—'यह देह किससे उत्पन्न हुई है तथा मेरे माता-पिता और भाई-बन्धु कहाँ हैं?' इसी चिन्तामें वे तीन लाख दिव्य वर्षोंतक उस कमलके भीतर चक्कर काटते रहे। तत्पश्चात् पाँच लाख दिव्य वर्षोंतक उन्होंने तपस्याद्वारा मेरा स्मरण किया, तब मैंने उन्हें मन्त्र प्रदान किया, जिसका वे पवित्रतापूर्वक इन्द्रियोंको काबूमें करके
६९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नियतरूपसे सात लाख दिव्य वर्षोंतक उस
कमलके अंदर जप करते रहे। इसके बाद मुझसे
वर पाकर उन सृष्टिकर्ताने सृष्टिकी रचना की।
मेरी मायाके बलसे ब्रह्माने प्रत्येक ब्रह्माण्डमें
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल, द्वादश आदित्य,
एकादश रुद्र, नौ ग्रह, आठ वसु, तीन करोड़
देवता, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यक्ष, गन्धर्व,
किन्नर, भूत-प्रेत आदि राक्षस एवं चराचर जगत्की
रचना की। उन्होंने प्रत्येक विश्वमें क्रमशः सात
स्वर्ग, सात सागरोंसे संयुक्त स्वर्णभूमिवाली
सप्तद्वीपवती पृथ्वी, अन्धकारमय स्थान, सात
पाताल तथा इनसे युक्त ब्रह्माण्डका निर्माण
किया। प्रत्येक विश्वमें चन्द्रमा, सूर्य, पुण्यक्षेत्र
भारत और इन गङ्गा आदि तीर्थोंकी सृष्टि की।
ब्रजेश्वर ! महाविष्णुके शरीरमें जितने रोमकूप हैं,
क्रमशः उतने ही असंख्य विश्व हैं। उन विश्वोंके
ऊर्ध्वभागमें वैकुण्ठ है, जो निराश्रय है तथा मेरी
इच्छासे जिसका निर्माण हुआ है। वेद भी उसका
वर्णन करके पार नहीं पा सकते। निश्चय ही
कुयोगियों तथा भक्तिहीनोंके लिये उसका दर्शन
दुर्लभ है। इससे ऊपर गोलोक है। वह परम
विचित्र आश्रयस्थान वायुके आधारपर टिका
हुआ है। मेरी इच्छासे उस अत्यन्त रमणीय
अविनाशी लोकका निर्माण हुआ है। वह शतशृङ्ग
पर्वत, पुण्यमय वृन्दावन, रमणीय रासमण्डल
तथा विरजा नदीसे युक्त है। विरजा अमूल्य
रत्नसमूहों, हीरा, माणिक्य तथा कौस्तुभ आदि
असंख्य मणियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी
मनोहर है। उस गोलोकमें प्रत्येक महल अमूल्य
रत्नोंके बने हुए हैं। उसमें ऐसा मनोहर परकोटा
है, जिसे विश्वकर्माने भी नहीं देखा है। वे महल
गोपियों, गोपगणों तथा कामधेनुओंसे परिवेष्टित
हैं। वहाँ रास-मण्डल असंख्यों कल्पवृक्षों, पारिजातके
तरुओं, सरोवरों तथा पुष्पोद्यानोंसे समावृत है।
वह गोपों, मन्दिरों, रत्नप्रदीपों, पुष्प-शय्याओं, कस्तूरी-
कुङ्कुमयुक्त सुगन्धित चन्दनके गन्धों, क्रीडोपयुक्त
भोगपदार्थों, सुवासित जल और पान-बीड़ाओं,
रमणीय सुगन्धियुक्त धूपों, पुष्पमालाओं और
रत्नजटित दर्पणोंसे भरा-पूरा है। अमूल्य रत्नाभरणों
तथा अग्नि-शुद्ध वस्त्रोंसे अलंकृत राधाकी दासियाँ
सदा उसकी रक्षा करती रहती हैं। नवयौवनसम्पन्न
तथा अनुपम सौन्दर्यशाली गजेन्द्रोंकी सेना क्रमशः
उसे घेरे हुए है। ब्रजराज ! वह रमणीय तथा
चन्द्रमण्डलके समान गोल है। उस विस्तृत
मण्डलकी रचना बहुमूल्य रत्नोंद्वारा हुई है। वह
कस्तूरी-कुङ्कुमयुक्त सुन्दर एवं सुगन्धित चन्दनसे
समर्चित है। वह फल-पल्लवयुक्त मङ्गल-कलशों,
दही और खीलों, पत्तों, कोमल दूर्वाङ्कुरों, फलों,
असंख्य केलेके मनोहर खम्भों तथा रेशमी सूत्रमें
बँधे हुए कोमल चन्दन-पल्लवोंकी वन्दनवारोंसे
आच्छादित है और चन्दनयुक्त पुष्पमालाओं एवं
आभूषणोंसे विभूषित है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका
बना हुआ शतशृङ्ग पर्वत मनको खींचे लेता है।
