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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०३
मुनिको आया देख राजाने शीघ्र ही उनके चरणोंमें
प्रणाम किया और भयसे व्याकुल हो मधुपर्क
आदि देकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।
वह सब कुछ ग्रहण करके मुनिने कामनापूर्वक
राजकन्याको माँगा। उनकी याचना सुनकर राजा
चुप हो गये। उनसे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना।
मुनिने फिर याचना की। नरेश्वर! अपनी कन्या
मुझे दीजिये; अन्यथा मैं एक ही क्षणमें सबको
भस्म कर डालूँगा। मुनिके तेजसे राजाके समस्त
सेवक आच्छन्न हो गये। मुनिको वृद्ध और जरा-
जीर्ण हुआ देख भृत्यगणोंसहित राजा रोने लगे।
सब रानियाँ भी रोदन करने लगीं। इस समय
क्या करना चाहिये, इसका निर्णय करनेकी शक्ति
किसीमें नहीं रह गयी। कन्याकी माता महारानी
शोकसे व्याकुल हो मूर्च्छित हो गयीं। तब
नीतिशास्त्रके ज्ञाता राजपण्डितने राजा, रानी,
राजकुमारों और कन्याको उत्तम नीतिका उपदेश
देते हुए कहा—'नरेश्वर! आज या दूसरे दिन
आप अपनी कन्या किसी-न-किसीको देंगे ही।
इस ब्राह्मणको छोड़कर और किसको आप कन्या
देना उचित समझते हैं? मैं तो तीनों लोकोंमें इस
ब्राह्मणके सिवा दूसरे किसीको कन्यादानका
उत्तम पात्र नहीं देखता हूँ। आप मुनिको अपनी
पुत्री देकर समस्त सम्पदाओंकी रक्षा कीजिये;
अन्यथा राजकन्याके कारण सारी सम्पत्ति नष्ट हो
जायगी। शरणागतके सिवा दूसरे किसी भी एक
मनुष्यका त्याग करके सर्वस्वकी रक्षा की जा
सकती है।'
पण्डितजीकी बात सुनकर राजाने बारंबार
विलापके पश्चात् राजकन्याको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत
करके मुनीन्द्रके हाथमें दे दिया। प्राणवल्लभाको
पाकर मुनि प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट
गये। राजा भी शोकके कारण सबका त्याग करके
तपस्याके लिये चले गये। पति और पुत्रीके
शोकसे सुन्दरी महारानीने अपने प्राणोंको त्याग
दिया। राजाके बिना उनके पुत्र, पौत्र और
भृत्यगण शोकसे अचेत हो गये। राजा अनरण्य
गोलोकनाथ राधावल्लभका चिन्तन और सेवन
करते हुए तप करके गोलोकधामको चले गये।
उनका ज्येष्ठ पुत्र कीर्तिमान् राजा हुआ। वह
भूतलपर समस्त प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन
करने लगा। (अध्याय ४१)
अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप
देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका
हिमवान्‌को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना
वसिष्ठजी कहते हैं— गिरिराज! जैसे लक्ष्मी
नारायणकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार अनरण्यकी
कन्या पद्मा मन, वाणी और क्रियाद्वारा भक्तिभावसे
पिप्पलादमुनिकी सेवा करने लगी। एक दिन वह
सती राजकुमारी स्नान करनेके लिये गङ्गाजीके
तटपर गयी। मार्गमें राजाका वेष धारण किये हुए
साक्षात् धर्मने उसके मनके भावोंको जाननेके
लिये पवित्र भावनासे ही कामी पुरुषकी भाँति
कुछ बातें कहीं। उन्हें सुनकर पद्मा बोली—'ओ
पापिष्ठ नृपाधम! दूर चला जा, दूर चला जा। यदि
तू मेरी ओर कामदृष्टिसे देखेगा तो तत्काल भस्म
हो जायगा। जिनका शरीर तपस्यासे परम पवित्र
हो गया है; उन मुनिश्रेष्ठ पिप्पलादको छोड़कर
क्या मैं तेरे-जैसे स्त्रीके गुलाम तथा रति-
लम्पटकी सेवा स्वीकार करूँगी? मैं तेरे लिये
माताके समान हूँ तो भी तू भोग्या स्त्रीका भाव
लेकर मुझसे बात कर रहा है। इसलिये मैं शाप
देती हूँ कि कालक्रमसे तेरा क्षय हो जायगा।'

६०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सतीका शाप सुनकर देवेश्वर धर्म काँपने लगे और राजाका रूप छोड़ अपनी मूर्ति धारण करके उससे बोले।

