सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

५२- पुष्करमें तप करते हुए इन्द्रको श्रीविष्णुका प्रकट होकर मनोवाञ्छित वर, कवच और मन्त्र प्रदान करना

गणपतिखण्ड ३४७


जाय। भाई! कर्मानुसार जिनका जिन-जिन योनियोंमें जन्म होता है, वे उन्हीं योनियोंमें निरन्तर रहते हुए निर्वृति लाभ करते हैं। वे चाहे संत हों अथवा मूर्ख हों, जिन्हें कर्मभोगके परिणामस्वरूप जिस योनिकी प्राप्ति हुई है, वे विष्णुमायासे मोहित होकर उसी योनिको बहुत बढ़कर समझते हैं। जो सनातनी विष्णुमाया सबकी आदि, सर्वस्व प्रदान करनेवाली और विश्वका मङ्गल करनेवाली हैं, उन्हीं जगज्जननीने इस समय भारतवर्षमें शैलराजकी पत्नीके गर्भसे जन्म धारण किया है और दारुण तपस्या करके शंकरको पतिरूपमें प्राप्त किया है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारी सृष्टि कृत्रिम है, अतएव मिथ्या ही है। सभी श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए हैं और समय आनेपर केवल श्रीकृष्णमें ही विलीन हो जाते हैं। प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके विधानमें मैं नित्य होते हुए भी मायासे आबद्ध होकर जन्म-धारण करता हूँ, उस समय प्रत्येक जन्ममें जगज्जननी पार्वती मेरी माता होती हैं। जगत्में जितनी नारियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिसे उत्पन्न हुई हैं। उनमेंसे कुछ प्रकृतिकी अंशभूता हैं तो कुछ कलात्मिका तथा कुछ कलांशके अंशसे प्रकट हुई हैं। ये ज्ञानसम्पन्ना योगिनी कृत्तिकाएँ प्रकृतिकी कलाएँ हैं। इन्होंने निरन्तर अपने स्तनके दूध तथा उपहारसे मेरा पालन-पोषण किया है। अतः मैं उनका पोष्य पुत्र हूँ और पोषण करनेके कारण ये मेरी माताएँ हैं। साथ ही मैं उन प्रकृतिदेवी (पार्वती)-का भी पुत्र हूँ; क्योंकि तुम्हारे स्वामी शंकरजीके वीर्यसे उत्पन्न हुआ हूँ। नन्दिकेश्वर! मैं गिरिराजनन्दिनीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुआ हूँ, अतः जैसे वे मेरी धर्ममाता हैं, वैसे ही ये कृत्तिकाएँ भी सर्वसम्मतिसे मेरी धर्म-माताएँ हैं; क्योंकि स्तन पिलानेवाली (धाय), गर्भमें धारण करनेवाली (जननी), भोजन देनेवाली (पाचिका), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवताकी पत्नी, पिताकी पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहिन, पुत्रवधू, पत्नीकी माता (सास), माताकी माता (नानी), पिताकी माता (दादी), सहोदर भाईकी पत्नी, माताकी बहिन (मौसी), पिताकी बहिन (बुआ) तथा मामी—ये सोलह मनुष्योंकी वेदविहित माताएँ कहलाती हैं।* ये कृत्तिकाएँ सम्पूर्ण सिद्धियोंकी ज्ञाता, परमैश्वर्यसम्पन्न और तीनों लोकोंमें पूजित हैं। ये क्षुद्र नहीं हैं, बल्कि ब्रह्माकी कन्याएँ हैं। तुम भी सत्त्वसम्पन्न तथा शम्भुके पुत्रके समान हो और विष्णुने तुम्हें भेजा है; अतः चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। वहाँ देवसमुदायका दर्शन करूँगा। (अध्याय १४-१५)


कार्तिकेयका नन्दिकेश्वरके साथ कैलासपर आगमन, स्वागत, सभामें जाकर विष्णु आदि देवोंको नमस्कार करना और शुभाशीर्वाद पाना

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! शंकरसुवन कार्तिकेय नन्दिकेश्वरसे यों कहकर शीघ्र ही कृत्तिकाओंको समझाते हुए नीतियुक्त वचन बोले।

कार्तिकेयने कहा— माताओ! मैं देवसमुदाय, बन्धुवर्ग तथा माताको देखना चाहता हूँ; अतः शंकरजीके निवासस्थानपर जाऊँगा, इसके लिये आपलोग मुझे आज्ञा प्रदान करें। सारा जगत्, शुभदायक जन्म-कर्म, संयोग-वियोग सभी दैवके


* स्तनदात्री गर्भधात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया। अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भकन्याभगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसूः। मातृर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च। जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
(१५। ३८—४०)

