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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२५- नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

१९८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर, सावित्रीको वरदान

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! सावित्रीके वचन सुनकर यमराजके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हँसकर प्राणियोंके कर्म-विपाक कहनेके लिये उद्यत हो गये।

धर्मराजने कहा—प्यारी बेटी! अभी तुम हो तो अल्प वयकी बालिका, किंतु तुम्हें पूर्ण विद्वानों, ज्ञानियों और योगियोंसे भी बढ़कर ज्ञान प्राप्त है। पुत्री! भगवती सावित्रीके वरदानसे तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम उन देवीकी कला हो। राजाने तपस्याके प्रभावसे सावित्री-जैसी कन्यारत्नको प्राप्त किया है। जिस प्रकार लक्ष्मी भगवान् विष्णुके, भवानी शंकरके, राधा श्रीकृष्णके, सावित्री ब्रह्माके, मूर्ति धर्मके, शतरूपा मनुके, देवहूति कर्दमके, अरुन्धती वसिष्ठके, अदिति कश्यपके, अहल्या गौतमके, शची इन्द्रके, रोहिणी चन्द्रमाके, रति कामदेवके, स्वाहा अग्निके, स्वधा पितरोंके, संज्ञा सूर्यके, वरुणानी वरुणके, दक्षिणा यज्ञके, पृथ्वी वराहके और देवसेना कार्तिकेयके पास सौभाग्यवती प्रिया बनकर शोभा पाती हैं, तुम भी वैसी ही सत्यवान्‌की प्रिया बनो। मैंने यह तुम्हें वर दे दिया। महाभागे! इसके अतिरिक्त भी जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह वर माँगो। मैं तुम्हें सभी अभिलषित वर देनेको तैयार हूँ।

सावित्री बोली—महाभाग! सत्यवान्‌के औरस अंशसे मुझे सौ पुत्र प्राप्त हों—यही मेरा अभिलषित वर है। साथ ही, मेरे पिता भी सौ पुत्रोंके जनक हों। मेरे श्वशुरको नेत्र-लाभ हों और उन्हें पुनः राज्यश्री प्राप्त हो जाय, यह भी मैं चाहती हूँ। जगत्प्रभो! सत्यवान्‌के साथ मैं बहुत लंबे समयतक रहकर अन्तमें भगवान् श्रीहरिके धाममें चली जाऊँ, यह वर भी देनेकी आप कृपा करें।

प्रभो! मुझे जीवके कर्मका विपाक तथा विश्वसे तर जानेका उपाय भी सुननेके लिये मनमें महान् कौतूहल हो रहा है; अतः आप यह भी बतावें।

धर्मराजने कहा—महासाध्वि! तुम्हारे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे। अब मैं प्राणियोंका कर्म-विपाक कहता हूँ, सुनो। भारतवर्षमें ही शुभ-अशुभ कर्मोंका जन्म होता है—यहाँके कर्मोंको 'शुभ' या 'अशुभ' की संज्ञा दी गयी है। यहाँ सर्वत्र पुण्यक्षेत्र है, अन्यत्र नहीं; अन्यत्र प्राणी केवल कर्मोंका फल भोगते हैं। पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा मनुष्य—ये सभी कर्मके फल भोगते हैं। परंतु सबका जीवन समान नहीं है। उनमेंसे मानव ही कर्मका जनक होता है अर्थात् मनुष्ययोनिमें ही शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं; जिनका फल सर्वत्र सभी योनियोंमें भोगना पड़ता है। विशिष्ट जीवधारी—विशेषतः मानव ही सब योनियोंमें कर्मोंका फल भोगते हैं और सभी योनियोंमें भटकते हैं। वे पूर्व-जन्मका किया हुआ शुभाशुभ कर्म भोगते हैं। शुभ कर्मके प्रभावसे वे स्वर्गलोकमें जाते हैं और अशुभ कर्मसे उन्हें नरकमें भटकना पड़ता है। कर्मका निर्मूलन हो जानेपर मुक्ति होती है। साध्वि! मुक्ति दो प्रकारकी बतलायी गयी है—एक निर्वाणस्वरूपा और दूसरी परमात्मा श्रीकृष्णकी सेवारूपा। बुरे कर्मसे प्राणी रोगी होता है और शुभ कर्मसे आरोग्यवान्। वह अपने शुभाशुभ कर्मके अनुसार दीर्घजीवी, अल्पायु, सुखी एवं दुःखी होता है। कुत्सित कर्मसे ही प्राणी अङ्गहीन, अंधे-बहरे आदि होते हैं। उत्तम कर्मके फलस्वरूप सिद्धि आदिकी प्राप्ति होती है।

देवि! सामान्य बातें बतायी गयीं; अब विशेष बातें सुनो। सुन्दरि! यह अतिशय दुर्लभ विषय शास्त्रों और पुराणोंमें वर्णित है। इसे सबके सामने नहीं कहना चाहिये। सभी जातियोंके लिये भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाना परम दुर्लभ है। साध्वि! उन सब जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ माना

प्रकृतिखण्ड

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जाता है। वह समस्त कर्मोंमें प्रशस्त होता है। भारतवर्षमें विष्णुभक्त ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है। पतिव्रते! वैष्णवके भी दो भेद हैं—सकाम और निष्काम। सकाम वैष्णव कर्मप्रधान होता है और निष्काम वैष्णव केवल भक्त। सकाम वैष्णव कर्मोंका फल भोगता है और निष्काम वैष्णव शुभाशुभ भोगके उपद्रवसे दूर रहता है।

