ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७- कलियुगके भावी चरित्रका, कालमानका तथा गोलोककी श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन
| १२६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति
[ ऋषिप्रवर ] भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! सरस्वती देवीका स्तोत्र सुनो, जिससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्राचीन समयकी बात है—याज्ञवल्क्य नामसे प्रसिद्ध एक महामुनि थे। उन्होंने उसी स्तोत्रसे भगवती सरस्वतीकी स्तुति की थी। जब गुरुके शापसे मुनिकी श्रेष्ठ विद्या नष्ट हो गयी, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर लोलार्ककुण्डपर, जो उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाला तीर्थ है, गये। उन्होंने तपस्याके द्वारा सूर्यका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर शोकविह्वल हो भगवान् सूर्यका स्तवन तथा बारंबार रोदन किया। तब शक्तिशाली सूर्यने याज्ञवल्क्यको वेद और वेदाङ्गका अध्ययन कराया। साथ ही कहा—‘मुने! तुम स्मरण-शक्ति प्राप्त करनेके लिये भक्तिपूर्वक वाग्देवता भगवती सरस्वतीकी स्तुति करो।’ इस प्रकार कहकर दीनजनोंपर दया करनेवाले सूर्य अन्तर्धान हो गये। तब याज्ञवल्क्य मुनिने स्नान किया और विनयपूर्वक सिर झुकाकर वे भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे।
याज्ञवल्क्य बोले—जगन्माता! मुझपर कृपा करो। मेरा तेज नष्ट हो गया है। गुरुके शापसे मेरी स्मरण-शक्ति खो गयी है। मैं विद्यासे वञ्चित होनेके कारण बहुत दुःखी हूँ। विद्याकी अधिदेवते! तुम मुझे ज्ञान, स्मृति, विद्या, प्रतिष्ठा, कवित्व-शक्ति, शिष्योंको समझानेकी शक्ति तथा ग्रन्थ-रचना करनेकी क्षमता दो। साथ ही मुझे अपना उत्तम एवं सुप्रतिष्ठित शिष्य बना लो। माता! मुझे प्रतिभा तथा सत्पुरुषोंकी सभामें विचार प्रकट करनेकी उत्तम क्षमता दो। दुर्भाग्यवश मेरा जो सम्पूर्ण ज्ञान नष्ट हो गया है, वह मुझे पुनः नवीन रूपमें प्राप्त हो जाय। जिस प्रकार देवता धूल या राखमें छिपे हुए बीजको समयानुसार अङ्कुरित कर देते हैं, वैसे ही तुम भी मेरे लुप्त ज्ञानको पुनः प्रकाशित कर दो। जो ब्रह्मस्वरूपा, परमा, ज्योतिरूपा, सनातनी तथा सम्पूर्ण विद्याओंकी अधिष्ठात्री हैं, उन वाणीदेवीको बार-बार प्रणाम है। जिनके बिना सारा जगत् सदा जीते-जी मरेके समान है तथा जो ज्ञानकी अधिष्ठात्री देवी हैं, उन माता सरस्वतीको बारंबार नमस्कार है। जिनके बिना सारा जगत् सदा गूँगा और पागलके समान हो जायगा तथा जो वाणीकी अधिष्ठात्री देवी हैं, उन वाग्देवताको बारंबार नमस्कार है। जिनकी अङ्गकान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद तथा श्वेतकमलके समान उज्ज्वल है तथा जो वर्णों (अक्षरों)-की अधिष्ठात्री देवी हैं, उन