ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६३- वसुदेवजीका नन्दगाँवमें पहुँचकर शय्यापर यशोदाजीको निद्रित अवस्थामें देखकर तुरंत ही पुत्र (श्रीकृष्ण)-को शय्यापर सुलाकर तथा उनके बदले सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक बालिकाको गोदमें लेकर मथुराके लिये प्रस्थान करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४४५
लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, ब्रह्मा, शिव, शेषनाग
और धर्म- ये सब मेरे प्राणोंके समान हैं; परंतु
तुम मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारी हो। राधिके!
ये सब देवता और देवियाँ मेरे निकट हैं; परंतु
तुम यदि इनसे अधिक न होतीं तो मेरे वक्षः-
स्थलमें कैसे विराजमान हो सकती थीं ? सुशीले
राधे ! आँसू बहाना छोड़ो। साथ ही इस निष्फल
भ्रमका परित्याग करो। शङ्का छोड़कर निर्भीक-
भावसे वृषभानुके घरमें पधारो। सुन्दरि! नौ
मासतक कलावतीके पेटमें स्थित गर्भको मायाद्वारा
वायुसे भरकर रोके रहो। दसवाँ महीना आनेपर
तुम भूतलपर प्रकट हो जाना। अपने दिव्य रूपका
परित्याग करके शिशुरूप धारण कर लेना। जब
गर्भसे वायुके निकलनेका समय हो, तब कलावतीके
समीप पृथ्वीपर नग्न शिशुके रूपमें गिरकर निश्चय
ही रोना। साध्वि ! तुम गोकुलमें अयोनिजा-रूपसे
प्रकट होओगी। मैं भी अयोनिज-रूपसे ही अपने
आपको प्रकट करूँगा; क्योंकि हम दोनोंका गर्भमें
निवास होना सम्भव नहीं है। मेरे भूमिपर स्थित
होते ही पिताजी मुझे गोकुलमें पहुँचा देंगे।
वास्तवमें कंसके भयका बहाना लेकर मैं तुम्हारे
लिये ही गोकुलमें जाऊँगा। कल्याणि ! तुम वहाँ
यशोदाके मन्दिरमें मुझ नन्दनन्दनको प्रतिदिन
आनन्दपूर्वक देखोगी और हृदयसे लगाओगी।
राधिके ! मेरे वरदानसे तुम्हें समयपर मेरी स्मृति
होगी और मैं तुम्हारे साथ वृन्दावनमें नित्य
स्वच्छन्द विहार करूँगा। सुशीला आदि जो तैंतीस
तुम्हारी सखियाँ हैं, उनके तथा अन्यान्य बहुसंख्यक
गोपियोंके साथ तुम गोकुलको पधारो। असंख्य
गोपियोंको अपने मृतोपम एवं परिमित वाणीद्वारा
समझा-बुझाकर आश्वासन दे गोलोकमें ही रखकर
तुम्हें गोकुलमें जाना है। राधिके ! मैं भी इन
असंख्य गोपोंको यहीं स्थापित करके पीछेसे
वसुदेवके निवासस्थान मथुरापुरीमें पदार्पण करूँगा।
मेरे प्रिय-से-प्रिय गोप बहुत बड़ी संख्यामें मेरे
साथ क्रीडाके लिये व्रजमें चलें और वहाँ गोपोंके
घरमें जन्म लें।
नारद ! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये।
देवता, देवियाँ, गोप और गोपियाँ वहीं ठहर गयीं।
ब्रह्मा, शिव, धर्म, शेषनाग, पार्वती, लक्ष्मी और
सरस्वतीने बड़ी प्रसन्नताके साथ परात्पर श्रीकृष्णका
स्तवन किया। उस समय उनके विरहज्वरसे
व्याकुल तथा प्रेम-विह्वल गोपों और गोपियोंने भी
भक्तिभावसे वहाँ श्रीकृष्णकी स्तुति करके उनके
चरणोंमें मस्तक झुकाया। विरह-ज्वरसे कातर हुई
पूर्णमनोरथा राधाने भी अपने प्राणाधिक प्रियतम
हृदयवल्लभ श्रीकृष्णका भक्तिभावसे स्तवन किया।
उस समय श्रीराधाके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। वे
अत्यन्त दीन और भयसे व्याकुल दिखायी देती
थीं। उन्हें इस अवस्थामें देख स्वयं श्रीहरिने
सान्त्वना देनेके लिये यह सच्ची बात कही।
श्रीकृष्ण बोले- प्राणाधिके महादेवि ! सुस्थिर
होओ। भयका त्याग करो। जैसी तुम हो वैसा ही
मैं हूँ। मेरे रहते तुम्हें क्या चिन्ता है? श्रीदामके
