ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६१- गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
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इनकी ओर कुदृष्टि नहीं डालते। विद्वान् पुरुष ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखते। प्रथम, अष्टम, सप्तम, द्वादश, नवम और दशम स्थानमें सूर्य हों तो सूर्यका तथा जन्म-नक्षत्रमें और अष्टम एवं चतुर्थ स्थानमें चन्द्रमा हों तो चन्द्रमाका दर्शन नहीं करना चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्थीको उदित हुए चन्द्रमाको नष्टचन्द्र कहा गया है; अतः उसका दर्शन नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुषोंने ऐसे चन्द्रमाका परित्याग किया है। तात! यदि कोई उस दिन जान-बूझकर चन्द्रमाको देखता है तो वह उसे अत्यन्त दुष्कर कलङ्क देता है। यदि कोई मनुष्य अनिच्छासे उक्त चतुर्थीके चन्द्रमाको देख ले तो उसे मन्त्रसे पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिये। ऐसा करनेसे वह तत्काल शुद्ध हो भूतलपर निष्कलङ्क बना रहता है। जलको पवित्र करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
'सुन्दर सलोने कुमार! इस मणिके लिये सिंहने प्रसेनको मारा है और जाम्बवान्ने उस सिंहका संहार किया है; अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमन्तकमणिपर तुम्हारा ही अधिकार है।'
इस मन्त्रसे पवित्र किया हुआ उत्तम जल अवश्य पीना चाहिये। तात! ये सारी बातें तुम्हें बतायी गयीं। अब तुमसे और क्या कहूँ?
(अध्याय ७८)
दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन
तदनन्तर सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहणादिके विषयमें कहकर नन्द बाबाके पूछनेपर भगवान् कहने लगे।
**श्रीभगवान् बोले—**नन्दजी! जो स्वप्नमें हर्षातिरेकसे अट्टहास करता है अथवा यदि विवाह और मनोऽनुकूल नाच-गान देखता है तो उसके लिये विपत्ति निश्चित है। स्वप्नमें जिसके दाँत तोड़े जाते हैं और वह उन्हें गिरते हुए देखता है तो उसके धनकी हानि होती है और उसे शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। जो तेलसे स्नान करके गदहे, ऊँट और भैंसेपर सवार हो दक्षिण दिशाकी ओर जाता है; निःसंदेह उसकी मृत्यु हो जाती है। यदि स्वप्नमें कानमें लगे हुए अड़हुल, अशोक और करवीरके पुष्पको तथा तेल और नमकको देखता है तो उसे विपत्तिका सामना करना पड़ता है। नंगी, काली, नक-कटी, शूद्र-विधवा तथा जटा और ताड़के फलको देखकर मनुष्य शोकको प्राप्त होता है। स्वप्नमें कुपित हुए ब्राह्मण तथा क्रुद्ध हुई ब्राह्मणीको देखनेवाले मनुष्यपर निश्चय ही विपत्ति आती है और लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं। जंगली पुष्प, लाल फूल, भलीभाँति पुष्पोंसे लदा पलाश, कपास और सफेद वस्त्रको देखकर मनुष्य दुःखका भागी होता है। काला वस्त्र धारण करनेवाली काले रंगकी विधवा स्त्रीको हँसती और गाती हुई देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जिसे स्वप्नमें देवगण नाचते, गाते, हँसते, ताल ठोंकते और दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं; उसका शरीर मृत्युका शिकार हो जायगा। जो स्वप्नमें काले पुष्पोंकी माला और कृष्णाङ्गरागसे सुशोभित एवं काला वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसकी मृत्यु हो जायगी। जो स्वप्नमें मृगका मरा हुआ छौना, मनुष्यका मस्तक और हड्डियोंकी माला पाता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो ऐसे रथपर, जिसमें गदहे और ऊँट जुते हुए हों, अकेले सवार होता है और उसपर बैठकर फिर जागता है तो निःसंदेह वह मौतका ग्रास बन जाता है। जो अपनेको हवि, दूध, मधु, मट्ठा और गुड़से सराबोर देखता है; वह निश्चय ही
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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पीड़ित होता है। जो स्वप्नमें लाल पुष्पोंकी माला एवं लाल अङ्गरागसे युक्त तथा लाल वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; वह रोगग्रस्त हो जाता है, यह निश्चित है। गिरे हुए नख और केश, बुझा हुआ अंगार और भस्मपूर्ण चिताको देखकर मनुष्य अवश्य ही मृत्युका शिकार बन जाता है। श्मशान, काष्ठ, सूखा घास-फूस, लोहा, काली स्याही और कुछ-कुछ काले रंगवाले घोड़ेको देखनेसे अवश्यमेव दुःखकी प्राप्ति होती है। पादुका, ललाटकी हड्डी, लाल पुष्पोंकी भयावनी माला, उड़द, मसूर और मूंग देखनेसे तुरंत शरीरमें घाव या फोड़ा हो जाता है। स्वप्नमें सेना, गिरगिट, कौआ, भालू, वानर, नीलगाय, पीब और शरीरके मलका देखा जाना केवल व्याधिका कारण होता है। स्वप्नमें फूटा बर्तन, घाव, शूद्र, गलत्कुष्ठी, रोगी, लाल वस्त्र, जटाधारी, सूअर, भैंसा, गदहा, महाघोर अन्धकार, मरा हुआ भयंकर जीव और योनि-चिह्न देखकर मनुष्य निश्चय ही विपत्तिमें फँस जाता है। कुवेषधारी म्लेच्छ और पाश ही जिसका शस्त्र है, ऐसे पाशधारी भयंकर यमदूतको देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मण, ब्राह्मणी, छोटी कन्या और बालक-पुत्र क्रोधवश विलाप करते हों तो उन्हें देखकर दुःखकी प्राप्ति होती है। काला फूल, काले फूलोंकी माला, शस्त्रास्त्रधारी सेना और विकृत आकारवाली म्लेच्छवर्णकी स्त्रीको देखनेसे निस्संदेह मृत्यु गले लग जाती है। बाजा, नाच, गान, गवैया, लाल वस्त्र, बजाया जाता हुआ मृदङ्ग—इन्हें देखकर अवश्यमेव दुःख मिलता है। प्राणरहित (मुर्दे)-को देखकर निश्चय ही मृत्यु होती है और जो मत्स्य आदिको धारण करता है, उसके भाईका मरण ध्रुव है। घायल अथवा बिना सिरका धड़ अथवा मुण्डित सिरवाले एवं शीघ्रतापूर्वक नाचते हुए बेडौल प्राणीको देखकर मनुष्य मौतका भागी हो जाता है। मरा हुआ पुरुष अथवा मरी हुई काले रंगकी भयानक म्लेच्छनारी जिसका स्वप्नमें आलिङ्गन करती है; उसका मर जाना निश्चित है। स्वप्नमें जिनके दाँत टूट जायँ और बाल गिर रहे हों तो उसके धनकी हानि होती है अथवा वह शारीरिक पीड़ासे दुःखी होता है। स्वप्नमें जिसके ऊपर सींगधारी अथवा दंष्ट्रावाले जीव तथा बालक और मनुष्य टूटे पड़ते हों; उसे राजाकी ओरसे भय प्राप्त होता है। गिरता हुआ कटा वृक्ष, शिलावृष्टि, भूसी, छूरा, लाल अङ्गारा और राखकी