ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६८- राधा-उद्धव-संवाद
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१३
विप्रेन्द्र! श्रीकृष्णका वचन सुनकर नन्दने इस स्तोत्रद्वारा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्रदान करनेवाली पार्वतीका स्तवन किया। मुने! तब दुर्गाने उन्हें गोलोक-वासरूप अभीष्ट वर प्रदान किया। साथ ही जो वेदमें भी नहीं सुना गया है, वह परम दुर्लभ ज्ञान, गोकुलकी राजाधिराजता और परम दुर्लभ श्रीकृष्ण-भक्ति भी दी। इसके अतिरिक्त नन्दको श्रीकृष्णकी दासता, महत्ता और सिद्धता भी प्राप्त हुई। इस प्रकार वरदान देकर और शम्भुके साथ वार्तालाप करके दुर्गाजी अदृश्य हो गयीं। तब देवता और मुनिगण भी नन्दनन्दनकी स्तुति करके अपने-अपने स्थानको चले गये।
[तत्पश्चात् नन्दसे श्रीकृष्णने कहा—] 'नन्दजी! अब आप दुर्लभ ज्ञानसे संयुक्त होनेके कारण मोहका त्याग करके प्रसन्नमनसे ब्रजवासियोंसहित ब्रजको लौट जाइये। ब्रजराज! जाइये, जाइये, घर जाइये, ब्रजको पधारिये। अब आपको सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान हो गया। आपने मुनियों तथा देवताओंके दर्शन कर लिये और मेरे द्वारा अत्यन्त दुर्लभ नाना प्रकारके इतिहास, धनवर्धक आख्यान और जन्म एवं पापका विनाश करनेवाला दुर्गाका स्तोत्रराज भी सुन लिया। जो कुछ सामने उपस्थित था, उसका मैंने आपसे हर्ष और सुखपूर्वक वर्णन कर दिया। मैंने बाल-चपलतावश जो कुछ अपराध किया हो, उसे क्षमा कीजिये। तात! जो सुख मैंने माता-पिताके राजमहलमें नहीं किया, उससे बढ़कर तथा स्वर्गसे भी परम दुर्लभ सुख आपके यहाँ किया है। मेरे प्रिय वचन, नम्रता, विनय, भय, बहुसंख्यक परिहास, यशोदा, गोपिकागण, बालसमूह और विशेषतया राधा—ये सभी एकत्र स्थित हैं। उन बन्धुवर्गोंके साथ कर्मानुसार यहीं सुख भोगकर उत्तम गोलोकको जाओ। तात! यशोदा, रोहिणी, गोपिकागण, गोपबालक, वृषभानु, गोपसमूह, राधाकी माता कलावती और राधाके साथ आप पार्थिव देहको त्यागकर और दिव्य देह धारण करके गोलोक जायँगे। राधा और राधाकी माता कलावतीकी उत्पत्ति योनिसे नहीं हुई है; अतः वह निश्चय ही अपने उसी नित्यदेहसे गोलोकमें जायगी। कलावती पितरोंकी मानसी कन्या है; अतः धन्य और माननीय है। इसी प्रकार सीतामाता, दुर्गामाता, मेनका, दुर्गा, तारा और सुन्दरी सीता—ये सभी अयोनिजा तथा धन्य हैं। वे तथा मेना और कलावती योनिसे न उत्पन्न होनेके कारण धन्यवादकी पात्र हैं। तात! इस प्रकार मैंने परम दुर्लभ गोपनीय आख्यानका वर्णन कर दिया तथा मैंने और दुर्गाने आपको यह वरदान भी दे दिया।' श्रीकृष्णका वचन सुनकर श्रीकृष्णभक्त व्रजेश्वर उन भक्तवत्सल जगदीश्वरसे पुनः बोले।
