ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४६- दिव्य सुन्दर गोलोकमें राजा सुयज्ञको रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन
| २८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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इच्छा नहीं है। राधावल्लभ श्रीकृष्ण मुझे सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य नामक मोक्ष देते हैं; परंतु मैं उनकी कल्याणमयी सेवाके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं लेता हूँ। ब्रह्मत्व और अमरत्वको भी मैं जलमें दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या मानता हूँ। नरेश्वर ! भक्तिके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या भ्रममात्र है, नश्वर है। इन्द्र, मनु अथवा सूर्यका पद भी जलमें खींची गयी रेखाके समान मिथ्या है। मैं उसे सत्य नहीं मानता। फिर राजाके पदको कौन गिनता है। सुयज्ञ ! तुम्हारे यज्ञमें मुनियोंका आगमन सुनकर मेरे मनमें भी यहाँ आनेकी लालसा हुई। मैं तुम्हें विष्णुभक्तिकी प्राप्ति करानेके लिये यहाँ आया हूँ। इस समय मैंने तुमपर केवल अनुग्रह किया। तुम्हें शाप नहीं दिया। तुम एक भयानक गहरे भवसागरमें गिर गये थे। मैंने तुम्हारा उद्धार किया है। केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है। भगवान्के भक्त भी तीर्थ हैं, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, भगवद्भक्त भी देवता हैं। जलमय तीर्थ और मिट्टी-पत्थरके देवता मनुष्यको दीर्घकालमें पवित्र करते हैं; परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शन देनेके साथ ही पवित्र कर देते हैं।*
राजन् ! निकलो इस घरसे। दे दो राज्य अपने पुत्रको। वत्स ! अपनी साध्वी पत्नीकी रक्षाका भार बेटेको सौंपकर शीघ्र ही वनको चलो। भूमिपाल ! ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सब कुछ मिथ्या ही है। जो सबके ईश्वर हैं, उन परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्णका भजन करो। वे ध्यानसे सुलभ हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी उनकी समाराधना कठिन है। वे उत्पत्ति-विनाशशील प्राकृत पदार्थों और प्रकृतिसे भी परे हैं। जिनकी ही मायासे ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु पालन तथा रुद्रदेव संहार करते हैं। दिशाओंके स्वामी दिक्पाल जिनकी मायासे ही भ्रमण करते हैं, जिनकी आज्ञासे वायु चलती है, दिनेश सूर्य तपते हैं तथा निशापति चन्द्रमा सदा खेतीको सुस्निग्धता प्रदान करते हैं। सम्पूर्ण विश्वोंमें सबकी मृत्यु कालके द्वारा ही होती है। काल आनेपर ही इन्द्र वर्षा करते और अग्निदेव जलाते हैं। सम्पूर्ण विश्वके शासक तथा प्रजाको संयममें रखनेवाले यम कालसे ही भयभीत-से होकर अपने कार्यमें लगे रहते हैं। काल ही समय आनेपर संहार करता है और वही यथासमय सृष्टि तथा पालन करता है। कालसे प्रेरित होकर ही समुद्र अपने देश (स्थान)-की सीमामें रहता है, पृथ्वी अपने स्थानपर स्थिर रहती है, पर्वत अपने स्थानपर रहते हैं और पाताल अपने स्थानपर। राजेन्द्र ! सात स्वर्गलोक, सात द्वीपोंसहित पृथ्वी, पर्वत और समुद्रोंसहित सात पाताल—इन समस्त लोकोंसहित जो ब्रह्माण्ड है, वह अण्डेके आकारमें जलपर तैर रहा है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रहते हैं। देवता, मनुष्य, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि निवास करते हैं। राजन् ! पातालसे लेकर ब्रह्मलोकतक जो अण्ड है, यही ब्रह्माजीका कृत्रिम ब्रह्माण्ड है। यह जलमें शयन करनेवाले क्षुद्र विराट् विष्णुके नाभिकमलपर उसी तरह है जैसे कमलकी कर्णिकामें बीज रहा करता है।
