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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३४- दुर्गाकवचका वर्णन

गणपतिखण्ड ३११
बल-पराक्रमसे सम्पन्न बहुत-से भूपालोंका वध | उठाया। त्रिशूल चलाते समय आकाशवाणी हुई-
कर डाला। इस समय यहाँ शिशु-अवस्थावाले | 'विप्रवरो ! शिवजीका यह त्रिशूल अमोघ है, इसे
राजकुमार ही आये हैं। आपने सम्पूर्ण पृथ्वीको | मत चलाओ; क्योंकि मत्स्यराजके गलेमें सर्वाङ्गोंकी
इक्कीस बार भूपालोंसे शून्य कर देनेके लिये जो | रक्षा करनेवाला शिवजीका दिव्य कवच बँधा है,
प्रतिज्ञा की है, उसका पालन कीजिये। युद्ध | जिसे पूर्वकालमें दुर्वासाने दिया था। अतः पहले
करना तो क्षत्रियोंका धर्म ही है। युद्धमें मृत्युको | राजासे उस प्राण-प्रदान करनेवाले कवचको माँग
प्राप्त हो जाना उनके लिये निन्दित नहीं है; परंतु | लो।' मुने! तदनन्तर परशुरामने त्रिशूल चलाकर
ब्राह्मणोंकी रण-स्पृहा लोक और वेद-दोनोंमें | राजापर चोट की, परंतु राजाके शरीरसे टकराकर
विडम्बनाकी पात्र है। वाणी ही जिनका बल और | उस त्रिशूलके सौ टुकड़े हो गये। तब आकाशवाणी
तप ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणोंकी शान्ति ही | सुनकर महान् पराक्रमी जमदग्निनन्दन परशुरामने
प्रत्येक युगमें स्वस्तिकारक कर्म है। युद्ध करना | शृङ्गधारी संन्यासीका वेष धारण करके राजासे
ब्राह्मणका धर्म नहीं है। शान्तिपरायण ब्राह्मण | कवचकी याचना की। राजाने 'ब्रह्माण्ड-विजय'
युद्धके लिये उद्योगशील हो, ऐसा तो न देखनेमें | नामक वह उत्तम कवच उन्हें दे दिया। उस
ही आया है और न सुना ही गया है। भगवान् | कवचको लेकर परशुरामने पुनः त्रिशूलसे ही
नारायणके विद्यमान रहते यह दूसरी तरहका | प्रहार किया। उसके आघातसे मत्स्यराज, जो
उलट-फेर कैसे हो गया ? | चन्द्रवंशमें उत्पन्न, गुणवान् और महाबली था,
रणाङ्गणमें यों कहकर राजेन्द्र कार्तवीर्य | जिसके मुखकी कान्ति सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान
शान्त हो गया। उसके उस वचनको सुनकर सभी | थी, भूतलपर गिर पड़ा।
लोग मौन हो गये। तदनन्तर परशुरामके सभी | नारदने कहा-महाभाग नारायण ! मत्स्यराजने
भाई, जो बड़े शूरवीर तथा हाथोंमें अत्यन्त तीखे | शिवजीके जिस कवचको धारण किया था,
शस्त्र धारण किये हुए थे, उनकी आज्ञासे युद्ध | उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसे सुननेके लिये
करनेके लिये आगे बढ़े। तब जो स्वयं मङ्गलस्वरूप | मुझे कौतूहल हो रहा है।
तथा मङ्गलोंका आश्रयस्थान था, उस महाबली | नारायण बोले-विप्रवर ! महात्मा शंकरके
मत्स्यराजने भी उन सबको युद्धोन्मुख देखकर | उस 'ब्रह्माण्डविजय' नामक कवचका, जो सर्वाङ्गकी
युद्ध करना आरम्भ किया। उस राजेन्द्रने बाणोंका | रक्षा करनेवाला है, वर्णन करता हूँ; सुनो।
जाल बिछाकर उन सभीको रोक दिया। तब | पूर्वकालमें दुर्वासाने बुद्धिमान् मत्स्यराजको सम्पूर्ण
जमदग्निके पुत्रोंने उस बाण-समूहको छिन्न-भिन्न | पापोंका समूल नाश करनेवाला षडक्षर-मन्त्र
कर दिया। मुने! राजाने सैकड़ों सूर्योंके समान | बतलाकर इसे प्रदान किया था। यदि सिद्धि प्राप्त
प्रकाशमान दिव्यास्त्र चलाया; परंतु मुनियोंने | हो जाय तो इस कवचके शरीरपर स्थित रहते
माहेश्वरास्त्रके द्वारा खेल-ही-खेलमें उसे काट दिया। | अस्त्र-शस्त्रके प्रहारके समय, जलमें तथा अग्निमें
पुनः मुनियोंने दिव्यास्त्रद्वारा राजाके बाणसहित | प्राणियोंकी मृत्यु नहीं होती-इसमें संशय नहीं
धनुष, रथ, सारथि और कवचकी धज्जियाँ उड़ा | है। जिसे पढ़कर एवं धारण करके दुर्वासा सिद्ध
दीं। इस प्रकार राजाको शस्त्रहीन देखकर | होकर लोकपूजित हो गये, जिसके पढ़ने और
मुनियोंको महान् हर्ष हुआ। तब उन्होंने मत्स्यराजका | धारण करनेसे जैगीषव्य महायोगी कहलाने लगे।
वध करनेकी इच्छासे शिवजीका त्रिशूल हाथमें | जिसे धारण करके वामदेव, देवल, स्वयं च्यवन,