नन्दने कहा—प्रभो! श्रीकृष्ण! चारों युगोंके जो-जो सनातन धर्म होते हैं, उनका तथा कलियुगकी समाप्तिमें कलिके जो-जो गुण-दोष होते हों और पृथ्वी, धर्म तथा प्राणियोंकी क्या गति होती है—इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। नन्दकी बात सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, फिर उन्होंने मधुरताभरी विचित्र कथा कहना आरम्भ किया।
(अध्याय ८८-८९)
श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह
श्रीकृष्णने कहा—नन्दजी! पुराणोंमें जैसी अत्यन्त मधुर रमणीय कथा कही गयी है, उसे कहता हूँ। आप प्रसन्नमन होकर उसे श्रवण करें। सत्ययुगमें धर्म, सत्य और दया—ये अपने सभी
७९४
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
अङ्गोंसे परिपूर्ण थे। प्रजा धार्मिक थी। चारों वेदों,
वेदाङ्गों, विविध इतिहासों तथा संहिताओंका रूप
अत्यन्त प्रकाशमान था। पाँचों रमणीय पञ्चरात्र
तथा जितने पुराण और धर्मशास्त्र हैं, सभी रुचिर
एवं मङ्गलकारक थे। सभी ब्राह्मण वेदवेत्ता,
पुण्यवान् और तपस्वी थे, वे नारायणमें मनको
तल्लीन करके उन्हींका ध्यान और जप करते थे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—चारों वर्ण विष्णुभक्त
थे। शूद्र सत्यधर्ममें तत्पर तथा ब्राह्मणोंके सेवक
थे। राजा लोग धार्मिक तथा प्रजाओंके पालनमें
तत्पर रहते थे। वे प्रजाओंकी आयका केवल
सोलहवाँ भाग कर-रूपमें ग्रहण करते थे। ब्राह्मणोंसे
कर नहीं लिया जाता था, वे पूज्य और
स्वच्छन्दगामी थे। पृथ्वी सदा सभी अन्नोंसे
सम्पन्न तथा रत्नोंकी भण्डार थी। शिष्य गुरुभक्त,
पुत्र पितृभक्त और नारियाँ पतिभक्ता तथा
पतिव्रतपरायणा थीं। सभी लोग ऋतुकालमें अपनी
पत्नीके साथ सम्भोग करते थे। वे न तो स्त्रीके
लोभी थे और न लम्पट थे। सत्ययुगमें न तो
परायी स्त्रीसे मैथुन करनेवाले पुरुष थे और न
लुटेरों तथा चोरोंका भय था। वृक्षोंमें पूर्णरूपसे
फल लगते थे। गायें पूरा दूध देती थीं।
सभी मनुष्य बलवान्, दीर्घायु, (अथवा ऊँचे
कदवाले) और सौन्दर्यशाली होते थे। किन्हीं-
किन्हीं पुण्यवानोंकी नीरोगताके साथ-साथ लाखों
वर्षोंकी आयु होती थी। जैसे ब्राह्मण विष्णुभक्त
थे, उसी तरह क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—ये तीनों वर्ण
भी विष्णुसेवी थे। नद तथा नदियाँ सदा जलसे
भरी रहती थीं। कन्दराएँ तपस्वियोंसे परिपूर्ण
थीं। चारों वर्णोंके लोग तीर्थयात्रा करके अपनेको
पवित्र करते थे। द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य) तपस्यासे पावन थे। सभीका मन पवित्र
था। तीनों लोक दुष्टोंसे हीन, उत्तम कीर्तिसे