साध्वि! ऐसा निष्काम वैष्णव शरीर त्यागकर भगवान् विष्णुके निरामय पदको प्राप्त कर लेता है। ऐसे निष्काम वैष्णवोंका संसारमें पुनरागमन नहीं होता। द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णब्रह्म परमेश्वर हैं। उनकी उपासना करनेवाले भक्तपुरुष अन्तमें दिव्य शरीर धारण करके गोलोकमें जाते हैं। सकाम वैष्णव पुरुष उच्च वैष्णव लोकोंमें जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्षमें लौट आते हैं। द्विजातियोंके कुलमें उनका जन्म होता है। वे भी कालक्रमसे निष्काम भक्त बन जाते और भगवान् उन्हें निर्मल भक्ति भी अवश्य देते हैं। वैष्णव ब्राह्मणसे भिन्न जो सकाम मनुष्य हैं, वे विष्णुभक्तिसे रहित होनेके कारण किसी भी जन्ममें विशुद्ध बुद्धि नहीं पा सकते। साध्वि! जो तीर्थस्थानमें रहकर सदा तपस्या करते हैं, वे द्विज ब्रह्माके लोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें आ जाते हैं। भारतमें रहकर अपने कर्तव्य-कर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण तथा सूर्यभक्त शरीर त्यागनेपर सूर्यलोकमें जाते हैं और पुण्यभोगके पश्चात् पुनः भारतवर्षमें जन्म पाते हैं। अपने धर्ममें निरत रहकर शिव, शक्ति तथा गणपतिकी उपासना करनेवाले ब्राह्मण शिवलोकमें जाते हैं; फिर उन्हें लौटकर भारतवर्षमें आना पड़ता है। जो धर्मरहित होनेपर भी निष्कामभावसे श्रीहरिका भजन करते हैं, वे भी भक्तिके बलसे श्रीहरिके धाममें चले जाते हैं।

साध्वि! जो अपने धर्मका पालन नहीं करते, वे आचारहीन, कामलोलुप लोग अवश्य ही नरकमें जाते हैं। चारों ही वर्ण अपने धर्ममें कटिबद्ध रहनेपर ही शुभकर्मका फल भोगनेके अधिकारी होते हैं। जो अपना कर्तव्य-कर्म नहीं करते, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं। कर्मका फल भोगनेके लिये वे भारतवर्षमें नहीं आ सकते। अतएव चारों वर्णोंके लिये अपने धर्मका पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।

अपने धर्ममें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, स्वधर्मनिरत विप्रको अपनी कन्या देनेके फलस्वरूप चन्द्रलोकको जाते हैं और वहाँ चौदह मन्वन्तर कालतक रहते हैं। साध्वि! यदि कन्याको अलंकृत करके दानमें दिया जाय तो उससे दुगुना फल प्राप्त होता है। उन साधु पुरुषोंमें यदि कामना हो तब तो वे चन्द्रमाके लोकमें जाते हैं। निष्कामभावसे दान करें तो वे भगवान् विष्णुके परम धाममें पहुँच जाते हैं। गव्य (दूध), चाँदी, सुवर्ण, वस्त्र, घृत, फल और जल ब्राह्मणोंको देनेवाले पुण्यात्मा पुरुष चन्द्रलोकमें जाते हैं। साध्वि! एक मन्वन्तरतक वे वहाँ सुविधापूर्वक निवास करते हैं। उस दानके प्रभावसे उन्हें वहाँ सुदीर्घ कालतक निवास प्राप्त होता है। पतिव्रते! पवित्र ब्राह्मणको सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि द्रव्यका दान करनेवाले सत्पुरुष सूर्यलोकमें जाते हैं। वे भय-बाधासे शून्य हो, उस विस्तृत लोकमें सुदीर्घ कालतक वास करते हैं। जो ब्राह्मणोंको पृथ्वी अथवा प्रचुर धान्य दान करता है, वह भगवान् विष्णुके परम सुन्दर श्वेतद्वीपमें जाता है और दीर्घकालतक वहाँ वास करता है। भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गृह-दान करनेवाले पुरुष स्वर्गलोकमें जाते और वहाँ दीर्घकालतक निवास करते हैं; वे उस लोकमें उतने वर्षोंतक रहते हैं, जितनी संख्यामें उस दान-गृहके रजःकण हैं। मनुष्य जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे गृह-दान करता है, अन्तमें उसी देवताके लोकमें जाता है और घरमें जितने धूलिकण हैं, उतने वर्षोंतक वहाँ रहता

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है। अपने घरपर दान करनेकी अपेक्षा देवमन्दिरमें दान करनेसे चौगुना, पूर्तकर्म (वापी, कूप, तड़ाग आदिके निर्माण)-के अवसरपर करनेसे सौगुना तथा किसी श्रेष्ठ तीर्थस्थानमें करनेसे आठगुना फल होता है—यह ब्रह्माजीका वचन है।