वर्षा देखनेसे दुःखकी प्राप्ति होती है। गिरते हुए ग्रह अथवा पर्वत, भयानक धूमकेतु अथवा टूटे हुए कंधेवाले मनुष्यको देखकर स्वप्नद्रष्टा दुःखका भागी होता है। जो स्वप्नमें रथ, घर, पर्वत, वृक्ष, गौ, हाथी और घोड़ा आकाशसे भूतलपर गिरता देखता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो भस्म और अङ्गारयुक्त गड्डोंमें, क्षारकुण्डोंमें तथा धूलिकी राशिपर ऊँचाईसे गिरते हैं; निस्संदेह उनकी मृत्यु होती है। जिसके मस्तकपरसे कोई दुष्ट बलपूर्वक छत्र खींच लेता है; उसके पिता, गुरु अथवा राजाका नाश हो जाता है। जिसके घरसे भयभीत हुई गौ बछड़ेसहित चली जाती है; उस पापीकी लक्ष्मी और पृथ्वी भी नष्ट हो जाती है। म्लेच्छ यमदूत जिसे पाशसे बाँधकर ले जाते हैं; उसकी मृत्यु निश्चित है। जिसे ज्योतिषी ब्राह्मण, ब्राह्मणी तथा गुरु रुष्ट होकर शाप देते हैं; उसे निश्चय ही विपत्ति भोगनी पड़ती है। जिसके शरीरपर शत्रुदल, कौए, मुर्गे और रीछ आकर टूट पड़ते हैं; उसकी अवश्य मृत्यु हो जाती है और स्वप्नमें जिसके ऊपर भैंसे, भालू, ऊँट, सूअर और गदहे क्रुद्ध होकर धावा करते हैं; वह निश्चय ही रोगी हो जाता है।
जो लाल चन्दनकी लकड़ीको घीमें डुबोकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रद्वारा अग्निमें हवन करता है; उसका दुःस्वप्नजनित दोष शान्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक इन मधुसूदनका एक हजार जप
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करता है; वह निष्पाप हो जाता है और उसका दुःस्वप्न भी सुखदायक हो जाता है। जो विद्वान् पवित्र हो पूर्वकी ओर मुख करके अच्युत, केशव, विष्णु, हरि, सत्य, जनार्दन, हंस, नारायण—इन आठ शुभ नामोंका दस बार जप करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है तथा दुःस्वप्न भी शुभकारक हो जाता है। जो भक्त भक्तिपूर्वक विष्णु, नारायण, कृष्ण, माधव, मधुसूदन, हरि, नरहरि, राम, गोविन्द, दधिवामन—इन दस माङ्गलिक नामोंको जपता है; वह सौ बार जप करके नीरोग हो जाता है। जो एक लाख जप करता है; वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। दस लाख जप करके महावन्ध्या पुत्रको जन्म देती है। शुद्ध एवं हविष्यका भोजन करके जपनेवाला दरिद्र इनके जपसे धनी हो जाता है। एक करोड़ जप करके मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। नारायणक्षेत्रमें शुद्धतापूर्वक जप करनेवाले मनुष्यको सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं¹। जो जलमें स्नान करके ‘ॐ नमः’ के साथ शिव, दुर्गा, गणपति, कार्तिकेय, दिनेश्वर, धर्म, गङ्गा, तुलसी, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती—इन मङ्गल-नामोंका जप करता है; उसका मनोरथ सिद्ध हो जाता है और दुःस्वप्न भी शुभदायक हो जाता है।
‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा’—यह सप्तदशाक्षर-मन्त्र लोगोंके लिये कल्पवृक्षके समान है। इसका पवित्रतापूर्वक दस बार जप करनेसे दुःस्वप्न सुखदायक हो जाता है²। एक करोड़ जप करनेसे मनुष्योंको मन्त्र सिद्ध हो जाता है और सिद्धमन्त्रवाला मनुष्य अपनी सारी अभीष्ट सिद्धियोंको पा लेता है। जो मनुष्य ‘ॐ नमो मृत्युञ्जयाय स्वाहा’—इस मन्त्रका एक लाख जप करता है, वह स्वप्नमें मरणको देखकर भी सौ वर्षकी आयुवाला हो जाता है³। पूर्वोत्तरमुख होकर किसी विद्वान्से ही अपने स्वप्नको कहना चाहिये; किंतु जो शराबी, दुर्गतिप्राप्त, नीच, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, मूर्ख और (स्वप्नके शुभाशुभ फलका) अनभिज्ञ हो; उसके सामने स्वप्नको नहीं प्रकट करना चाहिये। पीपलका वृक्ष, ज्योतिषी, ब्राह्मण, पितृस्थान, देवस्थान, आर्यपुरुष, वैष्णव और मित्रके सामने दिनमें देखा हुआ स्वप्न प्रकाशित करना चाहिये। इस प्रकार मैंने आपसे इस पवित्र प्रसङ्गका वर्णन कर दिया; यह पापनाशक, धनकी वृद्धि करनेवाला, यशोवर्धक और आयु बढ़ानेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हैं? (अध्याय ७९-८२)
१-अच्युतं केशवं विष्णुं हरिं सत्यं जनार्दनम्। हंसं नारायणं चैव ह्येतन्नामाष्टकं शुभम्॥
शुचिः पूर्वमुखः प्राज्ञो दशकृत्वश्च यो जपेत्। निष्पापोऽपि भवेत् सोऽपि दुःस्वप्नः शुभवान् भवेत्॥
विष्णुं नारायणं कृष्णं माधवं मधुसूदनम्। हरिं नरहरिं रामं गोविन्दं दधिवामनम्॥
भक्त्या चेमानि भद्राणि दश नामानि यो जपेत्। शतकृत्वो भक्तियुक्तो जप्त्वा नीरोगतां व्रजेत्॥
लक्षधा हि जपेद् यो हि बन्धनान्मुच्यते ध्रुवम्। जप्त्वा च दशलक्षं च महावन्ध्या प्रसूयते।
हविष्याशी यतः शुद्धो दरिद्रो धनवान् भवेत्।
शतलक्षं च जप्त्वा च जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। शुद्धो नारायणक्षेत्रे सर्वसिद्धिं लभेन्नरः।
(८२।४४-४९)
२-ॐ नमः शिवं दुर्गां गणपतिं कार्तिकेयं दिनेश्वरम्। धर्मं गङ्गां च तुलसीं राधां लक्ष्मीं सरस्वतीम्॥
नामान्येतानि भद्राणि जले स्नात्वा च यो जपेत्। वाञ्छितं च लभेत् सोऽपि दुःस्वप्नः शुभवान् भवेत्॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं पूर्वं दुर्गतिनाशिन्यै महामायायै स्वाहा। कल्पवृक्षो हि लोकानां मन्त्रः सप्तदशाक्षरः।
शुचिश्च दशधा जप्त्वा दुःस्वप्नः सुखवान् भवेत्॥ (८२।५०-५२)
३-ॐ नमो मृत्युञ्जयायेति स्वाहान्तं लक्षधा जपेत्। दृष्ट्वा च मरणं स्वप्ने शतायुश्च भवेन्नरः।
(८२।५४)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, संन्यासी तथा विधवा और पतिव्रता नारियोंके
धर्मका वर्णन
नन्दजीने पूछा- बेटा! तुम्हारा कल्याण
हो। अब तुम वेदों तथा ब्रह्मा आदिकी उत्पत्तिका
सारा कारण वर्णन करो; क्योंकि तुम्हारे सिवा मैं
और किससे पूछूँ? साथ ही ब्राह्मणों तथा
क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंका कार्य करनेवालोंके
जो धर्म हैं तथा संन्यासियों, यतियों, ब्रह्मचारियों,
वैष्णव-ब्राह्मणों, सत्पुरुषों, विधवाओं एवं पतिव्रता
नारियों, गृहस्थों, गृहस्थपत्नियों, विशेषतया शिष्यों
और माता-पिताके प्रति पुत्रों एवं कन्याओंके जो
धर्म हैं; उन सबको बतलानेकी कृपा करो। प्रभो!
स्त्रियोंकी कितनी जातियाँ होती हैं? भक्तोंके
कितने भेद हैं? ब्रह्माण्ड कितने प्रकारका है?
वदन (बोली या मुख) किस प्रकारका होता है?
