सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

७१- श्रीकृष्ण, बलदेव और अन्य गोप-गोपियोंका गोकुल छोड़कर वृन्दावनके लिये प्रस्थान

४८८
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
श्रीकृष्ण क्षुधासे पीड़ित हो रहे हैं। नन्दने जैसे
भयभीत अच्युतको दिया था, उसी रूपमें वे इस
समय दिखायी दिये। राधा व्यथित-हृदयसे लंबी
साँस खींचकर इधर-उधर उस नव-तरुण श्रीकृष्णको
देखने और ढूँढ़ने लगीं। वे शोकसे पीड़ित और
विरहसे व्याकुल हो उठीं। उन्होंने कातरभावसे
श्रीकृष्णके उद्देश्यसे यह दीनतापूर्ण बात कही-
'मायेश्वर! आप अपनी इस दासीके प्रति ऐसी
माया क्यों करते हैं?' इतना कहकर राधा पृथ्वीपर
गिर पड़ीं और रोने लगीं। उधर बालकृष्ण भी
वहीं रो रहे थे। इसी समय आकाशवाणी हुई-
'राधे! तुम क्यों रोती हो? श्रीकृष्णके चरणकमलका
चिन्तन करो। जबतक रासमण्डलकी आयोजना
नहीं होती, तबतक प्रतिदिन रातमें तुम यहाँ
आओगी। अपने घरमें अपनी छाया छोड़कर
स्वयं यहाँ उपस्थित हो तुम श्रीहरिके साथ नित्य
मनोवाञ्छित क्रीड़ा करोगी। अतः रोओ मत।
शोक छोड़ो और अपने इन बालरूपधारी प्राणेश्वर
मायापतिको गोदमें लेकर घरको जाओ।'
जब आकाशवाणीने सुन्दरी राधाको इस
प्रकार आश्वासन दिया, तब उसकी बात सुनकर
राधाने बालकको गोदमें उठा लिया और पूर्वोक्त
पुष्पोद्यान, वन तथा उत्तम रत्नमण्डपकी ओर पुनः
दृष्टिपात किया। इसके बाद राधा वृन्दावनसे तुरंत
नन्द-मन्दिरकी ओर चल दीं। नारद ! वे देवी
मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली थीं। अतः
आधे निमेषमें वहाँ जा पहुँचीं। उनकी वाणी
स्निग्ध एवं मधुर थी। आँखें लाल हो गयी थीं।
वे यशोदाजीकी गोदमें उस बालकको देनेके लिये
उद्यत हो इस प्रकार बोलीं- 'मैया ! व्रजमें आपके
स्वामीने मुझे यह बालक घर पहुँचानेके लिये
दिया था। भूखसे आतुर होकर रोते हुए इस
स्थूलकाय शिशुको लेकर मैं रास्तेभर यातना भोग
रही हूँ। मेरा भीगा हुआ वस्त्र इस बच्चेके शरीरमें
सट गया है। आकाश बादलोंसे घिरा हुआ है।
अत्यन्त दुर्दिन हो रहा है, मार्गमें फिसलन हो
रही है। कीच-काच बढ़ गयी है। यशोदाजी !
अब मैं इस बालकका बोझ ढोनेमें असमर्थ हो
गयी हूँ। भद्रे ! इसे गोदमें ले लो और स्तन देकर
शान्त करो। मैंने बड़ी देरसे घर छोड़ रखा है;
अतः जाती हूँ। सती यशोदे ! तुम सुखी
रहो।' ऐसा कह बालक देकर राधा अपने घरको
चली गयीं। यशोदाने बालकको घरमें ले जाकर
चूमा और स्तन पिलाया। राधा अपने घरमें
रहकर बाह्यरूपसे गृहकर्ममें तत्पर दिखायी देती
थीं; परंतु प्रतिदिन रातमें वहाँ वृन्दावनमें जाकर
श्रीहरिके साथ क्रीड़ा करती थीं। वत्स नारद !
इस प्रकार मैंने तुमसे शुभद, सुखद तथा मोक्षदायक
पुण्यमय श्रीकृष्णचरित्र कहा। अब अन्य लीलाओंका
वर्णन करता हूँ, सुनो। (अध्याय १५)
वनमें श्रीकृष्णद्वारा बकासुर, प्रलम्बासुर और केशीका वध, उन सबका
गोलोकधाममें गमन, उनके पूर्वजीवनका परिचय, पार्वतीके त्रैमासिक
व्रतका सविधि वर्णन तथा नन्दकी आज्ञाके अनुसार
समस्त व्रजवासियोंका वृन्दावनमें गमन
भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! एक
समयकी बात है। माधव - श्रीकृष्ण अन्यान्य
बालकों और हलधरके साथ खा-पीकर खेलनेके
लिये श्रीवनमें गये। वहाँ मधुसूदनने नाना
प्रकारकी बालोचित क्रीड़ाएँ कीं। वह क्रीड़ा
समाप्त करके गोपबालकोंके साथ उन्होंने गोधनको
आगे बढ़ाया। वहाँ वनमें स्वादिष्ट जल पीकर
वे महाबली श्रीकृष्ण उस स्थानसे गोधनसहित

