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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

४६- बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पति-का इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६२९

कौथुमीशाखामें देखे गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! 'रा' शब्दके उच्चारणमात्रसे ही माधव हृष्ट-पुष्ट हो जाते हैं और 'धा' शब्दका उच्चारण होनेपर तो अवश्य ही भक्तके पीछे वेगपूर्वक दौड़ पड़ते हैं। जो पहले पुरुषवाची शब्दका उच्चारण करके पीछे प्रकृतिका उच्चारण करता है, वह वेदकी मर्यादाका उल्लङ्घन करनेके कारण मातृहत्याके पापका भागी होता है। तीनों लोकोंमें पुण्यदायक कर्मक्षेत्र होनेके कारण भारतवर्ष धन्य है। उसमें भी श्रीराधाचरणारविन्दोंकी रेणुसे पवित्र हुआ वृन्दावन अतिशय धन्य है। राधाके चरणकमलोंकी पवित्र धूल प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माजीने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी।

नारदजीने पूछा—पूर्णमासी बीत जानेपर जगदीश्वर श्रीकृष्णने क्या किया? उस समय उनकी कौन-सी रहस्यलीला हुई? यह बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—रासमण्डलमें रासलीला सम्पन्न करके स्वयं रासेश्वर श्यामसुन्दर रासेश्वरी राधाके साथ यमुनातटपर गये, वहाँ स्नान एवं निर्मल जलका पान करके उन्होंने कालिन्दीके स्वच्छ सलिलमें गोपाङ्गनाओंके साथ जलक्रीड़ा की। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण राधिकाजीके साथ भाण्डीर वनमें चले गये। इधर प्रेमविह्वला गोपियाँ अपने-अपने घरोंको लौट गयीं। उस समय श्यामसुन्दर श्रीराधाके साथ मालतीकानन, वासन्तीकानन, चन्दनकानन तथा चम्पककानन आदि मनोहर वनोंमें क्रीड़ा करते रहे। फिर पद्मवनमें रातको शयन किया। प्रातःकाल उन्होंने देखा, प्रियाजी फूलोंकी शय्यापर सो रही हैं। शरत्कालिक चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले उनके सुन्दर मुखपर पसीनेकी बूँदें दिखायी दे रही हैं। सिन्दूर लुप्त हो गया है, कज्जल मिट गया है, अधरोंकी लाली भी लुप्तप्राय हो गयी है और कपोलोंकी पत्र-रचना मिट गयी है। उनकी वेणी खुल गयी है, नेत्रकमल बंद हैं और रत्नोंके बने हुए दो बहुमूल्य कुण्डलोंसे उनके मुखमण्डलकी अपूर्व शोभा हो रही है। दन्तपंक्तिसे सुशोभित मुख मानो गजमुक्तासे अलंकृत एवं उद्दीप्त है। प्रियाजीको इस अवस्थामें देख भक्तवत्सल माधवने अग्निशुद्ध महीन वस्त्रसे उनके मुखको बड़े प्रेम और भक्तिभावसे पोंछा। फिर केशोंको सँवारकर उनकी चोटी बाँध दी। उस चोटीमें माधवी और मालतीके फूलोंकी माला लगा दी, जिससे उसकी शोभा बहुत बढ़ गयी। वह चोटी रत्नयुक्त रेशमी डोरोंसे बँधी थी। उसकी आकृति सुन्दर, वक्र, मनोहर और अत्यन्त गोल थी। कुन्दके फूलोंसे भी उसका शृङ्गार किया गया था। वेणी बाँधनेके पश्चात् श्यामसुन्दरने प्रियाजीके भाल-देशमें सिन्दूरका तिलक लगाया। उसके नीचे उज्ज्वल चन्दनका शृङ्गार किया। फिर कस्तूरीकी बेंदीसे उनके ललाटकी शोभा बढ़ायी। तत्पश्चात् दोनों कपोलोंपर चित्र-विचित्र पत्र-रचना की। नेत्रकमलोंमें भक्तिभावसे काजल लगाया, जिससे उनका सौन्दर्य खिल उठा। फिर बड़े अनुरागसे राधाके अधरोंमें लाली लगायी। कानमें दो अत्यन्त निर्मल आभूषण पहनाये। गलेमें बहुमूल्य रत्नोंका हार पहनाया, जो उनके वक्षःस्थलको उद्भासित कर रहा था। वह हार मणियोंकी लड़ियोंसे प्रकाशित हो रहा था। तदनन्तर बहुमूल्य, दिव्य, अग्निशुद्ध तथा सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत वस्त्र पहनाया, जो कस्तूरी और कुंकुमसे अभिषिक्त था। दोनों चरणोंमें रत्ननिर्मित मञ्जीर पहनाये और पैरोंकी अँगुलियों एवं नखोंमें भक्तिभावसे महावर लगाया।