३४८
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
अधीन है। दैवसे बढ़कर दूसरा कोई बली नहीं
है। वह दैव श्रीकृष्णके वशमें रहनेवाला है;
क्योंकि वे दैवसे परे हैं। इसीलिये संतलोग उन
ऐश्वर्यशाली परमात्माका निरन्तर भजन करते हैं।
अविनाशी श्रीकृष्ण अपनी लीलासे दैवको बढ़ाने
और घटानेमें समर्थ हैं। उनका भक्त दैवके
वशीभूत नहीं होता—ऐसा निर्णीत है। इसलिये
आपलोग इस दुःखदायक मोहका परित्याग कीजिये
और जो सुखदाता, मोक्षप्रद, सारसर्वस्व, जन्म-
मृत्युके भयके विनाशकर्ता, परमानन्दके जनक
और मोह-जालके उच्छेदक हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु
और शिव आदि सभी देवगण जिनका निरन्तर
भजन करते हैं, उन गोविन्दकी भक्ति कीजिये।
इस भवसागरमें मैं आपलोगोंका कौन हूँ और
आपलोग मेरी कौन हैं? संसार-प्रवाहका वह
सारा कर्म फेनकी भाँति पुञ्जीभूत हो गया है।
(वस्तुतः कोई किसीका नहीं है।) संयोग अथवा
वियोग—यह सब ईश्वरकी इच्छासे ही होता है।
यहाँतक कि सारा ब्रह्माण्ड ईश्वरके अधीन है,
वह भी स्वतन्त्र नहीं है—ऐसा विद्वान् लोग कहते
हैं। सारी त्रिलोकी जलके बुलबुलेके समान
क्षणभङ्गुर है, फिर भी मायासे मोहित चित्तवाले
लोग इस अनित्य जगत्में मायाका विस्तार करते
हैं; परंतु जो श्रीकृष्णपरायण संत हैं, वे जगत्में
रहते हुए भी वायुकी भाँति लिप्त नहीं होते।
इसलिये माताओ! आपलोग मोहका परित्याग
करके मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये।
यों कहकर ऐश्वर्यशाली कार्तिकेयने उन
कृत्तिकाओंको नमस्कार किया और फिर मन-
ही-मन श्रीहरिका स्मरण करते हुए शंकरजीके
पार्षदोंके साथ यात्राके लिये प्रस्थान किया। इसी
बीच उन्होंने वहाँ एक उत्तम रथको देखा। वह
बहुमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, जिसे विश्वकर्माने
भलीभाँति निर्माण किया था, उसमें स्थान-
स्थानपर माणिक्य और हीरे जड़े गये थे, जिससे
उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। पारिजात-
पुष्पोंकी मालावलीसे वह सुशोभित था। मणियोंके
दर्पण तथा श्वेत चँवरोंसे वह अत्यन्त उद्भासित
हो रहा था और चित्रकारीयुक्त रमणीय क्रीडा-
भवनोंसे वह भलीभाँति सुसज्जित था। वह
मनोहर तो था ही, उसका विस्तार भी बड़ा था।
उसमें सौ पहिये लगे थे। उसका वेग मनके
समान था और श्रेष्ठ पार्षद उसे घेरे हुए थे। उस
रथको पार्वतीने भेजा था। उस रथपर कार्तिकेयको
चढ़ते देखकर कृत्तिकाओंका हृदय दुःखसे फटा
जा रहा था। उनके केश खुल गये थे और वे
शोकसे व्याकुल थीं। सहसा चेतना प्राप्त होनेपर
अपने सामने स्कन्दको देख वे अत्यन्त शोकके
कारण ठगी-सी रह गयीं; फिर वहीं भयवश
उन्मत्तकी भाँति कहने लगीं।
कृत्तिकाओोंने कहा—हाय! अब हमलोग
क्या करें, कहाँ चली जायें ? बेटा ! हमारे आश्रय
तो तुम्हीं हो। इस समय तुम हमलोगोंको छोड़कर
कहाँ जा रहे हो ? यह तुम्हारे लिये धर्मसङ्गत
बात नहीं है। हमलोगोंने बड़े स्नेहसे तुम्हें पाला-पोसा
है, अतः तुम धर्मानुसार हमारे पुत्र हो। भला,
उपयुक्त पुत्र मातृवर्गोंका परित्याग कर दे—यह भी
कोई धर्म है? यों कहकर सभी कृत्तिकाओोंने
कार्तिकेयको छातीसे चिपका लिया और पुत्र-
वियोगजन्य दारुण दुःखके कारण वे पुनः मूर्च्छित
हो गयीं। मुने ! तत्पश्चात् कुमार कार्तिकेयने
आध्यात्मिक वचनोंद्वारा उन्हें समझाया और फिर
उनके तथा पार्षदोंके साथ वे उस रथपर सवार
हुए। मुने ! यात्राकालमें उन्होंने अपने सामने साँड़,
गजराज, घोड़ा, जलती हुई आग, भरा हुआ
सुवर्ण-कलश, अनेक प्रकारके पके हुए फल,
पति-पुत्रसे युक्त स्त्री, प्रदीप, उत्तम मणि, मोती,
पुष्पमाला, मछली और चन्दन—इन माङ्गलिक
वस्तुओंको, वामभागमें शृगाल, नकुल, कुम्भ
और शुभदायक शवको तथा दक्षिणभागमें राजहंस,

