ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७- भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता
प्रकृतिखण्ड २१३
करानेके बाद वहाँसे बहते हुए जलको, देवताके नैवेद्यको तथा निर्माल्य पुष्पको लाँघता है, वह गोहत्याका भागी होता है। जो अतिथियोंके लिये सदा 'नहीं' ही किया करता, झूठ बोलता और दूसरोंको ठगता तथा देवता और गुरुसे द्वेष करता है, उसे गोहत्याका पाप लगता है। जो देवप्रतिमा, गुरु और ब्राह्मणको देखकर वेगपूर्वक उन्हें प्रणाम नहीं करता, उसे गोहत्या अवश्य लगती है। जो ब्राह्मण प्रणाम करनेवाले व्यक्तिको क्रोधमें आकर आशीर्वाद नहीं देता तथा विद्यार्थीको विद्या नहीं पढ़ाता, उसे गोहत्या लगती है।
गुरुपत्नी, राजपत्नी, सौतेली माँ, सगी माँ, पुत्री, पुत्र-वधू, सास, गर्भवती स्त्री, बहिन, सहोदर भाईकी पत्नी, मामी, दादी, नानी, बूआ, मौसी, भतीजी, शिष्या, शिष्य-पत्नी, भानजेकी स्त्री, भाईके पुत्रकी पत्नी—इन सबको ब्रह्माजीने अत्यन्त अगम्या बतलाया है। जो पुरुष कामभावसे इनपर दृष्टिपात करता है, उसे अधम मानव कहा गया है। वेदोंमें उसे मातृगामी कहा गया है। उसे ब्रह्महत्याका पाप-फल प्राप्त होता है। किसी भी सत्कर्ममें उसे नहीं लिया जा सकता। वह महापापी अत्यन्त दुष्कर कुम्भीपाक नामक नरकमें जाता है। भद्रे! मैंने नरकोंमें जानेवाले लोगोंके कुछ लक्षण बतला दिये। इन नरककुण्डोंसे अतिरिक्त नरकोंमें जो जाते हैं, उनका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो!
साध्वि! जो द्विज पुंश्चली और वेश्याका अन्न खाता तथा उसके साथ गमन करता है, वह मरनेके पश्चात् कालसूत्र नामक नरकमें जाता है। इसके बाद रोगी होता है। एक पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री 'पतिव्रता' कहलाती है। दूसरेसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर उसे 'कुलटा' कहते हैं। तीसरेके सम्पर्कमें आनेपर उसे 'धर्षिणी' जानना चाहिये। चौथेके पास जानेवाली 'पुंश्चली' मानी जाती है। पाँचवें-छठेंके साथ गमन करनेवाली स्त्रीकी 'वेश्या' संज्ञा होती है। सातवें-आठवेंके सम्पर्कमें आनेवाली 'युग्मी' कहलाती है। इससे अधिक पुरुषोंके पास जानेवाली स्त्रीको 'महावेश्या' कहते हैं। वह सबके लिये अस्पृश्य है। जो द्विज कुलटा, धर्षिणी, पुंश्चली, वेश्या, युग्मी तथा महावेश्याके साथ गमन करता है, वह अवटोद नामक नरकमें जाता है—यह निश्चित है। कुलटागामी सौ वर्षोंतक, धर्षिणीगामी चार सौ वर्षोंतक, पुंश्चलीगामी छः सौ वर्षोंतक, वेश्यागामी आठ सौ वर्षोंतक, युग्मीगामी एक हजार वर्षोंतक तथा महावेश्यागामी कामुक मानव इससे सौ गुने वर्षोंतक इस अवटोद नरकमें वास करता है। यमदूत उसपर प्रहार करते हैं। फिर कुलटागामी तित्तिर, धर्षिणीगामी कौआ, पुंश्चलीगामी कोयल, वेश्यागामी शृगाल, युग्मीगामी सूअर तथा महावेश्यागामी मरघटमें सेमलका वृक्ष होकर सात जन्मोंतक पापका फल भोगते हैं।