अक्षर-स्वरूपा देवी सरस्वतीको बारंबार नमस्कार है। विसर्ग, बिन्दु एवं मात्रा—इन तीनोंका जो अधिष्ठान है, वह तुम हो; इस प्रकार साधु पुरुष तुम्हारी महिमाका गान करते हैं। तुम्हीं भारती हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है। जिनके बिना सुप्रसिद्ध गणक भी संख्याके परिगणनमें सफलता नहीं प्राप्त कर सकता, उन कालसंख्या-स्वरूपिणी भगवतीको बारंबार नमस्कार है। जो व्याख्यास्वरूपा तथा व्याख्याकी अधिष्ठात्री देवी हैं; भ्रम और सिद्धान्त दोनों जिनके स्वरूप हैं, उन वाग्देवीको बारंबार नमस्कार है। जो स्मृतिशक्ति, ज्ञानशक्ति और बुद्धिशक्तिस्वरूपा हैं तथा जो प्रतिभा और कल्पनाशक्ति हैं, उन भगवतीको बारंबार प्रणाम है। एक बार सनत्कुमारने जब ब्रह्माजीसे ज्ञान पूछा, तब ब्रह्मा भी जडवत् हो गये। सिद्धान्तकी स्थापना करनेमें समर्थ न हो सके। तब स्वयं परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ पधारे। उन्होंने आते ही कहा—‘प्रजापते! तुम उन्हीं इष्टदेवी
प्रकृतिखण्ड
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भगवती सरस्वतीकी स्तुति करो।' देवि! परमप्रभु श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर ब्रह्माने तुम्हारी स्तुति की। तुम्हारे कृपा-प्रसादसे उत्तम सिद्धान्तके विवेचनमें वे सफलीभूत हो गये।
ऐसे ही एक समयकी बात है—पृथ्वीने महाभाग अनन्तसे ज्ञानका रहस्य पूछा, तब शेषजी भी मूकवत् हो गये। सिद्धान्त नहीं बता सके। उनके हृदयमें घबराहट उत्पन्न हो गयी। फिर कश्यपकी आज्ञाके अनुसार उन्होंने सरस्वतीकी स्तुति की। इससे शेषने भ्रमको दूर करनेवाले निर्मल सिद्धान्तकी स्थापनामें सफलता प्राप्त कर ली। जब व्यासने वाल्मीकिसे पुराणसूत्रके विषयमें प्रश्न किया, तब वे भी चुप हो गये। ऐसी स्थितिमें वाल्मीकिने आप जगदम्बाका ही स्मरण किया। आपने उन्हें वर दिया, जिसके प्रभावसे मुनिवर वाल्मीकि सिद्धान्तका प्रतिपादन कर सके। उस समय उन्हें प्रमादको मिटानेवाला निर्मल ज्ञान प्राप्त हो गया था। भगवान् श्रीकृष्णके अंश व्यासजी वाल्मीकि मुनिके मुखसे पुराणसूत्र सुनकर उसका अर्थ कविताके रूपमें स्पष्ट करनेके लिये तुम्हारी ही उपासना और ध्यान करने लगे। उन्होंने पुष्करक्षेत्रमें रहकर सौ वर्षोंतक उपासना की। माता! तब तुमसे वर पाकर व्यासजी कवीश्वर बन गये। उस समय उन्होंने वेदोंका विभाजन तथा पुराणोंकी रचना की। जब देवराज इन्द्रने भगवान् शंकरसे तत्त्वज्ञानके विषयमें प्रश्न किया, तब क्षणभर भगवतीका ध्यान करके वे उन्हें ज्ञानोपदेश करने लगे। फिर इन्द्रने बृहस्पतिसे शब्दशास्त्रके विषयमें पूछा। जगदम्बे! उस समय बृहस्पति पुष्करक्षेत्रमें जाकर देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षतक तुम्हारे ध्यानमें संलग्न रहे। इतने वर्षोंके बाद तुमने उन्हें वर प्रदान किया।