गणपतिखण्ड
३४९


मयूर, खञ्जन, शुक, कोकिल, कबूतर, शङ्खचिल्ल (सफेद चील), माङ्गल्यिक चक्रवाक, कृष्णसार-मृग, सुरभी और चमरी गौ, श्वेत चँवर, सवत्सा धेनु और शुभ पताकाको देखा। उस समय नाना प्रकारके बाजोंकी मङ्गलध्वनि सुनायी पड़ने लगी, हरिकीर्तन तथा घण्टा और शङ्खका शब्द होने लगा। इस प्रकार मङ्गल-शकुनोंको देखते तथा सुनते हुए कार्तिकेय आनन्दपूर्वक उस मनके समान वेगशाली रथके द्वारा क्षणमात्रमें ही पिताके मन्दिरपर जा पहुँचे। वहाँ कैलासपर पहुँचकर वे अविनाशी वट-वृक्षके नीचे कृत्तिकाओं तथा श्रेष्ठ पार्षदोंके साथ कुछ देरके लिये ठहर गये। उस नगरके राजमार्ग बड़े मनोहर थे। उनपर चारों ओर पद्मराग और इन्द्रनीलमणि जड़ी हुई थी। समूह-के-समूह केलेके खंभे गड़े थे, जिनपर रेशमी सूतमें गुँथे हुए चन्दनके पल्लवोंकी बन्दनवार लटक रही थी। वह पूर्ण कुम्भोंसे सुशोभित था। उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था। असंख्यों रत्नप्रदीपों तथा मणियोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह सदा उत्सवोंसे व्याप्त, हाथोंमें दूब और पुष्प लिये हुए वन्दियों और ब्राह्मणोंसे युक्त तथा पति-पुत्रवती साध्वी नारियोंसे समन्वित था। समस्त मङ्गल-कार्य करके पार्वती देवी लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, तुलसी, रति, अरुन्धती, अहल्या, दिति, सुन्दरी तारा, अदिति, शतरूपा, शची, संध्या, रोहिणी, अनसूया, स्वाहा, संज्ञा, वरुण-पत्नी, आकूति, प्रसूति, देवहूति, मेनका, एक रंग तथा एक प्रकृतिवाली मैनाक-पत्नी, वसुन्धरा और मनसादेवीको आगे करके वहाँ आयीं। तदनन्तर देवगण, मुनिसमुदाय, पर्वत, गन्धर्व तथा किन्नर सब-के-सब आनन्दमग्न हो कुमारके स्वागतमें गये। महेश्वर भी नाना प्रकारके बाजों, रुद्रगणों, पार्षदों, भैरवों तथा क्षेत्रपालोंके साथ वहाँ पधारे। तत्पश्चात् शक्तिधारी कार्तिकेय पार्वतीको निकट देखकर हर्षगद्गद हो गये। उस समय वे तुरंत ही रथसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगे। तब पार्वतीने कार्तिकेयको देखकर लक्ष्मी आदि देवियों, मुनि-पत्नियों और शिव आदि सभीसे यत्नपूर्वक परम भक्तिके साथ सम्भाषण किया और उन्हें अपनी गोदमें उठाकर वे चूमने लगीं। फिर शंकर, देवगण, पर्वत, शैलपत्नियों, पार्वती आदि देवियों तथा सभी मुनियोंने कार्तिकेयको शुभाशीर्वाद दिया। तदनन्तर कुमार गणोंके साथ शिव-भवनमें आये। वहाँ सभाके मध्यमें उन्होंने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको देखा। वे रत्नाभरणोंसे विभूषित हो रत्नसिंहासनपर विराजमान थे। धर्म, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु आदि देवता उन्हें घेरे हुए थे। उनका मुख प्रसन्न था तथा उसपर थोड़ी-थोड़ी मुसकानकी छटा छा रही थी। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर हो रहे थे। उनपर श्वेत चँवर डुलाया जा रहा था और देवेन्द्र तथा मुनीन्द्र उनका स्तवन कर रहे थे। उन जगन्नाथको देखकर कार्तिकेयके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद

३५०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मा, धर्म, देवताओं और हर्षित मुनिवरोंमें प्रत्येकको प्रणाम किया और उनका शुभाशीर्वाद पाया। फिर बारी-बारीसे सबसे कुशल-समाचार पूछकर वे एक रत्नसिंहासनपर बैठे। उस समय पार्वतीसहित शंकरने ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान किया।
(अध्याय १६)


