ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७९- नन्दद्वारा इन्द्रयज्ञकी तैयारी देखकर श्रीकृष्णका विस्मित होकर उनसे पूजनके स्वरूप आदिके विषयमें प्रश्न करना
| ५२० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वचन सुनकर नारदजी हर्षविभोर हो गये। उन्होंने समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले उन महर्षिसे अपना संदेह इस प्रकार पूछा।
नारदजी बोले— जगद्गुरो! अपने पहलेके उत्तम भवनको छोड़कर कालिय यमुनातटको क्यों चला गया था? इसका रहस्य मुझे बताइये।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— नारद! सुनो। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे मैंने सूर्यग्रहणके समय मलयाचलपर सुप्रभा नदीके पश्चिम किनारे श्रीकृष्ण-कथाके प्रसङ्गमें पिता धर्मके मुखसे सुना था। पुलहने धर्मसे अपना संदेह पूछा था, तब कृपानिधान धर्मने मुनियोंकी सभामें इस आश्चर्यमय आख्यानको सुनाया था। नारद! वहीं मैंने इसे सुना था, अतः कहता हूँ, सुनो।
भगवान् शेषकी आज्ञासे नागगण प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको भयके कारण गरुड़देवकी पूजा करते हैं। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विविध उपहार-सामग्री अर्पित करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी आराधना करते हैं। महातीर्थ पुष्करमें भक्तिपूर्वक भलीभाँति स्नान करके कालियने अहंकारवश उक्त तिथिको गरुड़की पूजा नहीं की। नागोंद्वारा जो पूजाकी सामग्री एकत्र की गयी थी, उसे कालियनाग बलपूर्वक खानेको उद्यत हो गया। तब सभी नाग उस मदमत्त कालियको रोकने तथा उसे नीतिकी बात बताने लगे। जब किसी तरह भी वे कालियको रोकनेमें समर्थ न हो सके, तब सहसा वहाँ पक्षिराज गरुड़ प्रकट हो गये। मुने! गरुड़को आया देख नागगण कालियके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये जबतक सूर्योदय नहीं हुआ, तबतक पूरी शक्ति लगाकर उनके साथ युद्ध करते रहे। अन्तमें पक्षिराजके तेजसे उद्विग्न हो वे सब-के-सब भाग खड़े हुए और सबके अभयदाता भगवान् अनन्तकी शरणमें गये। नागोंको भागते देख करुणानिधान कालिय वहाँ निःशङ्कभावसे खड़ा रहा। उसने गरुड़की ओर देखा और श्रीहरिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके गरुड़के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। एक मुहूर्ततक उन दोनोंमें अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें गरुड़के तेजसे नागराज कालियको पराजित होना पड़ा। फिर तो वह भागा और यमुनाजीके उसी कुण्डमें चला गया, जहाँ सौभरिके शापसे पक्षिराज गरुड़ नहीं जा सकते थे। गरुड़के भयसे नाग वहीं रहने लगा। पीछेसे उसके परिवारके लोग भी वहीं चले गये।
नारदजीने पूछा— भगवन्! गरुड़को सौभरिका शाप कैसे प्राप्त हुआ? परमेश्वरके वाहन होकर भी गरुड़ उस ह्रदमें क्यों नहीं जा सकते थे?