वह अत्यन्त सुन्दर है। वेद भी उसका वर्णन नहीं
कर सकते। वह हीरेके हारसे युक्त होनेके कारण
रमणीय है तथा मनोहर परकोटेकी तरह उस
गोलोकको चारों ओरसे घेरे हुए है।
वहाँ चन्दनके वृक्षोंसे युक्त रमणीय वृन्दावन
है, जो कल्पवृक्षों, सुन्दर मन्दार-पुष्पों, कामधेनुओं,
शोभाशाली मनोहर पुष्पवाटिकाओं, रमणीय
क्रीड़ा-सरोवरों और परम सुन्दर क्रीड़ाभवनोंसे
सुशोभित है। उसके एकान्तमें रास-क्रीड़ाके
योग्य अत्यन्त सुन्दर स्थान है, जो चारों ओरसे
गोलाकार है। रक्षकरूपमें नियुक्त हुई असंख्यों
सुन्दरी गोपिकाएँ उसकी रक्षा करती हैं। वहाँ
कोकिल कूकते रहते हैं तथा भौंरोंका गुंजार होता
रहता है। उसीके एकान्त स्थलमें एक रमणीय
अक्षयवट है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई विशाल है।
सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला वह अक्षयवट
गोपियोंके लिये कल्पवृक्ष है। वहाँ राधाकी दासियाँ
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६९७
क्रीड़ा करती रहती हैं। विरजाके तटप्रान्तके
जलका स्पर्श करके बहती हुई शीतल, मन्द,
सुगन्ध वायु उसे पवित्र करती रहती है। उस
अक्षयवटके नीचे वृन्दावनमें विनोद करनेवाली
मेरे प्राणोंकी अधिदेवता वह राधा असंख्यों
दासीगणोंके साथ क्रीड़ा करती है। वही राधा इस
समय वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई है। ब्रजेश !
ब्रह्मादि देवता, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र और सिद्धगण
गुण, बल, बुद्धि, ज्ञानयोग और विद्याद्वारा उसकी
पूजा करते हैं। तात ! यह मेरी प्रिया मेरे ही समान
है; अतः सब तरहसे वन्दनीया है। नन्दजी ! इस
प्रकार मैंने यथोचित एवं परिमित रूपसे ब्रह्माण्डोंका
वर्णन कर दिया। अब पुनः आपकी और क्या
सुननेकी इच्छा है ?
(अध्याय ८४)
चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन
नन्दजीने कहा - महाभाग ! अब चारों
वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका तथा समस्त प्राणियोंके
कर्मविपाकका वर्णन कीजिये ।
श्रीभगवान् बोले- तात ! मैं चारों वर्णोंके
वेदोक्त भक्ष्याभक्ष्यका यथोचितरूपसे वर्णन करता
हूँ, उसे सावधान होकर श्रवण करो। मनुका
कथन है कि लोहेके बर्तनमें जलपान, उसमें
रखा हुआ गौका दूध-दही-घी, पकाया हुआ
अन्न भ्रष्ट्रादिक (भुना हुआ पदार्थ), मधु, गुड़,
नारियलका जल, फल, मूल आदि सभी पदार्थ
अभक्ष्य हो जाते हैं। जला हुआ अन्न तथा
गरमाया हुआ बदरीफल या खट्टी काँजीको भी
अभक्ष्य कहा गया है। काँसेके बर्तनमें नारियलका
जल और ताम्रपात्रमें स्थित मधु तथा घृतके
अतिरिक्त सभी गव्य पदार्थ (दूध-दही आदि)
मदिरा-तुल्य हो जाते हैं। ताम्रपात्रमें दूध पीना,
जूठा रखना, घीका भोजन करना और नमकसहित
दूध खाना तुरंत ही अभक्ष्यके समान पापकारक
हो जाता है। मधु मिला हुआ घी, तेल और गुड़
अभक्ष्य है तथा शास्त्रके मतानुसार गुड़मिश्रित
अदरक भी अभक्ष्य है। विद्वान् पुरुषको चाहिये
कि पीनेसे अवशिष्ट जल, माघमासमें मूली और
शय्यापर बैठकर जप आदिका सदा परित्याग कर
दे। उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको दिनमें दो बार तथा
दोनों संध्याओंमें और रात्रिके पिछले पहरमें भोजन
नहीं करना चाहिये। पीनेका जल, खीर, चूर्ण,
घी, नमक, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, गुड़,