धर्मने कहा—मातः ! आप मुझे धर्मज्ञोंके गुरुका भी गुरु धर्म समझिये। पतिव्रते ! मैं सदा परायी स्त्रीके प्रति माताका ही भाव रखता हूँ। मैं आपके आन्तरिक भावको समझनेके लिये ही आया था। यद्यपि आप-जैसी सतियोंका मन कैसा होता है, यह मैं जानता था; तथापि दैवसे प्रेरित होकर परीक्षा करनेके लिये चला आया। साध्वि ! आपने जो मेरा दमन किया है, वह नीतिके विरुद्ध नहीं है; सर्वथा उचित ही है; क्योंकि कुमार्गपर चलनेवालोंके लिये दण्डका विधान साक्षात् परमेश्वर श्रीकृष्णने ही किया है। जो धर्मको भी स्वधर्मका ज्ञान कराने और कालकी भी कलना (गणना) तथा स्रष्टाकी भी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो समयपर संहर्ताका भी संहार करनेकी शक्ति रखते हैं और अनायास ही स्रष्टाकी भी सृष्टि कर सकते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो शत्रुको भी मित्र बना सकते हैं, कलहको भी उत्तम प्रेममें परिणत कर सकते हैं तथा सृष्टि और विनाशकी भी क्षमता रखते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो सबको शाप, सुख, दुःख, वर, सम्पत्ति और विपत्ति भी देनेमें समर्थ हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने प्रकृतिको प्रकट किया है, महाविष्णु तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर आदिको उत्पन्न किया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने दूधको श्वेत, जलको शीतल और अग्निको दाहिका शक्तिसे सम्पन्न बनाया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो अत्यन्त तेजःपुञ्जसे प्रकट होते हैं, जिनकी मूर्ति तेजोमयी है तथा जो गुणोंसे श्रेष्ठ एवं निर्गुण हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है और जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सबके अन्तरात्मा तथा समस्त जीवोंके लिये बन्धुस्वरूप हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है।

यों कहकर जगद्गुरु धर्म पद्माके सामने खड़े हो गये। शैलराज! धर्मका परिचय पाकर वह साध्वी सहसा बोल उठी।

पद्माने कहा—भगवन् ! क्या आप ही सबके समस्त कर्मोंके साक्षी, सबके भीतर रहनेवाले, सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा सर्वतत्त्ववेत्ता धर्म हैं? फिर मेरे मनको जाननेके लिये मुझ दासीकी विडम्बना क्यों करते हैं? धर्मदेव ! आपके प्रति मैंने जो कुछ किया है, वह मेरा अपराध है। प्रभो ! मैंने स्त्री-स्वभाववश आपको न जाननेके कारण क्रोधपूर्वक शाप दे दिया है। उस शापकी क्या व्यवस्था होगी; यही इस समय मेरा चिन्ताका विषय है। आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ और वायु भी यदि नष्ट हो जायँ तो भी पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं हो सकता*। मेरे शापसे यदि आप नष्ट हो जाते हैं तो सम्पूर्ण सृष्टिका ही नाश हो जायगा। यह सोचकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही हूँ; तथापि आपसे कहती हूँ। देवेश्वर! जैसे पूर्णिमाको चन्द्रमा पूर्ण होते हैं, उसी प्रकार सत्ययुगमें आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण रहेंगे। उस युगमें सर्वत्र और सर्वदा दिन-रात आप विराजमान होंगे। किंतु भगवन् ! त्रेतायुग आनेपर आपके एक चरणका नाश हो जायगा। प्रभो! द्वापरमें दो पैर क्षीण होंगे और कलियुगमें आपका तीसरा पैर भी नष्ट हो जायगा। कलिके अन्तमें आपका चौथा चरण भी छिप जायगा। फिर सत्ययुग आनेपर आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण हो जायँगे। सत्ययुगमें आप सर्वव्यापी होंगे और उससे भिन्न युगोंमें भी कहीं-कहीं पूर्णरूपमें विद्यमान रहेंगे। प्रभो! जहाँ आपका स्थान या


*आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्ति वायवः । तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन ॥
(४२।३४)

