ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१००- श्रीकृष्णद्वारा कंस-वध
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५९
अक्रूरजीके शुभ स्वप्न तथा मङ्गलसूचक शकुनका वर्णन, उनका रासमण्डल और वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! कंससे ब्रजमें जानेकी आज्ञा पाकर अक्रूरजी अपने घर गये और उत्तम मिष्टान्न खाकर शय्यापर सोये। उन्होंने सुवासित जल पीकर कपूर मिला हुआ पान खाया और सुखपूर्वक निद्रा ली। तदनन्तर रातके पिछले पहरमें जब कि बाजे आदिकी ध्वनि नहीं होती थी; उन्होंने एक सुन्दर सपना देखा। ऐसा सपना, जिसकी पुराणों और श्रुतियोंमें प्रशंसा की गयी है। अक्रूरजी नीरोग थे। उनकी शिखा बँधी हुई थी। उन्होंने दो वस्त्र धारण कर रखे थे। वे सुन्दर शय्यापर सोये थे। उनके मनमें उत्तम स्नेह उमड़ रहा था और वे चिन्ता तथा शोकसे रहित थे।
मुने! उन्होंने स्वप्नमें पहले एक ब्राह्मण-बालकको देखा, जिसकी किशोर अवस्था और अङ्गकान्ति श्याम थी। वह दो भुजाओंसे विभूषित था। उसके हाथोंमें मुरली थी। वह पीत वस्त्र धारण करके वनमालासे सुशोभित था। उसके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। मालतीकी माला उसकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूषणके योग्य और उत्तम मणिरत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित था। उसके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी और नेत्र कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे थे। इसके बाद उन्होंने पति और पुत्रोंसे युक्त, पीताम्बरधारिणी तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित एक सुन्दरी सतीको देखा, जिसके एक हाथमें जलता दीपक था और दूसरेमें श्वेत धान्य। उसका मुख शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत कर रहा था। वह सुन्दरी सती मुस्कराती हुई वर देनेको उद्यत थी। इसके बाद उन्हें शुभाशीर्वाद देते हुए एक ब्राह्मण, श्वेत कमल, राजहंस, अश्व तथा सरोवरके दर्शन हुए। उन्होंने फल और फूलोंसे लदे हुए आम, नीम, नारियल, विशाल आक और केलेके वृक्षका सुन्दर एवं मनोहर चित्र भी देखा। उन्हें यह भी दिखायी दिया कि सफेद साँप मुझे काट रहा है और मैं पर्वतपर खड़ा हूँ। उन्होंने कभी अपनेको वृक्षपर, कभी हाथीपर, कभी नावपर और कभी घोड़ेकी पीठपर बैठे देखा। कभी देखा कि मैं वीणा बजा रहा हूँ और खीर खा रहा हूँ। कमलके पत्तेपर परोसा हुआ प्रिय अन्न दही, दूधके साथ ले रहा हूँ। कभी देखा कि मेरे अङ्गोंमें कीड़े और विष्ठा लग गये हैं और मैं रोता-रोता मोहित हो रहा हूँ। कभी उन्हें अपने हाथोंमें श्वेत धान्य और श्वेत पुष्प दिखायी दिया तथा कभी उन्होंने अपने-आपको चन्दनसे चर्चित देखा। कभी अपने-आपको अट्टालिकापर और कभी समुद्रमें देखा। शरीरमें रक्त लगा है; अङ्ग-अङ्ग छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो रहा है और उसमें मेद तथा पीब लिपटे हुए हैं—यह बात देखनेमें आयी। तदनन्तर चाँदी, सोना, उज्ज्वल मणिरत्न, मुक्ता, माणिक्य, भरे हुए कलशका जल, बछड़ासहित गौ, साँड़, मोर, तोता, सारस, हंस, चील, खंजरीट, ताम्बूल, पुष्पमाला, प्रज्वलित अग्नि, देवपूजा, पार्वतीकी प्रतिमा, श्रीकृष्णकी प्रतिमा, शिवलिङ्ग, ब्राह्मण-
६६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
बालिका, सामान्य बालिका, फली और पकी हुई खेती, देवस्थान, सिंह, बाघ, गुरु और देवताके दर्शन हुए।
