ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२९- भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन
| २२८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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बड़े दुःखके साथ वैकुण्ठमें गयीं और महालक्ष्मीमें अपने-आपको विलीन कर दिया। उस समय सम्पूर्ण देवताओंके शोककी सीमा नहीं रही। वे परम दुःखी होकर भगवान् ब्रह्माकी सभामें गये। वहाँ पहुँचकर ब्रह्माजीको आगे करके वे सब वैकुण्ठमें गये। वहाँ भगवान् नारायण विराजमान थे। अत्यन्त दैन्यभाव प्रकट करते हुए देवताओंने उनकी शरण ग्रहण की। वस्तुतः देवता बहुत दुःखी थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरिकी आज्ञा मानकर वे इन्द्रसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कलासे समुद्रकी कन्या हुईं।
देवताओं और दैत्योंने मिलकर क्षीरसागरका मन्थन किया था। उससे महालक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंने वहाँ उन्हें देखा और उनसे वर प्राप्त किया। देवता आदिको वर देकर उन प्रसन्नवदना देवीने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको वरमाला अर्पित की। नारद! उनकी कृपासे देवताओंको असुरोंके हाथमें गया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया। देवता उनकी भलीभाँति पूजा और स्तुति करके सर्वत्र निरापद हो गये।
नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! ब्रह्मनिष्ठ और तत्त्वज्ञ मुनिवर दुर्वासाने कब, क्यों और किस अपराधके कारण इन्द्रको शाप दे दिया था? देवता आदिने किस रूपसे समुद्रका मन्थन किया? किस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर देवीने इन्द्रको साक्षात् दर्शन दिये थे? प्रभो! किस प्रकार उन दोनोंका संवाद हुआ था? यह सब बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन कालकी बात है। मुनिवर दुर्वासाजी वैकुण्ठसे कैलासके शिखरपर जा रहे थे। इन्द्रने उन्हें देखा। मुनिवरका शरीर ब्रह्मतेजसे प्रदीप्त हो रहा था। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न हों। उनकी अत्यन्त स्वच्छ जटाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थीं। वे श्वेतवर्णका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे तथा उनके हाथोंमें चीर, दण्ड और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। उनके ललाटपर महान् उज्ज्वल तिलक चन्द्रमाके सदृश जान पड़ता था। वेद-वेदाङ्गके पारगामी असंख्य शिष्य उनके साथ विद्यमान थे। उन्हें देखकर इन्द्रने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके शिष्योंको भी भक्तिपूर्वक प्रसन्नताके साथ इन्द्रने संतुष्ट किया। तब शिष्योंसहित मुनिवर दुर्वासाने इन्द्रको शुभ-आशीर्वाद दिया; साथ ही भगवान् विष्णुद्वारा प्राप्त परम मनोहर पारिजात-पुष्प भी उन्हें समर्पित किये। राज्यश्रीके गर्वमें गर्वित इन्द्रने जरा, मृत्यु एवं शोकका विनाश करनेवाले तथा मोक्षदायी उस पुष्पको लेकर अपने ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। उस पुष्पका स्पर्श होते ही रूप, गुण, तेज और अवस्था—इन सबसे सम्पन्न होकर ऐरावत सहसा भगवान् विष्णुके समान हो गया। फिर तो इन्द्रको छोड़कर वह घोर वनमें चला गया। मुने! उस समय इन्द्र तेजसे युक्त उस ऐरावतपर शासन नहीं कर सके। इन्द्रने इस दिव्य पुष्पका परित्याग कर तिरस्कार किया है—यह जानकर मुनिवर दुर्वासाके रोषकी सीमा न रही। उन्होंने क्रोधमें भरकर शाप देते हुए कहा।
मुनिवर दुर्वासा बोले— अरे! राज्यश्रीके अभिमानमें प्रमत्त होकर तुम क्यों मेरा अपमान कर रहे हो? मैंने तुम्हें यह पारिजात-पुष्प दिया और तुमने गर्वके कारण स्वयं इसका उपयोग न करके हाथीके मस्तकपर रख दिया! नियम तो यह है कि श्रीविष्णुको समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जलके प्राप्त होते ही उनका उपभोग करना चाहिये। त्याग करनेसे ब्रह्महत्याके सदृश दोष लगता है। सौभाग्यवश प्राप्त हुए भगवान् विष्णुके पावन नैवेद्यका जो त्याग करता
•••• प्रकृतिखण्ड २२९
है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव-लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीविका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र ! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल, मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज ! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।
मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये। भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।
इन्द्रने कहा- प्रभो ! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है। धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता।* जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती।
* ऐश्वर्यं विपदां बीजं प्रच्छन्नज्ञानकारणम्। मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवाय कम् ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखाङ्कुरं परम्। सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ४८-४९)
२३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं - राजस और बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष)- मार्गका साक्षात्कार
तामस । जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण
कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस । मुनिश्रेष्ठ ! शास्त्र जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है।
दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं - एक प्रवृत्ति - बीज जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन
और दूसरा निवृत्ति-बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह
है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन
सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार
स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात- करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके
मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार
जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ
जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है।
परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें क्रमशः दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे
भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे जीवधारियोंको स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि
मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक
सैकड़ों और सहस्रों पुरुषोंमें कोई विरला ही मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन
साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है।
है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या
दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके
तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती चरणोंमें समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म
है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषोंके
उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है।
और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके
यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा
(बृहस्पति) - जी के मुखसे सुनी है। अब विधाताने नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक
इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य
किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप
वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो ! मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं
दयानिधे ! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं।
सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन,
कर दे। वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका
इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका
सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और जप - यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके
अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है,
देने लगे। जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका
मुनि बोले- अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा-प्रसादसे सर्वत्र