दूध, मट्ठा तथा मधु - ये एक हाथसे दूसरे हाथपर
ग्रहण करनेसे तत्काल ही अभक्ष्य हो जाते हैं।
श्रुतिकी सम्मतिसे चाँदीके पात्रमें रखा हुआ कपूर
अभक्ष्य हो जाता है। यदि परोसनेवाला व्यक्ति
भोजन करनेवालेको छू दे तो वह अन्न अभक्ष्य
हो जाता है - यह सभीको सम्मत है। ब्राह्मणोंको
भैंसका दूध, दही, घी, स्वस्तिक और माखन नहीं
खाना चाहिये। रविवारको अदरक सभीके लिये
अभक्ष्य है। ब्राह्मणोंके लिये बासी अन्न, जल
और दूध निषिद्ध है। असंस्कृत नमक और तेल
अभक्ष्य है; परंतु अग्निद्वारा संस्कृत पवित्र व्यञ्जन
सभीके खाने योग्य है। एक हाथसे धारण किया
हुआ, गँदला, कृमियुक्त और अपवित्र जल अपेय
होता है - यह सर्वसम्मत है। श्रीहरिको निवेदित
किये बिना कोई भी पदार्थ ब्राह्मणों, यतियों,
ब्रह्मचारियों, विशेष करके वैष्णवोंको नहीं खाना
चाहिये। तात ! जिस-किसी वस्तुमें अथवा मधु,
दूध, दही, घी और गुड़में यदि चींटियाँ पड़ गयी
हों तो उसे कभी नहीं खाना चाहिये। ऐसा श्रुतिमें
सुना गया है। पका हुआ शुद्ध फल, जिसे पक्षीने
काट दिया हो अथवा उसमें कीड़े पड़ गये हों तथा
कौवेद्वारा उच्छिष्ट किया हुआ पदार्थ सभीके लिये
अभक्ष्य होता है। घी अथवा तेलमें पकाया हुआ
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मिष्ठान्न तथा पीठक, यदि उसे शूद्रने बनाकर तैयार
किया हो तो वह शूद्रोंके ही खाने योग्य होता
है, ब्राह्मणोंके लिये नहीं। जो अपवित्र हैं, उन
सबके अन्न-जलका परित्याग कर देना चाहिये।
अशौचान्तके दूसरे दिन सब शुद्ध हो जाता है,
इसमें संशय नहीं है। ब्रजेश्वर ! इस प्रकार मैंने
अपनी जानकारीके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका वर्णन
कर दिया।
पिताजी ! श्रुतिके मतानुसार कर्मोंका विपाक
बड़ा दुष्कर होता है। इस विषयमें क्रमशः चारों
वेदोंमें चार प्रकारके मत बतलाये गये हैं; उनका
सारभूत रहस्य मैं कह रहा हूँ, सुनिये। चाहे
अरबों कल्प बीत जायें तो भी भोग किये बिना
कर्मका क्षय नहीं होता; अतः अपने द्वारा किया
हुआ शुभ-अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता
है*। तीर्थों और देवताओंके सहयोगसे मनुष्योंकी
भी कुछ सहायता हो जाती है; परंतु तात ! जो
मुझसे विमुख है, उसे निश्चय ही उसके द्वारा
किये गये प्रायश्चित्त उसी प्रकार पवित्र नहीं कर
सकते, जैसे नदियाँ मदिराके घड़ेको पावन नहीं
कर सकतीं। न तो उत्तम कर्मसे दुष्कर्मका नाश
होता है और न दुष्कर्म करनेसे सुकर्म ही नष्ट
होता है। यहाँतक कि यज्ञ, तप, व्रत, उपवास,
तीर्थस्नान, दान, जप, नियम, पृथ्वीकी परिक्रमा,
पुराण-श्रवण, पुण्योपदेश, गुरु और देवताकी
पूजा, स्वधर्माचरण, अतिथि-सत्कार, ब्राह्मणोंका
पूजन एवं विशेषतया उन्हें भोजन करानेसे भी
दुष्कर्मका विनाश नहीं होता। ब्राह्मणको जो दिया
जाता है, वह पूर्णरूपसे प्राप्त होता है; क्योंकि
ब्राह्मण क्षेत्ररूप है और वह दान बीजके समान
है। तात ! मनुष्य एक कर्मद्वारा स्वर्गको प्राप्त कर
लेता है; परंतु मोक्ष कर्मसे नहीं मिलता। वह तो
मेरी सेवासे सुलभ होता है। पुण्यकर्म करनेसे
स्वर्ग, दुष्कर्म करनेसे नरक तथा कुत्सित कर्म
करनेसे व्याधि और नीच योनिमें जन्म प्राप्त होता
है, तत्पश्चात् वह पवित्र होता है।
जो इच्छानुसार छोटे-बड़े पाप करनेवाला
तथा गोहत्यारा है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक दन्दशूक नामक नरकमें
