ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
तथा सुव्रतको उसे प्रदान करना
प्रकृतिखण्ड
२४७
देनेवाली हैं। मैं उनका भजन करता हूँ।' मुने ! यों ध्यान करके मूलमन्त्रसे पाद्य आदि अर्पण करनेके पश्चात् स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मूलमन्त्र यह है—'ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहा'। इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक जो भगवती स्वाहाकी पूजा करता है, उसके सारे मनोरथ अवश्य पूर्ण हो जाते हैं।
अग्निदेव बोले—स्वाहा, आद्या, प्रकृत्यंशा, मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी, मन्त्रफलदात्री, जगद्धात्री, सती, सिद्धस्वरूपा, सिद्धा, सदा नृणां सिद्धिदा, हुताशदाहिकाशक्ति, हुताशप्राणाधिकरूपिणी, संसारसाररूपा, घोरसंसारतारिणी, देवजीवनरूपा और देवपोषणकारिणी—ये सोलह नाम भगवती स्वाहाके हैं। जो भक्तिपूर्वक इनका पाठ करता है, उसे इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है*। उसका कोई भी कर्म अङ्गहीन नहीं होता। उसे सब कर्मोंमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सोलह नामोंके प्रभावसे पुत्रहीनको पुत्र तथा भार्याहीनको प्रिय भार्या प्राप्त हो जाती है।
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने ! अब भगवती स्वधाका उत्तम उपाख्यान कहता हूँ, सुनो। यह पितरोंके लिये तृप्तिप्रद एवं श्राद्धोंके फलको बढ़ानेवाला है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माने सृष्टिके आरम्भमें सात पितरोंका सृजन किया; उनमें चार तो मूर्तिमान् थे और तीन तेजःस्वरूप थे। उन सातों सिद्धस्वरूप मनोहर पितरोंको देखकर उनके भोजनके लिये श्राद्ध-तर्पणपूर्वक दिया हुआ पदार्थ निश्चित किया। तर्पणान्त स्नान, श्राद्धपर्यन्त देवपूजन तथा त्रिकालसंध्यान्त आह्निक कर्म—यह ब्राह्मणोंका परम कर्तव्य है। यह बात श्रुतिमें प्रसिद्ध है। जो ब्राह्मण नित्य त्रिकालसंध्या, श्राद्ध, तर्पण, बलिवैश्वदेव और वेदध्वनि नहीं करता, उसे विषहीन सर्पके समान शक्तिहीन समझना चाहिये। नारद ! श्रीहरिकी सेवासे वञ्चित तथा भगवान्को भोग लगाये बिना खानेवाला मनुष्य जीवनपर्यन्त अपवित्र रहता है। उसे कोई भी शुभकार्य करनेका अधिकार नहीं है। इस प्रकार ब्रह्माजी तो पितरोंके आहारार्थ श्राद्ध आदिका विधान करके चले गये; परंतु ब्राह्मण आदि उनके लिये जो कुछ देते थे, उसे पितर पाते नहीं थे। अतः वे सभी क्षुधा शान्त न होनेके कारण दुःखी होकर ब्रह्माजीकी सभामें गये। उन्होंने वहाँ जाकर ब्रह्माजीको सारी बातें बतायीं। तब उन महाभाग विधाताने एक परम सुन्दर मानसी कन्या प्रकट की।
सैकड़ों चन्द्रमाकी प्रभाके समान मुखवाली वह देवी रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। उस साध्वी देवीमें विद्या, गुण, बुद्धि और रूप सम्यक् प्रकारसे विद्यमान थे। श्वेत चम्पाके समान उसका उज्ज्वल वर्ण था। वह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित थी। मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी अंशभूता वह शुद्धस्वरूपा देवी मन्द-मन्द मुस्करा रही थी। वर देनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी उस सुन्दरीका नाम 'स्वधा' रखा गया। भगवती लक्ष्मीके सभी शुभ लक्षण उसमें विराजमान थे। उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह अपने चरणकमलोंको शतदल
* वह्निरुवाच—
स्वाहाद्या प्रकृतेरंशा मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी । मन्त्राणां फलदात्री च धात्री च जगतां सती ॥