३१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अगस्त्य और पुलस्त्य विश्ववन्द्य हो गये। 'ॐ नमः शिवाय' यह सदा मेरे मस्तककी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय स्वाहा' यह सदा ललाटकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवाय स्वाहा' सदा नेत्रोंकी रक्षा करे। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवाय नमः' मेरी नासिकाकी रक्षा करे। 'ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा' सदा कण्ठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा' सदा कानोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा' सदा दाँतकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा' सदा मेरे ओठकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा' सदा केशोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा' सदा छातीकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा' सदा नाभिकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भौंहोंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा' सदा पार्श्वभागकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा' सदा मेरे उदरकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा' सदा भुजाओंकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा' मेरे हाथोंकी रक्षा करे। 'ॐ महेश्वराय रुद्राय नमः' सदा मेरे नितम्बकी रक्षा करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा' सदा पैरोंकी रक्षा करे। 'ॐ सर्वेश्वराय सर्वाय स्वाहा' सदा सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें 'भूतेश' मेरी रक्षा करें। अग्निकोणमें 'शंकर' रक्षा करें। दक्षिणमें 'रुद्र' तथा नैर्ऋत्यकोणमें स्थाणु मेरी रक्षा करें। पश्चिममें 'खण्डपरशु', वायव्यकोणमें 'चन्द्रशेखर', उत्तरमें 'गिरिश' और ईशानकोणमें स्वयं 'ईश्वर' रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें 'मृड' और अधोभागमें स्वयं 'मृत्युञ्जय' सदा रक्षा करें। जलमें, स्थलमें, आकाशमें, सोते समय अथवा जागते रहनेपर भक्तवत्सल 'पिनाकी' सदा मुझ भक्तकी स्नेहपूर्वक रक्षा करें।

वत्स! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन कर दिया। इसके दस लाख जपसे ही सिद्धि हो जाती है, यह निश्चित है। यदि यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह निश्चय ही रुद्र-तुल्य हो जाता है। वत्स! तुम्हारे स्नेहके कारण मैंने वर्णन कर दिया है, तुम्हें इसे किसीको नहीं बतलाना चाहिये; क्योंकि यह काण्वशाखोक्त कवच अत्यन्त गोपनीय तथा परम दुर्लभ है। सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय—ये सभी इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इस कवचकी कृपासे मनुष्य निश्चय ही जीवन्मुक्त, सर्वज्ञ, सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी और मनके समान वेगशाली हो जाता है। इस कवचको बिना जाने जो भगवान् शंकरका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* (अध्याय ३५)


* नारायण उवाच—
कवचं शृणु विप्रेन्द्र शङ्करस्य महात्मनः। ब्रह्माण्डविजयं नाम सर्वावयवरक्षणम्॥
पुरा दुर्वाससा दत्तं मत्स्यराजाय धीमते। दत्त्वा षडक्षरं मन्त्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥
स्थिते च कवचे देहे नास्ति मृत्युश्च जीविनाम्। अस्त्रे शस्त्रे जले वह्नौ सिद्धिश्चैत्रास्ति संशयः॥
यद् धृत्वा पठनात् सिद्धो दुर्वासा विश्वपूजितः॥
जैगीषव्यो महायोगी पठनाद् धारणाद् यतः। यद् धृत्वा वामदेवश्च देवलश्च्यवनः स्वयम्॥
अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च बभूव विश्वपूजितः॥
ॐ नमः शिवायति च मस्तकं मे सदाऽवतु। ॐ नमः शिवायति च स्वाहा भालं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं शिवायति स्वाहा नेत्रे सदाऽवतु। ॐ ह्रीं क्लीं हूं शिवायति नमो मे पातु नासिकाम्॥
ॐ नमः शिवाय शान्ताय स्वाहा कण्ठं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं हूं संहारकर्त्रे स्वाहा कर्णौ सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं पञ्चवक्त्राय स्वाहा दन्तं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं महेशाय स्वाहा चाधरं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं त्रिनेत्राय स्वाहा केशान् सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं महादेवाय स्वाहा वक्षः सदाऽवतु॥