नित्य क्या है और कृत्रिम क्या है? क्रमशः यह
सब बतलाओ।
श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी! ब्राह्मण सदा
संध्यावन्दनसे पवित्र होकर मेरी सेवा करता है
और नित्य मेरे प्रसादको खाता है। वह मुझे
निवेदन किये बिना कभी भी नहीं खाता; क्योंकि
जो विष्णुको अर्पित नहीं किया गया है, वह
अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान माना जाता
है। अतः विष्णुके प्रसादको खानेवाला ब्राह्मण
जीवन्मुक्त हो जाता है। नित्य तपस्यामें संलग्न
रहनेवाला, पवित्र, शमपरायण, शास्त्रज्ञ, व्रतों
और तीर्थोंका सेवी, नाना प्रकारके अध्यापन-कार्यसे
संयुक्त धर्मात्मा ब्राह्मण विष्णु-मन्त्रसे दीक्षित
होकर गुरुकी सेवा करता है; तत्पश्चात् उनकी
आज्ञा लेकर संग्रहवान् (गृहस्थ) बनता है। उसे
गुरुको नित्य-पूजनकी दक्षिणा देनी चाहिये तथा
निःसंदेह नित्य गुरुजनोंका पालन-पोषण करना
चाहिये; क्योंकि समस्त वन्दनीयोंमें पिता ही
महान् गुरु माना जाता है, परंतु पितासे सौगुनी
माता, मातासे सौगुना अभीष्टदेव और अभीष्टदेवसे
चारगुना मन्त्रतन्त्र प्रदान करनेवाला गुरु श्रेष्ठ है।
गुरु प्रत्यक्षरूपमें ऐश्वर्यशाली भगवान् नारायण हैं।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही स्वयं
शिव हैं। सभी देवता गुरुमें सदा हर्षपूर्वक निवास
करते हैं। जिसके संतुष्ट होनेपर सभी देवता संतुष्ट
हो जाते हैं, वे श्रीहरि भी गुरुके प्रसन्न होनेपर
प्रसन्न हो जाते हैं। गुरु यदि शिष्योंपर पुत्रके
समान स्नेह नहीं करते तो उन्हें ब्रह्महत्याका पाप
लगता है और आशीर्वाद न देनेसे उन्हें भी वह
फल भोगना पड़ता है।
जो विप्र सदा अपने धर्ममें तत्पर, ब्रह्मज्ञ
तथा सदा विष्णुकी सेवा करनेवाला है; वही
पवित्र है। उसके अतिरिक्त अन्य विप्र सदा
अपवित्र रहता है। जो ब्राह्मण होकर बैलोंको
जोतता है, शूद्रोंकी रसोई बनाता है, देवमूर्तियोंपर
चढ़े हुए द्रव्यसे जीवन-निर्वाह करता है, संध्या
नहीं करता, उत्साहहीन है, दिनमें नींद लेता है,
शूद्रके श्राद्धान्नको खाता है, शूद्रोंके मुर्दोंका दाह
करता है; ऐसे सभी ब्राह्मण शूद्रके समान माने
जाते हैं। जो विधिपूर्वक शालग्राम महायन्त्रकी
पूजा करके उनके अर्पित किये हुए नैवेद्यको
खाता है तथा उनके चरणोदकको पीता है; वह
सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसे विष्णुलोककी
प्राप्ति होती है; क्योंकि श्रीहरिका चरणोदक
पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है। जो
शालग्राम-शिलाके जलसे अपनेको अभिषिक्त
करता है; उसने सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया
और समस्त यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली।
व्रजेश्वर ! शालग्राम-शिलाका जल गङ्गाजलसे दसगुना
बढ़कर है। जो ब्राह्मण उसे नित्य पान करता है;
वह जीवन्मुक्त एवं देवताओंके समान हो जाता
है। जो ब्राह्मणोंका नित्यकर्म, विष्णुके निवेदित
नैवेद्यका भोजन, उनकी यत्नपूर्वक पूजा, उनके
६८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
चरणोदकका सेवन, नित्य त्रिकाल संध्या और
भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, मेरे जन्मके दिन
तथा एकादशीको भोजन नहीं करता; हे तात! जो
व्रतपरायण होकर शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके
दिन आहार नहीं करता; वह ब्राह्मण जीवन्मुक्त
है। भूतलपर जितने तीर्थ हैं, वे सभी उस विप्रके
चरणोंमें नतमस्तक होते हैं; अतः उस ब्राह्मणका
