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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

( प्रकृतिखण्ड )

ब्रह्मखण्ड ९७

तत्पश्चात् विसर्जन करके पृथ्वीपर माथा टेककर प्रणाम करे। इस तरह देवपूजा सम्पन्न करके बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष श्रौत तथा स्मार्त अग्निसे युक्त यज्ञका अनुष्ठान करे। मुने! यज्ञके पश्चात् दिक्पाल आदिको बलि देनी चाहिये। फिर यथाशक्ति नित्य-श्राद्ध और अपने वैभवके अनुसार दान करे। यह सब करके पुण्यात्मा साधक आवश्यक आहार-विहारमें प्रवृत्त हो। श्रुतिमें पूजनका यही क्रम सुना गया है। नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण वेदोक्त उत्तम सूत्रका तथा ब्राह्मणोंके आह्निक कर्मका वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २६)


ब्राह्मणोंके लिये भक्ष्याभक्ष्य तथा कर्तव्याकर्तव्यका निरूपण

नारदजीने पूछा— प्रभो! गृहस्थ ब्राह्मणों, यतियों, वैष्णवों, विधवा स्त्रियों और ब्रह्मचारियोंके लिये क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? अथवा उनके लिये क्या भोग्य है और क्या अभोग्य? आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर और सबके कारण हैं, अतः मेरी पूछी हुई सब बातें बताइये।

महादेवजीने कहा— मुने! कोई तपस्वी ब्राह्मण चिरकालतक मौन रहकर बिना आहारके ही रहता है। कोई वायु पीकर रह जाता है और कोई फलाहारी होता है। कोई गृहस्थ ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ रहकर यथोचित समयपर अन्न ग्रहण करता है। ब्रह्मन्! जिनकी जैसी इच्छा होती है, वे उसीके अनुसार आहार करते हैं; क्योंकि रुचियोंका स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकारका होता है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये हविष्यान्न-भोजन सदा उत्तम माना गया है। भगवान् नारायणका उच्छिष्ट प्रसाद ही उनके लिये अभीष्ट भोजन है। जो भगवान्‌को निवेदित नहीं हुआ है, वह अभक्षणीय है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। एकादशीके दिन सब प्रकारका अन्न-जल मल-मूत्रके तुल्य कहा गया है। जो ब्राह्मण एकादशीके दिन स्वेच्छासे अन्न खाता है, वह पाप खाता है, इसमें संशय नहीं है। नारद! एकादशीका दिन प्राप्त होनेपर गृहस्थ ब्राह्मणोंको कदापि अन्न नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये। जन्माष्टमीके दिन, रामनवमीके दिन तथा शिवरात्रिके दिन जो अन्न खाता है, वह भी दूने पातकका भागी होता है। जो सर्वथा उपवास करनेमें समर्थ न हो, वह फल-मूल और जल ग्रहण करे; अन्यथा उपवासके कारण शरीर नष्ट हो जानेपर मनुष्य आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो व्रतके दिन एक बार हविष्यान्न खाता अथवा भगवान् विष्णुके नैवेद्यमात्रका भक्षण करता है, उसे अन्न खानेका पाप नहीं लगता। वह उपवासका पूरा फल प्राप्त कर लेता है।*

नारद! गृहस्थ, शैव, शाक्त, विशेषतः वैष्णव यति तथा ब्रह्मचारियोंके लिये यह बात बतायी गयी है। जो वैष्णव पुरुष नित्य भगवान् श्रीकृष्णके नैवेद्य (प्रसाद)-का भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त हो प्रतिदिन सौ उपवास-व्रतोंका फल पाता है। सम्पूर्ण देवता और तीर्थ उसके अङ्गोंका स्पर्श चाहते हैं। उसके साथ वार्तालाप तथा उसका दर्शन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यतियों, विधवाओं और ब्रह्मचारियोंके लिये ताम्बूल-भक्षण निषिद्ध है।


* उपवासासमर्थश्च फलमूलजलं पिबेत्। नष्टे शरीरे स भवेदन्यथा चात्मघातकः॥
सकृद् भुंक्ते हविष्यान्नं विष्णोर्नैवेद्यमेव च। न भवेत् प्रत्यवायी स चोपवासफलं लभेत्॥
(ब्रह्मखण्ड २७।१२-१३)