भगवान् श्रीनारायण बोले— उस कुण्डमें सौभरि मुनि एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके महासिद्ध हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते थे। उन ध्यानपरायण मुनिके समीप पक्षिराज गरुड़ यमुनाजीके जलमें तथा किनारे भी अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निःशङ्क विचरा करते थे। वे अपनी उत्कृष्ट इच्छासे प्रेरित हो बहुधा पूँछ (अथवा पंख) ऊपरको उठाकर मुनिके अगल-बगलमें उनकी सानन्द परिक्रमा करते हुए जाते-आते थे। एक दिन उन्होंने परिवारसहित विशालकाय मीनको देखा। देखते-ही-देखते गरुड़ने मुनीन्द्रके निकटसे ही उस मीनको चोंचसे पकड़ लिया। मछलीको मुँहमें दबाये जाते हुए गरुड़को मुनिने रोषभरी दृष्टिसे देखा। मुनिकी उस दृष्टिसे गरुड़ काँप उठे और वह महामत्स्य उनकी चोंचसे छूटकर पानीमें गिर पड़ा। गरुड़के डरसे वह मीन मुनिके पास ठहर गया—उनके शरणागत हो गया। जब गरुड़ पुनः उसे लेनेको उद्यत हुए, तब मुनीन्द्रने उनसे कहा।
सौभरि बोले— पक्षिराज! मेरे पाससे दूर हटो, दूर हटो। मेरे सामनेसे इस विशाल जीवको पकड़ लेनेकी तुममें क्या योग्यता है? तुम
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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अपनेको श्रीकृष्णका वाहन समझकर बहुत बड़ा मानते हो। श्रीकृष्ण तुम्हारे-जैसे करोड़ों वाहन रच लेनेकी शक्ति रखते हैं। मैं अपनी भौंहें टेढ़ी करनेमात्रसे तुम्हें शीघ्र और अनायास ही भस्म कर सकता हूँ। तुम परमेश्वरके वाहन हो तो क्या हुआ? हमलोग तुम्हारे दास नहीं हैं। पक्षिराज! यदि आजसे कभी भी मेरे इस कुण्डमें आओगे तो मेरे शापसे तत्काल भस्म हो जाओगे। यह ध्रुव सत्य है।
मुनीन्द्रकी बात सुनकर पक्षिराज विचलित हो गये। वे श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण करते-करते उन्हें प्रणाम करके चल दिये। विप्रवर नारद! तबसे अबतक सदा ही उस कुण्डका नाम सुननेमात्रसे पक्षिराजको कँपकँपी आ जाती है। यह इतिहास, जो धर्मके मुखसे सुना गया था, तुमसे कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, श्रीहरिके उस श्रवणसुखद, रहस्ययुक्त तथा मङ्गलमय लीलाचरित्रको सुनो।
श्रीकृष्ण बहुत देरतक यमुना-जलसे ऊपर नहीं उठे। यह जानकर ग्वालबाल दुःखी हो गये। वे मोहवश यमुनाके तटपर रोने लगे। कुछ बालक शोकसे व्याकुल हो अपनी छाती पीटने लगे। कोई श्रीहरिके बिना पृथ्वीपर पछाड़ खाकर गिरे और मूर्च्छित हो गये। कितने ही बालक श्रीकृष्णविरहसे व्यथित हो कालियदहमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गये और कुछ ग्वालबाल उनको उसमें जानेसे रोकने लगे। कोई-कोई विलाप करके प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गये और उनमें जो समझदार थे, ऐसे कुछ बालक उन मरणोन्मुख बालकोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। कोई 'हाय-हाय' कहकर रोने-बिलखने लगे। कोई 'कृष्ण-कृष्ण' की रट लगाने लगे और कोई इस समाचारको बतानेके लिये नन्दरायजीके समीप दौड़े गये। कुछ बालक वहाँ शोक, भय और मोहसे आतुर हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—'हम क्या करें? हमारे श्रीहरि कहाँ चले गये? हे नन्दनन्दन! हे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम श्रीकृष्ण! हे बन्धो! हमें दर्शन दो। हमारे प्राण निकले जा रहे हैं।'
इसी बीचमें कुछ बालक नन्दरायजीके निकट जा पहुँचे। वे अत्यन्त चञ्चल थे और शोकसे व्याकुल होकर रो रहे थे। उन्होंने शीघ्र ही यशोदाको, उनके पास बैठे हुए बलरामको तथा अन्यान्य गोपों और लाल कमलके समान नेत्रोंवाली गोपाङ्गनाओंको यह समाचार बताया। यह समाचार सुनकर वे सब-के-सब शोकसे व्याकुल हो दौड़ते हुए यमुनातटपर जा पहुँचे और बालकोंके साथ रोने लगे। सारे व्रजवासी एकत्र हो रोते-रोते शोकसे मूर्च्छित हो गये। माता यशोदा कालियदहमें प्रवेश करने लगीं। यह देख कुछ लोगोंने उन्हें रोका। गोप और गोपियाँ शोकसे अपने ही अङ्गोंको पीटने लगीं। कुछ लोग विलाप करने लगे और कितने ही व्रजवासी अपनी सुध-बुध खो बैठे। राधा भी यमुनाजीके उस कुण्डमें घुसने लगीं। यह देख कुछ स्त्रियोंने दौड़कर उन्हें रोका। वे शोकसे मूर्च्छित हो गयीं और उस नदीके तटपर मरी हुईके समान पड़
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गयीं। नन्दरायजी अत्यन्त विलाप करके बार-
बार मूर्च्छित होने लगे। वे चेत होनेपर पुनः रोते
तथा रो-रोकर फिर मूर्च्छित हो जाते थे। उस
समय ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने अत्यन्त विलाप
करते हुए नन्दको, शोकसे कातर हुई यशोदाको,
गोपों और गोपाङ्गनाओंको, अत्यन्त मूर्च्छित राधिकाको,
रोते हुए समस्त बालकोंको तथा शोकग्रस्त हुई
सम्पूर्ण गोप-बालिकाओंको धीरज बँधाते हुए
समझना आरम्भ किया।
श्रीबलदेव बोले-हे गोपो ! गोपियो ! और
बालको ! सब लोग मेरी बात सुनो। हे नन्दबाबा !