तब वे इन्द्रको शब्दशास्त्र और उसका अर्थ समझा सके। बृहस्पतिने जितने शिष्योंको पढ़ाया और जितने सुप्रसिद्ध मुनि उनसे अध्ययन कर चुके हैं, वे सब-के-सब भगवती सुरेश्वरीका चिन्तन करनेके पश्चात् ही सफलीभूत हुए हैं। माता! वह देवी तुम्हीं हो। मुनीश्वर, मनु और मानव—सभी तुम्हारी पूजा और स्तुति कर चुके हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवता और दानवेश्वर प्रभृति—सबने तुम्हारी उपासना की है। जब हजार मुखवाले शेष, पाँच मुखवाले शंकर तथा चार मुखवाले ब्रह्मा तुम्हारा यशोगान करनेमें जडवत् हो गये, तब एक मुखवाला मैं मानव तुम्हारी स्तुति कर ही कैसे सकता हूँ।
नारद! इस प्रकार स्तुति करके मुनिवर याज्ञवल्क्य भगवती सरस्वतीको प्रणाम करने लगे। उस समय भक्तिके कारण उनका कंधा झुक गया था। उनकी आँखोंसे जलकी धाराएँ निरन्तर गिर रही थीं। इतनेमें ज्योतिःस्वरूपा महामायाका उन्हें दर्शन प्राप्त हुआ। देवीने उनसे कहा—'मुने! तुम सुप्रख्यात कवि हो जाओ।' यों कहकर भगवती महामाया वैकुण्ठ पधार गयीं। जो पुरुष याज्ञवल्क्यरचित इस सरस्वतीस्तोत्रको पढ़ता है, उसे कवीन्द्रपदकी प्राप्ति हो जाती है। भाषण करनेमें वह बृहस्पतिकी तुलना
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कर सकता है। कोई महान् मूर्ख अथवा दुर्बुद्धि ही क्यों न हो, यदि वह एक वर्षतक नियमपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है तो वह निश्चय ही पण्डित, परम बुद्धिमान् एवं सुकवि हो जाता है।*
(अध्याय ५)
* याज्ञवल्क्य उवाच
कृपां कुरु जगन्मातर्मामेवं हततेजसम्। गुरुशापात् स्मृतिभ्रष्टं विद्याहीनं च दुःखितम्॥
ज्ञानं देहि स्मृतिं देहि विद्यां विद्याधिदेवते। प्रतिष्ठां कवितां देहि शक्तिं शिष्यप्रबोधिनीम्॥
ग्रन्थकर्तृत्वशक्तिं च सुशिष्यं सुप्रतिष्ठितम्। प्रतिभां सत्सभायां च विचारक्षमतां शुभाम्॥
लुप्तं सर्वं दैववशान्नवीभूतं पुनः कुरु। यथाङ्गारं भस्मनि च करोति देवता पुनः॥
ब्रह्मस्वरूपा परमा ज्योतीरूपा सनातनी। सर्वविद्याधिदेवी या तस्यै वाण्यै नमो नमः॥
यया विना जगत् सर्वं शश्वज्जीवन्मृतं सदा। ज्ञानाधिदेवी या तस्यै सरस्वत्यै नमो नमः॥
यया विना जगत् सर्वं मूकमुन्मत्तवत् सदा। वागधिष्ठातृदेवी या तस्यै वाण्यै नमो नमः॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभा। वर्णाधिदेवी या तस्यै चाक्षरायै नमो नमः॥
विसर्गबिन्दुमात्राणां यदधिष्ठानमेव च। इत्थं त्वं गीयसे सद्भिर्भारत्यै ते नमो नमः॥
यया विना च संख्याता संख्यां कर्तुं न शक्यते। कालसंख्यास्वरूपा या तस्यै देव्यै नमो नमः॥
व्याख्यास्वरूपा या देवी व्याख्याधिष्ठातृदेवता। भ्रमसिद्धान्तरूपा या तस्यै देव्यै नमो नमः॥
स्मृतिशक्तिर्ज्ञानशक्तिर्बुद्धिशक्तिस्वरूपिणी॥
प्रतिभा कल्पना शक्तिर्या च तस्यै नमो नमः। सनत्कुमारो ब्रह्माणं ज्ञानं पप्रच्छ यत्र वै॥
बभूव जडवत् सोऽपि सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। तदाऽऽजगाम भगवानात्मा श्रीकृष्ण ईश्वरः॥
उवाच स च तां स्तौहि वाणीमिष्टां प्रजापते। स च तुष्टाव त्वां ब्रह्मा चाज्ञया परमात्मनः॥
चकार त्वत्प्रसादेन तदा सिद्धान्तमुत्तमम्। यदाप्यनन्तं पप्रच्छ ज्ञानमेकं वसुंधरा॥
बभूव मूकवत् सोऽपि सिद्धान्तं कर्तुमक्षमः। तदा त्वां स च तुष्टाव संत्रस्तः कश्यपाज्ञया॥
ततश्चकार सिद्धान्तं निर्मलं भ्रमभञ्जनम्। व्यासः पुराणसूत्रं च पप्रच्छ वाल्मीकिं यदा॥
मौनीभूतः स सस्मार त्वामेव जगदम्बिकाम्। तदा चकार सिद्धान्तं त्वद्वरेण मुनीश्वरः॥
सम्प्राप्य निर्मलं ज्ञानं प्रमादध्वंसकारणम्। पुराणसूत्रं श्रुत्वा च व्यासः कृष्णकलोद्भवः॥
त्वां सिषेवे च दध्यौ च शतवर्षं च पुष्करे। तदा त्वत्तो वरं प्राप्य सत्कवीन्द्रो बभूव ह॥
तदा वेदविभागं च पुराणं च चकार सः। यदा महेन्द्रः पप्रच्छ तत्त्वज्ञानं सदाशिवम्॥
क्षणं त्वामेव संचिन्त्य तस्मै ज्ञानं ददौ विभुः। पप्रच्छ शब्दशास्त्रं च महेन्द्रश्च बृहस्पतिम्॥
दिव्यं वर्षसहस्रं च स त्वां दध्यौ च पुष्करे। तदा त्वत्तो वरं प्राप्य दिव्यवर्षसहस्रकम्॥
उवाच शब्दशास्त्रं च तदर्थं च सुरेश्वरम्। अध्यापिताश्च ये शिष्या यैरधीतं मुनीश्वरैः॥
ते च त्वां परिसंचिन्त्य प्रवर्तन्ते सुरेश्वरीम्। त्वं संस्तुता पूजिता च मुनीन्द्रैर्मनुमानवैः॥
दैत्येन्द्रैश्च सुरैश्चापि ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः। जडीभूतः सहस्रास्यः पञ्चवक्त्रश्चतुर्मुखः॥
यां स्तोतुं किमहं स्तोमि तामेकास्येन मानवः। इत्युक्त्वा याज्ञवल्क्यश्च भक्तिनम्रात्मकन्धरः॥
प्रणनाम निराहारो रुरोद च मुहुर्मुहुः। तदा ज्योतिःस्वरूपा सा तेन दृष्टाप्युवाच तम्॥
सुकवीन्द्रो भवेत्युक्त्वा वैकुण्ठं च जगाम ह। याज्ञवल्क्यकृतं वाणीस्तोत्रमेतत्तु यः पठेत्॥
स कवीन्द्रो महावाग्मी बृहस्पतिसमो भवेत्। महामूर्खश्च दुर्मेधा वर्षमेकं यदा पठेत्।
स पण्डितश्च मेधावी सुकविश्व भवेद् ध्रुवम्॥ (प्रकृतिखण्ड ५। ६-३६)
प्रकृतिखण्ड
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विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती एवं गङ्गाका परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! वे भगवती सरस्वती स्वयं वैकुण्ठमें भगवान् श्रीहरिके पास रहती हैं। पारस्परिक कलहके कारण गङ्गाने इन्हें शाप दे दिया था। अतः ये भारतवर्षमें अपनी एक कलासे पधारकर नदीरूपमें प्रकट हुईं। मुने! सरस्वती नदी पुण्य प्रदान करनेवाली, पुण्यरूपा और पुण्यतीर्थ-स्वरूपिणी हैं। पुण्यात्मा पुरुषोंको चाहिये कि वे इनका सेवन करें। इनके तटपर पुण्यवानोंकी ही स्थिति है। ये तपस्वियोंके लिये तपोरूपा हैं और तपस्याका फल भी इनसे कोई अलग वस्तु नहीं है। किये हुए सब पाप लकड़ीके समान हैं। उन्हें जलानेके लिये ये प्रज्वलित अग्निसुरूपा हैं। भूमण्डलपर रहनेवाले जो मानव इनकी महिमा जानते हुए इनके तटपर अपना शरीर त्यागते हैं, उन्हें वैकुण्ठमें स्थान प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुके भवनपर वे बहुत दिनोंतक वास करते हैं।