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४८९

मधुवनमें गये। उस वनमें एक बलवान् और भयंकर दैत्य था, जिसकी आकृति और मुख बड़े विकराल थे। उसका रंग सफेद था। वह पर्वताकार दैत्य बगुलेके आकारमें दिखायी देता था। उसने देखा, गोष्ठमें गौओंका समुदाय है और ग्वालबालोंके साथ केशव और बलराम भी विद्यमान हैं। फिर तो जैसे अगस्त्यने वातापिको उदरस्थ कर लिया था, उसी प्रकार वह दैत्य वहाँ सबको लीलापूर्वक लील गया। श्रीहरि बकासुरके ग्रास बन गये हैं, यह देख सब देवता भयसे काँप उठे। वे संत्रस्त हो हाहाकार करने लगे और हाथोंमें शस्त्र लेकर दौड़े। इन्द्रने दधीचिमुनिकी हड्डियोंका बना हुआ वज्र चलाया; किंतु उसके प्रहारसे बकासुर मर न सका। केवल उसकी एक पाँख जल गयी। चन्द्रमाने हिमपात किया; किंतु उससे उस दानवको केवल सर्दीके कष्टका अनुभव हुआ। सूर्यपुत्र यमने उसपर यमदण्ड मारा; उससे वह कुण्ठित हो गया—हिल-डुल न सका। वायुने वायव्यास्त्र चलाया, उससे वह एक स्थानसे उठकर दूसरे स्थानपर चला गया। वरुणने शिलाओंकी वर्षा की; उससे उसको बहुत पीड़ा हुई। अग्निदेवने आग्नेयास्त्र चलाकर उसकी सभी पाँखें जला दीं। कुबेरके अर्धचन्द्रसे उसके पैर कट गये। ईशानके शूलसे वह असुर मूर्च्छित हो गया। यह देख ऋषि और मुनि भयभीत हो श्रीकृष्णको आशीर्वाद देने लगे। इसी बीचमें श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो उठे। उन परमेश्वरने बाहर और भीतरसे दैत्यके सारे अङ्गोंमें दाह उत्पन्न कर दिया। तब उन सबका वमन करके उस दानवने प्राण त्याग दिये।

इस प्रकार बकासुरका वध करके बलवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालों और गौओंके साथ अत्यन्त मनोहर केलि-कदम्ब-काननमें जा पहुँचे। इसी समय वहाँ वृषरूपधारी प्रलम्ब नामक असुर आ पहुँचा, जो बड़ा बलवान्, महान् धूर्त तथा पर्वतके समान विशालकाय था। उसने दोनों सींगोंसे श्रीहरिको उठाकर वहाँ घुमाना आरम्भ किया। यह देख सब ग्वालबाल इधर-उधर भागने और रोने लगे। परंतु बलवान् बलराम जोर-जोरसे हँसने लगे; क्योंकि वे जानते थे कि मेरा भाई साक्षात् परमेश्वर है। उन्होंने बालकोंको समझाया और कहा—'भय किस बातका है?' इधर मधुसूदनने स्वयं उसके दोनों सींग पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर भूतलपर दे मारा। दैत्यराज प्रलम्ब पृथ्वीपर गिरकर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा। यह देख सब गोपबालक हँसने, नाचने और खुशीसे गीत गाने लगे। प्रलम्बासुरका वध करके बलरामसहित परमेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही गोचारणके कार्यमें जुट गये। वे गौएँ चराते हुए भाण्डीरवनके पास जा पहुँचे।