९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारद! समस्त ब्राह्मणोंके लिये जो अभक्ष्य है, उसका वर्णन सुनो। ताँबेके पात्रमें दूध पीना, जूठे बर्तन या अन्नमें घी लेकर खाना तथा नमकके साथ दूध पीना तत्काल गोमांस-भक्षणके समान माना गया है। काँसके बर्तनमें रखा हुआ एवं जो द्विज उठकर बायें हाथसे जल पीता है, वह शराबी माना गया है और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत है। मुने! भगवान् श्रीहरिको निवेदित न किया गया अन्न, खानेसे बचा हुआ जूठा भोजन तथा पीनेसे शेष रहा जूठा जल—ये सब सर्वथा निषिद्ध हैं। कार्तिकमें बैगनका फल, माघमें मूली तथा श्रीहरिके शयनकाल (चौमासे)-में कलम्बींका शाक सर्वथा नहीं खाना चाहिये। सफेद ताड़, मसूर और मछली—ये सभी ब्राह्मणोंके लिये समस्त देशोंमें त्याज्य हैं। प्रतिपदाको कूष्माण्ड (कोहड़ा) नहीं खाना चाहिये; क्योंकि उस दिन वह अर्थका नाश करनेवाला है। द्वितीयाको बृहती (छोटे बैगन अथवा कटेहरी) भोजन कर ले तो उसके दोषसे छुटकारा पानेके लिये श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। तृतीयाको परवल शत्रुओंकी वृद्धि करनेवाला होता है; अतः उस दिन उसे नहीं खाना चाहिये। चतुर्थीको भोजनके उपयोगमें लायी हुई मूली धनका नाश करनेवाली होती है। पञ्चमीको बेल खाना कलङ्क लगनेमें कारण होता है। षष्ठीको नीमकी पत्ती चबायी जाय या उसका फल या दाँतुन मुँहमें डाला जाय तो उस पापसे मनुष्यको पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। सप्तमीको ताड़का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीरका नाशक होता है। अष्टमीको नारियलका फल खाया जाय तो उससे बुद्धिका नाश होता है। नवमीको लौकी और दशमीको कलम्बीका शाक सर्वथा त्याज्य है। एकादशीको शिम्बी (सेम), द्वादशीको पूतिका (पोई) और त्रयोदशीको बैगन खानेसे पुत्रका नाश होता है। मांस सबके लिये सदा वर्जित है।

पार्वणश्राद्ध और व्रतके दिन प्रातःकालिक स्नानके समय सरसोंका तेल और पकाया हुआ तेल उपयोगमें लाया जाय तो उत्तम है। अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें, रविवारको, श्राद्ध और व्रतके दिन स्त्री-सहवास तथा तिलके तेलका सेवन निषिद्ध है। सभी वर्णोंके लिये दिनमें अपनी स्त्रीका भी सेवन वर्जित है। रातमें दही खाना, दिनमें दोनों संध्याओंके समय सोना तथा रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करना—ये नरककी प्राप्तिके कारण हैं। रजस्वला तथा कुलटाका अन्न नहीं खाना चाहिये।

ब्रह्मर्षे! शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। ब्रह्मन्! सूदखोर और गणकका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। अग्रदानी ब्राह्मण (महापात्र) तथा चिकित्सक (वैद्य या डाक्टर)-का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। अमावास्या तिथि और कृत्तिका नक्षत्रमें द्विजोंके लिये क्षौर-कर्म (हजामत) वर्जित है। जो मैथुन करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, उसका वह जल रक्तके समान होता है तथा उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है। नारद! जो करना चाहिये, जो नहीं करना चाहिये, जो भक्ष्य है और जो अभक्ष्य है, वह सब तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २७)


* जलज शाकविशेष अथवा कदम्ब।

ब्रह्मखण्ड

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परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण

नारदजीने पूछा— जगन्नाथ! जगद्गुरो! आपकी कृपासे मैंने सब कुछ सुन लिया। अब आप ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन—ब्रह्मतत्त्वका निरूपण कीजिये। प्रभो! सर्वेश्वर! ब्रह्म साकार है या निराकार? क्या उसका कुछ विशेषण भी है? अथवा वह विशेषणोंसे रहित (निर्विशेष) ही है? ब्रह्मका नेत्रोंसे दर्शन हो सकता है या नहीं? वह समस्त देहधारियोंमें लिप्त है अथवा नहीं? उसका क्या लक्षण बताया गया है? वेदमें उसका किस प्रकार निरूपण किया गया है? क्या प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त है या ब्रह्मस्वरूपिणी ही है? श्रुतिमें प्रकृतिका सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना गया है? ब्रह्म और प्रकृति इन दोनोंमेंसे किसकी सृष्टिमें प्रधानता है? दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? सर्वज्ञ! इन सब बातोंपर मनसे विचार करके जो सिद्धान्त हो, उसे अवश्य मुझे बताइये।

