ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 702, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें६९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तो दयाके सागर हैं; अतः मुझ दासीका अपराध
स्तोत्रको सुनती है; उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो
जाते हैं। पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त हो जाता है,
निर्धनको धन मिल जाता है, रोगी रोगसे मुक्त हो
जाता है और बँधा हुआ बन्धनसे छूट जाता है।
ब्रजेश्वर ! पतिव्रता इसके द्वारा स्तवन करके
तीर्थस्नानका फल तथा सम्पूर्ण तपस्याओं और
व्रतोंका फल पाती है*। इस प्रकार स्तुति-
नमस्कार करके पतिकी आज्ञासे वह भोजन
करती है। व्रजराज ! इस प्रकार मैंने पतिव्रताके
धर्मका वर्णन कर दिया, अब गृहस्थोंका धर्म
सुनिये। (अध्याय ८३)
क्षमा कर दें। ब्रजेश्वर ! पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भमें
लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी और गङ्गाने इस महान्
पुण्यमय स्तोत्रका पाठ किया था। पूर्वकालमें
सावित्रीने भी नित्यशः इस स्तोत्रद्वारा ब्रह्माका
स्तवन किया था। कैलासपर पार्वतीने भक्तिपूर्वक
शंकरके लिये इस स्तोत्रका पाठ किया था।
प्राचीनकालमें मुनिपत्नियों तथा देवाङ्गनाओंने भी
इसके द्वारा स्तुति की थी। अतः सभी पतिव्रताओंके
लिये यह स्तोत्र शुभदायक है। जो पतिव्रता
अथवा अन्य पुरुष या नारी इस महान् पुण्यदायक
गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके
त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन
श्रीभगवान् कहते हैं- नन्दजी ! गृहस्थ
पुरुष सदा ब्राह्मणों और देवताओंका पूजन करता
है तथा चारों वर्णोंके धर्मानुसार अपने वर्ण-धर्मके
पालनमें तत्पर रहता है। इसीलिये देवता आदि
सभी प्राणी गृहस्थोंकी आशा करते हैं। गृहस्थ
अतिथिका आदर-सत्कार करके सदा पवित्र बना
रहता है। (पिण्डदान आदि) कर्मके अवसरपर
पितर और अतिथि-पूजनके समय सारे देवता
उसी प्रकार गृहस्थके पास आते हैं, जैसे गौएँ
पानीसे भरे हुए हौजके पास जाती हैं। भूखा
अतिथि सायंकाल प्रयत्नपूर्वक गृहस्थके घर आता
है और वहाँ आदर-सत्कार पाकर उसे आशीर्वाद
देनेके पश्चात् उस गृहस्थके घरसे विदा होता है।
अतिथिका पूजन न करनेसे गृहस्थ पापका भागी
होता है और उसे त्रिलोकीमें उत्पन्न सारे पाप
भोगने पड़ते हैं; इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
अतिथि जिसके घरसे निराश होकर लौट जाता
है, उसके घरका उसके पितर, देवता और अग्नयाँ
भी परित्याग कर देती हैं तथा वह अतिथि
उसे अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर
- ॐ नमः कान्ताय भर्त्रे च शिरश्चन्द्रस्वरूपिणे ।
नमः शान्ताय दान्ताय सर्वदेवाश्रयाय च। नमो ब्रह्मस्वरूपाय सतीप्राणपराय च॥
नमस्याय च पूज्याय हृदाधाराय ते नमः।
पञ्चप्राणाधिदेवाय चक्षुषस्तारकाय च। ज्ञानाधाराय पत्नीनां परमानन्दरूपिणे ॥
पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः पतिरेव महेश्वरः । पतिश्च निर्गुणाधारो ब्रह्मरूपो नमोऽस्तु ते ॥
क्षमस्व भगवन् दोषं ज्ञानाज्ञानकृतं च यत् । पत्नीबन्धो दयासिन्धो दासीदोषं क्षमस्व मे ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं सृष्ट्यादौ पद्माया कृतम् । सरस्वत्या च धरया गङ्गया च पुरा व्रज ॥
सावित्र्या च कृतं पूर्वं ब्रह्मणे चापि नित्यशः । पार्वत्या च कृतं भक्त्या कैलासे शङ्कराय च ॥
मुनीनां च सुराणां च पत्नीभिश्च कृतं पुरा । पतिव्रतानां सर्वासां स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं या शृणोति पतिव्रता । नरोऽन्यो वापि नारी वा लभते सर्ववाञ्छितम् ॥
अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो लभते धनम् । रोगी च मुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥
पतिव्रता च स्तुत्वा च तीर्थस्नानफलं लभेत् । फलं च सर्वतपसां व्रतानां च ब्रजेश्वर।
(८३।१३६-१४६)