उस समय माधवको जाते देख बलवान् दैत्यराज केशीने अपनी टापसे धरतीको खोदते हुए शीघ्र ही इन्हें घेर लिया। उसने श्रीहरिको मस्तकपर चढ़ाकर संतुष्ट हो आकाशमें सौ योजनतक उन्हें उछाल-उछालकर घुमाया और अन्तमें पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस पापीने श्रीहरिके

४९० || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हाथको दाँतसे पकड़ लिया और क्रोधपूर्वक चबाना आरम्भ किया। परंतु श्रीहरिके अङ्ग वज्रके समान कठोर थे। उनके अङ्गका चर्वण करते ही दैत्यके सारे दाँत टूट गये। श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर उसने भूतलपर प्राणोंका परित्याग कर दिया। स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा आरम्भ हो गयी। इसी बीचमें दिव्यरूपधारी पार्षद विमानपर बैठे हुए वहाँ आ पहुँचे। उन सबके दो भुजाएँ थीं। वे पीताम्बरधारी, किरीट और कुण्डलसे अलंकृत तथा वनमालासे विभूषित थे। उन्होंने विनोदके लिये हाथमें मुरली ले रखी थी। उनके पैरोंमें मञ्जीरकी मधुर ध्वनि हो रही थी। उन पार्षदोंके सभी अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। वे गोपवेष धारण किये बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे श्रीकृष्णभक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित दीप्तिशाली दिव्य रथपर आरूढ़ हो वे भाण्डीरवनमें उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीहरि विराजमान थे। उसी समय दिव्य वस्त्र पहने तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित हुए तीन पुरुष आये, जो श्रीहरिको प्रणाम करके उनकी स्तुति करते हुए उसी विमानसे उत्तम गोलोकको चले गये। वे तीनों पहलेके वैष्णव पुरुष थे, जो देह त्यागकर दानवी योनिको प्राप्त हुए थे। वे ही इस समय श्रीकृष्णके हाथों मारे जाकर उनके पार्षद हो गये।

नारदजीने पूछा— महाभाग! वे दिव्य वैष्णव पुरुष कौन थे, जो दैत्यरूप हो गये थे? इस बातको बताइये। यह कैसी परम अद्भुत बात सुननेको मिली है?

भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! सुनो। मैं इसका प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ। मैंने पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर साक्षात् महेश्वरके मुखसे इस विषयको सुना था। श्रीहरिके गुण-कीर्तनके प्रसङ्गमें भगवान् शंकरने यह कथा कही थी। गन्धमादन पर्वतपर गन्धर्वराज गन्धवाह रहा करते थे। वे श्रीहरिकी सेवामें तत्पर रहनेवाले महान् तपस्वी और श्रेष्ठ संत थे। मुने! उनके चार पुत्र हुए, जो गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। वे सोते और जागते समय दिन-रात श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ही चिन्तन करते रहते थे। वे सभी दुर्वासाके शिष्य थे और श्रीकृष्णकी आराधनामें लगे रहते थे। प्रतिदिन कमल चढ़ाकर श्रीहरिकी पूजा करनेके पश्चात् ही जल पीते थे। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—वसुदेव, सुहोत्र, सुदर्शन और सुपार्श्व। वे चारों श्रेष्ठ वैष्णव थे और पुष्करमें तपस्या करते थे। चिरकालतक तपस्या करनेके पश्चात् उन्होंने मन्त्रको सिद्ध कर लिया था। उन चारोंमें जो ज्येष्ठ वसुदेव था, वह दुर्वासासे योग्य शिक्षा पाकर योगियोंमें श्रेष्ठ और सिद्ध हो गया। उसने विवाह नहीं किया। वह ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो तत्काल देह त्यागकर श्रीकृष्णका पार्षद हो गया। एक दिन वे तीनों भाई चित्रसरोवरके तटपर गये। वे सूर्योदयकालमें श्रीहरिकी पूजाके लिये कमल लेना चाहते थे। मुने! कमलोंका संग्रह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९१
करके जाते हुए उन वैष्णवोंको जब भगवान्
शंकरके सेवकोंने देखा, तब वे सब उन्हें बाँधकर
अपने साथ ले गये। शंकरके सेवक शरीरसे
बलिष्ठ थे; अतः उन दुर्बल वैष्णवोंको पकड़कर
उन्हें शंकरजीके पास ले गये। भगवान् शंकरको
देखकर उन सब वैष्णवोंने भूतलपर माथा टेक
उन्हें प्रणाम किया। शिवजी उन्हें उत्तम आशीर्वाद
दे शीघ्र ही उनसे वार्तालापके लिये उद्यत हुए।
उस समय उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट खेल
रही थी और वे उन भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके
लिये कातर हो चुके थे।
भगवान् शिवने पूछा- पार्वतीके सरोवरमें
प्रवेश करके कमल लेनेवाले तुमलोग कौन हो ?
पार्वतीके व्रतकी पूर्तिके लिये एक लाख यक्ष उस
सरोवरकी रक्षा करते हैं। पार्वती पतिविषयक
सौभाग्यकी वृद्धिके लिये जब त्रैमासिक व्रत
आरम्भ करती हैं, तब वे लगातार तीन महीनेतक
श्रीहरिको भक्तिभावसे प्रतिदिन एक सहस्र कमल
चढ़ाती हैं।
भगवान् शिवका यह वचन सुनकर वे तीनों
वैष्णव भयभीत हो भक्तिसे मस्तक झुका हाथ
जोड़कर बोले।
गन्धर्वोंने कहा - प्रभो! हमलोग गन्धर्वराज
गन्धवाहके पुत्र गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ हैं। महेश्वर ! हम
लोग प्रतिदिन श्रीहरिको कमल चढ़ाकर ही जल
पीते हैं। हे नाथ! हम यह नहीं जानते थे कि
पार्वतीके द्वारा इस सरोवरकी रक्षा की जाती है।
आप यह सारे कमल ले लीजिये और अपने
व्रतको सफल बनाइये। महादेव ! हम आज कमल
नहीं चढ़ायेंगे और जल भी नहीं पीयेंगे। हमने
आपको ही वे कमल अर्पित कर दिये। जिनके
चरण-कमलका प्रतिदिन चिन्तन करके हम
कमलसे पूजा करते हैं, आज साक्षात् उन्हींको
कमल अर्पण करके हम सब-के-सब पवित्र हो
गये। प्रभो! ब्रह्म एक ही है, दूसरा नहीं है।
उनके कहाँ देह और कहाँ रूप ? भक्तोंपर अनुग्रह
करनेके लिये ही भगवान् शरीर धारण करते हैं।
रूप-भेद मायासे ही प्रतीत होता है। प्रभो ! आप
ये कमल ले लीजिये; क्योंकि आप ही हमारे प्रभु
हैं। अच्युत ! हमारा हृदय जिसके ध्यानसे परिपूर्ण
है; आप अपने उसी रूपका हमें दर्शन कराइये।
जिसकी दो भुजाएँ हैं; कमनीय किशोर अवस्था
है; श्यामसुन्दर रूप है; हाथमें विनोदकी साधनभूता
मुरली है; जो पीताम्बरधारी है; जिसके एक मुख
और दो नेत्र हैं, वे चन्दन और अगुरुसे चर्चित
हैं; जिसके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा
फैल रही है; जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित
है। जिसका वक्षःस्थल मणिराज कौस्तुभकी
कान्तिसे अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देता है;
जिसकी चूड़ामें मोरका पंख लगा है; जो मालतीकी
मालासे विभूषित है; पारिजातके फूलोंके हारोंसे
अलंकृत है; करोड़ों कन्दर्पोंके लावण्यका मनोहर
लीलाधाम है; समूह-की-समूह गोपियाँ मन्द
मुस्कान और बाँकी चितवनसे जिसकी ओर देखा
करती हैं; जो नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा राधाके
वक्षःस्थलपर विराजमान है; ब्रह्मा आदि जिसकी
स्तुति करते हैं; जो सबके लिये वन्दनीय,
चिन्तनीय और वाञ्छनीय है और जो स्वात्माराम,
पूर्णकाम तथा भक्तोंपर अनुग्रहके लिये कातर
रहनेवाला है, आपके उसी रूपका हम दर्शन
करना चाहते हैं। ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ गन्धर्व
भगवान् शंकरके सामने खड़े हो गये।
श्रीकृष्णके रूपका वर्णन सुनकर भगवान्
शंकरके श्रीअङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंमें
आँसू भर आये। वे गन्धर्वोंकी उक्त बातें सुनकर
उनसे इस प्रकार बोले - 'मैंने यह जान लिया था कि
तुमलोग श्रेष्ठ वैष्णव हो और अपने चरणकमलोंकी
धूलसे पृथ्वीको पवित्र करनेके लिये भ्रमण कर रहे
हो। मैं श्रीकृष्णभक्तके दर्शनकी सदा ही इच्छा
करता रहता हूँ; क्योंकि साधु-संत तीनों लोकोंमें

