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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३९- शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास

६०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पतिव्रताकी प्रशंसा करने लगे। पद्मा अपने तरुण पतिके साथ सदा एकान्तमें मिलन-सुखका अनुभव करने लगी। पीछे उसके दस श्रेष्ठ पुत्र हुए जो उसके पतिसे भी अधिक गुणवान् थे। गिरिराज ! इस प्रकार मैंने सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया। अनरण्यने अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पत्तिकी रक्षा कर ली। तुम भी सबके ईश्वर भगवान् शिवको अपनी कन्या देकर अपने समस्त बन्धुओं तथा सम्पूर्ण सम्पत्तिकी रक्षा करो। शैलराज ! एक सप्ताह बीतनेपर अत्यन्त दुर्लभ शुभ क्षणमें, जब चन्द्रमा लग्नेश होकर लग्नमें अपने पुत्र बुधके साथ विराजमान होंगे; रोहिणीका संयोग पाकर प्रसन्नताका अनुभव करते होंगे; चन्द्र और तारा सर्वथा शुद्ध होंगे; मार्गशीर्ष मासका सोमवार होगा; लग्न सब प्रकारके दोषोंसे रहित, समस्त शुभग्रहोंकी दृष्टिसे लक्षित और असत् ग्रहोंसे शून्य होगा; उत्तम संतानप्रद, पतिसौभाग्यदायक, वैधव्यनिवारक, जन्म-जन्ममें सुख प्रदान करनेवाला तथा प्रेमका कभी विच्छेद न होने देनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठतम योग उपस्थित होगा; उस समय तुम अपनी पुत्री मूलप्रकृति ईश्वरी जगदम्बाको जगत्पिता महादेवजीके हाथमें देकर कृतकृत्य हो जाओ।

गिरिराज ! कल्पान्तरकी बात है; वह मूलप्रकृति ईश्वरी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे दक्षकन्या सतीके रूपमें आविर्भूत हुई। दक्षने उस देवीको विधि-विधानके साथ शूलपाणि शिवके हाथमें दे दिया। तदनन्तर मेरे पिताके यज्ञमें, जहाँ समस्त देवताओंकी सभा जुड़ी हुई थी, दक्षका उन शूलपाणि महादेवजीके साथ सहसा महान् कलह हो गया। उस कलहसे रुष्ट हो त्रिनेत्रधारी शिव ब्रह्माजीको नमस्कार करके चले गये। दक्षके मनमें भी रोष था; अतः वे भी अपने गणोंके साथ उसी क्षण अपने घरको चल दिये। घर जाकर दक्षने रोषपूर्वक ही यज्ञकी सामग्री एकत्र की और उसके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें उन्होंने द्वेषवश शूलपाणि शंकरको भाग नहीं दिया। यह देख सतीके मनमें पिताके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने व्यथित-हृदयसे पिताको बहुत फटकारा और यज्ञस्थानसे उठकर वह माताके पास गयी। उस परात्परा देवीको तीनों कालोंका ज्ञान था; अतः उसने भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाका वहाँ वर्णन किया। यज्ञका विध्वंस, पिता दक्षका पराभव, यज्ञस्थानसे देवताओं, मुनियों, ऋत्विजों तथा पर्वतोंका पलायन, शंकरके सैनिकोंकी विजय, अपनी मृत्यु, पत्नीके विरहसे आतुर-चित्त होकर शोकवश पतिका पर्यटन, उनके नेत्रोंके जलसे सरोवरका निर्माण, भगवान् जनार्दनके समझानेसे उनका धैर्य धारण करना, दूसरे शरीरसे पुनः शिवकी प्राप्ति, उनके साथ विहार तथा अन्य सब भावी वृत्तान्त बताकर सती माता और बहनोंके मना करनेपर भी दुःखी हो घरसे चली गयी। वह सिद्धयोगिनी थी। अतः योगबलसे सबकी दृष्टिसे ओझल हो गयी। गङ्गाजीके तटपर जाकर शंकरके ध्यान और पूजनके पश्चात् उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई सुन्दरी सतीने शरीरको त्याग दिया और गन्धमादन पर्वतकी गुफामें विद्यमान उस दिव्य विग्रहमें प्रवेश किया, जिसके द्वारा उसने पूर्वकालमें दैत्योंके समस्त कुलका संहार किया था। वह घटना देख सब देवता अत्यन्त विस्मित हो हाहाकार कर उठे। शंकरके सैनिक दक्ष-यज्ञका विनाश तथा सबका पराभव करके शोकसे व्याकुल हो लौट गये और शीघ्र ही सारा वृत्तान्त अपने स्वामीसे कह सुनाया। वह समाचार सुनकर समस्त रुद्रगणोंसे घिरे हुए संहारकारी महेश्वर गङ्गाजीके उस तटपर गये, जहाँ देवी सतीका शरीर पड़ा था।