नारदजीकी यह बात सुनकर भगवान् पञ्चमुख महादेव ठठाकर हँस पड़े और उन्होंने परब्रह्म-तत्त्वका निरूपण आरम्भ किया।

महादेवजी बोले— वत्स नारद! तुमने जो-जो पूछा है, वह उत्तम गूढ़ ज्ञानका विषय है। वेदों और पुराणोंमें भी वह उत्तम एवं गूढ़ ज्ञान परम दुर्लभ है। ब्रह्मन्! मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शेषनाग, धर्म और महाविराट्—इन सबने तथा श्रुतियोंने भी सब बातोंका निरूपण किया है। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारद! जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्य-तत्त्व है, उसका हमलोगोंने वेदमें निरूपण किया है। प्राचीनकालकी बात है, वैकुण्ठधाममें मैंने, ब्रह्माजीने और धर्मने श्रीहरिके समक्ष अपना प्रश्न उपस्थित किया था। उस समय श्रीहरिने उसका जो कुछ उत्तर दिया, वह सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ। वह ज्ञान तत्त्वोंका सारभूत तत्त्व है, अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके लिये नेत्ररूप है तथा दुविधा अथवा द्वैत नामक भ्रमरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये सर्वोत्तम प्रदीपके समान है। सनातन परब्रह्म परमात्मस्वरूप है। वह देहधारियोंके कर्मोंके साक्षीरूपसे समस्त शरीरोंमें विराजमान है। प्रत्येक शरीरमें पाँचों प्राणोंके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु विद्यमान हैं। मनके रूपमें प्रजापति ब्रह्मा विराज रहे हैं। सम्पूर्ण ज्ञान (बुद्धि)-के रूपमें स्वयं मैं हूँ और शक्तिके रूपमें ईश्वरीय प्रकृति है। हम सब-के-सब परमात्माके अधीन हैं। शरीरमें उसके स्थित होनेपर ही स्थित होते हैं और उसके चले जाने (सम्बन्ध हटा लेने)-पर हम भी चले जाते हैं। जैसे राजाके सेवक सदा राजाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार हम-लोग उस परमात्माके अनुगामी बने रहते हैं। जीव परमात्माका प्रतिबिम्ब है। वही कर्मोंके फलका उपभोग करता है। जैसे जलसे भरे हुए घड़ोंमें पृथक्-पृथक् सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब होता है तथा उन घड़ोंके फूट जानेपर वह प्रतिबिम्ब फिर चन्द्रमा और सूर्यमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टिकालमें परमात्माके प्रतिबिम्ब-स्वरूप जीवकी उपलब्धि होती है तथा सृष्टिमयी उपाधिके नष्ट हो जानेपर वह प्रतिबिम्बस्वरूप जीव पुनः सर्वव्यापी परमात्मामें लीन हो जाता है।

वत्स! संसारका संहार हो जानेपर एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। हम तथा यह चराचर जगत् उसीमें लीन हो जाते हैं। वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिःपुञ्जस्वरूप है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रकट होनेवाले कोटि-कोटि सूर्योंके समान उसका प्रकाश है। वह आकाशके समान विस्तृत, सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। योगीजनॉको ही वह चन्द्रमण्डलके समान सुखपूर्वक दिखायी देता है। योगीलोग उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन-रात उस सर्वमङ्गलमय सत्यस्वरूप परमात्माका ध्यान करते रहते हैं। वह परमात्मा निरीह, निराकार तथा सबका ईश्वर है।