समस्त प्राणियोंके उपकारके लिये तड़ागका दान करनेवाला दस हजार वर्षोंकी अवधि लेकर जनलोकमें जाता है। बावलीका दान करनेसे मनुष्यको सदा सौगुना फल मिलता है। वह सेतु (पुल)-का दान करनेपर तड़ागके दानका भी पुण्यफल प्राप्त कर लेता है। तड़ागका प्रमाण चार हजार धनुष* चौड़ा और उतना ही लंबा निश्चित किया गया है। इससे जो लघु प्रमाणमें है, वह वापी कही जाती है। सत्पात्रको दी हुई कन्या दस वापीके समान पुण्यप्रदा होती है। यदि उस कन्याको अलंकृत करके दान किया जाय तो दुगुना फल मिलता है। तड़ागके दानसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही उसके भीतरसे कीचड़ और मिट्टी निकालनेसे सुलभ हो जाता है। वापीके कीचड़को दूर करानेसे उसके निर्माण कराने-जितना फल होता है। पतिव्रते ! जो पुरुष पीपलका वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह हजारों वर्षोंके लिये भगवान् विष्णुके तपोलोकमें जाता है। सावित्री ! जो सबकी भलाईके लिये पुष्पोद्यान लगाता है, वह दस हजार वर्षोंतक ध्रुवलोकमें स्थान पाता है। पतिव्रते ! विष्णुके उद्देश्यसे विमानका दान करनेवाला मानव एक मन्वन्तरतक विष्णुलोकमें वास करता है। यदि वह विमान विशाल और चित्रोंसे सुसज्जित किया गया हो तो उसके दानसे चौगुना फल प्राप्त होता है। शिविका-दानमें उससे आधा फल होना निश्चित है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके उद्देश्यसे मन्दिराकार झूला दान करता है, वह अति दीर्घकालतक भगवान् विष्णुके लोकमें वास करता है। पतिव्रते ! जो सड़क बनवाता और उसके किनारे लोगोंके ठहरनेके लिये महल (धर्मशाला) बनवा देता है, वह सत्पुरुष हजारों वर्षोंतक इन्द्रके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। ब्राह्मणों अथवा देवताओंको दिया हुआ दान समान फल प्रदान करता है। जो पूर्वजन्ममें दिया गया है, वही जन्मान्तरमें प्राप्त होता है। जो नहीं दिया गया है, वह कैसे प्राप्त हो सकता है? पुण्यवान् पुरुष स्वर्गीय सुख भोगकर भारतवर्षमें जन्म पाता है। उसे क्रमशः उत्तम-से-उत्तम ब्राह्मण-कुलमें जन्म लेनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। पुण्यवान् ब्राह्मण स्वर्गसुख भोगनेके अनन्तर पुनः ब्राह्मण ही होता है। यही नियम क्षत्रिय आदिके लिये भी है। क्षत्रिय अथवा वैश्य तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेता है—ऐसी बात श्रुतिमें सुनी जाती है। धर्मरहित ब्राह्मण नाना योनियोंमें भटकते हैं और कर्मभोगके पश्चात् फिर ब्राह्मणकुलमें ही जन्म पाते हैं। कितना ही काल क्यों न बीत जाय, बिना भोग किये कर्म क्षीण नहीं हो सकते। अपने किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल प्राणियोंको अवश्य भोगना पड़ता है। देवता और तीर्थकी सहायता तथा कायव्यूहसे प्राणी शुद्ध हो जाता है।

साध्वि ! ये कुछ बातें तो तुम्हें बतला दीं, अब आगे और क्या सुनना चाहती हो?

(अध्याय २६)


* चार हाथकी लंबाईको धनुषका प्रमाण कहते हैं।

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सावित्री-धर्मराजके प्रश्नोत्तर तथा सावित्रीके द्वारा धर्मराजको प्रणाम-निवेदन

**सावित्रीने कहा—**धर्मराज ! जिस कर्मके प्रभावसे पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग अथवा अन्य लोकमें जाते हैं, वह मुझे बतानेकी कृपा करें।

**धर्मराज बोले—**पतिव्रते ! ब्राह्मणको अन्न दान करनेवाला पुरुष इन्द्रलोकमें जाता है और दान किये हुए अन्नमें जितने दाने होते हैं उतने वर्षोंतक वह वहाँ निवास पाता है। अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। इसमें न कभी पात्रकी परीक्षाकी आवश्यकता होती है और न समयकी*। साध्वि ! यदि ब्राह्मणों अथवा देवताओंको आसन दान किया जाय तो हजारों वर्षोंतक अग्निदेवके लोकमें रहनेकी सुविधा प्राप्त हो जाती है। जो पुरुष ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौ दान करता है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। यह गोदान साधारण दिनोंकी अपेक्षा पर्वके समय चौगुना, तीर्थमें सौगुना और नारायणक्षेत्रमें कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो मानव भारतवर्षमें रहकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको गौ प्रदान करता है, वह हजारों वर्षोंतक चन्द्रलोकमें रहनेका अधिकारी बन जाता है। दुग्धवती गौ ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष उसके रोमपर्यन्त वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो ब्राह्मणको वस्त्रसहित शालग्राम-शिलाका दान करता है, वह चन्द्रमा और सूर्यके स्थितिकालतक वैकुण्ठमें सम्मानपूर्वक रहता है। ब्राह्मणको सुन्दर स्वच्छ छत्र दान करनेवाला व्यक्ति हजारों वर्षोंतक वरुणके लोकमें आनन्द करता है। साध्वि ! जो ब्राह्मणको दो पादुकाएँ प्रदान करता है, उसे दस हजार वर्षतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। मनोहर दिव्य शय्या ब्राह्मणको देनेसे दीर्घकालतक चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा होती है। जो देवताओं अथवा ब्राह्मणोंको दीप-दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें वास करता है। उस पुण्यसे उसके नेत्रोंमें ज्योति बनी रहती है तथा वह यमलोकमें नहीं जाता। भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको हाथी दान करता है, वह इन्द्रकी आयुपर्यन्त उनके आधे आसनपर विराजमान होता है। ब्राह्मणको घोड़ा देनेवाला भारतवासी मनुष्य वरुणलोकमें आनन्द करता है। ब्राह्मणको उत्तम शिविका—पालकी प्रदान करनेवाला विष्णुलोकमें जाता है। जो ब्राह्मणको पंखा तथा सफेद चँवर अर्पण करता है, वह वायुलोकमें सम्मान पाता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको धानका पर्वत देता है, वह धानके दानोंके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। दाता और प्रतिगृहीता दोनों ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं।