(अध्याय ४२)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६०७

शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर महादेवजीने गङ्गाजीके तटपर सोयी हुई दुर्गास्वरूपा सतीकी मनोहर मूर्ति देखी, जिसके मुखारविन्दकी कान्ति अभी मलिन नहीं हुई थी। वह शरीरपर श्वेत वस्त्र धारण किये और हाथमें अक्षमाला लिये दिव्य तेजसे प्रकाशित हो रही थी। उसके अङ्गोंसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी कमनीय कान्ति फैल रही थी। सतीके उस प्राणहीन शरीरको देखकर भगवान् शिव विरहकी आगसे जलने लगे। वे मूर्तिमान् तत्त्वराशि होनेपर भी सतीके वियोगमें कभी मूर्च्छित, कभी चेतन होते हुए भाँति-भाँतिसे विलाप करने लगे। तदनन्तर उनके स्वर्णप्रतिम मृत देहको वक्षपर धारण करके सप्तद्वीप, लोकालोक पर्वत तथा सप्तसिन्धुमें भ्रमण करते हुए भारतमें शतशृङ्ग-गिरिके पास जम्बूद्वीपमें निर्जन प्रदेशस्थ अक्षयवटके नीचे नदीतीरपर पहुँचे। वहाँसे महायोगी शंकर विरहाकुलचित्त होकर पूरे एक वर्षतक पृथ्वीपर परिभ्रमण करते रहे। सती देवीके उस मृत देहके अङ्ग-प्रत्यङ्ग जिस-जिस स्थानपर गिरे, वे स्थान कामनाप्रद सिद्धपीठ हो गये। तदनन्तर शंकरने सतीके अवशिष्ट अङ्गोंका संस्कार किया। अस्थियोंकी माला गूँथकर उसे अपना कण्ठभूषण बना लिया और प्रतिदिन सतीका शरीर-भस्म अपने शरीरपर लगाने लगे। इसके बाद वे निश्चेष्ट-से होकर एक वटमूलमें पड़ गये। तब लक्ष्मीपूजित भगवान् नारायण अपने पार्षदों, देवताओं और ऋषि-मुनियोंके साथ वहाँ पधारकर श्रीशंकरको गोदमें लेकर उन्हें समझाने लगे।

श्रीभगवान्ने कहा— स्वात्माराम शिव! मेरी बात सुनो और उसपर ध्यान दो। वह हितकारक, अध्यात्मज्ञानका सार, दुःख-शोकका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अध्यात्मज्ञानका विद्यमान बीज है। यद्यपि तुम स्वयं ज्ञानकी निधि, विधि, सर्वज्ञ तथा स्रष्टाओंके भी स्रष्टा हो, तथापि मैं तुम्हें ज्ञानका उपदेश दे रहा हूँ। प्राण-संकटके समय विद्वान् पुरुष विद्वान्‌को भी समझा सकता है। लोकमें यह व्यवहार है कि सब लोग सबको परस्पर समझाते-बुझाते हैं। शम्भो! महेश्वर! दुर्दिनमें दुःख, शोक और भयकी प्राप्ति होती है। जब दुर्दिन बीत जाता और सुदिन आ जाता है, तब उनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उस समय तो हर्ष और ऐश्वर्यविषयक दर्पकी ही निरन्तर वृद्धि होती है; परंतु विद्वान् पुरुष इन सबको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझते हैं। महादेव! तुम ज्ञानकी उत्पत्तिके कारण तथा सनातन हो। ज्ञान प्राप्त करो—अपने स्वरूपका स्मरण करो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम सचेत होओ—होशमें आओ। निश्चय ही तुम्हें सतीकी प्राप्ति होगी। जैसे शीतलता जलको, दाहिका शक्ति अग्निको, तेज सूर्यको तथा गन्ध पृथ्वीको कभी नहीं छोड़ती है; उसी तरह सती तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रह सकती है।

सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप ज्ञाननिधे शंकर! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। तुम परात्पर परमेश्वर हो, परंतु शोकवश अपने-आपको भूल गये हो। प्रत्येक जगत्‌में तथा जन्म-जन्ममें सुदिन और दुर्दिनका चक्र निरन्तर चला करता है। वे सुदिन और दुर्दिन ही समस्त प्राकृत प्राणियोंके लिये सुख-दुःखकी प्राप्तिके मुख्य कारण होते हैं। सुखसे हर्ष, दर्प, शौर्य, प्रमाद, राग, ऐश्वर्यकी अभिलाषा और विद्वेष निरन्तर प्रकट होते रहते