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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२७- परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण

ब्रह्मखण्ड ९१


ब्रह्माजीने कहा—वत्स! भगवान् शंकर तुम्हारे पूर्वजन्मके गुरु हैं और हमारे भी पुरातन गुरु हैं। अतः तुम उन्हीं ज्ञानियोंके गुरु कल्याणदाता शान्तस्वरूप शिवके पास जाओ। वहीं उन पुरातन गुरुसे भगवन्मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नारायणकी कथा-वार्ता सुनो और शीघ्र ही मेरे घर लौट आओ। शौनक! ऐसा कहकर तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाले ब्रह्माजी चुप हो गये और नारदमुनि पिताको भक्तिभावसे प्रणाम करके शिवलोकको चले गये। (अध्याय २४)


नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन

सौति कहते हैं—शौनक! तदनन्तर विप्रवर नारद क्षणभरमें बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवके मनोहर धाममें जा पहुँचे। भगवान् शिवका वह अभीष्ट लोक ध्रुवसे एक लाख योजन ऊपर था। त्रिशूलधारी शिवने दिव्य रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया है। आधारशून्य आकाशमें योगबलसे शम्भुद्वारा धारण किया गया वह विचित्र लोक भाँति-भाँतिके दिव्य भवनोंसे सुशोभित है तथा दिन-रात तेजसे उद्भासित होता रहता है। पवित्र अन्तःकरणवाले श्रेष्ठ साधक तथा मुनीन्द्रशिरोमणि महात्माजन ही उस लोकका दर्शन कर पाते हैं।

मुने! वहाँ सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच पातीं। परकोटोंके रूपमें प्रकट हुए अत्यन्त ऊँचे, बहुत बढ़े हुए तथा ज्वालाओंसे जगमगाते हुए असंख्य पावक उस लोकको चारों ओरसे घेरकर स्थित हैं। उस श्रेष्ठ धामका विस्तार एक लाख योजन है। उसमें श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए तीन हजार गृह हैं। हीरेके सार-तत्त्वसे बने हुए भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मनोहर भवन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ माणिक्य तथा मुक्तामणिके दर्पण हैं। विश्वकर्माने उस लोकको सपनेमें भी नहीं देखा होगा। एकमात्र शिवसेवी महात्माजन ही उसमें कल्पपर्यन्त निरन्तर वास करते हैं। वह शिवलोक करोड़ों-करोड़ों सिद्धों तथा शिव-पार्षदोंसे युक्त है। वहाँ लाखों विकट भैरव निवास करते हैं। सैकड़ों लाख क्षेत्र उसे घेरे हुए हैं।

सुन्दर फूलोंसे भरे हुए मन्दार आदि देववृक्षोंसे वह सदा आवेष्टित है। सुन्दर कामधेनुएँ उस धामकी उसी तरह शोभा बढ़ाती हैं, जैसे सैकड़ों बलाकाएँ आकाशकी। उस लोकको देखकर नारदमुनि मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए और सोचने लगे—'जहाँ ज्ञानियों तथा योगियोंके गुरु निवास करते हैं, वहाँ ऐसी विचित्रताका होना क्या आश्चर्य है? यह सृष्टिलोक त्रिलोकीसे अत्यन्त विलक्षण है और भय, मृत्यु, रोग, पीड़ा तथा जरावस्थाको हर लेनेवाला है।

नारदजीने देखा, दूर सभा-मण्डपके मध्य-भागमें शान्तस्वरूप, कल्याणदाता एवं मनोहर शिव विराजमान हैं। उनके पाँच मुख पाँच चन्द्रमाओंके समान आह्लाददायक जान पड़ते हैं। प्रत्येक मुखमें प्रफुल्ल कमलके समान तीन-तीन नेत्र हैं। उन्होंने मस्तकपर गङ्गाजीको धारण कर रखा है तथा उनके भालदेशमें निर्मल चन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमती पीली जटा धारण करनेवाले दिगम्बर भगवान् शिव उस समय आकाशगङ्गामें उत्पन्न कमलोंके बीज (पद्माक्ष)-की मालासे सानन्द 'श्रीकृष्ण' नामका जप कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति गौर वर्णकी है, वे अनन्त और अविनाशी हैं। उनके कण्ठमें सुन्दर नील चिह्न शोभा पाता है। वे नागराजके हारसे अलंकृत हैं। बड़े-बड़े योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और मुनीन्द्र उनके