जो भारतवर्षमें निरन्तर भगवान् श्रीहरिके नामका कीर्तन करता है, उस चिरञ्जीवी मनुष्यको देखते ही मृत्यु भाग जाती है। भारतवर्षमें जो विद्वान् मनुष्य पूर्णिमाको रातभर दोलोत्सव मनानेका प्रबन्ध करता है, वह जीवन्मुक्त है। इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वह भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है। उत्तराफाल्गुनीमें उत्सव मनानेसे इससे दुगुना फल मिलता है। जो भारतवर्षमें ब्राह्मणको तिलदान करता है, वह तिलके बराबर वर्षोंतक विष्णुधाममें सम्मान पाता है। उसके बाद उत्तम योनिमें जन्म पाकर चिरजीवी हो सुख भोगता है। ताँबेके पात्रमें तिल रखकर दान करनेसे दूना फल मिलता है। जो मनुष्य ब्राह्मणको फलयुक्त वृक्ष प्रदान करता है, वह फलके बराबर वर्षोंतक इन्द्रलोकमें सम्मान पाता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह सुयोग्य पुत्र प्राप्त करता है। फलवाले वृक्षोंके दानकी महिमा इससे हजारगुना अधिक बतायी


* अन्नदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति। नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियमः क्वचित्॥
(प्रकृतिखण्ड २७।३)

२०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

गयी है अथवा ब्राह्मणको केवल फलका भी दान करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक स्वर्गमें वास करके पुनः भारतवर्षमें जन्म पाता है।

भारतवर्षमें रहनेवाला जो पुरुष अनेक द्रव्योंसे सम्पन्न तथा भाँति-भाँतिके धान्योंसे भरे-पूरे विशाल भवन ब्राह्मणको दान करता है, वह उसके फलस्वरूप दीर्घकालतक कुबेरके लोकमें वास पाता है। तत्पश्चात् उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह महान् धनवान् होता है। साध्वि! हरी-भरी खेतीसे युक्त सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पण करनेवाला पुरुष निश्चयपूर्वक वैकुण्ठधाममें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मणको दान करता है, उसकी वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठा होती है। फिर, जहाँकी उत्तम प्रजाएँ हों, जहाँकी भूमि पकी हुई खेतियोंसे लहलहा रही हो, अनेक प्रकारकी पुष्करिणियोंसे संयुक्त हो तथा फलवाले वृक्ष और लताएँ जिसकी शोभा बढ़ा रही हों, ऐसा श्रेष्ठ नगर जो पुरुष भारतवर्षमें ब्राह्मणको दान करता है, वह बहुत लंबे समयपर्यन्त वैकुण्ठधाममें सुप्रतिष्ठित होता है। फिर भारतवर्षमें उत्तम जन्म पाकर राजेश्वर होता है। उसे लाखों नगरोंका प्रभुत्व प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है। निश्चितरूपसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य भूमण्डलपर उसके पास विराजमान रहते हैं।

अत्यन्त उत्तम अथवा मध्यम श्रेणीका भी नगर प्रजाओंसे सम्पन्न हो, वापी, तड़ाग तथा भाँति-भाँतिके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हों, ऐसे सौ नगर ब्राह्मणको दान करनेवाला पुण्यात्मा वैकुण्ठलोकमें सुप्रतिष्ठित होता है। जैसे इन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होकर स्वर्गलोकमें शोभा पाते हैं, वैसे ही भूमण्डलपर उस पुरुषकी शोभा होती है। दीर्घ कालतक पृथ्वी उसका साथ नहीं छोड़ती। वह महान् सम्राट् होता है। अपना सम्पूर्ण अधिकार ब्राह्मणको देनेवाला पुरुष चौगुने फलका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है।