कार्तिकेयका अभिषेक तथा देवताओंद्वारा उन्हें उपहार-प्रदान

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! तदनन्तर जगदीश्वर विष्णुने प्रसन्नमनसे शुभ मुहूर्त निश्चय करके कार्तिकेयको एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और कौतुकवश नाना प्रकारके झाँझ-मँजीरा तथा यन्त्रमय बाजे बजवाये। फिर अमूल्य रत्नोंके बने हुए सैकड़ों घड़ोंसे, जो वेदमन्त्रोंद्वारा अभिषिक्त तथा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलोंसे परिपूर्ण थे, कार्तिकेयको हर्षपूर्वक स्नान कराया। तत्पश्चात् कार्तिकेयको प्रसन्नमनसे बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित किरीट, दो माङ्गलिक बाजूबंद, अमूल्य रत्नोंके बने हुए बहुत-से आभूषण, अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो दिव्य वस्त्र, क्षीरसागरसे उत्पन्न हुई कौस्तुभमणि और वनमाला दी। ब्रह्माने यज्ञसूत्र, वेद, वेदमाता गायत्री, संध्या-मन्त्र, कृष्ण-मन्त्र, श्रीहरिका स्तोत्र और कवच, कमण्डलु, ब्रह्मास्त्र तथा शत्रुविनाशिनी विद्या प्रदान की। धर्मने दिव्य धर्मबुद्धि और समस्त जीवोंपर दया समर्पित की। शिवने परमोत्कृष्ट मृत्युञ्जय-ज्ञान, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञान, निरन्तर सुख प्रदान करनेवाला परम मनोहर तत्त्वज्ञान, योगतत्त्व, सिद्धितत्त्व, परम दुर्लभ ब्रह्मज्ञान, त्रिशूल, पिनाक, फरसा, शक्ति, पाशुपतास्त्र, धनुष और संधान-संहारके ज्ञानसहित संहारास्त्र अर्पित किया। वरुणने श्वेत छत्र और रत्नोंकी माला, महेन्द्रने गजराज, अमृतसागरने अमृतका कलश, सूर्यने मनके समान वेगशाली रथ और मनोहर कवच, यमने यमदण्ड और अग्निने बहुत बड़ी शक्ति प्रदान की। इसी प्रकार अन्यान्य सभी देवताओंने भी हर्षपूर्वक नाना प्रकारके शस्त्र उन्हें भेंट किये। कामदेवने हर्षमग्न होकर उन्हें कामशास्त्र और क्षीरसागरने अमूल्य रत्न तथा रत्नोंके बने हुए विशिष्ट नूपुर दिये। पार्वतीका मन तो उस समय परमानन्दमें निमग्न था, उन्होंने मुस्कराते हुए महाविद्या, सुशीलाविद्या, मेधा, दया, स्मृति, अत्यन्त निर्मल बुद्धि, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, धृति, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति और श्रीहरिकी दासता प्रदान की। नारद! प्रजापतिने देवसेनाको, जो रत्नाभरणोंसे विभूषित, परम विनीत, उत्तम शीलवती, मनको हरण कर लेनेवाली अत्यन्त सुन्दरी थी, जिसे विद्वान् लोग शिशुओंकी रक्षा करनेवाली महाषष्ठी कहते हैं, वैवाहिक विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक कार्तिकेयके अर्पित कर दिया। इस प्रकार कुमारका अभिषेक करके सभी देवता, मुनिगण और गन्धर्व जगदीश्वरोंको प्रणाम करके अपने-अपने घर चले गये।

नारद! इसके बाद शंकरने नारायण, ब्रह्मा और धर्मकी स्तुति की और फिर धर्मका आलिङ्गन करके परमप्रिय श्रीहरिको मस्तक झुकाया। तदनन्तर शंकरद्वारा सत्कृत होकर शैलराज हिमालय गणोंसहित प्रेमपूर्वक वहाँसे बिदा हुए। इस प्रकार जो-जो लोग वहाँ आये थे, वे सभी आनन्दपूर्वक प्रस्थान कर गये। तब महेश्वर देवी पार्वतीके साथ बड़े आनन्दसे वहाँ रहने लगे। कुछ समय बीतनेके बाद शंकरने पुनः उन सभी देवोंको बुलाकर विवाह-विधिके अनुसार पुष्टिको महात्मा गणेशके हाथों समर्पित कर दिया। इस प्रकार दोनों पुत्रों तथा गणोंके साथ रहती हुई पार्वतीका मन बड़ा प्रसन्न था।

गणपतिखण्ड
३५१

वे सम्पूर्ण कामनाओंके देनेवाले स्वामीके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती थीं। नारद ! इस प्रकार मैंने देवताओंका समागम, पार्वतीको पुत्र-प्राप्ति, कुमारका अभिषेक, उनका पूजन और विवाह तथा गणेशका विवाह—यह सारा वृत्तान्त तुमसे वर्णन कर दिया। अब तुम्हारे मनमें कौन-सी अभिलाषा है? फिर और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय १७)


गणेशके शिरश्छेदनके वर्णनके प्रसङ्गमें शंकरद्वारा सूर्यका मारा जाना, कश्यपका शिवको शाप देना, सूर्यका जीवित होना और माली-सुमालीकी रोगनिवृत्ति