निवास करता है। वहाँ वह सर्पके डसनेके कारण
विषकी ज्वालासे तृषित एवं पीड़ित होता है तथा
आहार न मिलनेसे उसका पेट सट जाता है।
तत्पश्चात् उस कुण्डसे निकलकर गौके शरीरमें
जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह गौकी
योनिमें उत्पन्न होता है। तदनन्तर एक लाख
वर्षतक वह कोढ़ी और चाण्डाल होता है, इसके
बाद मनुष्य होता है। उस समय वह कर्मानुसार
कुष्ठरोगयुक्त ब्राह्मण होता है। तब एक लाख
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह नीरोग तथा पवित्र
हो जाता है। गो-हत्या करनेवाला निश्चय ही उतने
वर्षोंतक गौ होता है, जितने उस गौके शरीरमें
रोएँ होते हैं। ब्रह्मघाती उनसे भी चौगुने वर्षोंतक
विष्ठाका कीड़ा होता है, तदनन्तर उससे चौगुने
वर्षोंतक म्लेच्छ होता है। तत्पश्चात् उनसे चौगुने
वर्षोंतक अंधा होकर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता
है। वहाँ चार लाख विप्रोंको भोजन करानेसे वह
उस महान् पातकसे मुक्त होकर पवित्र नेत्रयुक्त
और यशस्वी हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो स्त्रीकी
हत्या करनेवाला है, उसे वेदमें महापातकी कहा
गया है। वह उस स्त्रीके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें वास
करता है। वहाँ उसे कीड़े काटते रहते हैं, आहार
नहीं मिलता और नरक-यातना भोगनी पड़ती है।
तदनन्तर वह पापी उतने ही वर्षोंतक जगत्में
जन्म लेता है। वहाँ वह कर्मानुसार पापपरायण
तथा राजयक्ष्मासे ग्रस्त रहता है। फिर सौ वर्षोंतक
- नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
(८५। ३६)
१०२- वृन्दाद्वारा धर्मको अपनी गोदमें कर जीवनदानकी चेष्टा तथा धर्मपत्नी मूर्तिका उसे (धर्मको) जीवित करनेकी श्रीविष्णुसे प्रार्थना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६९९
एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे शुद्ध होकर
वह विद्वान् एवं तपःपरायण विप्र होता है। उस
जन्ममें वह भी कुछ बचे-खुचे पापोंको भोगता है
तथा सोना दान करनेसे शुद्ध हो जाता है।
भ्रूणहत्या करनेवाला महापापी शुनीमुख नामक
नरकमें जाता है। वहाँ वह सौ वर्षोंतक सूक्ष्म
शस्त्रद्वारा पीड़ित किया जाता है। फिर उसे
निश्चय ही सौ वर्षोंतक घोड़ेकी योनिमें जन्म लेना
पड़ता है। इसके बाद वह पापी अपने कर्मके
फलस्वरूप दादके रोगसे युक्त वैश्य होता है और
पचास वर्षोंतक वह कष्ट भोगकर पुनः स्वर्णदानसे
शुद्ध होता है। इसके बाद अपने कुलमें उत्पन्न
होनेपर भी वह नीरोग होता है और फिर पवित्र
ब्राह्मण होकर जन्म लेता है। युद्धके बिना
क्षत्रियको मारनेवाला ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय तप्तशूल
नरकमें जाता है। वहाँ उसे एक हजार वर्षतक
तपाये हुए लोहेसे काढ़ेकी भाँति पकाया जाता है
और वह आर्तनाद करता है। तदनन्तर वह सौ
वर्षोंतक मदमत्त गजराज होता है। इसके बाद सौ
वर्षोंतक रक्तदोषयुक्त शूद्र होता है। वहाँ वह हाथी
दान करनेसे रोगमुक्त होकर फिर ब्राह्मणके घरमें
जन्म लेता है। वैश्य और शूद्रकी हत्या करनेवाला
वैश्य तथा वैश्यकी हिंसा करनेवाला शूद्र-ये
निश्चय ही समान पापके भागी होते हैं। इन्हें सौ
वर्षोंतक कृमिकुण्ड नामक नरकमें वास करना
पड़ता है। वहाँ कीड़ोंके काटनेसे वह महान्
दुःखी होता है। इसके बाद वह कृमिरोगसे युक्त
होकर सौ वर्षोंतक किरात होता है। व्रजेश्वर !