पतिव्रते! जो पुरुष ब्राह्मणको जम्बूद्वीपका दान करता है, उसे निश्चितरूपसे सौगुने फल प्राप्त होते हैं। जो सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका दान करनेवाले, सम्पूर्ण तीर्थोंमें निवास करनेवाले, समस्त तपस्याओंमें संलग्न, सम्पूर्ण उपवास-व्रतके पालक, सर्वस्व दान करनेवाले तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंके पारङ्गत तथा श्रीहरिके भक्त हैं, उन्हें पुनः जगत्में जन्म धारण करना नहीं पड़ता। उनके सामने असंख्य ब्रह्माओंका पतन हो जाता है, परंतु वे श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें निवास करते रहते हैं। विष्णु-मन्त्रकी उपासना करनेवाले पुरुष अपने मानवशरीरका त्याग करनेके पश्चात् जन्म, मृत्यु एवं जरासे रहित दिव्य रूप धारण करके श्रीहरिका सारूप्य पाकर उनकी सेवामें संलग्न हो जाते हैं। देवता, सिद्ध तथा अखिल विश्व—ये सब-के-सब समयानुसार नष्ट हो जाते हैं, किंतु श्रीकृष्णभक्तोंका कभी नाश नहीं होता। जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था उनके निकट नहीं आ सकती।

जो पुरुष कार्तिकमासमें श्रीहरिको तुलसी अर्पण करता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक भगवान्के धाममें विराजमान होता है। फिर उत्तम कुलमें उसका जन्म होता और निश्चितरूपसे भगवान्के प्रति उसके मनमें भक्ति उत्पन्न होती है, वह भारतमें सुखी एवं चिरञ्जीवी होता है। जो कार्तिकमें श्रीहरिको घीका दीप देता है, वह जितने पल दीपक जलता है, उतने वर्षोंतक हरिधाममें आनन्द भोगता है। फिर अपनी योनिमें आकर विष्णुभक्ति पाता है; महाधनवान् नेत्रकी ज्योतिसे युक्त तथा दीप्तिमान् होता है। जो पुरुष माघमें अरुणोदयके समय प्रयागकी गङ्गामें स्नान करता है, उसे दीर्घकालतक भगवान् श्रीहरिके मन्दिरमें आनन्द लाभ करनेका सुअवसर मिलता है। फिर वह उत्तम योनिमें आकर भगवान् श्रीहरिकी भक्ति एवं मन्त्र पाता है; भारतमें

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जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। पुनः यथासमय मानव-शरीरको त्यागकर 'भगवद्धाम' में जाता है। वहाँसे पुनः पृथ्वीतलपर आनेकी स्थिति उसके सामने नहीं आती। भगवान्‌का सारूप्य प्राप्तकर वह उन्हींकी सेवामें सदा लगा रहता है। गङ्गामें सर्वदा स्नान करनेवाला पुरुष सूर्यकी भाँति भूमण्डलपर पवित्र माना जाता है। उसे पद-पदपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है, यह निश्चित है। उसकी चरण-रजसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। वह वैकुण्ठलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। उस तेजस्वी पुरुषको जीवन्मुक्त कहना चाहिये। सम्पूर्ण तपस्वी उसका आदर करते हैं। जो पुरुष मीन और कर्कके मध्यवर्तीकालमें भारतवर्षमें सुवासित जलका दान करता है, वह वैकुण्ठमें आनन्द भोगता रहता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म पाकर रूपवान्, सुखी, शिवभक्त, तेजस्वी तथा वेद और वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् होता है। वैशाखमासमें ब्राह्मणको सत्तू दान करनेवाला पुरुष सत्तूकणके बराबर वर्षोंतक विष्णुमन्दिरमें प्रतिष्ठित होता है। भारतवर्षमें रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्णजन्माष्टमीका व्रत करता है, वह सौ जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। वह दीर्घकालतक वैकुण्ठलोकमें आनन्द भोगता है। फिर उत्तम योनिमें जन्म लेनेपर उसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति भक्ति उत्पन्न हो जाती है—यह निश्चित है। इस भारतवर्षमें ही शिवरात्रिका व्रत करनेवाला पुरुष दीर्घकालतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो शिवरात्रिके दिन भगवान् शंकरको बिल्वपत्र चढ़ाता है, वह पत्र-संख्याके बराबर युगोंतक कैलासमें सुखपूर्वक वास करता है। पुनः श्रेष्ठ योनिमें जन्म लेकर भगवान् शिवका परम भक्त होता है। विद्या, पुत्र, सम्पत्ति, प्रजा और भूमि—ये सभी उसके लिये सुलभ रहते हैं।

जो व्रती पुरुष चैत्र अथवा माघमासमें शंकरकी पूजा करता है तथा बेंत लेकर उनके सम्मुख रात-दिन भक्तिपूर्वक नृत्य करनेमें तत्पर रहता है, वह चाहे एक मास, आधा मास, दस दिन, सात दिन अथवा दो ही दिन या एक ही दिन ऐसा क्यों न करे, उसे दिनकी संख्याके बराबर युगोंतक भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है।

साध्वि! जो मनुष्य भारतवर्षमें रामनवमीका व्रत करता है, वह सात मन्वन्तरोंतक विष्णुधाममें आनन्दका अनुभव करता है, फिर अपनी योनिमें आकर रामभक्ति पाता और जितेन्द्रियशिरोमणि होता है। जो पुरुष भगवतीकी शरत्कालीन महापूजा करता है; साथ ही नृत्य, गीत तथा वाद्य आदिके द्वारा नाना प्रकारके उत्सव मनाता है, वह पुरुष भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर श्रेष्ठ योनिमें जन्म पाकर वह निर्मल बुद्धि पाता है। अतुल सम्पत्ति, पुत्र-पौत्रोंकी अभिवृद्धि, महान् प्रभाव तथा हाथी-घोड़े आदि वाहन—ये सभी उसे प्राप्त हो जाते हैं। वह राजराजेश्वर भी होता है। इसमें कोई संशय नहीं है। जो पुरुष पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें रहकर भाद्रपदमासकी शुक्लाष्टमीके अवसरपर एक पक्षतक नित्य भक्ति-भावसे महालक्ष्मीकी उपासना करता है, सोलह प्रकारके उत्तम उपचारोंसे भलीभाँति पूजा करनेमें संलग्न रहता है, वह वैकुण्ठधाममें रहनेका अधिकारी होता है।