ज्ञानिशिरोमणि गर्गजीकी बातोंको याद करो। जो
जगत्का भार उठानेवाले शेषके भी आधारभूत
हैं, संहारकारी शंकरके भी संहारक हैं तथा
विधाताके भी विधाता हैं; उनकी इस भूतलपर
किससे पराजय हो सकती है? श्रीकृष्ण अणुसे
भी अणु तथा परम महान् हैं। वे स्थूलसे भी
स्थूल तथा परात्पर हैं। उनकी सत्ता सदा और
सर्वत्र विद्यमान है; तथापि वे किसीके दृष्टिपथमें
नहीं आते। वे ही योगियोंके भी सम्यक् योग हैं।
श्रुतियोंने स्पष्ट कहा है कि सम्पूर्ण दिशाएँ
कभी एकत्र नहीं हो सकतीं, आकाशको कोई
छू नहीं सकता तथा सर्वेश्वरको कोई बाधा नहीं
पहुँच सकता। श्रीकृष्ण सबके आत्मा हैं। आत्मा
किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। उसे अस्त्रोंका
निशाना नहीं बनाया जा सकता। वह न तो वधके
योग्य है और न दृश्य ही है। उसे आग नहीं
जला सकती और न उसकी हिंसा ही की जा
सकती है। अध्यात्मतत्त्वके विज्ञाता विद्वानोंने
आत्माको ऐसा ही जाना और माना है। इन
श्रीकृष्णका विग्रह भक्तोंके ध्यानके लिये ही है।
ये ज्योतिःस्वरूप और सर्वव्यापी हैं। इन परमात्माका
आदि, मध्य और अन्त नहीं है। जब सारा
ब्रह्माण्ड एकार्णवके जलमें मग्न हो जाता है तब
ये श्रीकृष्ण जलमें शयन करते हैं। उस समय
इनकी नाभिसे जो कमल पैदा होता है, उसीसे
ब्रह्माजीका प्राकट्य होता है। जिन्हें एकार्णवके
जलमें भी भय नहीं है, उन्हीं परमेश्वरके लिये
इस कालियदहमें विपत्तिकी सम्भावना कितना
महान् अज्ञान है ? पिताजी ! यदि एक मच्छर सारे
ब्रह्माण्डको निगल जानेमें समर्थ हो जाय तो भी
उन ब्रह्माण्डनायकको वह सर्प अपना ग्रास नहीं
बना सकता। यह मैंने परम उत्तम सम्पूर्ण
आध्यात्मिक ज्ञानकी बात कही है। यह गूढ़ ज्ञान
योगियोंके लिये सार वस्तु है। इससे समस्त
संशयोंका उच्छेद हो जाता है।
बलदेवजीकी बात सुनकर और गर्गजीके
वचनोंको याद करके नन्दजीने शोक त्याग
दिया। व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका भी शोक
जाता रहा। सबने बलदेवजीके इस प्रबोधनको
मान लिया; परंतु यशोदा और राधिकाको इससे
संतोष न हुआ। प्रियजनके विरहके विषयमें
मन किसी प्रकारके प्रबोधको नहीं ग्रहण करता-
जबतक प्रियजनका मिलन न हो जाय, तबतक
केवल समझाने-बुझानेसे मनको शान्ति नहीं मिल
सकती।
मुने ! इसी समय व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंने