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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

१९- मुनिवर याज्ञवल्क्यका भगवती सरस्वतीको प्रणाम करना

प्रकृतिखण्ड ११९


स्वाहा' यह मन्त्रका स्वरूप है। इस मन्त्रका जप करनेसे सम्पूर्ण विघ्न टल जाते हैं।

ब्रह्मपुत्र नारद! मन्त्रोपदेशके पश्चात् परम प्रभु श्रीकृष्णने उस बालकके भोजनकी जो व्यवस्था की, वह तुम्हें बताता हूँ, सुनो! प्रत्येक विश्वमें वैष्णवजन जो कुछ भी नैवेद्य भगवान्‌को अर्पण करते हैं, उसमेंसे सोलहवाँ भाग विष्णुको मिलता है और पंद्रह भाग इस बालकके लिये निश्चित है; क्योंकि यह बालक स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्णका विराट्-रूप है।

विप्रवर! सर्वव्यापी श्रीकृष्णने उस उत्तम मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करानेके पश्चात् पुनः उस विराट्मय बालकसे कहा—'पुत्र! तुम्हें इसके सिवा दूसरा कौन-सा वर अभीष्ट है, वह भी मुझे बताओ। मैं देनेके लिये सहर्ष तैयार हूँ।' उस समय विराट् व्यापक प्रभु ही बालकरूपसे विराजमान था। भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर उसने उनसे समयोचित बात कही।

बालकने कहा—आपके चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति हो—मैं यही वर चाहता हूँ। मेरी आयु चाहे एक क्षणकी हो अथवा दीर्घकालकी; परंतु मैं जबतक जीऊँ, तबतक आपमें मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे। इस लोकमें जो पुरुष आपका भक्त है, उसे सदा जीवन्मुक्त समझना चाहिये। जो आपकी भक्तिसे विमुख है, वह मूर्ख जीते हुए भी मरेके समान है। जिस अज्ञानीजनके हृदयमें आपकी भक्ति नहीं है, उसे जप, तप, यज्ञ, पूजन, व्रत, उपवास, पुण्य अथवा तीर्थ-सेवनसे क्या लाभ? उसका जीवन ही निष्फल है। प्रभो! जबतक शरीरमें आत्मा रहता है, तबतक शक्तियाँ साथ रहती हैं। आत्माके चले जानेके पश्चात् सम्पूर्ण स्वतन्त्र शक्तियोंकी भी सत्ता वहाँ नहीं रह जाती। महाभाग! प्रकृतिसे परे वे सर्वात्मा आप ही हैं। आप स्वेच्छामय सनातन ब्रह्मज्योतिःस्वरूप परमात्मा सबके आदिपुरुष हैं।

नारद! इस प्रकार अपने हृदयका उद्गार प्रकट करके वह बालक चुप हो गया। तब भगवान् श्रीकृष्ण कानोंको सुहावनी लगनेवाली मधुर वाणीमें उसका उत्तर देने लगे।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—वत्स! मेरी ही भाँति तुम भी बहुत समयतक अत्यन्त स्थिर होकर विराजमान रहो। असंख्य ब्रह्माण्डोंके जीवन समाप्त हो जानेपर भी तुम्हारा नाश नहीं होगा। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें अपने क्षुद्र अंशसे तुम विराजमान रहोगे। तुम्हारे नाभिकमलसे विश्वस्रष्टा ब्रह्मा प्रकट होंगे। ब्रह्माके ललाटसे ग्यारह रुद्रोंका आविर्भाव होगा। शिवके अंशसे वे रुद्र सृष्टिके संहारकी व्यवस्था करेंगे। उन ग्यारह रुद्रोंमें 'कालाग्नि' नामसे जो प्रसिद्ध हैं, वे ही रुद्र विश्वके संहारक होंगे। विष्णु विश्वकी रक्षा करनेके लिये तुम्हारे क्षुद्र अंशसे प्रकट होंगे। मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारे हृदयमें सदा मेरी भक्ति बनी रहेगी। तुम मेरे परम सुन्दर स्वरूपको ध्यानके द्वारा निरन्तर देख सकोगे, यह निश्चित है। तुम्हारी कमनीया माता