तदनन्तर वह पचास वर्षोंतक मन्दाग्नियुक्त, दुर्बल,
कृशोदर, गरीब ब्राह्मण होता है। फिर तीर्थमें
घोड़ेका दान करनेसे उसकी मुक्ति हो जाती है।
तात! चारों वर्णोंमें किसी भी वर्णका मनुष्य
जो पीपलका वृक्ष काटता है, वह ब्रह्महत्याके
चौथाई पापका भागी होता है और उसे निश्चय ही
असिपत्र नामक नरकमें जाना पड़ता है। झूठी
गवाही देनेवाले, कृतघ्न, अतिकृतघ्न, विश्वासघाती,
मित्रघाती और ब्राह्मणोंका धन हरण करनेवाला-
ये महापापी कहलाते हैं। इन्हें हजारों वर्षोंतक
कुम्भीपाकमें रहना पड़ता है। वहाँ वे रात-दिन
खौलते हुए तेलसे संतप्त किये जाते हैं, उन्हें
व्याधियाँ घेरे रहती हैं और सर्पाकार जन्तु काटता
रहता है। तदनन्तर वह पापी हजार करोड़
जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक सूअर और सौ
जन्मोंतक हिंसक पशु होनेके बाद रोगग्रस्त शूद्र
होता है। उस जन्ममें वह मन्दाग्नि तथा ज्वरसे
पीड़ित रहता है तथा सौ पल सोना दान करके
अवश्य ही शुद्ध हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो
मनुष्य वस्त्र चुरानेवाला, गव्य (दूध-दही-घी)-
की चोरी करनेवाला, चाँदी और मुक्ताका अपहरण
करनेवाला तथा शूद्रके धनको लूट लेनेवाला होता
है; वह सौ वर्षोंतक मूत्रकुण्डका भोग करके पुनः
हजार वर्षोंतक बगुलेकी योनिमें उत्पन्न होता है-
यह ध्रुव है। व्रजराज ! तदनन्तर वह सौ वर्षोंतक
शूद्रजातिमें जन्म लेता है। वहाँ वह पापी कुष्ठरोगसे
युक्त होता है और उसके घावसे मवाद निकलती
रहती है। तत्पश्चात् थोड़ा-बहुत कोढ़से युक्त
होकर ब्राह्मण होता है और छः पल सोना दान
करनेसे पवित्र होकर रोगमुक्त हो जाता है। जो
खजाना लूटनेवाला, फल चुरानेवाला तथा खेल-
ही-खेलमें धनका अपहरण करनेवाला है, वह
भूतलपर यक्ष होता है। फिर सौ वर्षोंतक
नीलकण्ठ पक्षी होता है। तत्पश्चात् भारतभूमिपर
काले रंगवाला शूद्र होता है। फिर जन्म-
जन्मान्तरके बाद अधिक अङ्गोंवाला ब्राह्मण होता
है। वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पुनः ब्राह्मण
होकर मुक्त हो जाता है। पके हुए पदार्थोंकी चोरी
करनेवाला निश्चय ही पशुयोनिमें उत्पन्न होता
है। वहाँ वह सात जन्मोंतक जिसका अण्डकोश
गन्धयुक्त होता है तथा जिसे कस्तूरी नामसे पुकारा
जाता है; वह कस्तूरी-मृग होकर पुनः एक