जो ज्ञानहीन मानव सूर्यग्रहण अथवा चन्द्रग्रहणके समय भोजन करता है, वह अरुन्तुद नामक नरकमें जाता है। वह जितने अन्नके दाने खाता है, उतने वर्षोंतक उसे उस नरकमें वास करना पड़ता है। इसके बाद वह उदररोगसे पीड़ित मानव होता है। फिर गुल्म-रोगी, काना और दन्तहीन होता है। जो अपनी कन्याका वाग्दान करके किसी दूसरे वरके साथ उसका विवाह करता है, वह पांशुभोज नामक नरकमें स्थान पाता है। पांशु ही उसे भोजनके लिये मिलता है। साध्वि! जो दानमें दी हुई वस्तुको फिर ले लेता है, वह पाशवेष्ट नामक नरकमें निवास करता है। वहाँ शयन करनेके लिये उसे बाणोंकी शय्या मिलती है। मेरे दूतोंकी मार भी खानी पड़ती है। जो ब्राह्मणको दण्ड देता है तथा जिसके भयसे ब्राह्मण काँपता है, वह व्यक्ति प्रकम्पन नामक नरकमें वास करता है। जो स्त्री क्रोधभरे मुखसे रोषपूर्वक अपने पतिको देखती तथा कटुवचन कहती है, वह
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उल्कामुख नामक नरकमें जाती है। मेरे दूत उसके मुखमें उल्का (लूक) देते हैं और डंडोंसे उसके मस्तकपर प्रहार करते हैं। इसके बाद मनुष्ययोनिमें आकर वह विधवा तथा रोगिणी होती है। वेश्याको वेधन-कुण्डमें, युग्मीको दण्डताडनकुण्डमें, महावेश्याको जालबन्धकुण्डमें, कुलटाको देहचूर्णकुण्डमें, स्वैरिणीको दलनकुण्डमें तथा धृष्टाको शोषणकुण्डमें यातना भोगनेके लिये निवास करना पड़ता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते हैं। साध्वि ! ये पापिनी स्त्रियाँ विष्ठा-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुएँ खाकर निरन्तर कष्ट भोगती हैं।
जो पुरुष हाथमें तुलसी लेकर की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता अथवा झूठी शपथ खाता है, वह ज्वालामुख नामक नरकमें जाता है। हाथमें गङ्गाजल तथा शालग्रामकी प्रतिमा ले प्रतिज्ञा करके उसका पालन नहीं करनेवाला भी ज्वालामुख नरकका ही भागी होता है। जो दाहिना हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करता, देवमन्दिरमें जाकर या गौ और ब्राह्मणको छूकर वचनबद्ध होता और फिर उसका पालन नहीं करता है, उसे भी ज्वालामुख नामक नरककी प्राप्ति होती है। मित्रद्रोही, कृतघ्न, विश्वासघाती तथा झूठी गवाही देनेवाला—ये सभी ज्वालामुख नरकमें स्थान पाते हैं। वहाँ उन्हें प्रतप्त अङ्गार खानेके लिये मिलते हैं और मेरे दूत उन्हें पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। तुलसी छूकर झूठी शपथ खानेवाला सात जन्मोंतक चाण्डाल होता है। गङ्गाजल लेकर प्रतिज्ञा करके उसे न पालनेवाला पाँच जन्मोंतक म्लेच्छ होता है। देवि! शालग्रामका स्पर्श करके की हुई प्रतिज्ञाका पालन न करनेवाला सात जन्मोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। देवप्रतिमाको छूकर झूठी शपथ खानेवाला फोड़ेका कीड़ा होता है। खुले हाथों देनेकी झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद बिना हाथका मानव होकर फिर शुद्ध होता है। देवमन्दिरमें असत्य बोलनेवाला सात जन्मोंतक देवल होता है। ब्राह्मण आदिके सम्मुख प्रतिज्ञा करके उसका पालन न करनेवाला अग्रदानी होता है। तदनन्तर तीन जन्मोंतक वह गूँगा और बहरा मानव होता है। मित्रसे द्रोह करनेवाला नेवला होता है। कृतघ्न गेंडा और विश्वासघाती व्याघ्र होता है। वक्तव्यमें जो झूठी गवाही देता है, वह भालू होता है। ये उपर्युक्त पापी मानव अपने आगे और पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंको नरकमें गिराते हैं। मूर्खताके कारण अपनी नित्यक्रियासे विहीन, वेदके वचनोंमें अनास्था रखकर निरन्तर कपटपूर्वक उनका उपहास करनेवाला तथा व्रत और उपवाससे रहित एवं उत्तम सद्वाक्यका निन्दक कुटिल ब्राह्मण जिम्भ एवं हिमोदक नरकमें वास करता है। जो देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करता है, उसे आगे-पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंको नरकमें गिराकर स्वयं भी वहाँ रहना पड़ता है। धूमके अन्धकारसे पूर्ण धूमान्ध नामक नरकमें जाता है। उसे धूएँके कारण कष्ट भोगना पड़ता है। भोजनके लिये उसे धूम्र ही मिलता है। इस प्रकारकी यातना भोगते हुए वह वहाँ रहता है। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह चूहेकी योनिमें जन्म पाता है। तदनन्तर नाना प्रकारके पक्षियों, कीड़ों, वृक्षों और पशुओंकी योनिमें जन्म पानेके पश्चात् शुद्ध होता है।
पतिव्रते! ये सुविख्यात नरककुण्ड बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे अप्रसिद्ध नरक भी गिनाये गये हैं। अपने दुष्कर्मोंके फल भोगनेवाले पापियोंसे उन नरकोंका कोना-कोना भरा रहता है। कर्म-फल भोगनेके लिये प्राणी नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकते हैं। कहाँतक बताया जाय ?
(अध्याय २९-३१)
प्रकृतिखण्ड २१५
पञ्चदेवोपासकोंके नरकमें न जानेका कथन तथा छियासी प्रकारके नरक-कुण्डोंका विशद परिचय
सावित्रीने कहा— महाभाग धर्मराज ! आप वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मका उच्छेद करनेमें कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंके लिये सुखदायी, यशोवर्द्धक, धर्मप्रद तथा सबको सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाला है, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण मानव जगत्को दुःख देनेवाली यमयातनाको नहीं प्राप्त होते, नरककुण्डोंको नहीं देखते और न उनमें पड़ते ही हैं; तथा जिससे जन्म आदि विकार नहीं प्राप्त होते, वह उत्तम कर्म क्या है? सुव्रत ! यह बतानेकी कृपा करें। साथ ही उन कुण्डोंके आकार कैसे हैं, वे किस प्रकार बने हैं तथा कौन-से पापी किस रूपसे उनमें वास करते हैं—यह मैं सुनना चाहती हूँ। देहके अग्निमें भस्म हो जानेके पश्चात् मानव किस देहसे लोकान्तरोंमें जाता और अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है ? अत्यन्त क्लेश पानेपर भी वह शरीर नष्ट क्यों नहीं हो जाता तथा वह शरीर भी कैसा है ? ये सभी बातें मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! सावित्रीके वचन सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए गुरुको नमस्कारकर पवित्र कथा आरम्भ की।