तदनन्तर सरस्वती नदीमें स्नानकी और भी महिमा कहकर नारायणने कहा कि इस प्रकार सरस्वतीकी महिमाका कुछ वर्णन किया गया है। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो।
सौति कहते हैं—शौनक! भगवान् नारायणकी बात सुनकर मुनिवर नारदने पुनः तत्काल ही उनसे यह पूछा।
नारदजीने कहा—सत्त्वस्वरूपा तथा सदा पुण्यदायिनी गङ्गाने सर्वपूज्या सरस्वतीदेवीको शाप क्यों दे दिया? इन दोनों तेजस्विनी देवियोंके विवादका कारण अवश्य ही कानोंको सुख देनेवाला होगा। आप इसे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले—नारद! यह प्राचीन कथा मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गा—ये तीनों ही भगवान् श्रीहरिकी भार्या हैं। एक बार सरस्वतीको यह संदेह हो गया कि श्रीहरि मेरी अपेक्षा गङ्गासे अधिक प्रेम करते हैं। तब उन्होंने श्रीहरिको कुछ कड़े शब्द कह दिये। फिर वे गङ्गापर क्रोध करके कठोर बर्ताव करने लगीं। तब शान्तस्वरूपा, क्षमामयी लक्ष्मीने उनको रोक दिया। इसपर सरस्वतीने लक्ष्मीको गङ्गाका पक्ष करनेवाली मानकर आवेशमें शाप दे दिया कि 'तुम निश्चय ही वृक्षरूपा और नदीरूपा हो जाओगी।'
लक्ष्मीने सरस्वतीके इस शापको सुन लिया; परंतु स्वयं बदलेमें सरस्वतीको शाप देना तो दूर रहा, उनके मनमें तनिक-सा क्रोध भी उत्पन्न नहीं हुआ। वे वहीं शान्त बैठी रहीं और सरस्वतीके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया। पर गङ्गासे यह नहीं देखा गया। उन्होंने सरस्वतीको शाप दे दिया। कहा—'बहन लक्ष्मी! जो तुम्हें शाप दे चुकी है, वह सरस्वती भी नदीरूपा हो जाय। यह नीचे मर्त्यलोकमें चली जाय, जहाँ सब पापीजन निवास करते हैं।'
नारद! गङ्गाकी यह बात सुनकर सरस्वतीने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें भी धरातलपर जाना होगा और तुम पापियोंके पापको अङ्गीकार करोगी। इतनेमें भगवान् श्रीहरि वहाँ आ गये। उस समय चार भुजावाले वे प्रभु अपने चार पार्षदोंसे सुशोभित थे। उन्होंने सरस्वतीका हाथ पकड़कर उन्हें अपने समीप प्रेमसे बैठा लिया। तत्पश्चात् वे सर्वज्ञानी श्रीहरि प्राचीन अखिल ज्ञानका रहस्य समझाने लगे। उन दुःखित देवियोंके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर परम प्रभुने समयानुकूल बातें बतायीं।
भगवान् श्रीहरि बोले—लक्ष्मी! शुभे! तुम अपनी कलासे राजा धर्मध्वजके घर पधारो। तुम किसीकी योनिसे उत्पन्न न होकर स्वयं भूमण्डलपर प्रकट हो जाना। वहीं तुम वृक्षरूपसे निवास