४९२
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दुर्लभ हैं। तुमलोग मुझे पार्वती और देवताओंसे
भी बढ़कर सदा प्रिय हो। मुझे वैष्णवजन अपने
तथा अपने भक्तोंसे भी अधिक प्रिय हैं। परंतु मैंने
पूर्वकालमें जो प्रतिज्ञा कर रखी है, वह भी व्यर्थ
नहीं होनी चाहिये। महाभाग वैष्णवो! सुनो। मैंने
कह रखा है कि पार्वतीके व्रतके समय जो लोग
किसी अन्य व्रतके निमित्त इस सरोवरसे कमल ले
जायेंगे वे शीघ्र ही आसुरी योनिको प्राप्त होंगे,
इसमें संशय नहीं है। श्रीकृष्णके भक्तोंका कहीं भी
अशुभ नहीं होता है। तुमलोग पहले दानवी
योनिमें पड़कर फिर निश्चय ही गोलोकमें पधारोगे।
तुम्हारे मनमें श्रीकृष्णके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन
करनेके लिये उत्कण्ठा है। अतः बच्चो! तुम्हें
भारतवर्षके वृन्दावनमें उस रूपका अवश्य दर्शन
होगा। श्रीकृष्णको देखकर उन्हींके हाथसे मृत्युको
प्राप्त हो तुम वैष्णवशिरोमणि बन जाओगे और
दिव्य विमानपर आरूढ़ हो हरिधामको पधारोगे।
तुमलोग अभी यहाँ उस वाञ्छनीय रूपको
देखनेके लिये उत्सुक हो। अतः वह सब देखो।'
ऐसा कहकर भगवान् शिवने उन्हें उस
रूपके दर्शन कराये। उस रूपके दर्शन करके उन
वैष्णवोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे सर्वरूपी
श्रीहरिको प्रणाम करके दानवी योनिमें चले गये।
इसलिये वे दानवेश्वर हुए। वसुदेव तो पहले ही
मुक्त हो चुका था। सुहोत्र बकासुर, सुदर्शन
प्रलम्ब और स्वयं सुपार्श्व केशी हुआ था। भगवान्
शंकरके वरदानसे श्रीहरिके परम उत्तम रूपके
दर्शन करके उन्हींके हाथसे मृत्युको प्राप्त हो वे
उनके परम धाममें चले गये। विप्रवर! श्रीहरिका
यह अद्भुत चरित्र कहा गया। बक, प्रलम्ब और
केशीके उद्धारका यह प्रसङ्ग वाचकों और श्रोताओंको
मोक्ष प्रदान करनेवाला है।
नारदजीने पूछा- महाभाग! आपके कृपा-
प्रसादसे यह सारी अद्भुत बात मैंने सुनी। अब मैं
यह सुनना चाहता हूँ कि पार्वतीने कौन-सा व्रत
किया था? उस व्रतके आराध्यदेव कौन हैं?
उसका फल क्या है और उसमें पालन करनेयोग्य
नियम क्या है? भगवन्! उस व्रतके लिये
उपयोगी द्रव्य कौन-कौन-से हैं? कितने समयतक
वह व्रत किया जाता है और उसकी प्रतिष्ठामें
क्या-क्या करना आवश्यक होता है? प्रभो!
भलीभाँति विचारकर बताइये। इसे सुननेके लिये
मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।
श्रीनारायण बोले- मुने! यह 'त्रैमासिक'
नामक व्रत है, जो नारीके पतिविषयक सौभाग्यको
बढ़ानेवाला है। इस व्रतके आराध्य देवता हैं-
राधिकासहित भगवान् श्रीकृष्ण। उत्तरायणके
विषुव * योगमें इसका आरम्भ होता है और
दक्षिणायन आरम्भ होनेतक इसकी समाप्ति हो
जाती है। वैशाखकी संक्रान्तिसे एक दिन पहले
संयमपूर्वक रहकर निश्चय ही हविष्यका सेवन
करे। फिर वैशाखकी संक्रान्तिके दिन स्नान करके
गङ्गातटपर व्रतका संकल्प ले। तदनन्तर व्रती
पुरुष कलशपर, मणिमें, शालग्राम-शिलामें अथवा
जलमें राधासहित श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले
पाँच देवताओंकी पूजा करके भक्तिभावसे राधावल्लभ
श्रीकृष्णका ध्यान करे। उनके सामवेदोक्त ध्यानका
वर्णन करता हूँ, सुनो। भगवान् श्रीकृष्णकी
अङ्गकान्ति सजल जलधरके समान श्याम है। वे
रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं। उनका मुख
शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मनोहर
है। उसपर मन्द हासकी प्रभा फैल रही है। नेत्र
शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत
कर रहे हैं। उनमें सुन्दर अञ्जन लगा हुआ है। वे
गोपियोंके मनको बारंबार मोहते रहते हैं। राधा
उनकी ओर देख रही हैं। वे राधाके वक्षःस्थलमें
विराजमान हैं। ब्रह्मा, अनन्त, शिव और धर्म
आदि देवता उनकी स्तुति करते हैं।