शापकी सत्यताके लिये कुछ समयतक (बाह्यरूपमें)
मेरे साथ तुम्हारा वियोग रहेगा। तदनन्तर मैं
मथुरामें आ जाऊँगा। वहाँ भूतलका भार उतारना,
माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाना, माली, दर्जी और
कुब्जाका उद्धार करना, कालयवनको मरवाकर
मुचुकुन्दको मोक्ष देना, द्वारकाका निर्माण, राजसूय-
यज्ञका दर्शन, सोलह हजार एक सौ दस राजकन्याओंके
साथ विवाह करना, शत्रुओंका दमन, मित्रोंका
मया विना त्वं निर्जीवा चादृश्योऽहं त्वया विना। त्वया विना भवं कर्तुं नालं सुन्दरि निश्चितम् ॥
विना मृदा घटं कर्तुं यथा नालं कुलालकः । विना स्वर्णं स्वर्णकारोऽलंकारं कर्तुमक्षमः ॥
स्वयमात्मा यथा नित्यस्तथा त्वं प्रकृतिः स्वयम् । सर्वशक्तिसमायुक्ता सर्वधारा सनातनी ॥
( श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६ । २१४-२१८)
४४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उपकार, वाराणसीपुरीका दहन, महादेवजीको
जृम्भणास्त्रसे बाँधना, बाणासुरकी भुजाओंको काटना,
पारिजातका अपहरण, अन्यान्य कर्मोंका सम्पादन,
प्रभासतीर्थकी यात्रामें जाना, वहाँ मुनिमण्डलीका
दर्शन करना, ब्रजके बन्धुजनोंसे वार्तालाप, पिताके
यज्ञका सम्पादन, वहीं शुभ बेलामें पुनः तुम्हारे
साथ मिलन तथा गोपियोंका साक्षात्कार आदि
कार्य मुझे करने हैं। फिर तुम्हें अध्यात्मज्ञानका
उपदेश देकर वास्तवमें तुम्हारे साथ नित्य मिलनका
सौभाग्य प्राप्त करूँगा। इसके बाद मेरे साथ दिन-
रात तुम्हारा संयोग बना रहेगा। कभी क्षणभरके
लिये भी वियोग न होगा। इतना ही नहीं, वहाँसे
तुम्हारे साथ मेरा पुनः ब्रजमें आगमन होगा।
प्राणवल्लभे ! वियोगकालमें भी स्वप्नमें तुम्हारे साथ
मेरा सदैव मिलन होता रहेगा। तुमसे बिछुड़कर
द्वारकामें जानेपर मेरे और मेरे नारायणांशके द्वारा
उपर्युक्त कार्य सम्पादित होंगे। फिर वृन्दावनमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। फिर माता-पिता
तथा गोपियोंके शोकका पूर्णतः निवारण होगा।
भूतलका भार उतारकर तुम्हारे और गोप-गोपियोंके
साथ मेरा पुनः गोलोकमें आगमन होगा। राधे !
मेरे अंशभूत जो नित्य परमात्मा नारायण हैं, वे
लक्ष्मी और सरस्वतीके साथ वैकुण्ठलोकको
पधारेंगे। धर्म और मेरे अंशोंका निवासस्थान
श्वेतद्वीपमें होगा। देवताओं और देवियोंके अंश
भी अक्षय धामको पधारेंगे। फिर इसी गोलोकमें
तुम्हारे साथ मेरा निवास होगा। कान्ते ! इस प्रकार
समस्त भावी शुभाशुभका वर्णन मैंने कर दिया।
मेरे द्वारा जो निश्चय हो चुका है, उसका कौन
निवारण कर सकता है?
तदनन्तर श्रीहरिने देवताओं और देवियोंसे
समयोचित बात कही—देवताओ ! अब तुमलोग
भावी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने-अपने स्थानको
जाओ। पार्वति ! तुम अपने दोनों पुत्रों तथा
स्वामीके साथ कैलासको जाओ। मैंने जो कार्य
तुम्हारे जिम्मे लगाया है, वह सब यथासमय पूरा
होगा। ब्रजेश्वरि ! राधे ! गणेशजीको छोड़कर शेष
छोटे-बड़े सभी देवताओं और देवियोंका कलाद्वारा
भूतलपर अवतरण होगा।
तदनन्तर लक्ष्मी, सरस्वती तथा श्रीराधासहित
पुरुषोत्तम श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रणाम करके
सब देवता आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानको
चले गये। श्रीहरिने जिस कार्यका आयोजन किया
था, उसे सफल बनानेके लिये वे व्यग्रतापूर्वक
भूतलपर पधारे; क्योंकि स्वामीका बताया हुआ
स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ था।