·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०५

आधार होगा, उसे बताती हूँ, सुनिये।

सम्पूर्ण वैष्णव, यति, ब्रह्मचारी, पतिव्रता स्त्री, ज्ञानी पुरुष, वानप्रस्थ, भिक्षु (संन्यासी), धर्मशील राजा, साधु-संत, श्रेष्ठ वैश्यजाति तथा सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहनेवाले द्विज, सेवक, शूद्र— इन सबमें आप सदा पूर्णरूपसे विराजमान रहेंगे। युग-युगमें जहाँ भी पुण्यात्मा पुरुष होंगे, वे आपके आधार रहेंगे। पीपल, वट, बिल्व, तुलसी, चन्दन—इन वृक्षोंपर; दीक्षा, परीक्षा, शपथ, गोशाला और गोपद भूमियोंमें; विवाहमें, फूलोंमें, देववृक्षोंमें, देवालयोंमें, तीर्थोंमें तथा साधु पुरुषोंके गृहोंमें आपका सदा निवास होगा। वेद-वेदाङ्गोंके श्रवणकालमें, जलमें, सभाओंमें, श्रीकृष्णके नाम और गुणोंके कीर्तन, श्रवण तथा गानके स्थानोंमें; व्रत, पूजा, तप, न्याय, यज्ञ एवं साक्षीके स्थानोंमें; गोशालाओंमें तथा गौओंमें विद्यमान रहकर आप अपनेको पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित देखेंगे। धर्म! उन स्थानोंमें आप क्षीण नहीं होंगे। इनसे भिन्न स्थानोंमें आपकी कृशता देखी जायगी। जो स्थान आपके लिये अगम्य हैं; उनका वर्णन सुनिये। सम्पूर्ण व्यभिचारिणियोंमें, नरघाती मनुष्योंके घरोंमें, नरहत्या करनेवाले नीच पुरुषोंमें, मूर्ख और दुष्टोंमें, देवता, गुरु, ब्राह्मण, इष्टदेव तथा पालनीय मनुष्योंके धनका अपहरण करनेवालोंमें; दुष्टों, धूर्तों और चोरोंमें, रति-स्थानोंमें; जूआ, मदिरापान और कलहके स्थानोंमें; शालग्राम, साधु, तीर्थ और पुराणोंसे रहित स्थलोंमें; डाकुओंके स्नेहमें, वाद-विवादमें, ताड़की छायामें, गर्वीले मनुष्योंमें, तलवारसे जीविका चलानेवाले तथा स्याहीसे जीवन-निर्वाह करनेवाले, देवालयोंमें पूजाकी वृत्तिसे जीनेवाले तथा ग्राम-पुरोहितोंमें; बैल जोतनेवालों, सुनारों और जीव-हिंसासे जीविका चलानेवालोंमें; भर्तृनिन्दित नारियों तथा नारीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंमें; दीक्षा, संध्या तथा विष्णुभक्तिसे हीन द्विजोंमें; अपनी पुत्री तथा पत्नी बेचनेवालोंमें; शालग्राम और देवमूर्तियोंका विक्रय करनेवालोंमें; मित्रद्रोही, कृतघ्न, सत्यनाशक तथा विश्वासघातियोंमें; शरणागतकी रक्षासे दूर रहनेवालों तथा शरणमें आये हुए लोगोंका नाश करनेवालोंमें; सदा झूठ बोलनेवाले, सीमाका अपहरण करनेवाले, काम, क्रोध और लोभवश झूठी गवाही देनेवाले, पुण्यकर्महीन तथा पुण्यकर्मके विरोधी मनुष्योंमें आप नहीं रहेंगे। प्रभो! इन निन्दनीय स्थानोंमें रहनेका आपको अधिकार नहीं होगा। ऐसी व्यवस्था होनेसे मेरी बात भी सच्ची हो जायगी। तात! अब मैं पतिसेवाके लिये जाऊँगी। आप भी अपने घरको पधारिये।

ऐसी बातें कहनेवाली पद्माके वचन सुनकर ब्रह्मपुत्र श्रीमान् धर्मका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस पतिव्रतासे अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।

धर्मने कहा—मेरी रक्षा करनेवाली देवि! तुम धन्य हो। पतिपरायणा हो। तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। मैं तुम्हें वर देता हूँ; ग्रहण करो। बेटी! तुम्हारे पति युवावस्थासे सम्पन्न तथा रतिकर्ममें समर्थ हों। साध्वि! वे रूपवान् और गुणवान् हों। उनका यौवन सदा ही स्थिर रहे। वत्से! तुम भी उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त एवं स्थिरयौवना हो जाओ। तुम्हारे पति मार्कण्डेयके बाद दूसरे चिरंजीवी पुरुष हों। वे कुबेरसे भी धनी और इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यवान् हों। शिवके समान विष्णुभक्त तथा कपिलके बाद उन्हींकी श्रेणीके सिद्ध हों। तुम जीवनभर पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न बनी रहो। साध्वि! तुम्हारे घर कुबेरके भवनसे भी अधिक सुन्दर हों। तुम अपने पतिसे भी अधिक गुणवान् और चिरंजीवी दस पुत्रोंकी माता बनोगी; इसमें संशय नहीं है।

शैलराज! यों कहकर धर्मराज चुपचाप खड़े हो गये। पद्मा उनकी परिक्रमा और प्रणाम करके अपने घरको चली गयी। धर्म भी उसे आशीर्वाद दे अपने धामको गये और प्रत्येक सभामें