१२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मेरे वक्षःस्थलपर विराजमान रहेगी। उसकी भी झाँकी तुम प्राप्त कर सकोगे। वत्स! अब मैं अपने गोलोकमें जाता हूँ। तुम यहीं ठहरो।

इस प्रकार उस बालकसे कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और तत्काल वहाँ पहुँचकर उन्होंने सृष्टिकी व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माको तथा संहारकार्यमें कुशल रुद्रको आज्ञा दी।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—वत्स! सृष्टि रचनेके लिये जाओ। विधे! मेरी बात सुनो, महाविराट्के एक रोमकूपमें स्थित क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलसे प्रकट होओ। फिर रुद्रको संकेत करके कहा—'वत्स महादेव! जाओ। महाभाग! अपने अंशसे ब्रह्माके ललाटसे प्रकट हो जाओ और स्वयं भी दीर्घकालतक तपस्या करो।'

नारद! जगत्पति भगवान् श्रीकृष्ण यों कहकर चुप हो गये। तब ब्रह्मा और कल्याणकारी शिव—दोनों महानुभाव उन्हें प्रणाम करके विदा हो गये। महाविराट् पुरुषके रोमकूपमें जो ब्रह्माण्ड-गोलकका जल है, उसमें वे महाविराट् पुरुष अपने अंशसे क्षुद्र विराट् पुरुष हो गये, जो इस समय भी विद्यमान हैं। इनकी सदा युवा अवस्था रहती है। इनका श्याम रंगका विग्रह है। ये पीताम्बर पहनते हैं। जलरूपी शय्यापर सोये रहते हैं। इनका मुखमण्डल मुस्कानसे सुशोभित है। इन प्रसन्नमुख विश्वव्यापी प्रभुको 'जनार्दन' कहा जाता है। इन्हींके नाभिकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए और उसके अन्तिम छोरका पता लगानेके लिये वे उस कमलदण्डमें एक लाख युगोंतक चक्कर लगाते रहे। नारद! इतना प्रयास करनेपर भी वे पद्मजन्मा ब्रह्मा पद्मनाभकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलदण्डके अन्ततक जानेमें सफल न हो सके। तब उनके मनमें चिन्ता घिर आयी। वे पुनः अपने स्थानपर आकर भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलका ध्यान करने लगे। उस स्थितिमें उन्हें दिव्य दृष्टिके द्वारा क्षुद्र विराट् पुरुषके दर्शन प्राप्त हुए। ब्रह्माण्ड-गोलकके भीतर जलमय शय्यापर वे पुरुष शयन कर रहे थे। फिर जिनके रोमकूपमें वह ब्रह्माण्ड था, उन महाविराट् पुरुषके तथा उनके भी परम प्रभु भगवान् श्रीकृष्णके भी दर्शन हुए। साथ ही गोपों और गोपियोंसे सुशोभित गोलोकधामका भी दर्शन हुआ। फिर तो उन्होंने श्रीकृष्णकी स्तुति की और उनसे वरदान पाकर सृष्टिका कार्य आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम ब्रह्मासे सनकादि चार मानसपुत्र हुए। फिर उनके ललाटसे शिवके अंशभूत ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। फिर क्षुद्र विराट् पुरुषके वामभागसे जगत्की रक्षाके व्यवस्थापक चार भुजाधारी भगवान् श्रीविष्णु प्रकट हुए। वे श्वेतद्वीपमें निवास करने लगे। क्षुद्र विराट् पुरुषके नाभिकमलमें प्रकट हुए ब्रह्माने विश्वकी रचना की। स्वर्ग, मर्त्य और पाताल—त्रिलोकीके सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंका उन्होंने सृजन किया।

नारद! इस प्रकार महाविराट् पुरुषके सम्पूर्ण रोमकूपोंमें एक-एक करके अनेक ब्रह्माण्ड हुए। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक क्षुद्र विराट् पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि भी हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके मङ्गलमय चरित्रका वर्णन कर दिया। यह सारभूत प्रसंग सुख एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मन्! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ३)