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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

८०- गोवर्धन-पूजाके समय श्रीकृष्णका लोगोंसे वर माँगनेके लिये कहना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५२३

श्रीकृष्णको जलसे ऊपरको उछलते देखा। इससे उनके हर्षकी सीमा न रही। उनका शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परम मनोहर मुख और उनकी मन्द-मन्द मुस्कराहट मनको बरबस अपनी ओर खींचे लेती थी। पानीसे निकलनेपर भी वस्त्र भीगे नहीं थे। शरीर भी आर्द्र नहीं था। भाल-देशमें चन्दन और नेत्रोंमें अञ्जनका शृङ्गार भी लुप्त नहीं हुआ था। समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, सिरपर मोरपंखका मुकुट धारण किये और अधरोंसे मुरली लगाये अच्युत श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। यशोदा अपने लालाको देखते ही छातीसे लगाकर मुस्करा उठीं और उनके मुखारविन्दको चूमने लगीं। उस समय उनके नेत्र और मुख प्रसन्नतासे खिल उठे थे। नन्द, बलराम तथा रोहिणीजीने बारी-बारीसे श्यामसुन्दरको हर्षपूर्वक हृदयसे लगाया। सब लोग एकटक हो गोविन्दके श्रीमुखका दर्शन करने लगे। प्रेमसे अंधे हुए सम्पूर्ण ग्वालबालोंने श्रीहरिका आलिङ्गन किया। गोपाङ्गनाएँ नेत्र-चकोरोंद्वारा उनके मुखचन्द्रकी मधुर सुधाका पान करने लगीं।

इतनेमें ही वहाँ सहसा वनके भीतरी भागको दावानलने आवेष्टित कर लिया। उन सबके साथ गौओंका समुदाय भी उस दावाग्निसे घिर गया। वनके भीतर चारों ओर पर्वतोंके समान आगकी ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं। यह देख सबने अपना नाश निकट ही समझा। उस संकटसे सब भयभीत हो उठे। उस समय सारे व्रजवासी, गोपीजन और ग्वालबाल संत्रस्त हो भक्तिसे सिर झुका दोनों हाथ जोड़कर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।

ग्वालबाल बोले—ब्रह्मन्! मधुसूदन! आपने सब आपत्तियोंमें जैसे हमारे कुलकी रक्षा की है, उसी प्रकार फिर इस दावानलसे हमें बचाइये। जगत्पते! आप ही हमारे इष्टदेवता हैं और आप ही कुलदेवता। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी आप ही हैं। अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, यम, कुबेर, वायु, ईशानादि देवता, ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, इन्द्र, मुनीन्द्र, मनु, मानव, दैत्य, यक्ष, राक्षस, किन्नर तथा अन्य जो-जो चराचर प्राणी हैं, वे सब-के-सब आपकी ही विभूतियाँ हैं। उन सबके आविर्भाव और लय आपकी इच्छासे ही होते हैं। गोविन्द! हमें अभय दीजिये और इस अग्निका संहार कीजिये। हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हम शरणागतोंको बचाइये।

यों कहकर वे सब लोग श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए खड़े हो गये। श्रीकृष्णकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही दावानल दूर हो गया। फिर तो वे ग्वालबाल मोदमग्न होकर नाचने लगे। क्यों न हो, श्रीहरिके स्मरणमात्रसे सब विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। जो प्रातःकाल उठकर इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे जन्म-जन्ममें कभी अग्निसे भय नहीं होता। शत्रुओंसे घिर जानेपर, दावानलमें आ जानेपर, भारी विपत्तिमें पड़नेपर तथा प्राणसंकटके समय इस स्तोत्रका पाठ करके मनुष्य सब दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। शत्रुओंकी सेना क्षीण हो जाती है और वह मनुष्य युद्धमें सर्वत्र विजयी होता है। वह इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और अन्तमें उनके दास्य-सुखको अवश्य पा लेता है*।


* यथा संरक्षितं ब्रह्मन् सर्वापत्स्वेव नः कुलम्। तथा रक्षां कुरु पुनर्दावाग्नेर्मधुसूदन ॥
त्वमिष्टदेवतास्माकं त्वमेव कुलदेवता। वह्निर्वा वरुणो वापि चन्द्रो वा सूर्य एव वा ॥
यमः कुबेरः पवन ईशानाद्याश्च देवताः। ब्रह्मोशशेषधर्मेन्द्रा मुनीन्द्रा मनवः स्मृताः ॥
मानवाश्च तथा दैत्या यक्षराक्षसकिन्नराः। ये ये चराचराश्चैव सर्वे तव विभूतयः ॥
स्रष्टा पाता च संहर्ता जगतां च जगत्पते। आविर्भावस्तिरोभावः सर्वेषां च तवेच्छया ॥