सिद्धस्वरूपा सिद्धा च सिद्धिदा सर्वदा नृणाम् । हुताशदाहिकाशक्तिस्तत्प्राणाधिकरूपिणी ॥
संसारसाररूपा च घोरसंसारतारिणी । देवजीवनरूपा च देवपोषणकारिणी ॥
षोडशैतानि नामानि यः पठेद्भक्तिसंयुतः । सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य इहलोके परत्र च ॥
(प्रकृतिखण्ड ४०। ५१—५४)
| २४८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कमलपर रखे हुए थी। उसके मुख और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उसे पितरोंकी पत्नी बनाया गया। ब्रह्माजीने पितरोंको संतुष्ट करनेके लिये यह तुष्टिस्वरूपिणी पत्नी उन्हें सौंप दी। साथ ही अन्तमें 'स्वधा' लगाकर मन्त्रोंका उच्चारण करके पितरोंके उद्देश्यसे पदार्थ अर्पण करना चाहिये—यह गोपनीय बात भी ब्राह्मणोंको बतला दी। तबसे ब्राह्मण उसी क्रमसे पितरोंको कव्य प्रदान करने लगे। यों देवताओंके लिये वस्तुदानमें 'स्वाहा' और पितरोंके लिये 'स्वधा' शब्दका उच्चारण श्रेष्ठ माना जाने लगा। सभी कर्मों (यज्ञों)-में दक्षिणा उत्तम मानी गयी है। दक्षिणाहीन यज्ञ नष्टप्राय कहा गया है। उस समय देवता, पितर, ब्राह्मण, मुनि और मानव—इन सबने बड़े आदरके साथ उन शान्तस्वरूपिणी भगवती स्वधाकी पूजा एवं स्तुति की। देवीके वर-प्रसादसे वे सब-के-सब परम संतुष्ट हो गये। उनकी सारी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं।
मुने! इस प्रकार भगवती स्वधाके सम्पूर्ण उपाख्यानका वर्णन मैंने तुम्हारे सामने कर दिया। यह सबके लिये तुष्टिकारक है। पुनः क्या सुनना चाहते हो?
नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महामुने! अब मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, ध्यान और स्तोत्र सुनना चाहता हूँ। यत्नपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! देवी स्वधाका ध्यान-स्तवन वेदोंमें वर्णित है, अतएव सबके लिये मान्य है। शरत्कालमें आश्विन मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रमें अथवा श्राद्धके दिन यत्नपूर्वक भगवती स्वधाकी पूजा करके तत्पश्चात् श्राद्ध करना चाहिये। जो अभिमानी ब्राह्मण स्वधा देवीकी पूजा न करके श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध और तर्पणके फलका भागी नहीं होता—यह सर्वथा सत्य है। 'भगवती स्वधा ब्रह्माजीकी मानसी कन्या हैं, ये सदा तरुणावस्थासे सम्पन्न रहती हैं। पितरों और देवताओंके लिये सदा पूजनीया हैं। ये ही श्राद्धोंका फल देनेवाली हैं। इनकी मैं उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके शालग्राम-शिला अथवा मङ्गलमय कलशपर इनका आवाहन करना चाहिये। तदनन्तर मूलमन्त्रसे पाद्य आदि उपचारोंद्वारा इनका पूजन करना चाहिये। महामुने! 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्राह्मण इनकी पूजा, स्तुति और इन्हें प्रणाम करें। ब्रह्मपुत्र विज्ञानी नारद! अब स्तोत्र सुनो। यह स्तोत्र मानवोंके लिये सम्पूर्ण अभिलाषा प्रदान करनेवाला है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इसका पाठ किया था।
ब्रह्माजी बोले— 'स्वधा' शब्दके उच्चारण-मात्रसे मानव तीर्थस्नायी समझा जाता है। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर वाजपेय-यज्ञके फलका अधिकारी हो जाता है। 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाय तो श्राद्ध, बलि और तर्पणके फल पुरुषको प्राप्त हो जाते हैं। श्राद्धके अवसरपर जो पुरुष सावधान होकर स्वधा देवीके स्तोत्रका श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धोंका फल पा लेता है—इसमें संशय नहीं