नारदने पूछा—महाभाग नारायण ! आप तो वेदवेदाङ्गोंके पारगामी विद्वान् हैं। परमेश्वर ! मैं आपसे एक बहुत बड़े संदेहका समाधान जानना चाहता हूँ। प्रभो! जो देवेश्वर महात्मा शंकरके पुत्र तथा विघ्नोंके विनाशक हैं, उन गणेश्वरके लिये जो विघ्न घटित हुआ, उसका क्या कारण है? जब परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा श्रीमान् गोलोकनाथ स्वयं ही अपने अंशसे पार्वतीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे, तब उन ग्रहाधिराज भगवान् श्रीकृष्णके मस्तकका ग्रहकी दृष्टिसे कट जाना बड़े आश्चर्यकी बात है। आप इस वृत्तान्तको मुझे बतलानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—ब्रह्मन् ! विघ्नेश्वरका यह विघ्न जिस कारणसे हुआ था, उस प्राचीन इतिहासको तुम सावधान होकर श्रवण करो। नारद ! एक समयकी बात है। भक्तवत्सल शंकरने माली और सुमालीको मारनेवाले सूर्यपर बड़े क्रोधके साथ त्रिशूलसे प्रहार किया। वह शिवके समान तेजस्वी त्रिशूल अमोघ था। अतः उसकी चोटसे सूर्यकी चेतना नष्ट हो गयी और वे तुरंत ही रथसे नीचे गिर पड़े। जब कश्यपजीने देखा कि मेरे पुत्रकी आँखें ऊपरको चढ़ गयी हैं और वह चेतनाहीन हो गया है, तब वे उसे छातीसे लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओंमें हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। अन्धकार छा जानेसे सारा जगत् अंधीभूत हो गया। तब ब्रह्माके पौत्र तपस्वी कश्यपजी, जो ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे, अपने पुत्रको प्रभाहीन देखकर शिवको शाप देते हुए बोले—'जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूलसे मेरे पुत्रका वक्षःस्थल विदीर्ण हो गया है, उसी तरह तुम्हारे पुत्रका मस्तक कट जायगा।' शिवजी आशुतोष तो हैं ही; अतः क्षणमात्रमें ही उनका क्रोध जाता रहा। तब उन्होंने उसी क्षण ब्रह्मज्ञानद्वारा सूर्यको जीवित कर दिया। तदनन्तर जो ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशसे उत्पन्न हैं, वे त्रिगुणात्मक भक्तवत्सल सूर्य चेतना प्राप्त करके पिताके समक्ष खड़े हुए। फिर भक्तिपूर्वक पिताको तथा शंकरको नमस्कार किया। साथ ही (पिताद्वारा दिये गये) शम्भुके शापको जानकर वे कश्यपजीपर क्रुद्ध हो गये, जिससे उन्होंने अपने विषयको ग्रहण नहीं किया और क्रोधावेशमें यों कहा—'ईश्वरके बिना यह सब कुछ तुच्छ, अनित्य और नश्वर है, अतः विद्वान्को चाहिये कि वह मङ्गलकारक सत्यको छोड़कर अमङ्गलकी इच्छा न करे। इसलिये अब मैं विषयका परित्याग करके परमेश्वर श्रीकृष्णका भजन करूँगा।' यह सुनकर देवताओंने ब्रह्माको प्रेरित किया, तब उन प्रभुने शीघ्रतापूर्वक वहाँ पधारकर सूर्यको समझाया और उन्हें इनके कार्यपर नियुक्त किया। फिर ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनन्दपूर्वक सूर्यको आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवनको चले गये। इधर सूर्य भी अपनी राशिपर आरूढ़ हुए। तत्पश्चात् माली

३५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

और सुमाली व्याधिग्रस्त हो गये। उनके शरीरमें सफेद कोढ़ हो गयी, जिससे सारा अङ्ग गल गया, शक्ति जाती रही और प्रभा नष्ट हो गयी। तब स्वयं ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा—'सूर्यके कोपसे ही तुम दोनों हतप्रभ हो गये हो और तुम्हारा शरीर गल गया है, अतः तुमलोग सूर्यका भजन करो।' फिर ब्रह्मा उन दोनोंको सूर्यका कवच, स्तोत्र और पूजाकी सारी विधि बतलाकर ब्रह्मलोकको चले गये। मुने! तदनन्तर वे दोनों पुष्करमें जाकर सूर्यका भजन करने लगे। वहाँ वे तीनों काल स्नान करके भक्तिपूर्वक उत्तम सूर्य-मन्त्रके जपमें तल्लीन हो गये। फिर समयानुसार सूर्यसे वरदान पाकर वे पुनः अपने असली रूपमें आ गये। इस प्रकार मैंने यह सारा वृत्तान्त वर्णन कर दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय १८)


ब्रह्माद्वारा माली-सुमालीको सूर्यके कवच और स्तोत्रकी प्राप्ति तथा सूर्यकी कृपासे उन दोनोंका नीरोग होना

तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर नारायण बोले—नारद! मैं श्रीसूर्यके पूजनका क्रम तथा सम्पूर्ण पापों और व्याधियोंसे विमुक्त करनेवाले कवच और स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। जब माली और सुमाली—ये दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये, तब उन्होंने स्तवन करनेके लिये शिव-मन्त्र प्रदान करनेवाले ब्रह्माका स्मरण किया। ब्रह्माने वैकुण्ठमें जाकर कमलापति विष्णुसे पूछा। उस समय शिव भी वहीं श्रीहरिके संनिकट विराजमान थे।

ब्रह्मा बोले—हरे! माली और सुमाली दोनों दैत्य व्याधिग्रस्त हो गये हैं, अतः उनके रोगके विनाशका कौन-सा उपाय है—यह बतलािये।

विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! वे दोनों पुष्करमें जाकर वर्षभरतक मेरे अंशभूत व्याधिहन्ता सूर्यकी सेवा करें, इससे वे रोगमुक्त हो जायेंगे।