  • ज्योतिषके अनुसार वह समय जब कि सूर्य विषुव रेखापर पहुँचता है और दिन-रात दोनों बराबर होते हैं।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४९३

इस प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करके व्रती पुरुष उस ध्यानके द्वारा ही उनका सानन्द आवाहन करे। इसके बाद वह राधाका ध्यान करे। वह ध्यान यजुर्वेदकी माध्यन्दिनशाखामें वर्णित है। राधा रासेश्वरी हैं, रमणीया हैं और रासोल्लास-रसके लिये उत्सुक रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें उनका स्थान है। वे रासकी अधिष्ठात्री देवी हैं। रासेश्वरके वक्षःस्थलमें वास करती हैं। रासकी रसिका हैं। रसिकशेखर श्यामसुन्दरकी प्रिया हैं। रसिकाओंमें श्रेष्ठ हैं। सुरम्य रमारूपिणी हैं। प्रियतमके साथ रमणके लिये उत्सुक रहती हैं। उनके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत करते हैं। वे बाँकी भौंहोंसे सुशोभित होती हैं। उनके नेत्रोंमें सुरमा शोभा पा रहा है। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति सुन्दर मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभाके कारण उनकी मनोहरता बहुत बढ़ गयी है। मनोहर चम्पाके समान उनकी अङ्गकान्ति सुनहरी दिखायी देती है। चन्दन, कस्तूरीकी बेंदी तथा सिन्दूर-बिन्दुसे उनका शृङ्गार किया गया है। कपोलोंपर मनोहर पत्रावलीकी रचना शोभा देती है। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्रसे उनकी उज्ज्वलता बढ़ गयी है। उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डलोंकी कान्तिसे उनके सुन्दर कपोल प्रकाशित हो रहे हैं। रत्नेन्द्रसाररचित हारसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा है। रत्ननिर्मित कङ्कण, केयूर तथा किङ्किणी रत्नसे उनके अङ्गोंकी अपूर्व शोभा हो रही है। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे रचित मञ्जीरोंकी झनकारसे उनके दोनों चरण सुशोभित होते हैं। ब्रह्मा आदिके भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं। सर्वेश्वरके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है तथा वे सबकी कारणस्वरूपा हैं। ऐसी श्रीराधाका मैं भजन करता हूँ। इस प्रकार ध्यान करके श्रीकृष्णके साथ उनका पूजन करे*।

