ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५३- राजा कार्तवीर्यद्वारा—'युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ समर्पित कीजिये' कहनेपर जमदग्निमुनिका उसे घर लौटने और सनातन धर्मकी रक्षा करनेके लिये निर्देश देना
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पुण्यदायक शुभ भारतवर्षमें एक वर्षतक निराहार
रहकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके हेतु उन्होंने लक्ष्मीपतिकी
सेवा की। तब श्रीहरिने प्रकट होकर इन्द्रको
मनोवाञ्छित वर तथा लक्ष्मीका स्तोत्र, कवच और
ऐश्वर्यवर्धक मन्त्र प्रदान किया। मुने! यह सब
देकर श्रीहरि तो वैकुण्ठको चले गये और इन्द्र
क्षीरसागरपर पहुँचे। वहाँ उन्होंने कवच धारणकर
स्तोत्रद्वारा स्तवन करके लक्ष्मीको प्राप्त किया।
तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने शत्रुको जीतकर अमरावतीको
अपने अधिकारमें कर लिया। इसी प्रकार सभी
देवता एक-एक करके अपने इच्छित स्थानको
प्राप्त हुए।
(अध्याय २०-२१)
श्रीहरिका इन्द्रको लक्ष्मी-कवच तथा लक्ष्मी-स्तोत्र प्रदान करना
नारदजीने पूछा-तपोधन ! लक्ष्मीपति श्रीहरिने
प्रकट होकर इन्द्रको महालक्ष्मीका कौन-सा स्तोत्र
और कवच प्रदान किया था, वह मुझे बतलाइये।
नारायणने कहा-नारद ! जब पुष्करमें
तपस्या करके देवराज इन्द्र शान्त हुए, तब उनके
क्लेशको देखकर स्वयं श्रीहरि वहीं प्रकट हुए।
उन हृषीकेशने इन्द्रसे कहा- 'तुम अपने इच्छानुसार
वर माँग लो।' तब इन्द्रने लक्ष्मीको ही वररूपसे
वरण किया और श्रीहरिने हर्षपूर्वक उन्हें दे
दिया। वर देनेके पश्चात् हृषीकेशने जो हितकारक,
सत्य, साररूप और परिणाममें सुखदायक था,
ऐसा वचन कहना आरम्भ किया।
श्रीमधुसूदन बोले- इन्द्र ! (लक्ष्मी-प्राप्तिके
लिये) तुम लक्ष्मी-कवच ग्रहण करो। यह समस्त
दुःखोंका विनाशक, परम ऐश्वर्यका उत्पादक और
सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। पूर्वकालमें
जब सारा संसार जलमग्न हो गया था, उस समय
मैंने इसे ब्रह्माको दिया था। जिसे धारण करके
ब्रह्मा त्रिलोकीमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न
हो गये थे। इसीके धारणसे सभी मनुलोग सम्पूर्ण
ऐश्वर्योंके भागी हुए थे। देवराज ! इस सर्वैश्वर्यप्रद
कवचके ब्रह्मा ऋषि हैं, पङ्क्ति छन्द है, स्वयं
पद्मालया लक्ष्मी देवी हैं और सिद्धैश्वर्यके जपोंमें
इसका विनियोग कहा गया है। इस कवचके
धारण करनेसे लोग सर्वत्र विजयी होते हैं। पद्मा
मेरे मस्तककी रक्षा करें। हरिप्रिया कण्ठकी रक्षा
करें। लक्ष्मी नासिकाकी रक्षा करें। कमला
नेत्रकी रक्षा करें। केशवकान्ता केशोंकी, कमलालया
कपालकी, जगज्जननी दोनों कपोलोंकी और
सम्पत्प्रदा सदा स्कन्धकी रक्षा करें। 'ॐ श्रीं
कमलवासिन्यै स्वाहा' मेरे पृष्ठभागका सदा पालन
करे ! 'ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा' वक्षःस्थलको
सदा सुरक्षित रखे। श्री देवीको नमस्कार है, वे
मेरे कङ्काल तथा दोनों भुजाओंको बचावें। 'ॐ
ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः' चिरकालतक निरन्तर मेरे
पैरोंका पालन करे। 'ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै
स्वाहा' नितम्बभागकी रक्षा करे। 'ॐ श्रीं
महालक्ष्म्यै स्वाहा' मेरे सर्वाङ्गकी सदा रक्षा करे।
'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा' सब ओरसे
सदा मेरा पालन करे। वत्स ! इस प्रकार मैंने
तुमसे इस सर्वैश्वर्यप्रद नामक परमोत्कृष्ट कवचका
वर्णन कर दिया। यह परम अद्भुत कवच सम्पूर्ण
सम्पत्तियोंको देनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक
गुरुकी अर्चना करके इस कवचको गलेमें अथवा
दाहिनी भुजापर धारण करता है, वह सबको
जीतनेवाला हो जाता है। महालक्ष्मी कभी उसके
घरका त्याग नहीं करतीं; बल्कि प्रत्येक जन्ममें
छायाकी भाँति सदा उसके साथ लगी रहती हैं।
जो मन्दबुद्धि इस कवचको बिना जाने ही
लक्ष्मीकी भक्ति करता है, उसे एक करोड़ जप
... गणपतिखण्ड ३५७
करनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता*।
नारायण कहते हैं— महामुने! यों जगदीश्वर
श्रीहरिने प्रसन्न हो इन्द्रको यह कवच देनेके
पश्चात् पुनः जगत्की हित-कामनासे कृपापूर्वक
उन्हें 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमो महालक्ष्म्यै हरिप्रियायै
स्वाहा' यह षोडशाक्षर-मन्त्र भी प्रदान किया।
फिर जो गोपनीय, परम दुर्लभ, सिद्धों और
मुनिवरोंद्वारा दुष्प्राप्य और निश्चितरूपसे सिद्धिप्रद
है, वह सामवेदोक्त शुभ ध्यान भी बतलाया।
(वह ध्यान इस प्रकार है—) जिनके शरीरकी
आभा श्वेत चम्पाके पुष्पके सदृश तथा कान्ति
सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान है, जो अग्निमें तपाकर
शुद्ध की हुई साड़ीको धारण किये हुए तथा
रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिनके प्रसन्न
मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो
भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली, स्वस्थ और अत्यन्त
मनोहर हैं, सहस्रदल-कमल जिनका आसन है,
जो परम शान्त तथा श्रीहरिकी प्रियतमा पत्नी हैं,
उन जगज्जननीका भजन करना चाहिये। देवेन्द्र!
इस प्रकारके ध्यानसे जब तुम मनोहारिणी लक्ष्मीका
ध्यान करके भक्तिपूर्वक उन्हें षोडशोपचार समर्पित
करोगे और आगे कहे जानेवाले स्तोत्रसे उनकी
स्तुति करके सिर झुकाओगे, तब उनसे वरदान
पाकर तुम दुःखसे मुक्त हो जाओगे। देवराज!
महालक्ष्मीका वह सुखप्रद स्तोत्र, जो परम गोपनीय
तथा त्रिलोकीमें दुर्लभ है, बतलाता हूँ। सुनो।
नारायण कहते हैं—देवि! जिनका स्तवन
करनेमें बड़े-बड़े देवेश्वर समर्थ नहीं हैं, उन्हीं
आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। आप बुद्धिके
परे, सूक्ष्म, तेजोरूपा, सनातनी और अत्यन्त
अनिर्वचनीया हैं। फिर आपका वर्णन कौन कर
सकता है? जगदम्बिके ! आप स्वेच्छामयी, निराकार,
भक्तोंके लिये मूर्तिमान् अनुग्रहस्वरूप और मन-
वाणीसे परे हैं; तब मैं आपकी क्या स्तुति करूँ।
आप चारों वेदोंसे परे, भवसागरको पार करनेके
लिये उपायस्वरूप, सम्पूर्ण अन्नों तथा सारी
सम्पदाओंकी अधिदेवी हैं और योगियों-योगों,
ज्ञानियों-ज्ञानों, वेदों-वेदवेत्ताओंकी जननी हैं;
फिर मैं आपका क्या वर्णन कर सकता हूँ!
जिनके बिना सारा जगत् निश्चय ही उसी प्रकार
- श्रीमधुसूदन उवाच-
गृहाण कवचं शक्र सर्वदुःखविनाशनम्। परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनम् ॥
ब्रह्मणे च पुरा दत्तं संसारे च जलप्लुते । यद् धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः ॥
बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुता यतः । सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधिः ॥
पङ्क्तिश्छन्दश्च सा देवी स्वयं पद्मालया सुर। सिद्धैश्वर्यजपेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तितः ।
यद् धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत् ॥
मस्तकं पातु मे पद्मा कण्ठं पातु हरिप्रिया । नासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम् ॥
केशान् केशवकान्ता च कपालं कमलालया। जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं स्कन्धं सम्प्रदा सदा ॥
ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु।
पातु श्रीमर्म कङ्कालं बाहुयुग्मं च ते नमः ॥
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे सततं चिरम् । ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम् ॥
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वाङ्गं पातु मे सदा । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ॥
इति ते कथितं वत्स सर्वसम्पत्करं परम् । सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स सर्वविजयी भवेत् ॥
महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन । तस्य छायेव सततं सा च जन्मनि जन्मनि ॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेल्लक्ष्मीः सुमन्दधीः । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥
( २२।५–१७)