ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४८- कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६३७
अज्ञानरूपी तिमिर (रतौंधी)-रोगसे अन्धे हुए मनुष्यकी दृष्टिको ज्ञानाञ्जनकी शलाकासे खोल दिया है; उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है। जन्मदाता, अन्नदाता, माता, पिता, अन्य गुरु जीवको घोर संसारसागरसे पार करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुरु विष्णु हैं, गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु धर्म हैं, गुरु शेषनाग हैं और गुरु सर्वात्मा निर्गुण श्रीकृष्ण हैं; गुरु सम्पूर्ण तीर्थ, आश्रम तथा देवालय हैं। गुरु सम्पूर्ण देवस्वरूप तथा साक्षात् श्रीहरि हैं। इष्टदेवके रुष्ट हो जानेपर गुरुदेव अपने शिष्यकी रक्षा कर सकते हैं; किंतु गुरुके रुष्ट हो जानेपर इष्टदेव उसकी रक्षा नहीं कर सकते। जिसपर सम्पूर्ण ग्रह, देवता और ब्राह्मण रुष्ट हो जाते हैं, उसीपर गुरुदेव रुष्ट होते हैं; क्योंकि गुरु ही देवता हैं। आत्मा (शरीर), पुत्र, धन और पत्नी भी गुरुसे बढ़कर प्रिय नहीं हैं। धर्म, तप, सत्य और पुण्य भी गुरुसे अधिक प्रिय नहीं हैं। गुरुसे बढ़कर शासक और बन्धु दूसरा कोई नहीं है। शिष्योंके लिये सदा गुरु ही शासक, राजा और देवता हैं। अन्नदाता जबतक अन्न देनेमें समर्थ है, तभीतक वह शासक होता है; परंतु गुरु जन्म-जन्ममें शिष्योंके शासक होते हैं। मन्त्र, विद्या, गुरु और देवता—ये पतिकी भाँति पूर्वजन्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं। प्रत्येक जन्ममें गुरुका सम्बन्ध होनेसे उनका स्थान सबसे ऊपर है। पितारूप गुरु जिस जन्ममें जन्म देते हैं, उसी जन्ममें वन्दनीय होते हैं। माता तथा अन्य गुरुओंकी भी यही स्थिति है; परंतु ज्ञानदाता गुरु प्रत्येक जन्ममें वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! आप ब्राह्मणोंमें वरिष्ठ, तपस्वी जनोंमें गरिष्ठ तथा समस्त धर्मात्माओंमें उत्तम धर्मिष्ठ एवं ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ता हैं। मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझपर और इन्द्रपर संतुष्ट हों। आपके संतुष्ट होनेपर ही ग्रह और देवता सदा संतुष्ट रहते हैं।
ब्रह्मन्! ऐसा कहकर शची फिर उच्चस्वरसे रोने लगी। उसका रोना देखकर तारादेवी भी फूट-फूटकर रोने लगीं। तारा अपने पतिके चरणोंपर गिर पड़ीं और बार-बार यह कहकर रोने लगीं कि आप इन्द्रके अपराधको क्षमा करें। तब बृहस्पतिजी संतुष्ट हो तारासे बोले।
गुरुने कहा—तारे! उठो। शचीका सब कुछ मङ्गलमय होगा, मेरे आशीर्वादसे यह अपने पति महेन्द्रको शीघ्र ही प्राप्त कर लेगी।
ऐसा कहकर बृहस्पतिजी चुप हो गये। तारा पुनः उनके चरणोंमें गिरीं और बार-बार रोयीं। फिर ताराने शचीको पकड़कर अपने हृदयसे लगा लिया और उसे नाना प्रकारके आध्यात्मिक-ज्ञानसम्बन्धी उत्तम वचन सुनाकर समझाया एवं धीरज बँधाया।
(अध्याय ५६—५९)
बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पतिका इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! शचीद्वारा किये गये स्तोत्रको सुनकर बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए और शान्तभावसे इन्द्रपत्नी शचीके प्रति मधुर वाणीमें बोले।
बृहस्पतिने कहा—बेटी! सारा भय छोड़ दो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? शोभने! मेरे लिये जैसे कचकी पत्नी (पुत्रवधू) रक्षणीय है, उसी प्रकार तुम भी हो। जो स्थान पुत्रका
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
है, वही शिष्यका भी है। तर्पण, पिण्डदान, पालन और परितोषण—इन सभी कर्मोंके लिये पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं है। जैसे पुत्र पिताके मरनेपर उसके लिये अग्निदाता होता है, अवश्य उसी तरह शिष्य गुरुके लिये अग्निप्रदाता कहा गया है। यह बात कण्वशाखामें ब्रह्माजीने कही है। पिता, माता, गुरु, पत्नी, छोटा बालक, अनाथ एवं कुटुम्बीजन—ये पुरुषमात्रसे नित्य पोषण पानेके योग्य हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है*। जो इनका पोषण नहीं करता उसके शरीरके भस्म होनेतक उसे सूतक (अशौच)—का भागी होना पड़ता है। वह जीते-जी देवयज्ञ तथा पितृयज्ञमें कर्म करनेका अधिकारी नहीं रहता है—ऐसा महेश्वरका कथन है। जो माता, पिता और गुरुके प्रति मानव-बुद्धि रखता है, उसको सर्वत्र अयश प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर विघ्नका ही सामना करना पड़ता है। जो सम्पत्तिसे मतवाला होकर अपने गुरुका अपमान करता है, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है; यह सुनिश्चित बात है। अपनी सभामें मुझे देखकर इन्द्र आसनसे नहीं उठे थे, उसीका फल इस समय भोग रहे हैं। गुरुके अपमानका शीघ्र ही जो कटु फल प्राप्त हुआ, उसे तुम अपनी आँखों देख लो। अब मैं इन्द्रको शापसे छुड़ाऊँगा और निश्चय ही तुम्हारी रक्षा करूँगा। जो शासन और संरक्षण दोनों ही कर सकता हो, वही गुरु कहलाता है। जो हृदयसे शुद्ध है अर्थात् जिसके हृदयमें कलुषित भाव नहीं पैदा हुआ है, उस नारीका सतीत्व नष्ट नहीं होता। परंतु जिसके मनमें विकल्प है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है। पतिव्रते ! तुम्हारा दुर्गाजीके समान प्रभाव बढ़ेगा। तुम्हारी प्रतिष्ठा और यश लक्ष्मीजीके समान होंगे। सौभाग्य और पतिविषयक प्रेम श्रीराधिकाके समान होगा। स्वामीके प्रति गौरव, मान, प्रीति तथा प्रधानताका भाव भी तुममें श्रीराधाके ही सदृश होगा। रोहिणीके समान तुममें पतिकी अपेक्षा-बुद्धि होगी। तुम भारतीके समान पूजनीया तथा सावित्रीके तुल्य सदा शुद्धा एवं उपमारहित होओगी।
बृहस्पतिजी ऐसा कह ही रहे थे कि नहुषके दूतने वहाँ आकर शचीसे नन्दनवनमें चलनेके लिये कहा। यह सुनते ही बृहस्पतिजीका सारा शरीर क्रोधसे काँपने लगा और उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे उस दूतसे बोले।
गुरुने कहा— दूत ! तू जाकर नहुषसे कह दे कि 'महाराज ! यदि तुम शचीका उपभोग करना चाहते हो तो एक ऐसी सवारीपर चढ़कर रातमें आना, जिसका आजसे पहले किसीने उपयोग न किया हो। सप्तर्षियोंके कंधोंपर अपनी सुन्दर शिविका (पालकी) रख उत्तम वेश-भूषासे सज-धजकर उसीपर आरूढ़ हो तुम्हें यहाँतक यात्रा करनी चाहिये।'
बृहस्पतिजीकी बात सुनकर दूतने नहुषके पास जा उनका संदेश कह सुनाया। सुनकर नहुष हँस पड़ा और अपने सेवकसे बोला— 'जाओ, जाओ, जल्दी जाओ और सप्तर्षियोंको यहाँ बुला लाओ। उन सबके साथ मिलकर कोई उपाय करूँगा। तुम अभी जाओ।'
राजाका आदेश पाकर दूत सप्तर्षियोंके समीप गया और नहुषने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उन सबसे कह सुनाया। दूतकी बात सुनकर सप्तर्षि प्रसन्नतापूर्वक नहुषके पास गये। उन
* पिता माता गुरुर्भार्या शिशुश्चानाथबान्धवाः। एते पुंसां नित्यपोष्या इत्याह कमलोद्भवः॥