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उसका स्वरूप उसकी इच्छाके अनुसार है। वह स्वतन्त्र तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। परमानन्दस्वरूप तथा परमानन्दकी प्राप्तिका हेतु है। सबसे उत्कृष्ट, प्रधान पुरुष (पुरुषोत्तम), प्राकृत गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे है। प्रलयके समय उसीमें सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति लीन होती है। ठीक उसी तरह, जैसे अग्निमें उसकी दाहिका शक्ति, सूर्यमें प्रभा, दुग्धमें धवलता और जलमें शीतलता लीन रहती है। मुने! जैसे आकाशमें शब्द और पृथ्वीमें गन्ध सदा विद्यमान है, उसी तरह निर्गुण ब्रह्ममें निर्गुण प्रकृति सर्वदा स्थित है। जब ब्रह्म सृष्टिके लिये उन्मुख होता है, तब अपने अंशसे पुरुष कहलाता है। वत्स! वही गुणों—विषयोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर प्राकृत एवं विषयी कहा गया है। त्रिगुणा प्रकृति उस परमात्मामें ही उत्कृष्ट छायारूपिणी मानी गयी है। मुने! जैसे कुम्हार मिट्टीसे घड़ा बनानेमें सदा ही समर्थ होता है, उसी प्रकार वह ब्रह्म प्रकृतिके द्वारा सृष्टिका निर्माण करनेमें नित्य समर्थ है। जैसे सुनार सुवर्णसे कुण्डल बनानेकी शक्ति रखता है, उसी तरह परमेश्वर उपादानभूता प्रकृतिके द्वारा सदा सृष्टि करनेमें समर्थ है। जैसे कुम्हार मिट्टीका निर्माण नहीं करता, मिट्टी उसके लिये नित्य एवं सनातन है तथा जैसे सुनार सुवर्णकी सृष्टि नहीं करता, सुवर्ण उसके लिये नित्य वस्तु ही है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमात्मा नित्य है और वह प्रकृति भी नित्य मानी गयी है। इसीलिये कुछ लोग सृष्टिमें उन दोनोंकी ही समानरूपसे प्रधानता बतलाते हैं। कुम्हार और सुनार स्वयं मिट्टी और सुवर्ण पैदा करके लानेमें समर्थ नहीं हैं तथा मिट्टी और सुवर्ण भी कुम्हार और सुनारको ले आनेकी शक्ति नहीं रखते। अतः मिट्टी और कुम्हारकी घटमें तथा सुवर्ण और सुनारकी कुण्डलमें समानरूपसे प्रधानता है।

नारद! इस विवेचनसे ब्रह्म प्रकृतिसे परे ही सिद्ध होता है। यही बात दृष्टिमें रखकर कुछ लोग प्रकृति और ब्रह्म दोनोंकी ही निश्चितरूपसे नित्यताका प्रतिपादन करते हैं। कुछ विद्वानोंका कथन है कि ब्रह्म स्वयं ही प्रकृति और पुरुषरूपमें प्रकट है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त (भिन्न) है। वह ब्रह्म परमधाम-स्वरूप तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। ब्रह्मन्! उस ब्रह्मका लक्षण श्रुतिमें कुछ इस प्रकारका सुना गया है—ब्रह्म सबका आत्मा है। वह सबसे निर्लिप्त और सबका साक्षी है। सर्वत्र व्यापक और सबका आदिकारण है। सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति उस ब्रह्मकी शक्ति है। जिससे वह ब्रह्म शक्तिमान् है, अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनों अभिन्न हैं। योगीलोग सदा तेजःस्वरूपमें ही ब्रह्मका ध्यान करते हैं; परंतु सूक्ष्म बुद्धिवाले मेरे भक्त—वैष्णवजन ऐसा नहीं मानते। वे वैष्णवजन उस आश्चर्यमय तेजोमण्डलके भीतर सदा साकार, सर्वात्मा, स्वेच्छामय पुरुषके मनोहर रूपका ध्यान करते हैं। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान जो मण्डलाकार तेजःपुञ्ज है, उसके भीतर नित्यधाम छिपा हुआ है, जिसका नाम गोलोक है। वह मनोहर लोक चारों ओरसे लक्षकोटि योजन विस्तृत है। सर्वश्रेष्ठ दिव्य रत्नोंके सारतत्त्वसे जिनका निर्माण हुआ है, ऐसे दिव्य भवनों तथा गोपाङ्गनाओंसे वह लोक भरा हुआ है। उसे सुखपूर्वक देखा जा सकता है। चन्द्रमण्डलके समान ही वह गोलाकार है। रतेन्द्रसारसे निर्मित वह धाम परमात्माकी इच्छाके अनुसार बिना किसी आधारके ही स्थित है। उस नित्य लोककी स्थिति वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर है। वहाँ गौएँ, गोप और गोपियाँ निवास करती हैं। वहाँ कल्पवृक्षोंके वन हैं। गोलोक कामधेनु गौओंसे भरा हुआ तथा रासमण्डलसे मण्डित है। मुने! वह वृन्दावनसे आच्छन्न और विरजा नदीसे आवेष्टित है। वहाँ सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित गिरिराज विराजमान है। सुवर्णनिर्मित