श्रीकृष्णने राधासे कहा—प्रिये ! तुम
पूर्वनिश्चित गोप-गोपियोंके समुदायके साथ वृषभानुके
निवासगृहको पधारो। मैं मथुरापुरीमें वसुदेवके
घर जाऊँगा। फिर कंसके भयका बहाना बनाकर
गोकुलमें तुम्हारे समीप आ जाऊँगा।
लाल कमलके समान नेत्रोंवाली श्रीराधा
श्रीकृष्णको प्रणाम करके प्रेमविच्छेदके भयसे
कातर हो उनके सामने फूट-फूटकर रोने लगीं।
वे ठहर-ठहरकर कभी कुछ दूरतक जातीं और
जा-जाकर बार-बार लौट आती थीं। लौटकर
पुनः श्रीहरिका मुँह निहारने लगती थीं। सती
राधा शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी कान्तिसुधासे
पूर्ण प्रभुके मुखचन्द्रकी सौन्दर्य-माधुरीका अपने
निमेषरहित नेत्र-चकोरोंद्वारा पान करती थीं।
तदनन्तर परमेश्वरी राधा प्रभुकी सात बार परिक्रमा
करके सात बार प्रणाम करनेके अनन्तर पुनः
श्रीहरिके सामने खड़ी हुईं। इतनेमें ही करोड़ों
गोप-गोपियोंका समूह वहाँ आ पहुँचा। उन
सबके साथ श्रीराधाने पुनः श्रीकृष्णको प्रणाम
किया। तत्पश्चात् तैंतीस सखीस्वरूपा गोपकिशोरियों
और गोपसमूहोंके साथ सुन्दरी राधा श्रीहरिको
मस्तक झुकाकर भूतलके लिये प्रस्थित हुईं। वे
सब-के-सब श्रीहरिके बताये हुए स्थान नन्द-
गोकुलको गये। फिर राधा वृषभानुके घरमें और
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४४७
गोपियाँ अन्यान्य गोपोंके घरोंमें गयीं। गोप-
उन्हें कंसने तत्काल मार डाला। इस तरह उनके
गोपियोंसहित श्रीराधाके भूतलपर चले जानेपर
छः पुत्रोंको उसने कालके गालमें डाल दिया।
श्रीहरि भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचनेके लिये उत्सुक
देवकीका सातवाँ गर्भ शेषनागका अंश था, जिसे
हुए। गोलोकके गोपों और गोपियोंसे बात करके
योगमायाने खींचकर गोकुलमें निवास करनेवाली
उन्हें अपने-अपने कामोंमें लगाकर मनकी गतिसे
रोहिणीजीके गर्भमें स्थापित कर दिया। फिर वह
चलनेवाले जगदीश्वर श्रीहरि मथुरामें जा पहुँचे।
श्रीहरिकी आज्ञासे चली गयी।
पहले देवकी और वसुदेवके जो-जो पुत्र हुए,
(अध्याय ६)
श्रीकृष्णजन्म-वृत्तान्त - आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवकीके वधके लिये उद्यत
हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना, कंसद्वारा उसके छः पुत्रोंका वध, सातवें
गर्भका संकर्षण, आठवें गर्भमें भगवान्का आविर्भाव - देवताओंद्वारा
स्तुति, भगवान्का दिव्य रूपमें प्राकट्य, वसुदेवद्वारा उनकी स्तुति,
भगवान्का पूर्वजन्मके वरदानका प्रसङ्ग बताकर अपनेको व्रजमें ले
जानेकी बात बता शिशुरूपमें प्रकट होना, वसुदेवजीका व्रजमें
यशोदाके शयनगृहमें शिशुको सुलाकर नन्द-कन्याको ले
आना, कंसका उसे मारनेको उद्यत होना, परंतु
वसुदेवजी तथा आकाशवाणीके कथनपर
विश्वास करके कन्याको दे देना, वसुदेव-
देवकीका सानन्द घरको लौटना
नारदजीने पूछा- महाभाग ! श्रीकृष्णका जन्म-
फलरूपसे ही उन्होंने श्रीहरिको पुत्ररूपसे प्राप्त
वृत्तान्त महान् पुण्यप्रद और उत्तम है। वह जन्म,
किया था। देवमीढ़द्वारा मारिषाके गर्भसे महान्
मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। अतः आप
पुरुष वसुदेवका जन्म हुआ। उनके जन्मकालमें
इस प्रसङ्गको कुछ विस्तारके साथ बतलाइये।
अत्यन्त हर्षसे भरे हुए देवसमुदायने आनक और
वसुदेव किसके पुत्र थे और देवकी किसकी
दुन्दुभि नामक बाजे बजाये थे। इसलिये श्रीहरिके
कन्या थीं? देवकी और वसुदेव पूर्वजन्ममें कौन