इस प्रकार सुविस्तृत जलशय्यापर शयन करनेवाले वे प्राकृत महायोगी क्षुद्र विराट् विष्णु भी प्रकृतिसे परवर्ती ईश्वर, सर्वात्मा, कालेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करते हैं; उनका आधार है महाविष्णुका विस्तृत रोमकूप। महाविष्णुके अनन्त रोमकूपोंमेंसे प्रत्येकमें ऐसे-ऐसे ब्रह्माण्ड स्थित हैं। महाविष्णुके शरीरमें असंख्य रोम हैं और उन रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड हैं। अण्डाकार ब्रह्माण्डोंकी
* न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ॥ ते पुनन्त्युरुकालेन कृष्णभक्ताश्च दर्शनात्।
(प्रकृतिखण्ड ५३। २५-२६)
प्रकृतिखण्ड २८१
उत्पत्तिके स्थानभूत वे महाविष्णु भी सदा श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकृतिके गर्भसे अण्डरूपमें प्रकट होते हैं। सबके आधारभूत वे महाविष्णु भी कालके स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णका सदा चिन्तन किया करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंमें स्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि तथा महान् विराट् और क्षुद्र विराट् इन सबकी बीजरूपा जो मूलप्रकृति ईश्वरी है, वह प्रलयकालमें कालेश्वर श्रीकृष्णमें लीन होती है तथा सदा उन्हींका ध्यान किया करती है। यह सब परम दुर्लभ महाज्ञान तुम्हें बताया गया है। गुरुदेव शिवने यह ज्ञान मुझे दिया था। इसे तो तुमने सुन लिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५३)
गोलोक एवं श्रीकृष्णकी उत्कृष्टता, कालमान एवं विभिन्न प्रलयोंका निरूपण, चौदह मनुओंका परिचय, ब्रह्मासे लेकर प्रकृतितकके श्रीकृष्णमें लय होनेका वर्णन, शिवका मृत्युञ्जयत्व, मूलप्रकृतिसे महाविष्णुका प्रादुर्भाव, सुयज्ञको विप्रचरणोदकका महत्त्व तथा राधाका मन्त्र बताकर सुतपाका जाना, पुष्करमें राजाकी दुष्कर तपस्या तथा राधामन्त्रके जपसे सुयज्ञका श्रीराधाकी कृपासे गोलोकमें जाना और श्रीकृष्णका दर्शन एवं कृपाप्रसाद प्राप्त करना
**राजाने पूछा—**मुनीश्वर! सभी कालसे भयभीत रहते हैं तो उनका आधार कहाँ है? कालकी माया कितनी है? क्षुद्र विराट्की आयु कितने कालकी है? ब्रह्मा, प्रकृति, मनु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य प्राकृत जनोंकी परमायु क्या है? वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उनकी वेदोक्त आयुका भलीभाँति विचार करके मेरे समक्ष वर्णन कीजिये। महाभाग! समस्त विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें कौन-सा लोक है? यह बताइये और मेरे संदेहका निवारण कीजिये।
**मुनि बोले—**राजन्! सम्पूर्ण विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें गोलोक विद्यमान है, जो आकाशके समान विस्तृत है। वह श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकट हो सदा नित्य-अण्डके रूपमें प्रकाशित होता है। भूपाल! आदिसर्गमें सृष्टिके लिये उन्मुख हो अपनी कलास्वरूपा प्रकृतिके साथ संयुक्त श्रीकृष्ण जब क्रीडापरायण होकर लीलासे ही थकानका अनुभव करते हैं, उस समय उनके मुखमण्डलसे निर्गत पसीनेकी बूँदोंसे जो जलराशि प्रकट होती है, उसीके द्वारा गोलोकधाम जलसे परिपूर्ण रहता है। प्रकृतिके गर्भसे संयुक्त एवं अण्डाकारमें उत्पन्न जो विश्वके आधारभूत महाविष्णु (या महाविराट्) हैं, उनका आधार वहाँ उपर्युक्त विस्तृत गोलोकधाम ही है। अत्यन्त विस्तृत जलाधार (अथवा जलशय्या)-पर शयन करनेवाले जो महाविराट् हैं, वे श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्णका सोलहवाँ अंश कहे गये हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है। उनके मुखपर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे वनमाला धारण करते हैं। श्रीमान् महाविष्णु पीताम्बरसे सुशोभित हैं। सर्वोपरि आकाशमें श्रीविष्णुका नित्य वैकुण्ठधाम है, जो आत्माकाशके समान नित्य तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य विस्तृत है। ईश्वरकी इच्छासे उसका आविर्भाव हुआ है।