ब्रह्मखण्ड
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लक्ष कोटि मनोहर आश्रम हैं, जिनसे वह अभीष्ट धाम अत्यन्त दीप्तिमान् एवं श्रीसम्पन्न दिखायी देता है। उन सबके मध्यभागमें एक परम मनोहर आश्रम है, जो अकेला ही सौ मन्दिरोंसे संयुक्त है। वह परकोटों तथा खाइयोंसे घिरा हुआ तथा पारिजातके वनोंसे सुशोभित है। उस आश्रमके भवनोंमें जो कलश लगे हैं, उनका निर्माण रत्नराज कौस्तुभमणिसे हुआ है। इसलिये वे उत्तम ज्योतिःपुञ्जसे जाज्वल्यमान रहते हैं। उन भवनोंमें जो सीढ़ियाँ हैं, वे दिव्य हीरोंके सार-तत्त्वसे बनी हुई हैं। उनसे उन भवनोंका सौन्दर्य बहुत बढ़ गया है। मणीन्द्रसारसे निर्मित वहाँके किवाड़ोंमें दर्पण जड़े हुए हैं। नाना प्रकारके चित्र-विचित्र उपकरणोंसे वह आश्रम भलीभाँति सुसज्जित है। उसमें सोलह दरवाजे हैं तथा वह आश्रम रत्नमय प्रदीपोंसे अत्यन्त उद्भासित होता रहता है।

वहाँ बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित रमणीय रत्नमय सिंहासनपर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं। उनकी अङ्गकान्ति नवीन मेघ-मालाके समान श्याम है। वे किशोर-अवस्थाके बालक हैं। उनके नेत्र शरत्कालकी दोपहरिके सूर्यकी प्रभाको छीने लेते हैं। उनका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको ढक देता है। उनका सौन्दर्य कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत कर रहा है। उनका पुष्ट श्रीविग्रह करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे सेवित है। उनके मुखपर मुस्कराहट खेलती रहती है। उनके हाथमें मुरली शोभा पाती है। उनके मनोहर छबिकी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे परम मङ्गलमय हैं। अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके समान रंगवाले दो पीताम्बर धारण करनेसे उनका श्रीविग्रह परम उज्ज्वल प्रतीत होता है। भगवान्‌के सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा कौस्तुभमणिसे प्रकाशित हैं। घुटनोंतक लटकती हुई मालतीकी माला और वनमालासे वे विभूषित हैं। त्रिभंगी छबिसे युक्त और मणिमाणिक्यसे अलंकृत हैं। मोरपंखका मुकुट धारण करते हैं। उत्तम रत्नमय मुकुटसे उनका मस्तक जगमगाता रहता है। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन और मंजीरसे उनके हाथ-पैर सुशोभित हैं। उनके गण्डस्थल रत्नमय युगल कुण्डलसे अत्यन्त शोभा पाते हैं। उनकी दन्तपंक्ति मोतियोंकी पाँतिका तिरस्कार करनेवाली है। वे बड़े ही मनोहर हैं। उनके ओठ पके हुए बिम्बफलके समान लाल हैं। उन्नत नासिका उनकी शोभा बढ़ाती है। सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई गोपाङ्गनाएँ उन्हें सदा सादर निहारती रहती हैं। वे गोपाङ्गनाएँ भी सुस्थिर यौवनसे युक्त, मन्द मुस्कानसे सुशोभित तथा उत्तम रत्नोंके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित हैं। देवेन्द्र, मुनीन्द्र, मुनिगण तथा नरेशोंके समुदाय और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त तथा धर्म आदि उनकी सानन्द वन्दना किया करते हैं। वे भक्तोंके प्रियतम, भक्तोंके नाथ तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान परम रसिक रासेश्वर हैं। मुने! वैष्णवजन उन निराकार परमात्माका इस रूपमें ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगोंके सदा ही ध्येय हैं। उन्हींको अविनाशी परब्रह्म कहा गया है। वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान् हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृतिसे परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको हाथमें देनेवाले हैं। वे आदिपुरुष भगवान् स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोकमें निवास करते हैं। उनकी वेश-भूषा भी ग्वालोंके समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालोंसे घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान्‌को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजीके साथ रहनेवाले और श्रीराधिकाके प्राणेश्वर हैं। सबके अन्तरात्मा, सर्वत्र प्रत्यक्ष