(६०।५)
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सबको आया देख राजाने प्रणाम किया और आदरपूर्वक कहा।
**नहुष बोला—**आप लोग ब्रह्माजीके पुत्र हैं, ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हैं और सदा ब्रह्माजीके समान ही भक्तवत्सल हैं। निरन्तर भगवान् नारायणकी उपासनामें लगे रहते हैं। शुद्ध सत्त्व ही आपका स्वरूप है। आप मोह और मात्सर्यसे रहित हैं। दर्प और अहंकार आपको छू नहीं सके हैं। आप सब लोग सदा भगवान् नारायणके समान तेजस्वी और यशस्वी हैं। गुण, कृपा, प्रेम और वरदान सभी दृष्टियोंसे निश्चय ही आप श्रीहरिके तुल्य हैं।
ऐसा कहकर राजा उनके चरणोंमें प्रणाम और स्तुति करने लगा। राजाको कातर हुआ देख वे परम हितैषी ऋषि उससे बोले।
**ऋषियोंने कहा—**बेटा! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो; हम सब कुछ देनेमें समर्थ हैं। हमारे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इन्द्रपद, मनुका पद, दीर्घायु, सातों द्वीपोंका प्रभुत्व, चिरकालतक बना रहनेवाला अतिशय सुख, सम्पूर्ण सिद्धियाँ, परम दुर्लभ समस्त ऐश्वर्य तथा जो तपस्यासे भी नहीं मिल सकती, वह हरिभक्ति अथवा मुक्ति भी हम तुम्हें दे सकते हैं। वत्स! बोलो, इस समय तुम्हें किस वस्तुकी इच्छा है? वह सब तुम्हें देकर ही हम तपस्याके लिये जायँगे। जो क्षण श्रीकृष्णकी आराधनाके बिना व्यतीत होता है, वह लाख युगोंके समान है अर्थात् श्रीकृष्ण-भजनके बिना यदि एक क्षण भी व्यर्थ बीता तो समझना चाहिये कि हमारे एक लाख युग व्यर्थ बीत गये। जो दिन श्रीहरिके ध्यान और सेवनसे शून्य रह गया, वही सबसे बड़ा दुर्दिन है। जो मनुष्य श्रीहरिकी सेवा छोड़कर किसी दूसरे विषयको पानेकी इच्छा रखता है, वह मनोवाञ्छित अमृतको त्यागकर अपने ही विनाशके लिये मानो विष खाता है*। ब्रह्मा, शिव, धर्म, विष्णु, महाविष्णु (महानारायण), गणेश, सूर्य, शेष और सनकादि मुनि—ये दिन-रात प्रसन्नतापूर्वक जिनके चरणकमलोंका चिन्तन करते रहते हैं, उन जन्म, मृत्यु और जरारूप व्याधिको हर लेनेवाले श्रीकृष्णमें हमलोग सदा अनुरक्त रहते हैं।
सप्तर्षियोंकी यह बात सुनकर राजेश्वर नहुष लज्जित हो गया। उसका सिर झुक गया, तथापि मायासे मोहितचित्त होनेके कारण वह बोला।
**नहुषने कहा—**महर्षियो! आपलोग भक्तवत्सल हैं और सब कुछ देनेकी शक्ति रखते हैं। इस समय मैं शचीको पाना चाहता हूँ; अतः शीघ्र ही मुझे शचीका दान दीजिये। महासती शची ऐसे पतिको पाना चाहती है, जिसके वाहन सप्तर्षि हों। यही मेरा वर है। आपलोग शीघ्र ही मेरे अभीष्ट कार्यको सम्पन्न करें।
नारद! नहुषकी बात सुनकर सब मुनि कौतूहलवश एक-दूसरेको देखते हुए जोर-जोरसे हँसने लगे। राजाको भगवान् विष्णुकी मायासे वेष्टित एवं मोहित मानकर उन दीनवत्सल सप्तर्षियोंने कृपापूर्वक राजाका वाहन बननेकी प्रतिज्ञा कर ली। उसकी शिविका मुक्ता और माणिक्यसे सुशोभित थी। ऋषियोंने उसे कंधेपर उठा लिया और राजा नहुष सुन्दर वेष एवं रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो उस शिविकासे चला। उस वाहनद्वारा अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें अधिक विलम्ब होता देख राजा सप्तर्षियोंको डाँटने-
* युगलक्षसमं यच्च क्षणं कृष्णार्त्तनं विना। तद्दिनं दुर्दिनं यत्तद्ध्यानसेवनवर्जितम्॥
विना तत्सेवनं यो हि विषयान्यं च वाञ्छति। विषमत्ति प्रणाशाय विहायामृतमीप्सितम्॥
(६०। ३२-३३)