जनक वसुदेवको प्राचीन संत-महात्मा 'आनकदुन्दुभि'
थे ? उनके विवाहका वृत्तान्त भी बताइये। अत्यन्त
कहते हैं। यदुकुलमें आहुकके पुत्र श्रीमान् देवक
क्रूर स्वभाववाले कंसने देवकीके छः पुत्रोंका वध
हुए थे, जो ज्ञानके समुद्र कहे जाते हैं। उन्हींकी
क्यों किया ? तथा श्रीहरिका जन्म किस दिन
पुत्री देवकी थीं। यदुकुलके आचार्य गर्गने
हुआ ? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। आप
वसुदेवके साथ देवकीका विधिपूर्वक यथोचित
कृपापूर्वक कहिये।
विवाहसम्बन्ध कराया था। देवकने विवाहके
श्रीनारायणने कहा - महर्षि कश्यप ही
लिये बहुत सामान एकत्र किये थे। उन्होंने उत्तम
वसुदेव हुए थे और देवमाता अदिति देवकीके
लग्नमें अपनी पुत्री देवकीको वसुदेवके हाथमें समर्पण
रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। पूर्वजन्मके पुण्यके
कर दिया। नारद ! देवकने दहेजमें सहस्रों घोड़े,
४४८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सहस्रों स्वर्णपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों
सुन्दरी दासियाँ, नाना प्रकारके द्रव्य, भाँति-
भाँतिके रत्न, उत्तम मणि, हीरे तथा रत्नमय पात्र
दिये थे। देवककी कन्या श्रेष्ठ रत्नमय आभूषणोंसे
विभूषित, सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती,
त्रिभुवनमोहिनी, धन्य, मान्य तथा श्रेष्ठ युवती
थी। रूप और गुणकी निधि थी। उसके मुखपर
मन्द मुस्कानकी छटा छायी रहती थी। उसे
रथपर बिठाकर वसुदेव जब प्रस्थान करने लगे,
तब बहिनके विवाहमें हर्षसे भरा हुआ कंस भी
उसके साथ चला। वह तत्काल देवकीके रथके
निकट आ गया। इसी समय कंसको सम्बोधित
करके आकाशवाणी हुई—'राजेन्द्र! क्यों हर्षसे
फूल उठे हो? यह सच्ची बात सुनो। देवकीका
आठवाँ गर्भ तुम्हारी मृत्युका कारण होगा।'
यह सुनकर महाबली कंसने हाथमें तलवार
ले ली। दैवी वाणीपर विश्वास करके भयभीत
और कुपित हो वह महापापी नरेश देवकीका
वध करनेके लिये उद्यत हो गया। वसुदेवजी बड़े
भारी पण्डित, नीतिज्ञ तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानमें
निपुण थे। उन्होंने कंसको देवकीका वध करनेके
लिये उद्यत देख उसे समझाना आरम्भ किया।
वसुदेवजी बोले- राजन् ! जान पड़ता है
तुम राजनीति नहीं जानते हो। मेरी बात सुनो।
यह तुम्हारे लिये हितकर और यशस्कर है। साथ
ही कलङ्कको दूर करनेवाली, शास्त्रोंद्वारा प्रतिपादित
तथा समयके अनुरूप भी है। भूपाल ! यदि
इसके आठवें गर्भसे ही तुम्हारी मृत्यु होनेवाली
है तो इस बेचारीका वध करके क्यों अपयश
लेते और अपने लिये नरकका मार्ग प्रशस्त करते
हो ? जीवमात्रके वधसे ही न्यूनाधिक पाप होता
है; परंतु ब्रह्महत्या बहुत बड़ा पातक है। स्त्रीका
वध करनेसे मनुष्यको ब्रह्महत्याके समान पाप
लगता है। विशेषतः यह तुम्हारी बहिन है।
तुमसे पालित और पोषित होने योग्य है तथा
तुम्हारी शरणमें आयी है। नरेश्वर ! इसका वध
करनेपर तुम्हें सौ स्त्रियोंकी हत्याका पाप लगेगा।
मनुष्य जप, तप, दान, पूजा, तीर्थदर्शन, ब्राह्मणभोजन
और होमयज्ञ आदिका अनुष्ठान स्वर्ग (दिव्य
सुख)-की प्राप्तिके लिये ही करता है। साधुपुरुष
समस्त संसारको पानीके बुलबुले और स्वप्नकी
भाँति निःसार एवं मिथ्या मानते और भयदायक
समझते हैं। इसीलिये वे सदैव यत्नपूर्वक धर्मका
अनुष्ठान करते हैं। यदुकुल-कमल-दिवाकर धर्मिष्ठ
नरेश्वर ! अपनी इस बहिनको छोड़ दो; मारो
मत। तुम्हारी राजसभामें कई प्रकारके विद्वान् हैं।