परिपूर्ण, यशस्कर तथा मङ्गलसम्पन्न थे। घर-
घरमें सभी अवसरोंपर पितरोंकी, निर्दिष्ट तिथियोंमें
देवताओंकी और सभी समय अतिथियोंकी पूजा
होती थी। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—तीनों वर्ण
ब्राह्मणोंकी सेवा करते थे और सदा उन्हें भोजन
कराते रहते थे; क्योंकि ब्राह्मणका मुख ऊसररहित
एवं अकण्टक क्षेत्र है। सभी लोग उत्सवके
अवसरपर हर्षके साथ नारायणके नामोंका कीर्तन
करते थे। उस समय कोई भी देवताओं, ब्राह्मणों
तथा विद्वानोंकी निन्दा नहीं करता था। कोई भी
अपने मुँह अपनी प्रशंसा नहीं करता था। सभी
दूसरेके गुणोंके लिये उत्सुक रहते थे। मनुष्योंके
शत्रु नहीं होते थे, बल्कि सभी सबके हितैषी थे।
पुरुष अथवा स्त्री कोई भी मूर्ख नहीं था; सभी
पण्डित थे। सभी मनुष्य सुखी थे। सभीके
रत्ननिर्मित महल थे; जो सदा मणि, माणिक्य,
बहुत प्रकारके रत्न और स्वर्णसे भरे रहते थे। न
कोई भिक्षुक था न रोगी; सभी शोकरहित और
हर्षमग्न थे। पुरुष अथवा स्त्री—कोई भी आभूषणोंसे
रहित नहीं था। न पापी थे न धूर्त; न क्षुधार्त न
निन्दित। प्राणियोंकी वृद्धावस्था नहीं आती थी;
वे निरन्तर नवयुवक बने रहते थे। सभी देहधारी
मानसिक तथा शारीरिक व्याधिसे रहित और
निर्विकार थे। इस प्रकार सत्ययुगमें जो सत्य,
दया आदि धर्म बतलाया गया है; वह त्रेतायुगमें
एक पादसे हीन और द्वापरमें सत्ययुगका आधा
रह जाता है।
कलिके प्रारम्भमें वही धर्म निर्बल और
कृश हो जाता है तथा उसका एक ही पाद
अवशिष्ट रह जाता है। ब्रजेश्वर! उस समय दुष्टों,
लुटेरों और चोरोंका अङ्कुर उत्पन्न होने लगता है।
लोग अधर्मपरायण हो जाते हैं। उनमें कुछ लोग
भयवश अपने पापोंपर परदा डालते रहते हैं।
धर्मात्माओंको सदा भय लगा रहता है और पापी
भी काँपते रहते हैं। राजाओंमें धर्म नाममात्रका
रह जाता है और ब्राह्मणोंकी वेदनिष्ठा कम हो
जाती है। उनमें कोई-कोई ही व्रत और धर्ममें
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७१५
तत्पर रहते हैं; प्रायः सभी मनमाना आचरण
करने लगते हैं। जबतक तीर्थ वर्तमान हैं, जबतक
सत्पुरुष स्थित हैं और जबतक ग्रामदेवता, शास्त्र
तथा पूजा-पद्धति मौजूद है; तभीतक कुछ-कुछ
तप, सत्य तथा स्वर्गदायक धर्मका अंश विद्यमान
रहता है।
तात ! दोषके भण्डाररूप इस कलियुगका
एक महान् गुण भी है, इसमें मानसिक धर्म
पुण्यकारक होता है, परंतु मानसिक पाप नहीं
लगता *। पिताजी ! कलियुगके अन्तमें अधर्म
पूर्णरूपसे व्याप्त हो जायगा। उस समय चारों वर्ण
मिलकर एक वर्ण हो जायेंगे। न वेदमन्त्रोच्चारणसे
पवित्र विवाह होगा और न सत्य तथा क्षमाका ही
अस्तित्व रह जायगा। ग्राम्यधर्मकी प्रधानतासे