९२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चरणोंकी वन्दना करते हैं। वे सिद्धेश्वर हैं, सिद्धिविधानके कारण हैं, मृत्युञ्जय हैं तथा काल और यमका भी अन्त करनेवाले हैं। उनका मुख प्रसन्नतासूचक हास्यसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। वे सम्पूर्ण आश्रितोंको कल्याण तथा अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं। सदा शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, भवरोगसे रहित, भक्तजनोंके प्रिय तथा भक्तोंके एकमात्र बन्धु हैं।

दूरसे देखनेके पश्चात् निकट जाकर मुनिने भगवान् शूलपाणिको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उस समय मुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। वे तीन तारवाली वीणा बजाते हुए कलहंसके समान मधुर कण्ठसे पुनः श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे। ब्रह्माजीके पुत्र और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीन्द्रशिरोमणि नारदको आया देख भगवान् शंकर योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और महर्षियोंके साथ मुस्कराते हुए सिंहासनसे वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गये। फिर उन्होंने मुनिको बड़े वेगसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद तथा आसन आदि दिये। साथ ही उन तपोधनसे आनेका प्रयोजन और कुशल-मङ्गल पूछा। इसके बाद भगवान् शम्भु उत्तम रत्नोंके बने हुए श्रेष्ठ एवं सुन्दर सिंहासनपर अपने प्रमुख पार्षदोंके साथ बैठे। किंतु ब्रह्माजीके पुत्र नारद नहीं बैठे। उन्होंने भक्तिभावसे प्रभुको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। गन्धर्वराजके द्वारा किये गये शुभदायक वेदोक्त स्तोत्रसे स्तुति करके पुनः प्रणाम करनेके अनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा ले नारदजी उनके वाम-भागमें बैठे। वहीं उन्होंने जगत्की वाञ्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् शिवसे अपनी हार्दिक अभिलाषा बतायी। मुनिका वह वचन सुनकर कृपानिधान शंकरने तुरंत प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'बहुत अच्छा, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' (अध्याय २५)


ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन

**सौति कहते हैं—**शौनकजी! देवर्षि नारदने भगवान् शंकरसे श्रीहरिके स्तोत्र, कवच, मन्त्र, उत्तम पूजाविधान, ध्यान तथा उनके तत्त्वज्ञानकी याचना की। महेश्वरने उन्हें स्तोत्र, कवच, मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि तथा उनके पूर्वजन्म-सम्बन्धी ज्ञानका उपदेश दिया। वह सब कुछ पाकर मुनिश्रेष्ठ नारदका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अपने शरणागतवत्सल गुरु भगवान् शिवको भक्तिभावसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।

**नारदजी बोले—**वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप ब्राह्मणोंके आह्निक आचार (दिनचर्या या नित्य-कर्म)-का वर्णन कीजिये, जिससे प्रतिदिन स्वधर्मपालन हो सके।

**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर रात्रिमें पहने हुए कपड़ेको बदल दे और अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सूक्ष्म, निर्मल, ग्लानिरहित सहस्रदल-कमलपर विराजमान गुरुदेवका चिन्तन करे। ध्यानमें यह देखे कि ब्रह्मरन्ध्रवर्ती सहस्रदल-कमलपर गुरुजी प्रसन्नतापूर्वक बैठे हैं, मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, व्याख्याकी मुद्रामें उनका हाथ उठा हुआ है और शिष्यके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है। मुखपर प्रसन्नता छा रही है। वे शान्त तथा निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले हैं और साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं। सदा इसी प्रकार उनका चिन्तन करना चाहिये। इस तरह ध्यान करके मन-ही-मन गुरुकी आराधना करे। तदनन्तर निर्मल, श्वेत, सहस्रदलभूषित, विस्तृत हृदयकमलपर विराजमान इष्टदेवका चिन्तन करे। जिस देवताका जैसा ध्यान और जो रूप बताया गया है, वैसा ही चिन्तन करना चाहिये। गुरुकी आज्ञा ले समयोचित कर्तव्यका पालन करना चाहिये। क्रम यह है कि पहले गुरुका ध्यान करके उन्हें प्रणाम करे। फिर उनकी विधिवत् पूजा करनेके

