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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 699

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६८९
(अब क्षत्रियोंके धर्म बतलाता हूँ-) क्षत्रियोंको
सदा यत्नपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन, नारायणकी
अर्चा, राज्योंका पालन, युद्धमें निर्भीकता, ब्राह्मणोंको
नित्य दान, शरणागतकी रक्षा, प्रजाओं और
दुःखियोंका पुत्रवत् पालन, शस्त्रास्त्रकी निपुणता,
रणमें पराक्रम, तपस्या और धर्मकार्य करना
चाहिये। जो सदसद्विवेकवाली बुद्धिसे युक्त तथा
नीति-शास्त्रका ज्ञाता हो, उसका सदा पालन
करना चाहिये और सत्पुरुषोंसे भरी हुई सभामें
उसे नित्य नियुक्त करना चाहिये। प्रतापी एवं
यशस्वी क्षत्रिय हाथी, घोड़े, रथ और पैदल
सैनिकोंसे युक्त चतुरङ्गिणी सेनाका नित्य यत्नपूर्वक
पालन करता है। युद्धके लिये बुलाये जानेपर वह
युद्ध-दानसे विमुख नहीं होता; क्योंकि जो क्षत्रिय
युद्धमें प्राण-विसर्जन करता है, उसे यशस्कर
स्वर्गकी प्राप्ति होती है*।
वैश्योंका धर्म व्यापार, खेती करना, ब्राह्मणों
और देवताओंका पूजन, दान, तपस्या और व्रतका
पालन है। नित्य ब्राह्मणोंकी पूजा करना शूद्रका
धर्म कहा गया है। ब्राह्मणको कष्ट देनेवाला तथा
उसके धनपर अधिकार कर लेनेवाला शूद्र
चाण्डालताको प्राप्त हो जाता है। विप्रके धनका
अपहरण करनेवाला शूद्र असंख्य जन्मोंतक गीध,
सौ जन्मोंतक सूअर और फिर सौ जन्मोंतक
हिंसक पशुओंकी योनिमें जन्म लेता है। जो शूद्र
ब्राह्मणी तथा अपनी माताके साथ व्यभिचार
करता है; वह पापी जबतक सौ ब्रह्मा नहीं बीत
जाते, तबतक कुम्भीपाकमें कष्ट भोगता है। वहाँ
वह खौलते हुए तैलमें डुबाया जाता है, रात-दिन
उसे साँप काटते रहते हैं; इस प्रकार यम-यातनासे
दुःखी होकर वह चीत्कार करता रहता है।
तत्पश्चात् वह पापी सात जन्मोंतक चाण्डाल-
योनिमें, सात जन्मोंतक सर्प-योनिमें और सात
जन्मोंतक जल-जन्तुओंकी योनिमें उत्पन्न होता
है। फिर वह असंख्य जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा
तथा सात जन्मोंतक कुलटा स्त्रियोंकी योनिका
कीट होता है। पुनः वह पापी सात जन्मोंतक
गौओंके घावका कीड़ा होता है। इस प्रकार उसे
अनेक योनिमें भ्रमण करते ही बीतता है; परंतु
मनुष्यकी योनि नहीं मिलती।
अब संन्यासियोंका जो धर्म है, वह मेरे
मुखसे श्रवण करो। मनुष्य दण्ड-ग्रहणमात्रसे
नारायणस्वरूप हो जाता है। जो संन्यासी मेरा
ध्यान करता है; वह अपने पूर्वकर्मोंको जलाकर
वर्तमान-जन्मके कर्मोंका उच्छेद कर डालता है
और अन्तमें उसे मेरे लोककी प्राप्ति होती है।
व्रजराज ! जैसे वैष्णवके चरणस्पर्शसे तीर्थ तत्काल
पवित्र हो जाते हैं; वैसे ही संन्यासीके पादस्पर्शसे
पृथ्वी तुरंत पावन हो जाती है। मनुष्य संन्यासीका
स्पर्श करनेसे पापरहित हो जाता है। संन्यासीको
भोजन कराकर अश्वमेधयज्ञका फल तथा अकस्मात्
संन्यासीको देखकर उसे नमस्कार करके राजसूय-
यज्ञका फल पाता है। संन्यासी, यति और
ब्रह्मचारी-इन सबके दर्शन-स्पर्शका फल एक-
सा होता है।
संन्यासीको चाहिये कि वह भूखसे व्याकुल
होनेपर सायंकाल गृहस्थोंके घर जाय और वहाँ
गृहस्थ उसे सदन्न अथवा कदन्न जो कुछ भी दे;
उसका परित्याग न करे। न तो मिष्टान्नकी
याचना करे, न क्रोध करे और न धन ग्रहण करे।
एक वस्त्र धारण करे, इच्छारहित हो जाय,
जाड़ा-गरमीमें एक-सा रहे और लोभ-मोहका
परित्याग कर दे। इस प्रकार वहाँ एक रात
ठहरकर प्रातःकाल दूसरे स्थानको चला जाय।
*हस्त्यरथपदातं सेनाङ्गं च चतुष्टयम्। पालयेद् यत्नतो नित्यं यशस्वी च प्रतापवान् ॥
रणे निमन्त्रितश्चैव दाने न विमुखो भवेत्। रणे यो वा त्यजेत् प्राणांस्तस्य स्वर्गो यशस्करः ॥
(८३।७१-७२)