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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

५३- शुभ लग्नमें यात्रासम्बन्धी मङ्गलकृत्य करके श्रीकृष्णका मथुरापुरीको प्रस्थान, पुरीकी शोभाका वर्णन, कुब्जापर कृपा, मालीको वरदान, धोबीका उद्धार, कुब्जाका गोलोकगमन, कंसका दुःस्वप्न, रङ्गभूमिमें कंसका पधारना, धनुर्भङ्ग, हाथीका वध, कंसका उद्धार, उग्रसेनको राज्यदान, माता-पिताके बन्धन काटना, वसुदेवजीद्वारा नन्द आदिका सत्कार और ब्राह्मणोंको दान

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५५
मुझको छुट्टी दे दो। तुम मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री
देवी हो। तुममें ही मेरे प्राण बसते हैं। प्रिये !
प्राणी अपने प्राणोंको छोड़कर कहाँ ठहर सकता
है ? तुममें ही सदा मेरा मन लगा रहता है, तुमसे
बढ़कर प्यारी मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है।
केवल तुम्हीं मुझे शंकरसे अधिक प्रिय हो। यह
सत्य है शंकर मेरे प्राण हैं; परंतु सती राधे ! तुम
तो प्राणोंसे भी बढ़कर हो।
यों कहकर भगवान् वहाँसे जानेको उद्यत
हुए। वे सर्वज्ञ और सब कुछ सिद्ध करनेवाले हैं।
सबके आत्मा, पालक और उपकारक हैं। उन्होंने
अक्रूरका आगमन जानकर ब्रजमें जानेका विचार
किया। श्रीकृष्णका मन बँट गया है; वे अन्यत्र
जानेको उत्सुक हैं; यह देख राधिका देवी
व्यथित-हृदयसे बोलीं।
राधिकाने कहा- हे नाथ ! हे रमणश्रेष्ठ !
प्रिय लगनेवाले मेरे समस्त सम्बन्धियोंमें तुम्हीं
श्रेष्ठ हो। प्राणनाथ ! मैं देखती हूँ, इस समय
तुम्हारा मन बँटा हुआ है। तुम्हारे चले जानेपर
मेरा प्रेम और सौभाग्य सब कुछ लुट जायगा।
मुझे शोकके गहरे समुद्रमें डालकर तुम कहाँ चले
जा रहे हो ? मैं विरहसे व्याकुल हूँ, दीन हूँ और
तुम्हारी ही शरणमें आयी हूँ। अब मैं फिर घरको
नहीं लौटूँगी; दूसरे वनमें चली जाऊँगी और
दिन-रात 'कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !' का गान करती
रहूँगी अथवा किसी वनमें भी नहीं जाऊँगी,
प्रेमके समुद्रमें प्रवेश करूँगी और मनमें केवल
तुम्हारी कामना लेकर शरीरको त्याग दूँगी। जैसे
आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य सदा साथ
रहते हैं; उसी तरह तुम मेरे आँचलमें बँधकर
सदा पास ही रहते और साथ-साथ घूमते हो;
किंतु दीनवत्सल ! इस समय तुम मुझे निराश करके
जा रहे हो ! मुझ दीन एवं शरणागत अबलाको
त्याग देना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। ब्रह्मा,
विष्णु तथा शिव आदि देवता जिनके चरणकमलोंका
ध्यान करते हैं; वे परमात्मा तुम हो। तुमने मायासे
गोपवेष धारण कर रखा है। मैं ईर्ष्यालु नारी तुम्हें
कैसे जान सकती हूँ? देव ! मैंने तुम्हें पति
समझकर अथवा अभिमानके कारण तुम्हारे प्रति
जो दुर्नीतिपूर्ण बर्ताव तथा सहस्रों अपराध किये
हैं; उन्हें क्षमा कर दो। मेरा गर्व चूर्ण हो गया और
मेरे सारे मनसूबे दूर चले गये। अपने सौभाग्यको
आज मैं अच्छी तरह समझ चुकी हूँ। नाथ ! इसके
सिवा, तुमसे और क्या कह सकती हूँ? गर्गके
मुखसे तुम्हारे विषयमें सुनकर, जानकर भी मैं
तुम्हारी मायासे मोहित हो गयी। इस समय
प्रेमातिरेक अथवा भक्तिपाशसे बँधकर मैं तुमसे
कुछ कह नहीं सकती। प्राणवल्लभ ! प्रभो ! तुम्हारे
बिना मुझे एक-एक क्षण सौ युगोंके समान जान
पड़ता है; फिर सौ वर्षोंतक मैं किस तरह जीवन
धारण कर सकूँगी ?
मुने ! ऐसा कहकर राधिका भूमिपर गिर
पड़ीं और सहसा मूर्च्छित हो चेतना खो बैठीं।
उन्हें मूर्च्छित देख कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक
सचेत किया और हृदयसे लगा लिया। फिर
शोकहारी योगोंद्वारा उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया
तथापि शुचिस्मिता श्रीराधा शोकको त्याग न
सकीं। सामान्य वस्तुका बिछोह भी मनुष्योंके
लिये शोकप्रद हो जाता है, फिर जहाँ देह और
आत्माका बिछोह होता हो, वहाँ सुख कैसे हो
सकता है? उस दिन व्रजराज श्यामसुन्दर ब्रजमें
नहीं लौट सके। श्रीराधाके साथ क्रीड़ा-सरोवरके
तटपर गये। वहाँ उनके साथ भगवान्ने पुनः
रास-क्रीड़ा की। तदनन्तर आनन्दमग्ना राधिकाजी
सो गयीं।
इसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी शिव, शेष
आदि देवताओं तथा मुनीन्द्रोंके साथ वहाँ आये।
आकर उन्होंने धरतीपर माथा टेक प्रणाम किया
और हाथ जोड़ वे उन परिपूर्णतम परमेश्वरका
सामवेदोक्त स्तोत्रसे स्तवन करने लगे।