शंकरने कहा—जगदीश्वर! उन दोनोंको रोगनाशक महात्मा सूर्यका स्तोत्र, कवच और मन्त्र, जो कल्पतरुके समान है, प्रदान कीजिये। ब्रह्मन्! स्वयं श्रीहरि तो सर्वस्व प्रदान करनेवाले हैं और सूर्य रोगनाशक हैं। जिसका जो-जो विषय है, अपने विषयमें ये दोनों सम्पत्ति-प्रदायक हैं। इस प्रकार विष्णु और शिवकी अनुमति पाकर ब्रह्मा उन दैत्योंके घर गये। तब दैत्योंने उन्हें प्रणाम करके कुशल-समाचार पूछा और बैठनेके लिये आसन दिया। उन दैत्योंका शरीर गल गया था, उसमेंसे पीब और दुर्गन्ध निकल रही थी। आहाररहित होनेके कारण वे चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे। तब स्वयं दयालु ब्रह्माने उन दोनोंसे कहा।

ब्रह्मा बोले—वत्सो! तुम दोनों कवच, स्तोत्र और पूजाकी विधिका क्रम ग्रहण करके पुष्करमें जाओ और वहाँ विनम्रभावसे सूर्यका भजन करो।

उन दोनोंने कहा—ब्रह्मन्! किस विधिसे और किस मन्त्रसे हम सूर्यका भजन करें, उनका स्तोत्र कौन-सा है और कवच क्या है—वह सब हमें प्रदान कीजिये।

ब्रह्माने कहा—वत्स! वहाँ त्रिकाल स्नान करके इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भास्करकी भलीभाँति सेवा करनेपर तुमलोग नीरोग हो जाओगे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—)'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'—इस मन्त्रसे सावधानतया सूर्यका पूजन करके उन्हें भक्तिपूर्वक सोलह उपहार प्रदान करना चाहिये। यों ही पूरे वर्षभरतक करना होगा। इससे तुमलोग निश्चय ही रोगमुक्त हो जाओगे।

गणपतिखण्ड

३५३


पूर्वकालमें अहल्याका हरण करनेके कारण गौतमके शापसे जब इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग हो गये थे, उस संकट-कालमें बृहस्पतिजीने प्रेमपूर्वक पापयुक्त इन्द्रको जो कवच दिया था, वही अपूर्व सूर्यकवच मैं तुमलोगोंको प्रदान करता हूँ।

बृहस्पतिने कहा— इन्द्र! सुनो। मैं उस परम अद्भुत कवचका वर्णन करता हूँ जिसे धारण करके मुनिगण पवित्र हो भारतवर्षमें जीवन्मुक्त हो गये। इस कवचके धारण करनेवालेके संनिकट व्याधि भयके मारे उसी प्रकार नहीं जाती है, जैसे गरुड़को देखकर साँप दूर भाग जाते हैं। इसे अपने शिष्यको, जो गुरुभक्त और शुद्ध हो, बतलाना चाहिये परंतु जो दूसरेके दुष्ट स्वभाववाले शिष्यको देता है, वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इस जगद्विलक्षण कवचके प्रजापति ऋषि हैं, गायत्री छन्द है और स्वयं सूर्य देवता हैं। व्याधिनाश तथा सौन्दर्यके लिये इसका विनियोग किया जाता है। यह सारस्वरूप कवच तत्काल ही पवित्र करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। 'ह्रीं ॐ क्लीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरे मस्तककी रक्षा करे। अष्टादशाक्षर$^१$-मन्त्र सदा मेरे कपालको बचावे। 'ॐ ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीसूर्याय स्वाहा' मेरी नासिकाको सुरक्षित रखे। सूर्य मेरे नेत्रोंकी, विकर्तन पुतलियोंकी, भास्कर ओठोंकी और दिनकर दाँतोंकी रक्षा करें। प्रचण्ड मेरे गण्डस्थलका, मार्तण्ड कानोंका, मिहिर स्कन्धोंका और पूषा जंघाओंका सदा पालन करें। रवि मेरे वक्षःस्थलकी, स्वयं सूर्य नाभिकी और सर्वदेवनमस्कृत कङ्कालकी सदा देख-रेख करें। ब्रध्न हाथोंको, प्रभाकर पैरोंको और सामर्थ्यशाली विभाकर मेरे सारे शरीरको निरन्तर सुरक्षित रखें। वत्स! यह 'जगद्विलक्षण' नामक कवच अत्यन्त मनोहर तथा त्रिलोकीमें परम दुर्लभ है। इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। पूर्वकालमें पुलस्त्यने पुष्करक्षेत्रमें प्रसन्न होकर इसे मनुको दिया था, वही मैं तुम्हें दे रहा हूँ। इसे तुम जिस-किसीको मत दे देना। इस कवचकी कृपासे तुम्हारा रोग नष्ट हो जायगा और तुम नीरोग तथा श्रीसम्पन्न हो जाओगे—इसमें संशय नहीं है। एक लाख वर्षतक हविष्य-भोजनसे मनुष्यको जो फल मिलता है, वह फल निश्चय ही इस कवचके धारणसे प्राप्त हो जाता है। इस कवचको जाने बिना जो मूर्ख सूर्यकी भक्ति करता है, उसे दस लाख जप करनेपर भी मन्त्रसिद्धि नहीं प्राप्त होती।