भारतवर्षमें कार्तिककी पूर्णिमाके अवसरपर सैकड़ों गोप एवं गोपियोंको साथ लेकर रासमण्डल-सम्बन्धी उत्सव मनानेकी बड़ी महिमा है। उस दिन पाषाणमयी प्रतिमामें सोलह प्रकारके उपचारोंद्वारा श्रीराधा-कृष्णकी पूजा करे। इस पुण्यमय कार्यको सम्पन्न करनेवाला पुरुष गोलोकमें वास करता है और भगवान् श्रीकृष्णका परम भक्त बनता है। उसकी भक्ति क्रमशः वृद्धिको प्राप्त होती है। वह सदा भगवान् श्रीहरिका मन्त्र जपता है। वहाँ

२०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् श्रीकृष्णके समान रूप प्राप्त करके उनका प्रमुख पार्षद होता है। जरा और मृत्युको जीतनेवाले उस पुरुषका पुनः वहाँसे पतन नहीं होता।

जो पुरुष शुक्ल अथवा कृष्ण-पक्षकी एकादशीका व्रत करता है, उसे वैकुण्ठमें रहनेकी सुविधा प्राप्त होती है। फिर भारतवर्षमें आकर वह भगवान् श्रीकृष्णका अनन्य उपासक होता है। क्रमशः भगवान् श्रीहरिके प्रति उसकी भक्ति सुदृढ़ होती जाती है। शरीर त्यागनेके बाद पुनः गोलोकमें जाकर वह भगवान् श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करके उनका पार्षद बन जाता है। पुनः उसका संसारमें आना नहीं होता। जो पुरुष भाद्रपदमासकी शुक्ल द्वादशी तिथिके दिन इन्द्रकी पूजा करता है, वह सम्मानित होता है। जो प्राणी भारतवर्षमें रहकर रविवार, संक्रान्ति अथवा शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा करके हविष्यान्न भोजन करता है, वह सूर्यलोकमें विराजमान होता है। फिर भारतवर्षमें जन्म पाकर आरोग्यवान् और धनाढ्य पुरुष होता है। ज्येष्ठ महीनेकी कृष्ण-चतुर्दशीके दिन जो व्यक्ति भगवती सावित्रीकी पूजा करता है, वह ब्रह्माके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर वह पृथ्वीपर आकर श्रीमान् एवं अतुल पराक्रमी पुरुष होता है। साथ ही वह चिरंजीवी, ज्ञानी और वैभव-सम्पन्न होता है। जो मानव माघमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिके दिन संयमपूर्वक उत्तम भक्तिके साथ षोडशोपचारसे भगवती सरस्वतीकी अर्चना करता है, वह वैकुण्ठधाममें स्थान पाता है। जो भारतवासी व्यक्ति जीवनभर भक्तिके साथ नित्यप्रति ब्राह्मणको गौ और सुवर्ण आदि प्रदान करता है, वह वैकुण्ठमें सुख भोगता है। भारतवर्षमें जो प्राणी ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराता है, वह ब्राह्मणकी रोमसंख्याके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो भारतवासी व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके नामका स्वयं कीर्तन करता है अथवा दूसरेको कीर्तन करनेके लिये उत्साहित करता है, वह नाम-संख्याके बराबर युगोंतक वैकुण्ठमें विराजमान होता है। यदि नारायणक्षेत्रमें नामोच्चारण किया जाय तो करोड़ोंगुना अधिक फल मिलता है। जो पुरुष नारायणक्षेत्रमें भगवान् श्रीहरिके नामका एक करोड़ जप करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है—यह ध्रुव सत्य है। वह पुनः जन्म न पाकर विष्णुलोकमें विराजमान होता है*। उसे भगवान्‌का सारूप्य प्राप्त हो जाता है। वहाँसे वह फिर गिर नहीं सकता।

जो पुरुष प्रतिदिन पार्थिव मूर्ति बनाकर शिवलिङ्गकी अर्चा करता है और जीवनभर इस नियमका पालन करता रहता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है और लंबे समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित रहता है; तत्पश्चात् भारतवर्षमें आकर राजेन्द्रपदको सुशोभित करता है। निरन्तर शालग्रामकी पूजा करके उनका चरणोदक पान करनेवाला पुण्यात्मा पुरुष अतिदीर्घकालपर्यन्त वैकुण्ठमें विराजमान होता है। उसे दुर्लभ भक्ति सुलभ हो जाती है। संसारमें उसका पुनः आना नहीं होता। जिसके द्वारा सम्पूर्ण तप और व्रतका पालन होता है, वह पुरुष इन सत्कर्मोंके फलस्वरूप वैकुण्ठमें रहनेका अधिकार पाता है। पुनः उसे जन्म नहीं लेना पड़ता। जो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करता है, उसे निर्वाणपद मिल जाता है। पुनः संसारमें उसकी उत्पत्ति नहीं होती। भारत-जैसे पुण्यक्षेत्रमें जो अश्वमेधयज्ञ करता है, वह दीर्घकालतक