५२४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! सुनो। दावानलसे उनका उद्धार करके श्रीहरि उन सबके साथ अपने कुबेरभवनोपम गृहमें गये। वहाँ नन्दने आनन्दपूर्वक ब्राह्मणोंको प्रचुर धनका दान किया और ज्ञातिवर्गके लोगों तथा भाई-बन्धुओंको भोजन कराया। नाना प्रकारका मङ्गलकृत्य तथा श्रीहरिनाम-कीर्तन कराया। ब्राह्मणोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक वेदपाठ करवाया। इस प्रकार वृन्दावनके घर-घरमें वे सब गोप श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके चिन्तनमें चित्तको एकाग्र करके आनन्दपूर्वक रहने लगे। श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कहा गया, जो कलिकल्मषरूपी काष्ठको दग्ध करनेके लिये अग्निके समान है। (अध्याय १९)

मोहवश श्रीहरिके प्रभावको जाननेके लिये ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, बछड़ों और बालकोंका अपहरण, श्रीकृष्णद्वारा उन सबकी नूतन सृष्टि, ब्रह्माजीका श्रीहरिके पास आना, सबको श्रीकृष्णमय देख उनकी स्तुति करके पहलेके गौओं आदिको वापस देकर अपने लोकको जाना तथा श्रीकृष्णका घरको पधारना

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! एक दिन बलरामसहित माधव खा-पीकर चन्दन आदिसे चर्चित हो ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें गये। वहाँ भगवान् कौतूहलवश उन ग्वाल-बालोंके साथ क्रीडा करने लगे। इधर ग्वाल-बालोंका मन खेलमें लगा हुआ था, उधर उन सबकी गौएँ बहुत दूर निकल गयीं। उस समय लोकनाथ ब्रह्मा श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेके लिये समस्त गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंको भी चुरा ले गये। उनका अभिप्राय जान सर्वज्ञ एवं सर्वस्रष्टा योगीन्द्र श्रीहरिने योगमायासे पुनः उन सबकी सृष्टि कर ली। दिनभर गौएँ चराकर क्रीडाकौतुकमें मन लगानेवाले श्रीहरि संध्याको बलराम और ग्वालबालोंके साथ घर गये। इस प्रकार एक वर्षतक भगवान्ने ऐसा ही किया। वे प्रतिदिन गौओं, ग्वालबालों तथा बलरामजीके साथ यमुना तटपर आते और संध्याके समय घरको लौट जाते थे। भगवान्‌के इस प्रभावको जानकर ब्रह्माजीका मस्तक लज्जासे झुक गया। वे भाण्डीर वटके नीचे जहाँ श्रीहरि बैठे हुए थे, आये। उन्होंने ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णको वहीं देखा, मानो नक्षत्रोंके साथ पूर्णिमाके चन्द्रदेव प्रकाशित हो रहे हों। गोविन्द रत्नमय सिंहासनपर बैठे थे और सानन्द मन्द-मन्द हँस रहे थे। उनके श्रीअङ्गोंमें पीताम्बरका परिधान शोभा पा रहा था। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। उनकी बाँहोंमें रत्नोंके बने हुए बाजूबंद, कलाईमें रत्नोंके कंगन तथा पैरोंमें रत्नमय मञ्जीर शोभा दे रहे थे। दो रत्ननिर्मित कुण्डलोंकी प्रभासे उनके गण्डस्थल अत्यन्त उद्दीप्त हो रहे थे। श्यामसुन्दरका श्रीविग्रह करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलाका धाम था। वे मनको मोहे लेते थे। उनके श्रीअङ्ग चन्दन, अगुरु,

अभयं देहि गोविन्द वह्निसंहरणं कुरु। वयं त्वां शरणं यामो रक्ष नः शरणागतान्॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे तस्थुर्ध्यात्वा पदाम्बुजम्। दूरीभूतश्च दावाग्निः श्रीकृष्णामृतदृष्टितः॥
दूरीभूते च दावाग्नौ ननृतुस्ते मुदान्विताः। सर्वापदः प्रणश्यन्ति हरिस्मरण मात्रतः॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। वह्नितो न भवेत्तस्य भयं जन्मनि जन्मनि॥
शत्रुग्रस्ते च दावाग्नौ विपत्तौ प्राणसंकटे। स्तोत्रमेतत् पठित्वा च मुच्यते नात्र संशयः॥
शत्रुसैन्यं क्षयं याति सर्वत्र विजयी भवेत्। इहलोके हरेर्भक्तिमन्ते दास्यं लभेद् ध्रुवम्॥
(१९। १७१—१८१)