ऐसा स्वप्न देख प्रातःकाल उठकर उन्होंने इच्छानुसार आह्निक कृत्योंका सम्पादन किया। इसके बाद उद्धवसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त कहा और उनकी आज्ञा ले गुरु एवं देवताकी पूजा करके मन-ही-मन श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए वहाँसे यात्रा की। नारद! रास्तेमें भी उन्हें ऐसे ही मङ्गलयोग्य, शुभदायक, मनोवाञ्छित फल देनेवाले, रमणीय तथा मङ्गलसूचक शकुन अपने सामने दृष्टिगोचर हुए। बायीं तरफ उन्हें मुर्दा, सियारिन, भरा घड़ा, नेवला, नीलकण्ठ, दिव्याभूषणोंसे विभूषित पति-पुत्रवती साध्वी स्त्री, श्वेत पुष्प, श्वेत माला, श्वेत धान्य तथा खञ्जरीटके शुभ दर्शन हुए। दाहिनी ओर उन्होंने जलती आग, ब्राह्मण, वृषभ, हाथी, बछड़ेसहित गाय, श्वेत अश्व, राजहंस, वेश्या, पुष्पमाला, पताका, दही, खीर, मणि, सुवर्ण, चाँदी, मुक्ता, माणिक्य, तुरंतका कटा हुआ मांस, चन्दन, मधु, घी, कृष्णसार मृग, फल, लावा, सरसों, दर्पण, विचित्र विमान, सुन्दर दीप्तिमती प्रतिमा, श्वेत कमल, कमलवन, शङ्ख, चील, चकोर, बिलाव, पर्वत, बादल, मोर, तोता और सारसके दर्शन किये तथा शङ्ख, कोयल एवं वाद्योंकी मङ्गलमयी ध्वनि सुनी। श्रीकृष्ण-महिमाके विचित्र गान, हरिकीर्तन और जय-जयकारके शब्द भी उनके कानोंमें पड़े।
ऐसे शुभ-शकुन देख-सुनकर अक्रूरका हृदय हर्षसे खिल उठा। उन्होंने श्रीहरिका स्मरण करके पुण्यमय वृन्दावनमें प्रवेश किया। सामने देखा— रमणीय रासमण्डल शोभा पाता है, जो मनको अभीष्ट है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, पुष्प तथा चन्दनका स्पर्श करके बहनेवाली वायु उस स्थानको सुवासित कर रही है। केलेके खम्भे तथा मङ्गल-कलश रासमण्डलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। रेशमी सूतमें गूँथे हुए आम्रपल्लवोंकी सुन्दर बन्दनवारें भी इस रम्य प्रदेशकी श्रीवृद्धि कर रही हैं। सारा शोभनीय रासमण्डल सब ओरसे पद्मरागमणिद्वारा निर्मित है तथा तीन करोड़ रत्नमय मन्दिर एवं लाखों रमणीय कुञ्ज-कुटीर उसकी शोभा बढ़ाते हैं।
रासमण्डल तथा वृन्दावनकी शोभा देखकर जब अक्रूर कुछ दूर आगे गये तो उन्हें अपने समक्ष नन्दरायजीका परम उत्तम सुरम्य व्रज दिखायी दिया, जो विष्णुके निवास-स्थान— वैकुण्ठधामके समान सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी सीढ़ियाँ लगी थीं। रत्नोंके बने हुए खम्भोंसे वह बड़ा दीप्तिमान् दिखायी देता था। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उसका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंके मण्डलाकार घेरेसे वह घिरा हुआ था। विश्वकर्माद्वारा रचित वह नन्दभवन मणियोंके सारभागसे खचित (जड़ा हुआ) था। दरवाजेपर जो मार्ग दिखायी दिया, उसके द्वारा अक्रूरने राजद्वारके भीतर प्रवेश किया। वह द्वार पताकाओं तथा रत्नोंकी झालरोंसे सजा था। मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित था। रत्नोंके दर्पण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा रत्नोंसे जटित होनेके कारण उस द्वारकी विचित्र शोभा होती थी। वहाँ रत्नमयी वीथियोंकी रचना की गयी थी तथा मङ्गल-कलशोंसे सुसज्जित वह द्वार मङ्गलमय दिखायी देता था।
अक्रूरका आगमन सुनकर नन्दजी बड़े प्रसन्न हुए और बलराम तथा श्रीकृष्णको साथ ले उनकी अगवानीके लिये गये। नन्दजीके साथ वृषभानु आदि गोप भी थे। नर्तकी, भरा हुआ घड़ा, गजराज तथा श्वेत धान्यको आगे करके काली गौ, मधुपर्क, पाद्य तथा रत्नमय आसन आदि साथ ले नन्दजी विनीत एवं शान्तभावसे मुस्कराते हुए आगे बढ़े। वे गोपगणों तथा बालकोंसहित आनन्दमग्न हो रहे थे। महाभाग अक्रूरको देख