६५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

**ब्रह्माजी बोले—**जगदीश्वर ! आपकी जय हो, जय हो। आपके चरणोंकी सभी वन्दना करते हैं। आप निर्गुण, निराकार और स्वेच्छामय हैं। सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं और वह श्रीविग्रह नित्य है। मायासे गोपवेष धारण करनेवाले मायापते ! आपकी वेश-भूषा तथा शील-स्वभाव सभी सुन्दर एवं मनोहर हैं। आप शान्त तथा सबके प्राणवल्लभ हैं। स्वभावतः इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं। नितान्त ज्ञानानन्दस्वरूप, परात्परतर, प्रकृतिसे परे, सबके अन्तरात्मा, निर्लिप्त, साक्षिस्वरूप, व्यक्ताव्यक्तरूप, निरञ्जन, भूतलका भार उतारनेवाले, करुणासागर, शोक-संतापनाशन, जरा-मृत्यु और भय आदिको हर लेनेवाले, शरणागतरक्षक, भक्तोंपर दया करनेके लिये व्याकुल रहनेवाले, भक्तवत्सल, भक्तोंके संचित धन तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। सबके अधिष्ठाता देवता तथा प्रीति प्रदान करनेवाले प्रभुको सादर नमस्कार है।

इस तरह बारंबार कहते हुए ब्रह्माजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। जो ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रको एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंकी सिद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है।

इस प्रकार स्तुति और बारंबार प्रणाम करके जगद्विधाता ब्रह्माजी सचेत हो धीरे-धीरे उठे और पुनः भक्तिभावसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**देवदेवेश्वर ! उठिये। परमानन्दकारण ! सानन्द, नित्यानन्दमय नन्दनन्दन ! आपको नमस्कार है। नाथ ! नन्दभवनमें पधारिये और वृन्दावनको छोड़िये। सौ वर्षोंके लिये जो सुदामका शाप प्राप्त हुआ है, उसको स्मरण कीजिये। भक्तके शापको सफल बनानेके लिये प्रियाजीको उतने समयके लिये त्याग दीजिये। फिर इन्हें पाकर आप गोलोकमें पधारियेगा। देव ! आप पिताके घर जाकर वहाँ आये हुए अक्रूरजीसे मिलिये। वे आपके पितृव्य (चाचा), माननीय अतिथि तथा धन्यवादके योग्य सर्वसमर्थ वैष्णव हैं। भगवन् ! अब उनके साथ मधुपुरीकी यात्रा कीजिये। हरे ! वहाँ शिवके धनुषको तोड़िये और शत्रुगणोंको हतोत्साह कीजिये—मार भगाइये। दुरात्मा कंसका वध कीजिये और पिता-माताको सान्त्वना दीजिये। द्वारकापुरीका निर्माण कीजिये, भूतलका भार उतारिये, भगवान् शंकरकी वाराणसीपुरीको दग्ध कीजिये और इन्द्रके भवनपर भी धावा बोलिये। युद्धमें शिवजीको जृम्भास्त्रसे जृम्भित करके बाणासुरकी भुजाओंको काटिये। नाथ! इससे पहले आपको रुक्मिणीका हरण, नरकासुरका वध तथा सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करना है। व्रजेश्वर ! अब इन प्राणतुल्या प्रियतमाको छोड़िये और व्रजमें चलिये। उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। जबतक राधाकी नींद नहीं टूटती है; तभीतक चल दीजिये।

इतना कहकर ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको चले गये। साथ ही शेषनाग तथा शंकरजी भी अपने स्थानको पधारे। देवताओंने श्रीकृष्णके ऊपर प्रेम और भक्तिसे पुष्प और चन्दनकी वर्षा की। फिर आकाशवाणी हुई—‘प्रभो ! कंस वधके योग्य है; अतः उसका वध कीजिये; अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाइये और पृथ्वीके भारका निवारण कीजिये।’ नारद ! इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाको छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे उठे। बारंबार पीछेकी ओर देखते हुए श्रीहरि कुछ दूरतक गये; फिर चन्दनवनमें वासस्थानके पास ही थोड़ी देरके लिये ठहर गये। उधर राधा निद्रा त्यागकर अपनी शय्यासे उठ बैठीं और शान्त, कान्त, प्राणवल्लभ श्रीहरिको वहाँ न देख विलाप करती हुई बोलीं—‘हा नाथ! हा रमणश्रेष्ठ ! हा प्राणेश्वर !