ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५७- सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७१
उन्हींके समान हैं। वे हाथमें श्वेत चँवर लिये रहती हैं और बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित होती हैं। समस्त देवियोंमें श्रेष्ठ वे राधा ही मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। वे सुदामके शापसे इस समय भूतलपर वृषभानुनन्दिनीके रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। मेरे साथ उनका अब सौ वर्षोंतक वियोग रहेगा। पिताजी! इन्हीं सौ वर्षोंकी अवधिमें मैं भूतलका भार उतारूँगा। तदनन्तर निश्चय ही श्रीराधा, तुम, माता यशोदा, गोप, गोपीगण, वृषभानुजी, उनकी पत्नी कलावती तथा अन्य बान्धवजनोंके साथ मैं गोलोकको चलूँगा। बाबा! यही बात तुम प्रसन्नतापूर्वक मैया यशोदासे भी कह देना। महाभाग! शोक छोड़ो और व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट जाओ। मैं सबका आत्मा और साक्षी हूँ। सम्पूर्ण जीवधारियोंके भीतर रहकर भी उनसे निर्लिप्त हूँ। जीव मेरा प्रतिबिम्ब है; यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। प्रकृति मेरा ही विकार है अर्थात् वह प्रकृति भी मैं ही हूँ। जैसे दूधमें धवलता होती है। दूध और धवलतामें कभी भेद नहीं होता। जैसे जलमें शीतलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, आकाशमें शब्द, भूमिमें गन्ध, चन्द्रमामें शोभा, सूर्यमें प्रभा और जीवमें आत्मा है; उसी प्रकार राधाके साथ मुझको अभिन्न समझो। तुम राधाको साधारण गोपी और मुझे अपना पुत्र न जानो। मैं सबका उत्पादक परमेश्वर हूँ और राधा ईश्वरी प्रकृति है*।
बाबा! मेरी सुखदायिनी विभूतिका वर्णन सुनो, जिसे पहले मैंने अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीको बताया था। मैं देवताओंमें श्रीकृष्ण हूँ। गोलोकमें स्वयं ही द्विभुजरूपसे निवास करता हूँ और वैकुण्ठमें चतुर्भुज विष्णुरूपसे। शिवलोकमें मैं ही शिव हूँ। ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा हूँ। तेजस्वियोंमें सूर्य हूँ। पवित्रोंमें अग्नि हूँ। द्रव-पदार्थोंमें जल हूँ। इन्द्रियोंमें मन हूँ। शीघ्रगामियोंमें समीर (वायु) हूँ। दण्ड प्रदान करनेवालोंमें मैं यम हूँ। कालगणना करनेवालोंमें काल हूँ। अक्षरोंमें अकार हूँ। सामोंमें साम हूँ, चौदह इन्द्रोंमें इन्द्र हूँ। धनियोंमें कुबेर हूँ। दिक्पालोंमें ईशान हूँ। व्यापक तत्त्वोंमें आकाश हूँ। जीवोंमें सबका अन्तरात्मा हूँ। आश्रमोंमें ब्रह्मतत्त्वज्ञ संन्यास आश्रम हूँ। धनोंमें मैं सर्वदुर्लभ बहुमूल्य रत्न हूँ। तैजस पदार्थोंमें सुवर्ण हूँ। मणियोंमें कौस्तुभ हूँ। पूज्य प्रतिमाओंमें शालग्राम तथा पत्तोंमें तुलसीदल हूँ। फूलोंमें पारिजात, तीर्थोंमें पुष्कर, वैष्णवोंमें कुमार, योगीन्द्रोंमें गणेश, सेनापतियोंमें स्कन्द, धनुर्धरोंमें लक्ष्मण, राजेन्द्रोंमें राम, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, मासोंमें मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, दिनोंमें रविवार, तिथियोंमें एकादशी, सहनशीलोंमें पृथ्वी, बान्धवोंमें माता, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, गौसे प्रकट होनेवाले खाद्यपदार्थोंमें घी, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, कामधेनुओंमें सुरभि, नदियोंमें पापनाशिनी गङ्गा, पण्डितोंमें पाण्डित्यपूर्ण वाणी, मन्त्रोंमें प्रणव, विद्याओंमें उनका बीजरूप तथा खेतसे पैदा होनेवाली वस्तुओंमें धान्य हूँ। फलवान् वृक्षोंमें पीपल, गुरुओंमें मन्त्रदाता गुरु, प्रजापतियोंमें कश्यप, पक्षियोंमें गरुड़, नागोंमें अनन्त (शेषनाग), नरोंमें नरेश, ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, देवर्षियोंमें नारद, राजर्षियोंमें जनक, महर्षियोंमें शुक, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, सिद्धोंमें कपिलमुनि, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, कवियोंमें शुक्राचार्य, ग्रहोंमें शनि, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, मृगोंमें मृगेन्द्र, वृषभोंमें शिववाहन नन्दी, गजराजोंमें ऐरावत, छन्दोंमें गायत्री, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वेद, जलचरोंमें उनका राजा वरुण, अप्सराओंमें उर्वशी, समुद्रोंमें जलनिधि, पर्वतोंमें सुमेरु, रत्नवान् शैलोंमें हिमालय, प्रकृतियोंमें देवी पार्वती तथा देवियोंमें लक्ष्मी हूँ।