१०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दर्शन देनेके योग्य और सर्वव्यापी हैं। 'कृष्' का अर्थ है सब और 'ण' का अर्थ है आत्मा। वे परब्रह्म परमात्मा सबके आत्मा हैं। इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' शब्द सर्वका वाचक है और 'ण' कार आदिवाचक है। वे सर्वव्यापी परमेश्वर सबके आदिपुरुष हैं, इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। वे ही भगवान् अपने एक अंशसे वैकुण्ठधाममें चार भुजाधारी लक्ष्मीपतिके रूपमें निवास करते हैं, चार भुजाधारी पार्षद उन्हें घेरे रहते हैं। वे ही जगत्पालक भगवान् विष्णु अपनी एक कलासे श्वेतद्वीपमें चार भुजाधारी रमापति-रूपसे निवास करते हैं। समुद्रतनया रमा उनकी पत्नी हैं।

इस प्रकार मैंने तुमसे परब्रह्म-निरूपणविषयक सब बातें बतायीं। वे परमात्मा हम सबके प्रिय, वन्दनीय, सेव्य तथा सर्वदा स्मरणीय हैं।

शौनक! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँ चुप हो गये। तब नारदने गन्धर्वराज उपबर्हणद्वारा रचे गये स्तोत्रसे उनकी स्तुति की। मुनिके उस स्तोत्रसे संतुष्ट हो अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले आदि भगवान् मृत्युञ्जयने उन्हें अभीष्ट वरदान—ज्ञान प्रदान किया। उस समय मुनिवर नारदके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे भगवान् शिवको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले पुण्यमय नारायणाश्रमको चले गये।

(अध्याय २८)


बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न

सौति कहते हैं—शौनक! देवर्षि नारदने नारायण ऋषिके आश्चर्यमय आश्रमको देखा, जो बेरके वनोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारके वृक्षों और फलोंसे भरे हुए उस आश्रममें कोयलकी मीठी कूक मुखरित हो रही थी। बड़े-बड़े शरभों, सिंहों और व्याघ्रसमुदायोंसे घिरे होनेपर भी उस आश्रममें ऋषिराज नारायणके प्रभावसे हिंसा और भयका कहीं नाम नहीं था। वह विशाल वन जनसाधारणके लिये अगम्य और स्वर्गसे भी अधिक मनोहर था। वहाँ नारदजीने देखा—ऋषिप्रवर नारायण मुनियोंकी सभामें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका रूप बड़ा मनोहर है और वे योगियोंके गुरु हैं। श्रीकृष्णस्वरूप परमेश्वर परब्रह्मका जप करते हुए नारायण मुनिका दर्शन करके ब्रह्मपुत्र नारदने उन्हें प्रणाम किया। उन्हें आया देख नारायणने सहसा उठकर हृदयसे लगा लिया और उत्तम आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही स्नेहपूर्वक कुशल-समाचार पूछा और आतिथ्यसत्कार किया। फिर नारदजीको भी उन्होंने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। उस रमणीय आसनपर बैठकर नारदजीने रास्तेकी थकावट दूर की और उन ऋषिश्रेष्ठ सनातन भगवान् नारायणसे, साथ ही उन सब परम दुर्लभ मुनियोंसे भी पूछा, जो पिताके स्थानमें वेदाध्ययन करके वहाँ विराजमान थे।

नारदजी बोले—प्रभो! योगेश्वर शंकरसे ज्ञान और मन्त्रका उपदेश पाकर भी मेरा मन तृप्त नहीं हो रहा है; क्योंकि यह बड़ा चञ्चल है और इसे रोकना अत्यन्त कठिन है। मेरे मनमें प्रभुकी कुछ ऐसी प्रेरणा हुई, जिससे मैंने आपके चरणारविन्दोंका दर्शन किया। इस समय मैं आपसे कुछ विशेष ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन हो, जो कि जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवराज इन्द्र, मुनि और विद्वान् मनु किसका चिन्तन करते हैं? सृष्टिका प्रादुर्भाव किससे होता है अथवा उसका लय कहाँ होता है? समस्त