ब्रह्माने कहा— वत्स! इस कवचको धारण करके सूर्यका स्तवन करनेपर तुमलोग रोग-मुक्त हो जाओगे—यह निश्चित है। सूर्य-स्तवनका वर्णन सामवेदमें हुआ है। यह व्याधिविनाशक, सर्वपापहारी, परमोत्कृष्ट, साररूप और श्री तथा आरोग्यको देनेवाला है।

भगवन्! जो सनातन ब्रह्म, परमधाम, ज्योतीरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, त्रिलोकीके नेत्ररूप, जगन्नाथ, पापनाशक, तपस्याओंके फलदाता, पापियोंको सदा दुःखदायी, कर्मानुरूप फल प्रदान करनेवाले, कर्मके बीजस्वरूप, दयासागर, कर्मरूप, क्रियारूप, रूपरहित, कर्मबीज, ब्रह्मा, विष्णु और महेशके अंशरूप, त्रिगुणात्मक, व्याधिदाता, व्याधिहन्ता, शोक-मोह-भयके विनाशक, सुखदायक, मोक्षदाता, साररूप, भक्तिप्रद, सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वेश्वर, सर्वरूप, सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी, समस्त लोकोंके दृष्टिगोचर, अप्रत्यक्ष, मनोहर, निरन्तर रसको हरनेवाले, तत्पश्चात् रसदाता, सर्वसिद्धिप्रद, सिद्धस्वरूप, सिद्धेश और सिद्धोंके परम गुरु हैं, उन आपकी मैं स्तुति करना चाहता हूँ। वत्स! मैंने इस स्तवराजका वर्णन कर दिया। यह गोपनीयसे भी परम गोपनीय है।$^२$ जो नित्य


१. 'ॐ ह्रीं नमो भगवते सूर्याय परमात्मने स्वाहा'।
२. ब्रह्मोवाच—
वं ब्रह्म परमधाम ज्योतीरूपं सनातनम्। त्वामहं स्तोतुमिच्छामि भक्तानुग्रहकारकम्॥

३५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तीनों काल इसका पाठ करता है, वह समस्त व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है। उसके अंधापन, कोढ़, दरिद्रता, रोग, शोक, भय और कलह—ये सभी विश्वेश्वर सूर्यकी कृपासे निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। जो भयंकर कुष्ठसे दुःखी, गलित अङ्गोंवाला, नेत्रहीन, बड़े-बड़े घावोंसे युक्त, यक्ष्मासे ग्रस्त, महान् शूलरोगसे पीड़ित अथवा नाना प्रकारकी व्याधियोंसे युक्त हो, वह भी यदि एक मासतक हविष्यान्न भोजन करके इस स्तोत्रका श्रवण करे तो निश्चय ही रोगमुक्त हो जाता है और उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। अतः पुत्रो! तुमलोग शीघ्र ही पुष्करमें जाओ और वहाँ सूर्यका भजन करो। यों कहकर ब्रह्मा आनन्दपूर्वक अपने भवनको चले गये। इधर वे दोनों दैत्य सूर्यकी सेवा करके नीरोग हो गये। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने तुम्हारे पूछे हुए विघ्नेश्वरके विघ्नका कारण तथा सर्वविघ्नहर सूर्यकवच और सूर्यस्तवादि सुना दिये। अब तुम्हारी और क्या सुननेकी इच्छा है? (अध्याय १९)

भगवान् नारायणके निवेदित पुष्पकी अवहेलनासे इन्द्रका श्रीभ्रष्ट होना, पुनः बृहस्पतिके साथ ब्रह्माके पास जाना, ब्रह्माद्वारा दिये गये नारायणस्तोत्र, कवच और मन्त्रके जपसे पुनः श्री प्राप्त करना

तब श्रीनारायणने कहा—नारद! एक बार देवराज इन्द्र निर्जन वनमें, एक पुष्पोद्यानमें गये थे। वहाँ रम्भा अप्सरासे उनका समागम हुआ। तदनन्तर वे दोनों जलविहार करने लगे। इसी बीच मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वैकुण्ठसे कैलास जाते हुए शिष्यमण्डलीसहित वहाँ आ पहुँचे। देवराज इन्द्रने उन्हें प्रणाम किया। मुनिने आशीर्वाद दिया। फिर भगवान् नारायणका दिया हुआ पारिजात-पुष्प इन्द्रको देकर मुनिने कहा—'देवराज! भगवान् नारायणके निवेदित यह पुष्प सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। यह जिसके मस्तकपर रहेगा, वह सर्वत्र विजय प्राप्त करेगा और देवताओंमें अग्रगण्य होकर अग्रपूजाका अधिकारी होगा। महालक्ष्मी छायाकी तरह सदा उसके साथ रहेगी। वह ज्ञान, तेज, बुद्धि, बल—सभी बातोंमें सब देवताओंसे श्रेष्ठ और भगवान् हरिके तुल्य पराक्रमी होगा। परंतु जो पामर अहंकारवश भगवान् श्रीहरिके निवेदित इस पुष्पको मस्तकपर धारण नहीं करेगा, वह अपनी जातिवालोंके सहित श्रीभ्रष्ट हो जायगा।' इतना कहकर दुर्वासाजी शंकरालयको चले गये। इन्द्रने उस पुष्पको अपने सिरपर न धारण करके ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। इससे इन्द्र श्रीभ्रष्ट हो गये। इन्द्रको श्रीभ्रष्ट देख रम्भा उन्हें छोड़कर स्वर्ग चली गयी। गजराज इन्द्रको नीचे गिराकर महान् अरण्यमें चला गया और हथिनीके साथ