* नाम्नां कोटिं हरेर्यो हि क्षेत्रे नारायणे जपेत्। सर्वपापविनिर्मुक्तो जीवन्मुक्तो भवेद्ध्रुवम्॥
लभते न पुनर्जन्म वैकुण्ठे स महीयते।
(प्रकृतिखण्ड २७। ११०-१११)

प्रकृतिखण्ड २०५

इन्द्रके आधे आसनपर विराजमान रहता है। राजसूययज्ञ करनेसे मनुष्यको इससे चौगुना फल मिलता है।

सुन्दरि! सम्पूर्ण यज्ञोंसे भगवान् विष्णुका यज्ञ श्रेष्ठ कहा गया है। ब्रह्माने पूर्वकालमें बड़े समारोहके साथ इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पतिव्रते! उसी यज्ञमें दक्ष प्रजापति और शंकरमें कलह मच गया था। ब्राह्मणोंने क्रोधमें आकर नन्दीको शाप दिया था और नन्दीने ब्राह्मणोंको। यही कारण है कि भगवान् शंकरने दक्षके यज्ञको नष्ट कर डाला। पूर्वकालमें दक्ष, धर्म, कश्यप, शेषनाग, कर्दममुनि, स्वायम्भुवमनु, उनके पुत्र प्रियव्रत, शिव, सनत्कुमार, कपिल तथा ध्रुवने विष्णुयज्ञ किया था। उसके अनुष्ठानसे हजारों राजसूययज्ञोंका फल निश्चितरूपसे मिल जाता है। वह पुरुष अवश्य ही अनेक कल्पोंतक जीवन धारण करनेवाला तथा जीवन्मुक्त होता है।

भामिनि! जिस प्रकार देवताओंमें विष्णु, वैष्णवपुरुषोंमें शिव, शास्त्रोंमें वेद, वर्णोंमें ब्राह्मण, तीर्थोंमें गङ्गा, पुण्यात्मा पुरुषोंमें वैष्णव, व्रतोंमें एकादशी, पुष्पोंमें तुलसी, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, पक्षियोंमें गरुड़, स्त्रियोंमें भगवती मूलप्रकृति राधा, आधारोंमें वसुन्धरा, चञ्चल स्वभाववाली इन्द्रियोंमें मन, प्रजापतियोंमें ब्रह्मा, प्रजेश्वरोंमें प्रजापति, वनोंमें वृन्दावन, वर्षोंमें भारतवर्ष, श्रीमानोंमें लक्ष्मी, विद्वानोंमें सरस्वती, पतिव्रताओंमें भगवती दुर्गा और सौभाग्यवती श्रीकृष्णपत्नियोंमें श्रीराधा सर्वोपरि मानी जाती हैं; उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञोंमें विष्णुयज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंका स्नान, अखिल यज्ञोंकी दीक्षा तथा व्रतों एवं तपस्याओं और चारों वेदोंके पाठका तथा पृथिवीकी प्रदक्षिणाका फल अन्तमें यही है कि भगवान् श्रीकृष्णकी मुक्तिदायिनी सेवा सुलभ हो। पुराणों, वेदों और इतिहासमें सर्वत्र श्रीकृष्णके चरण-कमलोंकी अर्चनाको ही सारभूत माना गया है। भगवान्‌के स्वरूपका वर्णन, उनका ध्यान, उनके नाम और गुणोंका कीर्तन, स्तोत्रोंका पाठ, नमस्कार, जप, उनका चरणोदक और नैवेद्य ग्रहण करना—यह नित्यका परम कर्तव्य है। साध्वि! इसे सभी चाहते हैं और सर्वसम्मतिसे यही सिद्ध भी है।

वत्से! अब तुम प्रकृतिसे पर तथा प्राकृत गुणोंसे रहित परब्रह्म श्रीकृष्णकी निरन्तर उपासना करो। मैं तुम्हारे पतिदेवको लौटा देता हूँ। इन्हें लो और सुखपूर्वक अपने घरको जाओ। मनुष्योंका यह मङ्गलमय कर्म-विपाक मैंने तुमको सुना दिया। यह प्रसङ्ग सर्वेप्सित, सर्वसम्मत तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाला है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! धर्मराजके मुखसे उपर्युक्त वर्णन सुनकर सावित्रीकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक पड़े। उसका शरीर पुलकायमान हो गया। उसने पुनः धर्मराजसे कहा।

सावित्री बोली—धर्मराज! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! मैं किस विधिसे प्रकृतिसे भी पर भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करूँ, यह बताइये। भगवन्! मैं आपके द्वारा मनुष्योंके मनोहर शुभकर्मका विपाक सुन चुकी। अब आप मुझे अशुभकर्म-विपाककी व्याख्या सुनानेकी कृपा करें।

ब्रह्मन्! सती सावित्री इस प्रकार कहकर फिर भक्तिसे अत्यन्त नम्र हो वेदोक्त स्तुतिका पाठ करके धर्मराजकी स्तुति करने लगी।

