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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 697, कुल 810 में से

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पृष्ठ 697

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६८७
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, संन्यासी तथा विधवा और पतिव्रता नारियोंके
धर्मका वर्णन
नन्दजीने पूछा- बेटा! तुम्हारा कल्याण
हो। अब तुम वेदों तथा ब्रह्मा आदिकी उत्पत्तिका
सारा कारण वर्णन करो; क्योंकि तुम्हारे सिवा मैं
और किससे पूछूँ? साथ ही ब्राह्मणों तथा
क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंका कार्य करनेवालोंके
जो धर्म हैं तथा संन्यासियों, यतियों, ब्रह्मचारियों,
वैष्णव-ब्राह्मणों, सत्पुरुषों, विधवाओं एवं पतिव्रता
नारियों, गृहस्थों, गृहस्थपत्नियों, विशेषतया शिष्यों
और माता-पिताके प्रति पुत्रों एवं कन्याओंके जो
धर्म हैं; उन सबको बतलानेकी कृपा करो। प्रभो!
स्त्रियोंकी कितनी जातियाँ होती हैं? भक्तोंके
कितने भेद हैं? ब्रह्माण्ड कितने प्रकारका है?
वदन (बोली या मुख) किस प्रकारका होता है?
नित्य क्या है और कृत्रिम क्या है? क्रमशः यह
सब बतलाओ।
श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी! ब्राह्मण सदा
संध्यावन्दनसे पवित्र होकर मेरी सेवा करता है
और नित्य मेरे प्रसादको खाता है। वह मुझे
निवेदन किये बिना कभी भी नहीं खाता; क्योंकि
जो विष्णुको अर्पित नहीं किया गया है, वह
अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान माना जाता
है। अतः विष्णुके प्रसादको खानेवाला ब्राह्मण
जीवन्मुक्त हो जाता है। नित्य तपस्यामें संलग्न
रहनेवाला, पवित्र, शमपरायण, शास्त्रज्ञ, व्रतों
और तीर्थोंका सेवी, नाना प्रकारके अध्यापन-कार्यसे
संयुक्त धर्मात्मा ब्राह्मण विष्णु-मन्त्रसे दीक्षित
होकर गुरुकी सेवा करता है; तत्पश्चात् उनकी
आज्ञा लेकर संग्रहवान् (गृहस्थ) बनता है। उसे
गुरुको नित्य-पूजनकी दक्षिणा देनी चाहिये तथा
निःसंदेह नित्य गुरुजनोंका पालन-पोषण करना
चाहिये; क्योंकि समस्त वन्दनीयोंमें पिता ही
महान् गुरु माना जाता है, परंतु पितासे सौगुनी
माता, मातासे सौगुना अभीष्टदेव और अभीष्टदेवसे
चारगुना मन्त्रतन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु श्रेष्ठ है।
गुरु प्रत्यक्षरूपमें ऐश्वर्यशाली भगवान् नारायण हैं।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही स्वयं
शिव हैं। सभी देवता गुरुमें सदा हर्षपूर्वक निवास
करते हैं। जिसके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट
हो जाते हैं, वे श्रीहरि भी गुरुके प्रसन्न होनेपर
प्रसन्न हो जाते हैं। गुरु यदि शिष्योंपर पुत्रके
समान स्नेह नहीं करते तो उन्हें ब्रह्महत्याका पाप
लगता है और आशीर्वाद न देनेसे उन्हें भी वह
फल भोगना पड़ता है।
जो विप्र सदा अपने धर्ममें तत्पर, ब्रह्मज्ञ
तथा सदा विष्णुकी सेवा करनेवाला है; वही
पवित्र है। उसके अतिरिक्त अन्य विप्र सदा
अपवित्र रहता है। जो ब्राह्मण होकर बैलोंको
जोतता है, शूद्रोंकी रसोई बनाता है, देवमूर्तियोंपर
चढ़े हुए द्रव्यसे जीवन-निर्वाह करता है, संध्या
नहीं करता, उत्साहहीन है, दिनमें नींद लेता है,
शूद्रके श्राद्धान्नको खाता है, शूद्रोंके मुर्दोंका दाह
करता है; ऐसे सभी ब्राह्मण शूद्रके समान माने
जाते हैं। जो विधिपूर्वक शालग्राम महायन्त्रकी
पूजा करके उनके अर्पित किये हुए नैवेद्यको
खाता है तथा उनके चरणोदकको पीता है; वह
सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसे विष्णुलोककी
प्राप्ति होती है; क्योंकि श्रीहरिका चरणोदक
पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। जो
शालग्राम-शिलाके जलसे अपनेको अभिषिक्त
करता है; उसने सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया
और समस्त यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली।
व्रजेश्वर ! शालग्राम-शिलाका जल गङ्गाजलसे दसगुना
बढ़कर है। जो ब्राह्मण उसे नित्य पान करता है;
वह जीवन्मुक्त एवं देवताओंके समान हो जाता
है। जो ब्राह्मणोंका नित्यकर्म, विष्णुके निवेदित
नैवेद्यका भोजन, उनकी यत्नपूर्वक पूजा, उनके