ब्रह्मखण्ड
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कारणोंके भी कारणभूत सर्वेश्वर विष्णु कौन हैं? जगत्पते! उन ईश्वरका रूप अथवा कर्म क्या है? इन सब बातोंपर मन-ही-मन विचार करके आप बतानेकी कृपा करें।

नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् नारायण ऋषि हँसे। फिर उन्होंने त्रिभुवनपावनी पुण्यकथाको कहना आरम्भ किया।

(अध्याय २९)


नारायणके द्वारा परमपुरुष परमात्मा श्रीकृष्ण तथा प्रकृतिदेवीकी महिमाका प्रतिपादन

श्रीनारायण बोले—गणेश, विष्णु, शिव, रुद्र, शेष, ब्रह्मा आदि देवता, मनु, मुनीन्द्रगण, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा और लक्ष्मी आदि देवियाँ भी जिनका सेवन करती हैं, उन भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो अत्यन्त गम्भीर और भयंकर दावाग्निरूपी सर्पसे आवेष्टित हो छटपटाते अङ्गवाले संसार-सागरको लाँघकर उस पार जाना चाहता है और श्रीहरिके दास्य-सुखको पानेकी इच्छा रखता है, वह भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करे। जिन्होंने गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाकर व्रजभूमिको इन्द्रके कोपसे बचानेकी कीर्ति प्राप्त की है, वाराहावतारके समय एकार्णवके जलमें गली जाती हुई पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे उठाकर जलके ऊपर स्थापित किया तथा जो अपने रोमकूपोंमें असंख्य विश्व-ब्रह्माण्डको धारण करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो गोपाङ्गनाओंके मुखारविन्दके रसिक भ्रमर हैं और वृन्दावनमें विहार करनेवाले हैं, उन व्रजवेषधारी विष्णुरूप परमपुरुष रसिक-रमण रासेश्वर श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। वत्स नारदमुने! जिनके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, उनके कर्मका वर्णन करनेमें भूतलपर कौन समर्थ है? तुम भी श्रीहरिके चरणारविन्दका अत्यन्त आदरपूर्वक

चिन्तन करो। तुम और हम उन भगवान्की कलाकी कलाके अंशमात्र हैं। मनु और मुनीन्द्र भी उनकी कलाके कलांश ही हैं। महादेव और ब्रह्माजी भी कलाविशेष हैं और महान् विराट्-पुरुष भी उनकी विशिष्ट कलामात्र हैं। सहस्त्र सिरोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको अपने मस्तकपर सरसोंके एक दानेके समान धारण करते हैं, परंतु कूर्मके पृष्ठभागमें वे शेषनाग ऐसे जान पड़ते हैं, मानो हाथीके ऊपर मच्छर बैठा हो। वे भगवान् कूर्म (कच्छप) श्रीकृष्णकी कलाके कलांशमात्र हैं। नारद! गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णका निर्मल यश वेद और पुराणमें किञ्चिन्मात्र भी प्रकट नहीं हुआ। ब्रह्मा आदि देवता भी उसका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। ब्रह्मपुत्र नारद! तुम उन सर्वेश्वर श्रीकृष्णका ही मुख्यरूपसे भजन करो।

जिन विश्वाधार परमेश्वरके सम्पूर्ण लोकोंमें सदा बहुत-से ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र रहा ही करते हैं तथा श्रुतियाँ और देवता भी उनकी नियत संख्याको नहीं जानते हैं, उन्हीं परमेश्वर श्रीकृष्णकी तुम आराधना करो। वे विधाताके भी विधाता हैं। वे ही जगत्प्रसविनी नित्यरूपिणी प्रकृतिको प्रकट करके संसारकी सृष्टि करते हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता प्रकृतिजन्य हैं। वे भक्तिदायिनी श्रीप्रकृतिका भजन करते हैं। प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा है। वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसीके द्वारा सनातन पुरुष परमात्मा संसारकी सृष्टि करते हैं, श्रीप्रकृतिकी