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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 708

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मिष्ठान्न तथा पीठक, यदि उसे शूद्रने बनाकर तैयार
किया हो तो वह शूद्रोंके ही खाने योग्य होता
है, ब्राह्मणोंके लिये नहीं। जो अपवित्र हैं, उन
सबके अन्न-जलका परित्याग कर देना चाहिये।
अशौचान्तके दूसरे दिन सब शुद्ध हो जाता है,
इसमें संशय नहीं है। ब्रजेश्वर ! इस प्रकार मैंने
अपनी जानकारीके अनुसार भक्ष्याभक्ष्यका वर्णन
कर दिया।
पिताजी ! श्रुतिके मतानुसार कर्मोंका विपाक
बड़ा दुष्कर होता है। इस विषयमें क्रमशः चारों
वेदोंमें चार प्रकारके मत बतलाये गये हैं; उनका
सारभूत रहस्य मैं कह रहा हूँ, सुनिये। चाहे
अरबों कल्प बीत जायें तो भी भोग किये बिना
कर्मका क्षय नहीं होता; अतः अपने द्वारा किया
हुआ शुभ-अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता
है*। तीर्थों और देवताओंके सहयोगसे मनुष्योंकी
भी कुछ सहायता हो जाती है; परंतु तात ! जो
मुझसे विमुख है, उसे निश्चय ही उसके द्वारा
किये गये प्रायश्चित्त उसी प्रकार पवित्र नहीं कर
सकते, जैसे नदियाँ मदिराके घड़ेको पावन नहीं
कर सकतीं। न तो उत्तम कर्मसे दुष्कर्मका नाश
होता है और न दुष्कर्म करनेसे सुकर्म ही नष्ट
होता है। यहाँतक कि यज्ञ, तप, व्रत, उपवास,
तीर्थस्नान, दान, जप, नियम, पृथ्वीकी परिक्रमा,
पुराण-श्रवण, पुण्योपदेश, गुरु और देवताकी
पूजा, स्वधर्माचरण, अतिथि-सत्कार, ब्राह्मणोंका
पूजन एवं विशेषतया उन्हें भोजन करानेसे भी
दुष्कर्मका विनाश नहीं होता। ब्राह्मणको जो दिया
जाता है, वह पूर्णरूपसे प्राप्त होता है; क्योंकि
ब्राह्मण क्षेत्ररूप है और वह दान बीजके समान
है। तात ! मनुष्य एक कर्मद्वारा स्वर्गको प्राप्त कर
लेता है; परंतु मोक्ष कर्मसे नहीं मिलता। वह तो
मेरी सेवासे सुलभ होता है। पुण्यकर्म करनेसे
स्वर्ग, दुष्कर्म करनेसे नरक तथा कुत्सित कर्म
करनेसे व्याधि और नीच योनिमें जन्म प्राप्त होता
है, तत्पश्चात् वह पवित्र होता है।
जो इच्छानुसार छोटे-बड़े पाप करनेवाला
तथा गोहत्यारा है, वह गौके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक दन्दशूक नामक नरकमें
निवास करता है। वहाँ वह सर्पके डसनेके कारण
विषकी ज्वालासे तृषित एवं पीड़ित होता है तथा
आहार न मिलनेसे उसका पेट सट जाता है।
तत्पश्चात् उस कुण्डसे निकलकर गौके शरीरमें
जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह गौकी
योनिमें उत्पन्न होता है। तदनन्तर एक लाख
वर्षतक वह कोढ़ी और चाण्डाल होता है, इसके
बाद मनुष्य होता है। उस समय वह कर्मानुसार
कुष्ठरोगयुक्त ब्राह्मण होता है। तब एक लाख
ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह नीरोग तथा पवित्र
हो जाता है। गो-हत्या करनेवाला निश्चय ही उतने
वर्षोंतक गौ होता है, जितने उस गौके शरीरमें
रोएँ होते हैं। ब्रह्मघाती उनसे भी चौगुने वर्षोंतक
विष्ठाका कीड़ा होता है, तदनन्तर उससे चौगुने
वर्षोंतक म्लेच्छ होता है। तत्पश्चात् उनसे चौगुने
वर्षोंतक अंधा होकर ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता
है। वहाँ चार लाख विप्रोंको भोजन करानेसे वह
उस महान् पातकसे मुक्त होकर पवित्र नेत्रयुक्त
और यशस्वी हो जाता है। चारों वर्णोंमें जो स्त्रीकी
हत्या करनेवाला है, उसे वेदमें महापातकी कहा
गया है। वह उस स्त्रीके शरीरमें जितने रोएँ
होते हैं उतने वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें वास
करता है। वहाँ उसे कीड़े काटते रहते हैं, आहार
नहीं मिलता और नरक-यातना भोगनी पड़ती है।
तदनन्तर वह पापी उतने ही वर्षोंतक जगत्में
जन्म लेता है। वहाँ वह कर्मानुसार पापपरायण
तथा राजयक्ष्मासे ग्रस्त रहता है। फिर सौ वर्षोंतक

  • नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥
    (८५। ३६)