विवाह सदा स्त्रीकी स्वीकृतिपर ही निर्भर
करेगा। ब्राह्मण सदा यज्ञोपवीत और तिलक नहीं
धारण करेंगे। वे संध्या-वन्दन और शास्त्रोंसे हीन
हो जायेंगे। उनका वंश सुननेमात्रको रह जायगा।
सब लोग अनियमित रूपसे सबके साथ बैठकर
भोजन करेंगे। चारों वर्णोंके लोग अभक्ष्यभक्षी
और परस्त्रीगामी हो जायेंगे। स्त्रियोंमें कोई
पतिव्रता नहीं रह जायगी। घर-घरमें कुलटा ही
दीख पड़ेंगी; वे अपने पतिको नौकरकी तरह
डराती-धमकाती रहेंगी। पुत्र पिताकी और शिष्य
गुरुकी भर्त्सना करेगा। प्रजाएँ राजाको और राजा
प्रजाओंको पीडित करता रहेगा। दुष्ट, चोर और
लुटेरे सत्पुरुषोंको खूब कष्ट देंगे। पृथ्वी अन्नसे
हीन और गायें दूधरहित हो जायँगी। दूधके कम
हो जानेपर घी और माखनका सर्वथा अभाव हो
जायगा। सभी मनुष्य सत्यहीन हो जायँगे और
वे सदा झूठ बोलेंगे। ब्राह्मण पवित्रता, संध्या-
वन्दन और शास्त्रज्ञानसे हीन होकर बैलोंको
जोतेंगे, रसोइयाका काम करेंगे और सदा शूद्रामें
लवलीन रहेंगे। शूद्र ब्राह्मण-पत्नियोंसे प्रेम करेंगे।
रसोइया तथा लम्पट शूद्र जिस ब्राह्मणका अन्न
खायेंगे, उसकी सुन्दरी पत्नीको हथिया लेंगे।
नौकर राजाका वध करके स्वयं राजा बन बैठेंगे।
सभी लोग स्वच्छन्दाचारी, शिश्नोदरपरायण, पेटू,
रोगग्रस्त, मैले-कुचैले, खण्डित मन्त्रोंसे युक्त और
मिथ्या मन्त्रोंके प्रचारक होंगे। जातिहीन, अवस्थाहीन
और निन्दक गुरु होंगे। धर्मकी निन्दा करनेवाले
यवन और म्लेच्छ राजा होंगे; वे हर्षपूर्वक
सत्पुरुषोंकी उत्तम कीर्तिको भी समूल नष्ट कर
देंगे। लोग पितरों, देवताओं, द्विजातियों, अतिथियों,
गुरुजनों और माता-पिताकी पूजा नहीं करेंगे; वे
सदा स्त्रीकी ही आवभगतमें लगे रहेंगे।
पिताजी ! स्त्रियोंके भाई-बन्धुओं तथा
स्त्रियोंका ही सदा गौरव होगा। उत्तम कुलमें
उत्पन्न लोग चोर और ब्राह्मण तथा देवताके
द्रव्यका हरण करनेवाले होंगे। कलियुगमें लोग
कौतुकवश लोभयुक्त धर्मसे मानको धारण
करेंगे। सारा जगत् देव-मन्दिरोंसे शून्य तथा
भयाकुल हो जायगा। कलिके दोषसे सदा
दुर्नीतिके कारण अराजकता फैली रहेगी।
मनुष्य भूखे, मैले-कुचैले, दरिद्र और रोगग्रस्त
हो जायँगे। जो पहले अशर्फियोंके घटके
स्वामी थे, वे राजालोग कौड़ियोंके घड़ोंके
मालिक हो जायँगे। गृहस्थोंके घरोंकी शोभा
नष्ट हो जायगी; वे सभी जल रखनेके पात्र,
अन्न और वस्त्रसे शून्य, दुर्गन्धसे व्याप्त,
दीपकसे रहित तथा अन्धकारयुक्त हो जायँगे।
सभी मनुष्य पापपरायण तथा हिंसक जन्तुओंसे
- कलेर्दोषनिधेस्तात गुण एको महानपि। मानसं च भवेत् पुण्यं सुकृतं न हि दुष्कृतम् ॥
(१०।२९)
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥
(श्रीरामचरितमानस ७। १०३। ८)