ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२८- बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न
| ९४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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यतियों, वैष्णवों, ब्रह्मर्षियों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये गृहस्थोंकी अपेक्षा चौगुने शौचका विधान किया गया है। उपनयनरहित द्विज, शूद्र तथा स्त्रीके लिये उतने ही शौचका विधान है, जितनेसे उन-उन अङ्गोंमें लगे हुए मलके लेप और दुर्गन्ध मिट जायँ। क्षत्रिय और वैश्यके लिये भी गृहस्थ ब्राह्मणोंके समान शौचका विधान है। वैष्णव आदि मुनियोंके लिये दुगुना शौच कहा गया है। शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको शौचके उपर्युक्त नियममें न्यूनता या अधिकता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि विहित नियमका उल्लङ्घन करनेपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है।
नारद! अब तुम मुझसे शौच तथा उसके नियमके विषयमें सावधान होकर सुनो! मिट्टीसे शुद्धि करनेपर ही वास्तविक शुद्धि होती है। ब्राह्मण भी इस नियमका उल्लङ्घन करे तो वह अशुद्ध ही है। बाँबीकी मिट्टी, चूहोंकी खोदी हुई मिट्टी और पानीके भीतरकी मिट्टी भी शौचके उपयोगमें न लाये। शौचसे बची हुई मिट्टी, घरकी दीवारसे ली हुई मिट्टी तथा लीपने-पोतनेके काममें लायी हुई मिट्टी भी शौचके लिये त्याज्य है। जिसके भीतर प्राणी रहते हों, जहाँ पेड़से गिरे हुए पत्तोंके ढेर लगे हों तथा जहाँकी भूमि हलसे जोती गयी हो, वहाँकी भी मिट्टी न ले। कुश और दूर्वाके जड़से निकाली गयी, पीपलकी जड़के निकटसे लायी गयी तथा शयनकी वेदीसे निकाली गयी मिट्टीको भी शौचके काममें न लाये। चौराहेकी, गोशालाकी, गायकी खुरीकी, जहाँ खेती लहलहा रही हो, उस खेतकी तथा उद्यानकी मिट्टीको भी त्याग दे।
ब्राह्मण नहाया हो अथवा नहीं, उपर्युक्त शौचाचारके पालनमात्रसे शुद्ध हो जाता है तथा जो शौचसे हीन है, वह नित्य अपवित्र एवं समस्त कर्मोंके अयोग्य है। विद्वान् ब्राह्मण इस शौचाचारका पालन करके मुँह धोये। पहले सोलह बार कुल्ला करके मुख शुद्ध करनेके पश्चात् दँतुवनसे दाँतकी सफाई करे। फिर सोलह बार कुल्ला करके मुँह शुद्ध करे। नारद! दाँत माँजनेके लिये जो काठकी लकड़ी ली जाती है, उसके विषयमें भी कुछ नियम है, उसे सुनो। सामवेदमें श्रीहरिने आह्निक प्रकरणमें इसका निरूपण किया है। अपामार्ग (चिड़चिड़ा या ऊँगा), सिन्धुवार (सँभालू या निर्गुण्डी), आम, करवीर (कनेर), खैर, सिरस, जाति (जायफल), पुन्नाग (नागकेसर या कायफल), शाल (साखू), अशोक, अर्जुन, दूधवाला वृक्ष, कदम्ब, जामुन, मौलसिरी, उड़्र (अढ़उल) और पलाश—ये वृक्ष दँतुवनके लिये उत्तम माने गये हैं। बेर, देवदारु, मन्दार (आक), सेमर, कँटीले वृक्ष तथा लता आदिको त्याग देना चाहिये। पीपल, प्रियाल (पियाल), तिन्तिडीक (इमली), ताड़, खजूर और नारियल आदि वृक्ष दँतुवनके उपयोगमें वर्जित हैं। जिसने दाँतोंकी शुद्धि नहीं की, वह सब प्रकारके शौचसे रहित है। शौचहीन पुरुष सदा अपवित्र होता है। वह समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य है। शौचाचारका पालन करके शुद्ध हुआ ब्राह्मण स्नानके पश्चात् दो धुले हुए वस्त्र धारण करके पैर धो आचमनके पश्चात् प्रातः-कालकी संध्या करे।
इस प्रकार जो कुलीन ब्राह्मण तीनों संध्याओंके समय संध्योपासना करता है, वह समस्त तीर्थोंमें स्नानके पुण्यका भागी होता है। जो त्रिकाल संध्या नहीं करता, वह अपवित्र है। समस्त कर्मोंके अयोग्य है। वह दिनमें जो काम करता है, उसके फलका भागी नहीं होता। जो प्रातः और सायं संध्याका अनुष्ठान नहीं करता, वह शूद्रके समान है। उसको समस्त ब्राह्मणोचित कर्मसे बाहर निकाल देना चाहिये।* प्रातः, मध्याह्न और सायं-
* नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम्। स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥
(ब्रह्मखण्ड २६।५३)