त्रैलोक्यलोचनं लोकनाथं पापप्रमोचनम्। तपसां फलदातारं दुःखदं पापिनां सदा॥
कर्मानुरूपफलदं कर्मबीजं दयानिधिम्। कर्मरूपं क्रियारूपमरूपं कर्मबीजकम्॥
ब्रह्मविष्णुमहेशानामंशं च त्रिगुणात्मकम्। व्याधिदं व्याधिहन्तारं शोकमोहभयापहम्।
सुखदं मोक्षदं सारं भक्तिदं सर्वकामदम्॥
सर्वेश्वरं सर्वरूपं साक्षिणं सर्वकर्मणाम्।
प्रत्यक्षं सर्वलोकानामप्रत्यक्षं मनोहरम्॥
शश्वद् रसहरं पश्चाद् रसदं सर्वसिद्धिदम्।
सिद्धिस্বরূপं सिद्धेशं सिद्धानां परमं गुरुम्।
स्तवराजमिति प्रोक्तं गुह्याद्गुह्यतरं परम्। (१९। ३६–४२)

गणपतिखण्ड ३५५

विहार करने लगा। उस वनमें उसके बहुत-से बच्चे हुए। इसी समय श्रीहरिने उस हाथीका मस्तक काटकर बालक (गणेश)-के सिरपर लगा दिया। वत्स! गजमुखके लगानेका प्रसङ्ग तुमको सुना दिया। इसके श्रवणसे पाप नष्ट होते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो, सो कहो।

नारदने पूछा— प्रभो! किस ब्रह्मशापके कारण वे सभी देवता श्रीभ्रष्ट हो गये थे। पुनः किस प्रकार उन्होंने उन जगज्जननी कमलाको प्राप्त किया? उस समय महेन्द्रने क्या किया? आप उस परम दुर्लभ गोपनीय रहस्यको बतलानेकी कृपा करें।

नारायणने कहा— नारद! जिसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द हो गयी थी, श्रीसे भ्रष्ट होनेके कारण जिसपर दीनता छायी हुई थी और जिसका आनन्द नष्ट हो गया था, वह इन्द्र गजेन्द्र और रम्भासे पराभूत होकर अमरावतीमें गया। मुने! वहाँ उसने देखा कि उस पुरीमें आनन्दका नामनिशान नहीं है। वह दीनतासे ग्रस्त, बन्धुओंसे हीन और शत्रुवर्गोंसे खचाखच भर गयी है। तब दूतके मुखसे सारा वृत्तान्त सुनकर वह गुरु बृहस्पतिके घर गया और फिर गुरु तथा देवगणोंके साथ वह ब्रह्माकी सभामें जा पहुँचा। वहाँ जाकर देवताओंसहित इन्द्रने तथा बृहस्पतिने ब्रह्माको नमस्कार किया और भक्तिभावसहित वेदविधिके अनुसार स्तोत्रद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् बृहस्पतिने प्रजापति ब्रह्मासे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माने नीचे मुख करके कहना आरम्भ किया।

ब्रह्मा बोले— देवेन्द्र! तुम मेरे प्रपौत्र हो और श्रीसम्पन्न होनेसे सदा प्रज्वलित होते रहते हो। किंतु राजन्! लक्ष्मीके समान सुन्दरी शचीके पति होनेपर भी तुम आचरणभ्रष्ट हो जाते हो। जो आचरणभ्रष्ट होता है, उसे लक्ष्मी अथवा यशकी प्राप्ति कहाँसे हो सकती है? वह पापी तो सदा सभी सभाओंमें निन्दाका विषय बना रहता है। रम्भाने तुम्हें हतबुद्धि बना दिया था। इसी कारण तुमने दुर्वासाद्वारा दिये गये श्रीहरिके नैवेद्यको गजराजके मस्तकपर डाल दिया। इस समय सबके द्वारा भोगी जानेवाली वह रम्भा कहाँ है और श्रीसे भ्रष्ट हुए तुम कहाँ ? जिसके कारण तुम्हें लक्ष्मीसे रहित होना पड़ा, वह रम्भा भी तुम्हें क्षणभरमें ही त्यागकर चली गयी; क्योंकि वेश्या चञ्चला होती है। वह धनवानोंको ही पसंद करती है, निर्धनोंको नहीं तथा प्राचीन प्रेमीका तिरस्कार करके नये-नये नायकोंको खोजती रहती है। परंतु वत्स ! जो बीत गया, वह तो चला ही गया; क्योंकि बीता हुआ पुनः वापस नहीं आता। अब तुम लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक नारायणका भजन करो।

इतना कहकर नारायणपरायण ब्रह्माने इन्द्रको जगत्स्रष्टा नारायणका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दिया। तब इन्द्र देवताओं तथा गुरुके साथ पुष्करमें जाकर अपने अभीप्सित मन्त्रका जप करने लगे और कवच ग्रहण करके उसके द्वारा श्रीहरिकी स्तुतिमें तत्पर हो गये। इस प्रकार