६३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो तीनों लोकोंके सत्पुरुषोंद्वारा सेव्य हैं; उन श्यामसुन्दरने अपनी सेव्यरूपा प्राणवल्लभाकी सेवा की। तदनन्तर सेवकोचित भक्तिसे श्वेत चँवर डुलाया। यह कैसी अद्भुत बात है। इसके बाद समस्त भावोंके जानकारोंमें श्रेष्ठ बोधकलाके ज्ञाता एवं विलास-शास्त्रके मर्मज्ञ श्रीहरिने अपनी प्राणवल्लभाको जगाया और अपने वक्षःस्थलमें उनके लिये स्थान दिया।

इस प्रकार श्रीराधाको जगाकर श्रीकृष्णने उन्हें भाँति-भाँतिके पुष्पमाला, आभूषण तथा कौस्तुभमणि आदिके द्वारा सुसज्जित किया। रत्नपात्रमें भोजन और जल प्रस्तुत किये। इसी समय चरण-चिह्नोंको पहचानती हुई श्रीराधाकी सुप्रतिष्ठित सहचरी सुशीला आदि छत्तीस गोपियाँ अन्यान्य बहुसंख्यक गोपाङ्गनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथमें चन्दन था और किन्हींके हाथमें कस्तूरी। कोई चँवर लिये आयी थी और कोई माला। कोई सिन्दूर, कोई कंघी, कोई आलता (महावर) और कोई वस्त्र लिये हुए थी। कोई अपने हाथमें दर्पण, कोई पुष्पपात्र, कोई क्रीड़ाकमल, कोई फूलोंके गजरे, कोई मधुपात्र, कोई आभूषण, कोई करताल, कोई मृदंग, कोई स्वर-यन्त्र और कोई वीणा लिये आयी थीं। जो छत्तीस राग-रागिनियाँ गोपीका रूप धारण करके गोलोकसे राधाके साथ भारतवर्षमें आयी थीं, वे सब वहाँ उपस्थित हुईं। कई गोपियाँ वहाँ आकर नाचने और गाने लगीं तथा कोई श्वेत चँवर डुलाकर राधाकी सेवा करने लगीं। महामुने! कुछ गोपियाँ प्रसन्नतापूर्वक देवी राधाके पैर दबाने लगीं। एकने उन्हें चबानेके लिये पानका बीड़ा दिया। इस प्रकार पवित्र वृन्दावनमें श्रीराधाके वक्षःस्थलमें विराजमान भगवान् श्यामसुन्दर कौतूहलपूर्वक गोपियोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। वत्स! इस प्रकार मैंने श्रीहरिकी रासक्रीड़ाका वर्णन किया। वे भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय रूपधारी, परिपूर्णतम परमात्मा, निर्गुण, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे भी परे, सर्वसमर्थ और ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदिके भी परमेश्वर हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णजन्मका रहस्य, मनको प्रिय लगनेवाली उनकी बाललीला तथा किशोर-लीलाका भी वर्णन किया गया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

नारदजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ! इसके बाद कौन-सी रहस्य-लीला हुई? भगवान् श्रीकृष्ण किस प्रकार नन्दभवनसे मथुराको गये? श्रीहरिके वियोगसे पीड़ित हुए नन्दने कैसे अपने प्राण धारण किये? जिनका चित्त सदा श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही लगा रहता था, वे गोपाङ्गनाएँ और यशोदाजी भी कैसे जीवन धारण कर सकीं? जो आँखोंकी पलक गिरनेतकका भी वियोग होनेपर जीवित नहीं रह सकती थीं; वे ही देवी श्रीराधा अपने प्राणेश्वरके बिना किस तरह प्राणोंको रख सकीं? जो-जो गोप शयन, भोजन तथा अन्यान्य सुखोंके उपभोग-कालमें सदा श्रीकृष्णके साथ रहे; वे अपने वैसे प्रेमी बान्धवको ब्रजमें रहते हुए कैसे भूल सके? श्रीकृष्णने मथुरामें जाकर कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? परमधाम-गमनपर्यन्त उन्होंने जो कुछ किया हो, उसे आप बतानेकी कृपा करें।