तुम उन सबसे पूछो कि इसके विषयमें
क्या करना चाहिये ? भाई ! इसके आठवें गर्भमें
जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे हाथमें दे
दूँगा। उससे मेरा क्या प्रयोजन है? अथवा
ज्ञानिशिरोमणे ! जितनी भी संतानें होंगी, उन
सबको मैं तुम्हारे हवाले कर दूँगा; क्योंकि
उनमेंसे एक भी मुझे तुमसे अधिक प्रिय नहीं
है। राजेन्द्र ! बहिनको जीवित छोड़ दो। यह तुम्हें
बेटीके समान प्यारी है। तुमने इस छोटी
बहिनको सदा मीठे अन्न-पान देकर पाल-
पोसकर बड़ा किया है।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४४९
वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजा कंसने
बहिनको छोड़ दिया। वसुदेवजी प्यारी पत्नीको
साथ लेकर अपने घर गये। नारद ! देवकीके
गर्भसे क्रमशः जो छः संतानें हुईं, उन्हें
वसुदेवजीने कंसको दे दिया; क्योंकि वे सत्यसे
बँधे हुए थे। कंसने क्रमशः उन सबको मार
डाला। देवकीके सातवें गर्भके आनेपर कंसने
भयके कारण उसकी रक्षाकी ओर विशेष ध्यान
दिया। परंतु योगमायाने उस गर्भको खींचकर
रोहिणीके पेटमें रख दिया। रक्षकोंने राजाको यह
सूचना दी कि देवकीका सातवाँ गर्भ गिर
गया। उसी गर्भसे भगवान् अनन्त प्रकट हुए,
जो 'संकर्षण' नामसे प्रसिद्ध हुए।
तदनन्तर देवकीका आठवाँ गर्भ प्रकट हुआ
जो वायुसे भरा हुआ था। नवाँ मास व्यतीत होनेके
पश्चात् दसवाँ मास उपस्थित होनेपर सर्वदर्शी
भगवान्ने उस गर्भपर दृष्टिपात किया। समस्त
नारियोंमें श्रेष्ठ देवी देवकी स्वयं तो रूपवती थीं
ही, भगवान्के दृष्टिपात करनेपर तत्काल ही
उनका सौन्दर्य चौगुना बढ़ गया। कंसने देखा,
देवकीके मुख और नेत्र खिल उठे हैं। वह तेजसे
प्रज्वलित हो योगमायाके समान दसों दिशाओंको
प्रकाशित कर रही है; मूर्तिमान् ज्योतिःपुञ्ज-सी
दिखायी देती है। उसे देख असुरराज कंसको
बड़ा विस्मय हुआ। उसने मन-ही-मन कहा-
'इस गर्भसे जो संतान होगी, वही मेरी मृत्युका
कारण है' - ऐसा कहकर कंस यत्नपूर्वक देवकी
और वसुदेवकी रखवाली करने लगा। उसने सात
द्वारवाले भवनमें उन दोनोंको रख छोड़ा था।
दसवें मासके पूर्ण होनेपर जब वह गर्भ वायुसे
पूर्ण हो गया। तब सबसे निर्लिप्त रहनेवाले
साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने देवकीके हृदय-कमलमें
निवास किया। उस समय महामनस्वी वसुदेवने
देवकीपर दृष्टिपात करके समझ लिया कि प्रसवकाल
सन्निकट आ गया है। फिर तो वे भगवान्
श्रीहरिका स्मरण करने लगे। रत्नमय प्रदीपसे युक्त
उस परम मनोहर भवनमें उन्होंने तलवार, लोहा,
जल और अग्निको लाकर रखा। मन्त्रज्ञ मनुष्य
तथा भाई-बन्धुओंकी स्त्रियोंको भी बुला लिया।
भयसे व्याकुल वसुदेवने विद्वान् ब्राह्मण तथा
बन्धुओंको भी सादर बुला भेजा। इसी समय जब
रातके दो पहर बीत गये, आकाशमें बादल घिर
आये, बिजलियाँ चमकने लगीं, अनुकूल वायु
चलने लगी तथा रक्षक निद्रित हो शय्यापर इस
तरह निश्चेष्ट सो गये, मानो मरकर अचेत हो गये
हों; तब धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगण वहाँ
आये तथा गर्भस्थ परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।
देवता बोले- भगवन् ! आप समस्त संसारकी
उत्पत्तिके स्थान हैं, किंतु आपकी उत्पत्तिका स्थान
कोई नहीं है। आप अनन्त, अविनाशी, निष्पाप,
सगुण, निर्गुण तथा महान् ज्योतिःस्वरूप हैं। आप
निराकार होते हुए भी भक्तोंके अनुरोधसे साकार
बन जाते हैं। आपपर किसीका अंकुश या