ब्रह्मखण्ड ९३

पश्चात् उनकी आज्ञा ले इष्टदेवका ध्यान एवं पूजन करे। गुरु ही देवताके स्वरूपका दर्शन कराते हैं। वे ही इष्टदेवके मन्त्र, पूजाविधि और जपका उपदेश देते हैं। गुरुने इष्टदेवको देखा है; किंतु इष्टदेवने गुरुको नहीं देखा है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु आद्या प्रकृति-ईश्वरी (दुर्गा देवी) हैं, गुरु चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य हैं, गुरु ही वायु और वरुण हैं, गुरु ही माता-पिता और सुहृद् हैं तथा गुरु ही परब्रह्म परमात्मा हैं। गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय नहीं है। इष्टदेवके रुष्ट होनेपर गुरु शिष्य अथवा साधककी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। परंतु गुरुदेवके रुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उस साधककी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जिसपर गुरु सदा संतुष्ट हैं, उसे पग-पगपर विजय प्राप्त होती है और जिसपर गुरुदेव रुष्ट हैं, उसके लिये सदा सर्वनाशकी ही सम्भावना रहती है। जो मूढ़ भ्रमवश गुरुकी पूजा न करके इष्टदेवका पूजन करता है, वह सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। सामवेदमें साक्षात् भगवान् श्रीहरिने भी ऐसी बात कही है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर परम पूजनीय हैं।

मुने! इस प्रकार गुरुदेव तथा इष्टदेवका ध्यान एवं स्तवन करके साधक वेदमें बताये हुए स्थानपर पहुँचकर प्रसन्नतापूर्वक मल और मूत्रका त्याग करे। जल, जलके निकट का स्थान, बिलयुक्त भूमि, प्राणियोंके निवासके निकट, देवालयके समीप, वृक्षकी जड़के पास, मार्ग, हलसे जोती हुई भूमि, खेतीसे भरे हुए खेत, गोशाला, नदी, कन्दराके भीतरका स्थान, फुलवाड़ी, कीचड़युक्त अथवा दलदलकी भूमि, गाँव आदिके भीतरकी भूमि, लोगोंके घरके आसपासका स्थान, मेख या खम्भेके पास, पुल, सरकंडोंके वन, श्मशानभूमि, अग्निके समीप, क्रीडास्थल (खेल-कूदके मैदान), विशाल वन, मचानके नीचेका स्थान, पेड़की छायासे युक्त स्थान, जहाँ भूमिके भीतर प्राणी रहते हों वह स्थान, जहाँ ढेर-के-ढेर पत्ते जमा हों वह भूमि, जहाँ घनी दूब उगी हो अथवा कुश जमे हों वह स्थान, बाँबी, जहाँ वृक्ष लगाये गये हों वहाँकी भूमि तथा जो किसी विशेष कार्यके लिये झाड़-बुहारकर साफ की गयी हो, वह भूमि-इन सबको छोड़कर सूर्यके तापसे रहित स्थानमें गड्ढा खोद उसीमें मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये।

दिनमें उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करे; रातमें पश्चिमकी ओर मुँह करके और संध्याकालमें दक्षिणकी ओर मुँह रखते हुए मलोत्सर्ग तथा मूत्रोत्सर्ग करना उचित है। मौन रहकर, जोर-जोरसे साँस न लेते हुए मलत्याग करे, जिससे उसकी दुर्गन्ध नाकमें न जाय। मलत्यागके पश्चात् उस मलको मिट्टी डालकर ढक दे। तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष गुदा आदि अङ्गोंको शुद्ध करे। पहले ढेले या मिट्टीसे गुदा आदिकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् उसे जलसे धोकर शुद्ध करे। मृत्तिकायुक्त जो जल शौचके उपयोगमें आता है, उसका परिमाण सुनो। मूत्रत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये और धोये। फिर बायें हाथमें चार बार मिट्टी लगाकर धोये। तत्पश्चात् दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर धोना चाहिये, यह मूत्र-शौच कहा गया। यदि मैथुनके अनन्तर मूत्र-शौच करना हो तो उसमें मिट्टी लगाने और धोनेकी संख्या दुगुनी कर दे अथवा मैथुनके अनन्तरका शौच मूत्र-शौचकी अपेक्षा चौगुना होना चाहिये। मलत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी देनी चाहिये। छठे बार मिट्टी लगाकर धोनेसे पैरोंकी शुद्धि होती है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये मलत्यागके अनन्तर यही शौच बताया गया है। विधवाओंके लिये इस शौचका परिमाण दुगुना बताया गया है।