सावित्रीने कहा—प्राचीनकालकी बात है, महाभाग सूर्यने पुष्करमें तपस्याके द्वारा धर्मकी आराधना की। तब धर्मके अंशभूत जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया, उन भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जो सबके साक्षी हैं, जिनकी सम्पूर्ण भूतोंमें समता है, अतएव जिनका नाम शमन है, उन भगवान् शमनको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कर्मानुरूप कालके सहयोगसे विश्वके सम्पूर्ण

२०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्राणियोंका अन्त करते हैं, उन भगवान् कृतान्तको मैं प्रणाम करती हूँ। जो पापीजनोंको शुद्ध करनेके निमित्त दण्डनीयके लिये ही हाथमें दण्ड धारण करते हैं तथा जो समस्त कर्मोंके उपदेशक हैं, उन भगवान् दण्डधरको मेरा प्रणाम है। जो विश्वके सम्पूर्ण प्राणियोंका तथा उनकी समूची आयुका निरन्तर परिगणन करते रहते हैं, जिनकी गतिको रोक देना अत्यन्त कठिन है, उन भगवान् कालको मैं प्रणाम करती हूँ। जो तपस्वी, वैष्णव, धर्मात्मा, संयमी, जितेन्द्रिय और जीवोंके लिये कर्मफल देनेको उद्यत हैं, उन भगवान् यमको मैं प्रणाम करती हूँ। जो अपनी आत्मामें रमण करनेवाले, सर्वज्ञ, पुण्यात्मा पुरुषोंके मित्र तथा पापियोंके लिये कष्टप्रद हैं, उन 'पुण्यमित्र' नामसे प्रसिद्ध भगवान् धर्मराजको मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका जन्म ब्रह्माजीके वंशमें हुआ है तथा जो ब्रह्मतेजसे सदा प्रज्वलित रहते हैं एवं जिनके द्वारा परब्रह्मका सतत ध्यान होता रहता है, उन ब्रह्मवंशी भगवान् धर्मराजको मेरा प्रणाम है।*

मुने! इस प्रकार प्रार्थना करके सावित्रीने धर्मराजको प्रणाम किया। तब धर्मराजने सावित्रीको विष्णु-भजन तथा कर्मके विपाकका प्रसङ्ग सुनाया। जो मनुष्य प्रातः उठकर निरन्तर इस 'यमाष्टक' का पाठ करता है, उसे यमराजसे भय नहीं होता और उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि महान् पापी व्यक्ति भी भक्तिसे सम्पन्न होकर निरन्तर इसका पाठ करता है तो यमराज अपने कायव्यूहसे निश्चित ही उसकी शुद्धि कर देते हैं। (अध्याय २७-२८)


नरक-कुण्डों और उनमें जानेवाले पापियों तथा पापोंका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! रविनन्दन धर्मराजने सावित्रीको विधिपूर्वक विष्णुका महामन्त्र देकर 'अशुभकर्मका विपाक' कहना आरम्भ किया।

धर्मराजने कहा—पतिव्रते! मानव शुभकर्मके विपाकसे नरकमें नहीं जा सकता। नरकमें जानेमें कारण है—अशुभकर्मका विपाक। अतएव अब मैं अशुभकर्मका विपाक बतलाता हूँ, सुनो। नाना प्रकारके स्वर्ग हैं। प्राणी अपने-अपने कर्मोंके प्रभावसे उन स्वर्गोंमें जाते हैं। नरकोंमें जाना कोई मनुष्य नहीं चाहते, परंतु अशुभकर्म-विपाक उन्हें नरकमें जानेके लिये विवश कर देते हैं। नरकोंके नाना प्रकारके कुण्ड हैं। विभिन्न पुराणोंके भेदसे इनके नामोंके भी भेद हो गये हैं। ये सभी कुण्ड बड़े ही विस्तृत हैं। पापियोंको दुःखका भोग कराना ही इन कुण्डोंका प्रयोजन है। वत्से! ये भयंकर कुण्ड अत्यन्त भयावह तथा कुत्सित हैं। इनमें छियासी कुण्ड तो प्रसिद्ध हैं,


* तपसा धर्ममाराध्य पुष्करे भास्करः पुरा। धर्मांशं यं सुतं प्राप धर्मराजं नमाम्यहम्॥
समता सर्वभूतेषु यस्य सर्वस्य साक्षिणः। अतो यन्नाम शमन इति तं प्रणमाम्यहम्॥
येनान्तश्च कृतो विश्वे सर्वेषां जीविनां परम्। कर्मानुरूपकालेन तं कृतान्तं नमाम्यहम्॥
बिभर्ति दण्डं दण्डाय पापिनां शुद्धिहेतवे। नमामि तं दण्डधरं यः शास्ता सर्वकर्मणाम्॥
विश्वं यः कलयत्येव सर्वायुश्चापि सन्ततम्। अतीव दुर्निवार्यं च तं कालं प्रणमाम्यहम्॥
तपस्वी वैष्णवो धर्मी संयमी संजितेन्द्रियः। जीविनां कर्मफलदं तं यमं प्रणमाम्यहम्॥
स्वात्मारामश्च सर्वज्ञो मित्रं पुण्यकृतां भवेत्। पापिनां क्लेशदो यश्च पुण्यमित्रं नमाम्यहम्॥
यज्जन्म ब्रह्मणो वंशे ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा। यो ध्यायति परं ब्रह्म ब्रह्मवंशं नमाम्यहम्॥
(प्रकृतिखण्ड २८। ८—१५)