नियन्त्रण नहीं है। आप सर्वथा स्वच्छन्द, सर्वेश्वर,
सर्वरूप तथा समस्त गुणोंके आश्रय हैं। आप
संतोंको सुख देनेवाले, दुष्टोंको दुःख प्रदान करनेवाले,
दुर्गमस्वरूप एवं दुर्जनोंके नाशक हैं। आपतक
४५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तर्ककी पहुँच नहीं होती है। आप सबके आधार
हैं। शङ्का और उपद्रवसे शून्य हैं। उपाधिशून्य,
निर्लिप्त और निरीह हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं।
अपनी आत्मामें रमण करनेवाले पूर्णकाम, निर्दोष
और नित्य हैं। आप सौभाग्यशाली और दुर्भाग्यरहित
हैं तथा प्रवचनकुशल हैं। आपको रिझाना या
लाँघना कठिन ही नहीं, असम्भव है। आपके
निःश्वाससे वेदोंका प्राकट्य हुआ है; इसलिये
आप उनके प्रादुर्भावमें हेतु हैं। सम्पूर्ण वेद आपके
स्वरूप हैं। छन्द आदि वेदाङ्ग भी आपसे भिन्न
नहीं हैं। आप वेदवेत्ता और सर्वव्यापी हैं।
ऐसा कहकर देवताओंने बारंबार उनको
प्रणाम किया। उन सबके नेत्रोंमें हर्षके आँसू
छलक रहे थे। उन सबने फूलोंकी वर्षा की। जो
पुरुष प्रातःकाल उठकर (मूल श्लोकमें कहे
गये) बयालीस नामोंका पाठ करता है, वह
श्रीहरिकी दृढ़भक्ति, दास्यभाव तथा मनोवाञ्छित
फल पाता है*।
भगवान् नारायण कहते हैं - इस प्रकार
स्तुति सुनाकर देवतालोग अपने-अपने धामको
चले गये। फिर जलकी वृष्टि होने लगी। सारी
मथुरा नगरी निश्चेष्ट होकर सो रही थी। मुने ! वह
रात्रि घोर अन्धकारसे व्यास थी। जब रातके सात
मुहूर्त निकल गये और आठवाँ उपस्थित हुआ,
तब आधी रातके समय सर्वोत्कृष्ट शुभ लग्न
आया। वह वेदोंसे अतिरिक्त तथा दूसरोंके लिये
दुर्ज्ञेय लग्न था। उस लग्नपर केवल शुभ ग्रहोंकी
दृष्टि थी। अशुभ ग्रहोंकी नहीं थी। रोहिणी नक्षत्र
और अष्टमी तिथिके संयोगसे जयन्ती नामक योग
सम्पन्न हो गया था। मुने ! जब अर्धचन्द्रमाका
उदय हुआ, उस समय लग्नकी ओर देख-देखकर
भयभीत हुए सूर्य आदि सभी ग्रह आकाशमें
अपनी गतिके क्रमको लाँघकर मीन लग्नमें जा
पहुँचे। शुभ और अशुभ सभी वहाँ एकत्र हो गये।
विधाताकी आज्ञासे एक मुहूर्तके लिये वे सभी
ग्रह प्रसन्नतापूर्वक ग्यारहवें स्थानमें जाकर वहाँ
सानन्द स्थित हो गये। मेघ वर्षा करने लगे।
ठंडी-ठंडी हवा चलने लगी। पृथ्वी अत्यन्त प्रसन्न
थी। दसों दिशाएँ स्वच्छ हो गयी थीं। ऋषि, मनु,
यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, देवता और देवियाँ सभी
प्रसन्न थे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वराज
और विद्याधरियाँ गीत गाने लगीं। नदियाँ सुखपूर्वक
बहने लगीं। अग्निहोत्रकी अग्नयाँ प्रसन्नतापूर्वक
प्रज्वलित हो उठीं। स्वर्गमें दुन्दुभियों और आनकोंकी
मनोहर ध्वनि होने लगी। खिले हुए पारिजातके
पुष्पोंकी झड़ी लग गयी। पृथ्वी नारीका रूप
धारण करके स्वयं सूतिकागारमें गयी। वहाँ जय-
जयकार, शङ्खनाद तथा हरिकीर्तनका शब्द गूँज
रहा था। इसी समय सती देवकी वहाँ गिर पड़ीं।
उनके पेटसे वायु निकल गयी और वहीं भगवान्
श्रीकृष्ण दिव्यस्वरूप धारण करके देवकीके हृदयकमलके
कोशसे प्रकट हो गये। उनका शरीर अत्यन्त
कमनीय और परम मनोहर था। दो भुजाएँ थीं।
हाथमें मुरली शोभा पा रही थी। कानोंमें
- देवा ऊचुः -
जगद्योनिरयोनिस्त्वमनन्तोऽव्यय एव च । ज्योतिःस्वरूपो ह्यनघः सगुणो निर्गुणो महान् ॥
भक्तानुरोधात् साकारो निराकारो निरंकुशः । स्वेच्छामयश्च सर्वेशः सर्वः सर्वगुणाश्रयः ॥
सुखदो दुःखदो दुर्गो दुर्जनान्तक एव च । निर्व्यूहो निखिलाधारो निःशङ्को निरुपद्रवः ॥