श्रीनारायणने कहा—महामुने! कंसने धनुषयज्ञ नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें उस राजाका निमन्त्रण पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी गये थे। राजा कंसने श्रीकृष्णको बुलानेके लिये भगवद्भक्त अक्रूरको उनके पास भेजा था।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६३१

अक्रूरजी राजा कंसकी आज्ञा पाकर नन्दभवनमें गये और श्रीकृष्णको उनके साथियोंसहित साथ ले मथुरामें लौट आये। मुने! मथुरा जाकर श्रीकृष्णने राजा कंसको मार डाला। एक धोबीको, चाणूर और मुष्टिक नामक मल्लको तथा कुवलयापीड़ नामक हाथीको वे पहले ही कालके गालमें भेज चुके थे। कंस-वधके अनन्तर बान्धव श्रीकृष्णने माता-पिता तथा भाई-बन्धुओंका उद्धार किया। श्रीहरिने कृपापूर्वक एक मालीको भी मोक्ष प्रदान किया। फिर गोपियोंपर दया आनेसे उद्धवको ब्रजमें भेजकर उन्हींके द्वारा उन्हें समझाया-बुझाया और धीरज बँधाया। तदनन्तर उपनयन-संस्कारके पश्चात् भगवान् अवन्तीनगर (उज्जैन)-में गये और वहाँ गुरु सान्दीपनि मुनिसे विद्या ग्रहण की। उसके बाद जरासंधको जीतकर यवनराजका वध किया और विधिपूर्वक उग्रसेनको राजाके पदपर बिठाया। समुद्रके निकट जा वहाँ द्वारकापुरीका निर्माण कराया और राजाओंके समूहको जीतकर वे रुक्मिणीदेवीको हर लाये। फिर कालिन्दी, लक्ष्मणा, शैव्या, सत्या, सती जाम्बवती, मित्रविन्दा तथा नाग्नजितीके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् भयानक संग्रामके द्वारा प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश नरकका वध करके उन्होंने सोलह हजार राजकुमारियोंका उद्धार किया और उन्हें पत्नीरूपमें अपनाकर उनके साथ विहार किया। इन्द्रदेवको लीलापूर्वक परास्त करके पारिजातका अपहरण किया और भगवान् शंकरको जीतकर बाणासुरके हाथ काट दिये तथा अपने पौत्र अनिरुद्धको छुड़ाया और फिर द्वारकामें आकर अपने-आपको अपनी प्रत्येक रानीके महलमें उपस्थित दिखाया। वसुदेवजीके यज्ञमें तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे आयी हुई अपने प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधाके दर्शन किये। फिर वे उनके साथ पुण्यमय वृन्दावनमें गये। भारतके उस पुण्यक्षेत्रमें उन जगदीश्वरने श्रीराधाके साथ पुनः चौदह वर्षोंतक रासमण्डलमें रास किया। उन्होंने नन्द-भवनमें पूरे ग्यारह वर्षकी अवस्थातक निवास किया था। फिर मथुरा और द्वारकामें उन भगवान्‌के पूरे सौ वर्ष व्यतीत हुए। उन दिनों महापराक्रमी श्रीहरिने वहाँ रहकर भूतलका भार उतारा था। मुने! इस तरह वे एक सौ पचीस वर्षोंतक भूतलपर रहकर गोलोकमें गये। वहाँ उन्होंने मैया यशोदा और नन्दबाबाको तथा बुद्धिमान् वृषभानु एवं राधा-माता कलावतीको सामीप्य-मुक्ति प्रदान की। श्रीकृष्ण और गोपियोंके साथ राधाने कौतूहलवश प्रत्येक युगमें वेदवर्णित धर्मका सेतु बाँधा। महामुने! इस प्रकार मैंने थोड़ेमें श्रीकृष्णका सारा रम्य चरित्र कह सुनाया जो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् नश्वर ही है; अतः तुम परमानन्दमय नन्दनन्दनका सानन्द भजन करो। वे स्वेच्छामय परब्रह्म परमात्मा परमेश्वर, अविनाशी, अव्यक्त, भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही शरीर धारण करनेवाले, सत्य, नित्य, स्वतन्त्र, सर्वेश्वर, प्रकृतिसे परे, निर्गुण, निरीह, निराकार और निरञ्जन हैं। (अध्याय ५२—५४)