मैं नारियोंमें शतरूपा, अपनी प्रियतमाओंमें
* यथा जीवस्तथात्मानं तथैव राधया सह। त्यज त्वं गोपिकाबुद्धिं राधायां मयि पुत्रताम्॥
अहं सर्वस्य प्रभवः सा च प्रकृतीश्वरी। (७३। ५० १/२)
| ६७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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राधिका तथा साध्वी स्त्रियोंमें निश्चय ही वेदमाता सावित्री हूँ। दैत्योंमें प्रह्लाद, बलिष्ठोंमें बलि, ज्ञानियोंमें भगवान् नारायण ऋषि, वानरोंमें हनुमान्, पाण्डवोंमें अर्जुन, नागकन्याओंमें मनसा, वसुओंमें द्रोण, बादलोंमें द्रोण, जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंमें भारतवर्ष, कामियोंमें कामदेव, कामुकी स्त्रियोंमें रम्भा और लोकोंमें गोलोक हूँ, जो समस्त लोकोंमें उत्तम और सबसे परे है। मातृकाओंमें शान्ति, सुन्दरियोंमें रति, साक्षियोंमें धर्म, दिनके क्षणोंमें संध्या, देवताओंमें इन्द्र, राक्षसोंमें विभीषण, रुद्रोंमें कालाग्निरुद्र, भैरवोंमें संहारभैरव, शङ्खोंमें पाञ्चजन्य, अङ्गोंमें मस्तक, पुराणोंमें भागवत, इतिहासोंमें महाभारत, पाञ्चरात्रोंमें कपिल, मनुओंमें स्वायम्भुव, मुनियोंमें व्यासदेव, पितृपत्नियोंमें स्वधा, अग्निप्रियाओंमें स्वाहा, यज्ञोंमें राजसूय, यज्ञपत्नियोंमें दक्षिणा, अस्त्र-शस्त्रज्ञोंमें जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम, पौराणिकोंमें सूत, नीतिज्ञोंमें अङ्गिरा, व्रतोंमें विष्णुव्रत, बलोंमें दैवबल, ओषधियोंमें दूर्वा, तृणोंमें कुश, धर्मकर्मोंमें सत्य, स्नेहपात्रोंमें पुत्र, शत्रुओंमें व्याधि, व्याधियोंमें ज्वर, मेरी भक्तियोंमें दास्य-भक्ति, वरोंमें वर, आश्रमोंमें गृहस्थ, विवेकिय़ोंमें संन्यासी, शस्त्रोंमें सुदर्शन और शुभाशीर्वादोंमें कुशल हूँ।
ऐश्वर्योंमें महाज्ञान, सुखोंमें वैराग्य, प्रसन्नता प्रदान करनेवालोंमें मधुर वचन, दानोंमें आत्मदान, संचयोंमें धर्मकर्मका संचय, कर्मोंमें मेरा पूजन, कठोर कर्मोंमें तप, फलोंमें मोक्ष, अष्ट सिद्धियोंमें प्राकाम्य, पुरियोंमें काशी, नगरोंमें काञ्ची, देशोंमें वैष्णवोंका देश और समस्त स्थूल आधारोंमें मैं ही महान् विराट् हूँ। जगत्में जो अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ हैं; उनमें मैं परमाणु हूँ। वैद्योंमें अश्विनीकुमार, भेषजोंमें रसायन, मन्त्रवेत्ताओंमें धन्वन्तरि, विनाशकारी दुर्गुणोंमें विषाद, रागोंमें मेघ-मल्लार, रागिनियोंमें कामोद, मेरे पार्षदोंमें श्रीदामा, मेरे बन्धुओंमें उद्धव, पशुजीवोंमें गौ, वनोंमें चन्दन, पवित्रोंमें तीर्थ और निःशंकोंमें वैष्णव हूँ; वैष्णवसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। विशेषतः वह जो मेरे मन्त्रकी उपासना करता है, सर्वश्रेष्ठ है। मैं वृक्षोंमें अंकुर तथा सम्पूर्ण वस्तुओंमें उनका आकार हूँ। समस्त भूतोंमें मेरा निवास है, मुझमें सारा जगत् फैला हुआ है। जैसे वृक्षमें फल और फलोंमें वृक्षका अंकुर है, उसी प्रकार मैं सबका कारणरूप हूँ; मेरा कारण दूसरा नहीं है। मैं सबका ईश्वर हूँ; मेरा ईश्वर दूसरा कोई नहीं है। मैं कारणका भी कारण हूँ। मनीषी पुरुष मुझे ही सबके समस्त बीजोंका परम कारण बताते हैं। मेरी मायासे मोहित हुए पापीजन मुझे नहीं जान पाते हैं। मैं सब जन्तुओंका आत्मा हूँ; परंतु दुर्बुद्धि और दुर्भाग्यसे वञ्चित पापग्रस्त जीव मुझ अपने आत्माका भी आदर नहीं करते। जहाँ मैं हूँ, उसी शरीरमें सब शक्तियाँ और भूख-प्यास आदि हैं; मेरे निकलते ही सब उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे-पीछे उसके सेवक। व्रजराज नन्दजी! मेरे बाबा! इस ज्ञानको हृदयमें धारण करके व्रजको जाओ और राधा तथा यशोदा मैयाको इसका उपदेश दो।
इस ज्ञानको भलीभाँति समझकर नन्दजी अपने अनुगामी व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनों नारीशिरोमणियोंसे उस ज्ञानकी चर्चा की। नारद! वह महाज्ञान पाकर सब लोगोंने अपना शोक त्याग दिया। श्रीकृष्ण यद्यपि निर्लिप्त हैं, तथापि मायाके स्वामी हैं; इसलिये मायासे अनुरक्त जान पड़ते हैं। यशोदाजीने पुनः नन्दरायजीको माधवके पास भेजा। उनकी प्रेरणासे फिर आकर नन्दजीने ब्रह्माजीके द्वारा किये गये सामवेदोक्त स्तोत्रसे परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दन माधवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वे पुत्रके सामने खड़े हो बार-बार रोदन करने लगे। (अध्याय ७३)