निरुपाधिश्च निर्लिप्तो निरीहो निधनान्तकः । आत्मारामः पूर्णकामो निर्दोषो नित्य एव च ॥
सुभगो दुर्भगो वाग्मी दुराराध्यो दुरत्ययः । वेदहेतुश्च वेदाश्च वेदाङ्गो वेदविद् विभुः ॥
इत्येवमुक्त्वा देवाश्च प्रणेमुश्च मुहुर्मुहुः । हर्षाश्रुलोचनाः सर्वे ववृषुः कुसुमानि च ॥
द्विचत्वारिंशन्नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । दृढां भक्तिं हरेर्दास्यं लभते वाञ्छितं फलम् ॥
( श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७। ५५-६१)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४५१
मकराकृति कुण्डल झलमला रहे थे। मुख मन्द
हास्यकी छटासे प्रसन्न जान पड़ता था। वे भक्तोंपर
कृपा करनेके लिये कातर-से दिखायी पड़ते थे।
श्रेष्ठ मणि-रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित आभूषण
उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। पीताम्बरसे
सुशोभित श्रीविग्रहकी कान्ति नूतन जलधरके
समान श्याम थी। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और
कुंकुमके द्रवसे निर्मित अङ्गराग सब अङ्गोंमें लगा
हुआ था। उनका मुखचन्द्र शरत्पूर्णिमाके शशधरकी
शुभ्र ज्योत्स्नाको तिरस्कृत कर रहा था। बिम्बफलके
सदृश लाल अधरके कारण उसकी मनोहरता
और बढ़ गयी थी। माथेपर मोरपंखके मुकुट तथा
उत्तम रत्नमय किरीटसे श्रीहरिकी दिव्य ज्योति
और भी जाज्वल्यमान हो उठी थी। टेढ़ी कमर,
त्रिभङ्गी झाँकी, वनमालाका शृङ्गार, वक्षमें श्रीवत्सकी
स्वर्णमयी रेखा और उसपर मनोहर कौस्तुभमणिकी
भव्य प्रभा अद्भुत शोभा दे रही थी। उनकी
किशोर अवस्था थी। वे शान्तस्वरूप भगवान्
श्रीहरि ब्रह्मा और महादेवजीके भी परम कान्त
(प्राणवल्लभ) हैं। मुने! वसुदेव और देवकीने
उन्हें अपने समक्ष देखा। उन्हें बड़ा विस्मय
हुआ। वसुदेवजीने अपनी पत्नी देवकीके साथ
अश्रुपूर्णनयन, पुलकितशरीर तथा नतमस्तक हो
हाथ जोड़ भक्तिभावसे उनकी स्तुति की।
वसुदेवजी बोले—भगवन्! आप श्रीमान्
(सहज शोभासे सम्पन्न), इन्द्रियातीत, अविनाशी,
निर्गुण, सर्वव्यापी, ध्यानसे भी किसीके वशमें
न होनेवाले, सबके ईश्वर और परमात्मा हैं।
स्वेच्छामय, सर्वस्वरूप, स्वच्छन्द रूपधारी, अत्यन्त
निर्लिप्त, परब्रह्म तथा सनातन बीजरूप हैं। आप
स्थूलसे भी अत्यन्त स्थूल, सर्वत्र व्याप्त, अतिशय
सूक्ष्म, दृष्टिपथमें न आनेवाले, समस्त शरीरोंमें
साक्षीरूपसे स्थित तथा अदृश्य हैं। साकार,
निराकार; सगुण, गुणोंके समूह; प्रकृति, प्रकृतिके
शासक तथा प्राकृत पदार्थोंमें व्याप्त होते हुए भी
प्रकृतिसे परे विद्यमान हैं। विभो! आप सर्वेश्वर,
सर्वरूप, सर्वान्तक, अविनाशी, सर्वाधार, निराधार
और निर्व्यूह (तर्कके अविषय) हैं; मैं आपकी
क्या स्तुति करूँ? भगवान् अनन्त (सहस्रों
जिह्वावाले शेषनाग) भी आपका स्तवन करनेमें
असमर्थ हैं। सरस्वतीदेवीमें भी वह शक्ति नहीं
कि आपकी स्तुति कर सकें। पञ्चमुख महादेव
और छः मुखवाले स्कन्द भी जिनकी स्तुति नहीं
कर सकते, वेदोंको प्रकट करनेवाले चतुर्मुख
ब्रह्मा भी जिनके स्तवनमें सर्वदा अक्षम हैं
तथा योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु गणेश भी
जिनकी स्तुतिमें असमर्थ हैं; उन आपका स्तवन
ऋषि, देवता, मुनीन्द्र, मनु और मानव कैसे कर
सकते हैं? उनकी दृष्टिमें तो आप कभी आये
ही नहीं हैं। जब श्रुतियाँ आपकी स्तुति नहीं
कर सकतीं तो विद्वान् लोग क्या कर सकते हैं?
मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि आप
ऐसे दिव्य शरीरको त्यागकर बालकका रूप
धारण कर लें।
जो मनुष्य वसुदेवजीके द्वारा किये गये इस
स्तोत्रका तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है,
वह श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी दास्य-भक्ति प्राप्त कर
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लेता है। उसे विशिष्ट एवं हरिभक्त पुत्रकी प्राप्ति होती है। वह सारे संकटोंसे शीघ्र पार हो जाता और शत्रुके भयसे छूट जाता है*।
**भगवान् नारायण कहते हैं—**वसुदेवजीकी बात सुनकर भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर रहनेवाले प्रसन्नवदन श्रीहरिने स्वयं इस प्रकार कहा।
**श्रीकृष्ण बोले—**मैं तपस्याओंके फलसे ही इस समय तुम्हारा पुत्र हुआ हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो। तुम्हारा कल्याण होगा, इसमें संशय नहीं। पूर्वकालमें तुम तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ प्रजापति कश्यप थे और ये सुतपा माता अदिति तुम्हारे साथ थीं। तुमने अपनी इन तपस्विनी पत्नी अदितिके साथ तपस्याद्वारा मेरी आराधना की थी। वहाँ मुझे देखकर तुमने मेरे समान पुत्र होनेका वर माँगा और मैंने भी तुम्हें यह वर दिया कि मेरे समान पुत्रकी प्राप्ति होगी। तात! तुम्हें वर देकर मैंने मन-ही-मन विचार किया। फिर यह बात ध्यानमें आयी कि मेरे समान तो कोई त्रिभुवनमें है ही नहीं। इसलिये मैं स्वयं ही तुम्हारे पुत्रभावको प्राप्त हुआ। आप स्वयं कश्यपजी हैं और तपस्याके प्रभावसे इस समय मेरे पिता वसुदेव हुए हैं। ये उत्तम तपस्यावाली पतिव्रता देवमाता अदिति ही इस समय अपने अंशसे मेरी माता देवकीके रूपमें प्रकट हुई हैं। आप और माता अदितिसे ही मैं अंशतः वामनरूपमें अवतीर्ण हुआ था; किंतु इस समय आपके तपके फलसे मैं परिपूर्णतम परमात्मा ही पुत्ररूपमें प्रकट हुआ हूँ। महामते! तुम पुत्रभावसे या ब्रह्मभावसे जब मुझे पा गये हो तो अब निश्चय ही जीवन्मुक्त हो जाओगे। तात! अब तुम मुझे लेकर शीघ्र ही ब्रजमें चलो और यशोदाके घरमें मुझे रखकर वहाँ उत्पन्न हुई मायाको ले आओ तथा यहाँ अपने पास उसे रख लो। ऐसा कहकर श्रीहरि वहाँ तुरंत शिशुरूप हो गये।
श्यामल पुत्रको पृथ्वीपर नग्नभावसे सोया देख विष्णुकी मायासे मोहित हो वसुदेवजी सूतिकागारमें अपनी स्त्रीसे तन्द्रामें बोले—‘प्रिये! यह कैसा तेजःपुञ्ज है?’ ऐसा कह वसुदेवने पत्नीके साथ कुछ विचार करके बालकको गोदमें उठा लिया और उसे लेकर वे नन्द-गोकुलमें जा पहुँचे। वहाँ नन्दगाँवमें यशोदा नींदसे अचेत हो रही थीं। उन्होंने शय्यापर उन्हें निद्रित अवस्थामें देखा। साथ ही नन्दजी भी वहाँ नींदमें बेसुध हो रहे थे। वहाँ घरमें जो कोई भी प्राणी थे, सब सो गये थे। वसुदेवजीने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक नग्न बालिका पड़ी-पड़ी घरकी छतकी ओर दृष्टिपात
*श्रीमन्तमिन्द्रियातीतमक्षरं निर्गुणं विभुम्। ध्यानासाध्यं च सर्वेषां परमात्मानमीश्वरम्॥
स्वेच्छामयं सर्वरूपं स्वेच्छारूपधरं परम्। निर्लिप्तं परमं ब्रह्म बीजरूपं सनातनम्॥
स्थूलात् स्थूलतरं व्याप्तमतिसूक्ष्ममदर्शनम्। स्थितं सर्वशरीरेषु साक्षिरूपमदृश्यकम्॥
शरीरवन्तं सगुणमशरीरं गुणोत्करम्। प्रकृतिं प्रकृतीशं च प्राकृतं प्रकृतेः परम्॥
सर्वेशं सर्वरूपं च सर्वान्तकरमव्ययम्। सर्वाधारं निराधारं निर्व्यूहं स्तौमि किं विभो॥
अनन्तः स्तवनेऽशक्तोऽशक्ता देवी सरस्वती। यं स्तोतुमसमर्थश्च पञ्चवक्त्रः षडाननः॥
चतुर्मुखो वेदकर्ता यं स्तोतुमक्षमः सदा। गणेशो न समर्थश्च योगीन्द्राणां गुरोर्गुरुः॥
ऋषयो देवताश्चैव मुनीन्द्रमनुमानवाः। स्वप्ने तेषामदृश्यं च त्वामेवं किं स्तुवन्ति ते॥
श्रुतयः स्तवनेऽशक्ताः किं स्तुवन्ति विपश्चितः। विहायैवं शरीरं च बालो भवितुमर्हसि॥
वसुदेवकृतं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। भक्तिदास्यमवाप्नोति श्रीकृष्णचरणाम्बुजे॥
विशिष्टपुत्रं लभते हरिदासं गुणान्वितम्। सङ्कटं निस्तरेत् तूर्णं शत्रुभीत्या प्रमुच्यते॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७। ८०—९०)