प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह उपचार चढ़ाकर पूजा करे। व्रती पुरुष प्रत्येक उपचारको पृथक्-पृथक् करके सबको बारी-बारीसे प्रसन्नतापूर्वक अर्पित करे। मुने! नित्यप्रति एक सौ आठ दिव्य सहस्रदल कमल लेकर उनकी एक सौ आठ आहुतियाँ दे। भक्तिभावसे 'कृष्णाय स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके यत्नपूर्वक वे आहुतियाँ देनी चाहिये। आम और केलेके कच्चे या पके फलको लेकर उसकी एक सौ आठ आहुतियाँ भक्तिभावसे दे। फल अखण्ड होने चाहिये। मुने! प्रतिदिन सौ ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन करावे। व्रतीको नित्य एक सौ आठ आहुतियोंका हवन करना चाहिये। वे आहुतियाँ भक्तिपूर्वक राधिका सहित श्रीकृष्णको देनी चाहिये। नारद! घृतमिश्रित तिलसे भी हवन करे। नित्य बाजे बजावे और श्रीहरिका कीर्तन करावे।

तीन मासतक इस नियमका पालन करके उसके बाद व्रतकी प्रतिष्ठा करे। नारद! प्रतिष्ठाके


* ध्यायेत् तदा राधिकाञ्च ध्यानं माध्यन्दिनेरितम्। राधां रासेश्वरीं रम्यां रासोल्लासरसोत्सुकाम्॥
रासमण्डलमध्यस्थां रासाधिष्ठातृदेवताम्। रासेशवक्षःस्थलस्थां रसिकां रसिकप्रियाम्॥
रसिकप्रवरां रम्यां रमां च रमणोत्सुकाम्। शरद्वाजीवराजीनां प्रभामोचनलोचनाम्॥
वक्रभ्रूभङ्गसंयुक्तामञ्जनेनैव रञ्जिताम्। शरत्पार्वणचन्द्रास्यामीषद्धास्यमनोहराम् ॥
चारुचम्पकवर्णाभां चन्दनेन विभूषिताम्। कस्तूरीबिन्दुना सार्द्धं सिन्दूरबिन्दुना युताम्॥
चारुपत्रावलीयुक्तां वह्निशुद्धांशुकोज्ज्वलाम्। सद्रत्नकुण्डलाभ्यां च सुकपोलस्थ्लोज्ज्वलाम्॥
रत्नेन्द्रसारहारेण वक्षःस्थलविराजिताम्। रत्नकङ्कणकेयूरकिङ्किणीरत्नरञ्जिताम् ॥
सद्रत्नसाररचिताक्वणन्मञ्जीररञ्जिताम् । ब्रह्मादिभिश्च सेव्येन श्रीकृष्णेनैव सेविताम्॥
सर्वेशेन स्तूयमानां सर्वबीजां भजाम्यहम्। इति ध्यात्वा च कृष्णेन सहितां तां च पूजयेत्॥
(१६।८५–९३)

४९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दिन जो विधान आवश्यक है, उसे सुनो।
विप्रवर ! नब्बे हजार अक्षत कमलकी आहुति दे
और यत्नपूर्वक नौ हजार ब्राह्मणोंको उत्तम,
स्वादिष्ट एवं मीठे अन्न भोजन करावे। नौ हजार
सात सौ बीस फल तथा नाना प्रकारके मनोहर
द्रव्यका नैवेद्य अर्पण करे। इसके बाद संस्कारयुक्त
अग्निकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे।
घृतयुक्त तिलकी नब्बे हजार आहुतियाँ देकर
ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे वस्त्र, भोजन, यज्ञोपवीत
और फलसहित अन्न और तिलके लड्डू दे। उन
लड्डुओंको गन्ध-पुष्पसे अर्चित करके देना
चाहिये। साथ ही शीतल जलसे भरे हुए नब्बे
कलशोंका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार
व्रत करके ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये।
दक्षिणाका परिमाण वही है, जो वेदोंमें बताया
गया है। एक हजार बैल हों और उनके सींगोंमें
सोना मढ़ा गया हो। ब्रह्मन् ! इस प्रकार 'त्रैमासिक'
व्रत बताया गया। इस व्रतका अनुष्ठान कर लिया
जाय तो यह विशिष्ट संतति देनेवाला और
पतिसौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है। इस
व्रतके प्रभावसे सौ जन्मोंतक नारीका अखण्ड
सौभाग्य बना रहता है और निश्चय ही वह सौ
जन्मोंतक सत्पुत्रकी जननी होती है। उसका कभी
पति और पुत्रसे वियोग नहीं होता। पुत्र दासकी
भाँति उसकी आज्ञाका पालक होता है तथा पति
भी उसकी बातको माननेवाला होता है। वह सती
नारी प्रतिक्षण श्रीराधा-कृष्णकी भक्तिसे सम्पन्न
होती है। व्रतके प्रभावसे उसको ज्ञान तथा श्रीहरिकी
स्मृति प्राप्त होती है। इस सामवेदोक्त व्रतका
पूर्वकालमें हम दोनोंने भी पालन किया था। ब्रह्मन् !
दूसरी स्त्रियोंद्वारा उस व्रतका अनुष्ठान होता देख
पार्वतीदेवीने प्रसन्नतापूर्वक दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे
सिर झुकाकर भगवान् शंकरसे कहा।
पार्वती बोलीं- जगन्नाथ ! आज्ञा कीजिये।
मैं उत्तम व्रतका पालन करूँगी। हम दोनोंके
इष्टदेव श्रीहरिके व्रतोंमें यह श्रेष्ठ व्रत है। नाथ !
श्रीहरिकी आराधना समस्त मङ्गलोंकी कारणरूपा
है। यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तीर्थसेवन और पृथ्वीकी
परिक्रमा-ये सब श्रीहरिकी आराधनाकी सोलहवीं
कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिसके बाहर और
भीतर प्रतिक्षण श्रीहरिकी स्मृति बनी रहती है,
उस जीवन्मुक्त पुरुषके दर्शनसे ही मुक्ति प्राप्त हो
जाती है। उसके चरणकमलोंकी धूल पड़नेसे
वसुधा उसी क्षण शुद्ध हो जाती है तथा उसके
दर्शनमात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा,
विष्णु, धर्म, शेषनाग, आप महेश्वर और गणेश-
ये सब लोग जिनके चरणकमलोंका चिन्तन
करते-करते उन्हींके समान महातेजस्वी हो गये
हैं। जो जिसका सदा ध्यान करता है, वह निश्चय
ही उसे प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं-ध्याता
पुरुष गुण, तेज, बुद्धि और ज्ञानकी दृष्टिसे अपने
ध्येयके समान ही हो जाता है। श्रीकृष्णके
चिन्तन, तप, ध्यान और सेवासे मैंने आप-जैसा
स्वामी और पुत्र भी प्राप्त किया है। मुझे अनायास
ही सब कुछ मिल गया। मेरा मनोरथ पूर्ण हो
गया। मुझे आप-जैसे स्वामी मिले। कार्तिकेय
और गणेश-जैसे पुत्र प्राप्त हुए तथा श्रीकृष्णके
अंशस्वरूप हिमवान्-जैसे पिता मिले। प्रभो! मेरे
लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?
पार्वतीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर
बहुत प्रसन्न हुए। उनका शरीर पुलकित हो उठा
और वे हँसकर मधुर वाणीमें बोले।
श्रीमहादेवजीने कहा- ईश्वरि ! तुम
महालक्ष्मीस्वरूपा हो। तुम्हारे लिये क्या असाध्य
है? तुम सर्वसम्पत्स्वरूपा और अनन्तशक्तिरूपिणी
हो। देवि! तुम जिसके घरमें हो, वह सम्पूर्ण
ऐश्वर्यका भाजन है। शुभप्रदे! मैं, ब्रह्मा और विष्णु
तुममें भक्ति रखकर तुम्हारे कृपाप्रसादसे ही
संसारकी सृष्टि, पालन और संहारमें समर्थ हुए
हैं। हिमालय कौन है? मेरी क्या बिसात है