धर्मराज बोले— वत्से ! पतिव्रते ! सुव्रते ! चारों वेद, धर्मशास्त्र, संहिता, पुराण, इतिहास, पाञ्चरात्र प्रभृति धर्मग्रन्थ तथा अन्य धर्मशास्त्र एवं वेदाङ्ग—इन सबमें एक श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी सेवाको ही सबके लिये अभीष्ट एवं सारभूत बतलाया गया है। इससे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। यह साधन सर्वमङ्गलस्वरूप तथा परम आनन्दका कारण है। इससे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह नरकसे प्राणीका उद्धार करनेवाला है। भक्तिरूपी वृक्षमें अङ्कुर उत्पन्न करनेवाला तथा कर्मरूपी वृक्षको काटनेवाला है। गोलोकके मार्गपर अग्रसर होनेके लिये यह सोपान है। भगवान्के सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य आदि मोक्षको तथा अविनाशी एवं शुभ पदको प्रदान करनेवाला है। शुभे ! श्रीकृष्णके किङ्कर नरककुण्ड, यमदूत तथा यमराजको स्वप्नमें भी नहीं देखते हैं।
जो एकादशीका व्रत तथा वैष्णवतीर्थमें स्नान करते हैं, एकादशीको अन्न नहीं खाते और भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते एवं उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर संयमनीपुरीमें नहीं जाना पड़ता। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंसे मेरे दूत इस प्रकार डरते हैं, जैसे गरुड़से सर्प। मेरा दूत जब हाथमें पाश लेकर मर्त्यलोककी ओर जाता है, तब मैं चेतावनी देते हुए उससे कहता हूँ—‘दूत ! तुम भगवान् विष्णुके भक्तका आश्रम छोड़कर और सब जगह जा सकोगे।’ श्रीकृष्ण-मन्त्रके उपासकोंके नाम भी यमलोक-वासियोंको काट खाते हैं। चित्रगुप्त भयभीत-से हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत करते हैं। ब्रह्माजी उनके लिये मधुपर्क आदि निवेदन करते हैं; क्योंकि वे ब्रह्मलोकको लाँघकर गोलोकमें जानेवाले होते हैं। उनके स्पर्शमात्रसे प्राणियोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निमें पड़कर तृण और काष्ठ भस्म हो जाते हैं। उन्हें देखकर मोह भी अत्यन्त भयभीत-सा होकर सम्मोहको प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, मृत्यु, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग—ये सभी हरिभक्तोंको देखकर प्रभावशून्य हो जाते हैं।
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पतिव्रते! जो यमयातनामें नहीं पड़ते, उनका परिचय दिया गया। अब आगमके अनुसार देहका विवरण बता रहा हूँ, सुनो। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व स्रष्टाके सृष्टि-विधानमें देहधारियोंकी देहके बीज (उपादान कारण) हैं। पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम है। अतएव नश्वर है। इसीलिये वह यहीं भस्म हो जाता है। बँधी हुई मुट्ठीमें अँगूठेकी जितनी लम्बाई होती है, उतना ही बड़ा जो पुरुषाकार जीव है, वही कर्मोंके भोगके लिये सूक्ष्म 'यातनादेह' को धारण करता है। वह देह मेरे लोकमें नरककी प्रज्वलित आगमें डाली जानेपर भी जलकर भस्म नहीं होती। जलमें भी गलती नहीं है। दीर्घकालतक घातक प्रहार करनेपर भी उसका नाश नहीं होता है। अस्त्र, शस्त्र, तीखे कण्टक, खौलते हुए तेल या जल, तपाये हुए लौह, गरम पत्थर तथा तपाकर लाल की हुई लोहेकी प्रतिमासे स्पर्श होनेपर और ऊँचेसे नीचे गिरनेपर भी वह यातना-शरीर न तो दग्ध होता है, न टेढ़ा-मेढ़ा ही होता है। केवल संताप भोगता है (पर नष्ट नहीं होता)। देवि! आगमोंके कथनानुसार (जलने, कटने आदिका भीषण दुःख सहते हुए भी न मरनेवाले) यातना-देहका सारा वृत्तान्त तथा कारण बताया गया। अब मैं तुमसे नरक-कुण्डोंके लक्षण बता रहा हूँ; सुनो।
सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डलकी भाँति गोलाकार हैं। वे गहरे भी बहुत हैं। उनमें अनेक प्रकारके पत्थर जड़े गये हैं। प्रलयकालतक उनका नाश नहीं होता। भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे पापियोंको क्लेश देनेके लिये नानारूपोंमें उनका निर्माण हुआ है। जो प्रज्वलित अंगारस्वरूप है, जिसका विस्तार सब ओरसे एक-एक कोस है तथा जिसमें सौ हाथ ऊपरतक आगकी लपटें उठा करती हैं, उसे ‘अग्निकुण्ड’ कहा गया है। भयानक चीत्कार करनेवाले पापियोंसे वह सदा भरा रहता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते रहते हैं। वे निरन्तर उस नरककी रक्षा भी करते हैं। जो हिंसक जन्तुओंसे भरा-पूरा अत्यन्त घोर अन्धकारसे पूर्ण तथा आधे कोसतक विस्तृत है और जिसमें बहुत गरम जल भरा रहता है उसे ‘प्रतप्तोदककुण्ड’ कहते हैं। मेरे सेवकोंद्वारा कठिन प्रहार पड़नेपर नारकी जीव चिल्लाते रहते हैं। इसके बाद ‘तप्तक्षारोदकुण्ड’ है। वह खौलते हुए खारे जलसे भरा रहता है। एक कोस विस्तारवाला वह भयानक नरक पापियों तथा नाकोंसे भरपूर है। एक कोसके विस्तारमें ‘विण्मूत्रकुण्ड’ नामक नरक है। निराहार रहनेके कारण सूखे हुए कण्ठ, ओठ और तालुवाले पापी उसमें इधर-उधर भागते हैं। वह दारुण नरक विष्ठासे ही बना हुआ है। उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। वहाँ कीड़ोंसे उनका सारा अङ्ग छिद जाता है। ‘मूत्रकुण्ड’ नामक नरक खौलते हुए मूत्र तथा मूत्रके कीड़ोंसे भलीभाँति भरा हुआ है। अत्यन्त पातकी जीवोंसे भरा हुआ वह नरक दो कोसके परिमाणमें है। वहाँके कीड़े जीवोंको खाते रहते हैं। उसमें पड़े पापियोंके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे रहते हैं। श्लेष्म आदि अपवित्र वस्तुओं और उसके कीड़ों तथा श्लेष्मभोजी पापीजनोंसे भरा नरक ‘श्लेष्मकुण्ड’ कहा गया है। आधे कोसके परिमाणमें विषभक्षी पापियों तथा कीड़ोंसे भरा हुआ नरक ‘गरकुण्ड’ के नामसे कहा जाता है। सर्पके समान आकारवाले वज्रमय दाँतोंसे युक्त तथा क्षुधातुर सूखे कण्ठवाले अत्यन्त भयंकर जन्तुओंद्वारा वह नरक भरा रहता है। आँखोंके मलोंसे युक्त आधे कोसके विस्तारवाला ‘नेत्रमलकुण्ड’ है। कीड़ोंसे क्षत-विक्षत हुए पापी प्राणी निरन्तर उसमें चक्कर लगाते रहते हैं। वसासे पूर्ण चार कोसका लम्बा-चौड़ा ‘वसाकुण्ड’ है। वसाभोजी पातकी जीव
प्रकृतिखण्ड
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उसमें व्याप्त रहते हैं। एक कोसकी लम्बाई-चौड़ाईवाला 'शुक्रकुण्ड' है। वीर्यके कीड़ोंसे वह व्याप्त रहता है। उसमें रहनेवाले पापियोंको जब कीड़े काटते हैं, तब वे इधर-उधर भागते रहते हैं। बावड़ीके समान परिमाणवाला दुर्गन्धित वस्तुओंसे भरा हुआ 'रक्तकुण्ड' है। उस गहरे कुण्डमें रक्त पीनेवाले प्राणी तथा काटनेवाले कीड़े भरे रहते हैं। 