चरणोदक पीकर मनुष्य तीर्थस्नायी हो जाता है।
जबतक उस ब्राह्मणके चरणोदकसे पृथ्वी भीगी
रहती है, तबतक उसके पितर कमलपत्रके पात्रमें
जल पीते हैं। विष्णुके प्रसादको खानेवाला
ब्राह्मण पृथ्वीको, तीर्थोंको और मनुष्योंको पवित्र
कर देता है तथा स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है। जो
ब्राह्मण विष्णुमन्त्रका उपासक है; वही वैष्णव है।
उस वैष्णव ब्राह्मणकी बुद्धि उत्कृष्ट होती है;
अतः उससे बढ़कर पुरुष दूसरा नहीं है। जो
किसी क्षेत्रमें जाकर पुरश्चरणपूर्वक नारायणका
जप करता है; वह अनायास ही अपने-आपका
तथा अपनी एक हजार पीढ़ियोंका उद्धार कर
देता है। जिसके संकल्प तो बाहर होते हैं, परंतु
क्रियाएँ विष्णुपदमें होती हैं; वह एकनिष्ठ वैष्णव
अपने एक लाख पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है।
( भगवान् कहते हैं - ) ब्राह्मण और देवता
मेरे प्राण हैं, परंतु भक्त प्राणोंसे भी बढ़कर
प्रिय है। समस्त लोकोंमें जितने प्रिय पात्र हैं,
उनमें भक्तसे अधिक प्यारा मेरे लिये दूसरा कोई
नहीं है। इसलिये विष्णु-भक्तिसे रहित होकर
विष्णु-मन्त्रकी दीक्षा नहीं ग्रहण करनी चाहिये।
उत्तम बुद्धिसम्पन्न पुरुषको चाहिये कि वह
उदासीन एवं दुराचारी गुरुसे मन्त्रकी दीक्षा न
ग्रहण करे। यदि दैववश ग्रहण कर लेता है तो
वह निश्चय ही धनहीन हो जाता है। ब्राह्मणोंका
भोजन सदा मांसरहित हविष्यान्न है; क्योंकि
मांसका परित्याग कर देनेसे ब्राह्मण तेजमें सूर्यके
तुल्य हो जाता है। पूजक ब्राह्मण पहले स्थानको
भलीभाँति संस्कृत करके तब भोजन तैयार करता
है, फिर लिपे-पुते स्वच्छ स्थानपर भक्तिपूर्वक
मुझे निवेदित करके तत्पश्चात् आदरपूर्वक ब्राह्मणको
देकर तब स्वयं भोजन करता है। जो ब्राह्मणको
अर्पण न करके स्वयं खा जाता है; वह शराबीके
समान माना जाता है। चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके
समय अथवा जननाशौच या मरणाशौचमें अपवित्र
मनुष्यसे स्पर्श हो जानेपर भोजन-पात्र, भ्रष्ट-द्रव्य
तथा अन्नका तुरंत परित्याग कर देना चाहिये।
फिर धुली हुई धोती और गमछा धारण करके
पैर धोकर शुद्ध स्थानपर भोजन करना चाहिये।
द्विजातियोंको चाहिये कि सूर्यके रहते अर्थात्
दिनमें दो बार भोजन न करें; क्योंकि वैसा
करनेसे वह कर्म निष्फल हो जाता है और भोक्ता
नरकगामी होता है। हविष्यान्नका भोजन करनेवाले
संयमीको उचित है कि वह श्राद्धके दिन यात्रा,
युद्ध, नदी-तट, दुबारा भोजन और मैथुनका
परित्याग कर दे। जो विष्णुभक्त एवं बुद्धिमान् हो,
उसी ब्राह्मणको पात्रका दान देना चाहिये; किंतु
जो शूद्राका पति, शूद्रका पुरोहित, संध्याहीन,
दुष्ट, बैलोंको जोतनेवाला, शुक्र बेचनेवाला और
देव-प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला
हो; उसे यत्न करके कभी भी नहीं देना चाहिये।
इन लोगोंको पात्र प्रदान करनेसे ब्राह्मण नरकगामी
होता है। उस दिन पात्रका उपभोग करके मैथुन
करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। तात! कन्या
बेचनेवाला सबसे बढ़कर पापी होता है। जो
मूल्य लेकर कन्यादान करता है, वह महारौरव
नामक नरकमें जाता है, फिर कन्याके शरीरमें
जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक पितरोंसहित
वह, उसका पुत्र और पुरोहित भी कुम्भीपाक
नरकमें कष्ट भोगते हैं। इसलिये बुद्धिमान्को
चाहिये कि योग्य वरको ही कन्या प्रदान करें।
ब्रजेश्वर ! जो पुराणों तथा चारों वेदोंद्वारा वर्णित है,
वह ब्राह्मणों तथा वैष्णवोंका धर्म मैंने कह दिया।