'अश्रुकुण्ड' नेत्रोंके आँसुओंसे पूर्ण रहता है। अनेक पापीजन उसमें भरे रहते हैं। चार बावड़ी-जितना उसका विस्तार है। कीड़ोंके काटनेपर जीव उसमें रुदन करते रहते हैं। मनुष्योंके शारीरिक मलों तथा मलभक्षी पापी जीवोंसे युक्त 'गात्रमलकुण्ड' है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेके कारण घबराये हुए जीव उसमें किसी प्रकार समय बिताते हैं। कानोंकी मैल खानेवाले पापियोंसे आच्छादित 'कर्णविट्कुण्ड' है। चार बावड़ी-जितने प्रमाणवाला वह कुण्ड कीटोंद्वारा काटे जानेवाले पापियोंके चीत्कारसे पूरित रहता है। मनुष्योंकी मज्जा तथा अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त 'मज्जाकुण्ड' है, जो महापापियोंसे युक्त एवं चार वापीके विस्तारवाला है। मेरे दूतोंसे प्रताड़ित प्राणियोंसे युक्त स्निग्ध मांसवाला 'मांसकुण्ड' है। एक वापी-जितने प्रमाणवाले इस कुण्डमें भयानक प्राणी भरे रहते हैं। कन्याका विक्रय करनेवाले पापी वहाँ रहकर कन्याका मांस भक्षण करते हैं। कीड़ोंके काटनेपर वे अत्यन्त भयभीत हो 'बचाओ-बचाओ' की पुकार करते रहते हैं। चार बावड़ी-जितने लंबे-चौड़े 'नखादि' चार कुण्ड हैं। ताम्रमय उल्कासे युक्त तथा जलते हुए ताँबेके सदृश 'प्रतप्तताम्रकुण्ड' है। ताँबेकी असंख्य प्रतप्त प्रतिमाएँ उसमें भरी रहती हैं। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है। तब वे चिल्ला उठते हैं। नारकी जीवोंसे भरा वह नरक दो कोस लंबा-चौड़ा है। प्रज्वलित लोहे तथा चमकते हुए अङ्गारोंसे युक्त 'प्रतप्तलौहकुण्ड' है। वह जलते हुए लौहकी लाखों प्रतिमाओंसे पूर्ण है। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सताया जाता है, तब वे चीत्कार कर उठते हैं। वहाँ निरन्तर जलते हुए वे पापी भयभीत होकर 'रक्षा करो, रक्षा करो' पुकारते रहते हैं। वह कुण्ड दो कोसमें विस्तृत तथा अत्यन्त भयानक है और वहाँ चारों ओर भयानक अन्धकार छाया रहता है। 'चर्मकुण्ड' और 'तप्तसुराकुण्ड' आधी बावड़ीके प्रमाणके ही हैं। चर्मभक्षण तथा सुरापान करनेवाले पापी जीव उसमें भरे रहते हैं।
शाल्मलिवृक्षके नीचे तीखे काँटोंसे भरा एक कुण्ड है। वह दुःखप्रद नरक एक कोसकी दूरीमें है। लाखों मनुष्य उसमें अँट सकते हैं। वहाँ चार-चार हाथके अत्यन्त तीखे काँटे शाल्मली वृक्षसे गिरकर बिछे रहते हैं। एक-एक करके सभी काँटोंसे घोर पापियोंके अङ्ग छिद उठते हैं। उन अत्यन्त व्यग्र पापियोंके तालू सूख जाते हैं, तब महान् भयभीत होकर 'मुझे जल दो'—यों चिल्लाने लगते हैं। तक्षक आदिके विषसमूहोंसे परिपूर्ण एक कोस लंबा-चौड़ा नरक है, जिसमें पापी मेरे दूतोंकी मार खाकर गिरते हैं और वह विष ही खानेको पाते हैं। 'प्रतप्ततैलकुण्ड' में सदा खौलता हुआ तेल भरा रहता है। जलनके कारण कीड़ेतक उसमें नहीं रहते; किंतु मेरे दूतोंकी चोट खाकर पापियोंको वहाँ रहना पड़ता है। जलता हुआ तैल ही उन्हें खाना पड़ता है।
जिनके आकार त्रिशूल-जैसे हैं तथा जिनकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण है, उन लौहमय शस्त्रोंसे सम्पन्न 'शस्त्रकुण्ड' है। चार कोसमें विस्तृत वह नरक ऐसा जान पड़ता है, मानो शस्त्रोंकी शय्या हो। भालोंसे छिद जानेके कारण जिनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये हैं, ऐसे पापी जीवोंसे उस नरकका कोना-कोना भरा रहता है। साध्वि ! जिसमें सर्प-जैसे बड़े-बड़े असंख्य भयंकर कीड़े रहते हैं, उसे 'कृमिकुण्ड' कहा जाता है। विकृत