ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२८- भगवती महालक्ष्मीके प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियोंसे उनके पूजित होनेका तथा दुर्वासाके शापसे महालक्ष्मीके देवलोक-त्याग और इन्द्रके दुःखी होकर बृहस्पतिके पास जानेका वर्णन
२१८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वदनवाले उन कीड़ोंके दाँत बड़े तेज होते हैं। वहाँ सर्वत्र अन्धकार फैला है। 'पूयकुण्ड' को चार कोस लंबा-चौड़ा बताया जाता है। पूयभक्षी प्राणी उसमें निवास करते हैं। तालके वृक्ष-जितना गहरा तथा असंख्य सर्पोंसे युक्त 'सर्पकुण्ड' है। वह दो कोस लंबा और बर्फीले जलसे पूर्ण होता है। साँप पापियोंके शरीरसे लिपटकर उन्हें काटते रहते हैं। मशक आदि क्रूर जन्तुओंसे पूर्ण 'मशकुण्ड', 'दंशकुण्ड' और 'गोलकुण्ड'—ये तीन नरक हैं। महान् पापियोंसे युक्त उन नरकोंकी सीमा आधे-आधे कोसकी है। जिनके हाथ बँधे रहते हैं, रुधिरसे सर्वाङ्ग लाल रहता है तथा जो मेरे दूतोंसे घायल रहते हैं, उन प्राणियोंद्वारा वहाँ हाहाकार मचा रहता है। वज्र और बिच्छुओंसे ओत-प्रोत 'वज्रदंष्ट्रकुण्ड' और 'वृश्चिककुण्ड' हैं। आधी बावड़ीके प्रमाणवाले उन नरकोंमें वज्र एवं बिच्छुओंसे विद्ध प्राणी भरे रहते हैं। 'शरकुण्ड', 'शूलकुण्ड' और 'खड्गकुण्ड'—ये तीनों आयुधोंसे व्याप्त हैं। उन नरकोंमें पड़े प्राणियोंका शरीर शस्त्रास्त्रोंसे छिदता रहता है। रक्तकी धारा बहने लगती है, जिससे वे लाल प्रतीत होते हैं। उन नरकोंका प्रमाण आधी बावड़ी है। संतस कीचड़से पूर्ण तथा अन्धकारमय 'गोलकुण्ड' है। टेढ़े-मेढ़े काँटोंकी-सी आकृतिवाले कीड़े यहाँके पापियोंको काटते हैं। उस नरकका विस्तार आधी बावड़ी है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेपर भयसे घबराये हुए प्राणी रोते रहते हैं। पापियोंका झुंड कोसोंतक फैला रहता है। अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त तथा पापियोंको निरन्तर दुःख देनेवाला 'नक्रकुण्ड' है। वहाँ विकृत आकारवाले भयंकर नक्र आदि जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उस नरककी लंबाई-चौड़ाई आधी बावड़ीके परिमाणमें है। विष्ठा, मूत्र और श्लेष्मभक्षी असंख्य पापियों एवं कौओंसे भरा हुआ एक कुण्ड है। उसमें विशाल तथा विकृत आकारवाले भयंकर असंख्य कौए पापियोंको नोचते रहते हैं। 'सञ्चानकुण्ड' और 'बाजकुण्ड' इन्हीं दोनों वस्तुओं (पक्षियों)-से ओत-प्रोत हैं। इन कुण्डोंका परिमाण सौ धनुष है। उन भयानक पक्षियोंसे काटे हुए प्राणी सदा चीत्कार मचाया करते हैं। पापी जीवोंसे व्याप्त तथा सौ धनुष विस्तृत 'वज्रकुण्ड' है। वज्रके समान दाँतवाले भयंकर जन्तु उसमें रहते हैं। वहाँ सर्वत्र घोर अन्धकार छाया रहता है। दो वापी-जितना लंबा-चौड़ा 'तप्तपाषाणकुण्ड' है। उसका आकार ऐसा है मानो आग धधक रही हो। पापी प्राणी संतस होकर इधर-उधर भागते रहते हैं। छुरेकी धारके समान तीखे पाषाणोंसे बना हुआ 'तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड' है। महान् पापी उसमें वास करते हैं। रक्तसे लथपथ हुए प्राणियोंसे भरा हुआ 'लालाकुण्ड' है। वह कुण्ड एक कोस नीचेतक गहरा है। मेरे दूतोंसे संतस प्राणी उसमें खचाखच भरे रहते हैं। कज्जल वर्णवाले संतस पत्थरोंसे निर्मित तथा सौ धनुष परिमाणवाला 'मसीकुण्ड' है। पापियोंसे वह कुण्ड पूरित रहता है। तपे हुए बालूसे भरपूर एक कोस विस्तारवाला 'चूर्णकुण्ड' है। उसमें प्रतप्त बालुकासे दग्ध प्राणी निवास करते हैं। कुम्हारके चक्रकी भाँति निरन्तर घूमता हुआ 'चक्रकुण्ड' है। उसमें अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाले सोलह अरे लगे हुए हैं, जिनसे वहाँके पापियोंके अङ्ग सदा क्षत-विक्षत होते रहते हैं। उस कुण्डका आकार अत्यन्त टेढ़ी-मेढ़ी कन्दराके समान है तथा वह पर्याप्त गहरा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई चार कोस है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। वहाँके घोर पापियोंको जलचर-जन्तु काटते-खाते हैं। उस अन्धकारमय भयानक कुण्डमें संतस प्राणियोंद्वारा करुण-क्रन्दन होता रहता है। विकृत आकारवाले अत्यन्त भयंकर असंख्य कछुओंसे भरा हुआ 'कूर्मकुण्ड' है। जलमें रहनेवाले कछुए नारकी जीवोंको नोचते-खाते रहते हैं। प्रज्वलित ज्वालाओंसे व्याप्त
प्रकृतिखण्ड
'ज्वालाकुण्ड' है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। उस कष्टदायी कुण्डमें पातकी प्राणी निरन्तर चिल्लाते रहते हैं। एक कोस गहराईवाला 'भस्मकुण्ड' है जिसमें सर्वत्र प्रतप्त भस्म ही भरा रहता है। जलते हुए भस्मको खानेके कारण वहाँके पातकी जीवोंके अङ्गोंमें दाह-सा होता रहता है।
जो तपे हुए लौहसे परिपूर्ण तथा जले हुए गात्रवाले पापियोंसे युक्त नरक है, उसे 'दग्धकुण्ड' कहा गया है। वह अत्यन्त भयंकर गहरा कुण्ड एक कोसके परिमाणमें है। वहाँ सर्वत्र अन्धकार छाया रहता है। ज्वालाके कारण पापियोंके तालु सूखे रहते हैं। 'तप्तसूर्मिकुण्ड' नरक अत्यन्त भयानक है, जो बहुसंख्यक ऊर्मियों, संतप्त क्षार-जलों, नाना प्रकारके शब्द करनेवाले जल-जन्तुओंसे युक्त है। जिसकी चौड़ाई चार कोस है; ऐसे गहरे और अन्धकारयुक्त नरकको 'प्रतप्तसूचीकुण्ड' कहते हैं। उस भयानक कुण्डमें दग्ध होनेके कारण आर्तनाद करते हुए प्राणी एक-दूसरेको नहीं देख पाते। जिसमें तलवारकी धारके समान तीखे पत्तेवाले बहुत-से ऊँचे-ऊँचे ताड़के वृक्ष हैं, उस नरकको 'असिपत्रकुण्ड' कहा गया है। उस नरकके ये ताड़वृक्ष आधे कोसकी लंबाईतक ऊपरको फैले हुए हैं और उन्हीं वृक्षोंपरसे वहाँके पापियोंको गिराया जाता है। उन वृक्षोंके सिरसे गिराये गये पापियोंके रक्तोंसे वह कुण्ड भरा रहता है। उन पापियोंके मुखसे 'रक्षा करो' की चीख निकलती रहती है। वह भयानक कुण्ड अत्यन्त गहरा, अन्धकारसे आच्छन्न तथा रक्तके कीड़ोंसे परिपूरित है। जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा तथा छुरेकी धारके समान अस्त्रोंसे युक्त है, उस भयानक नरकको 'क्षुरधारकुण्ड' कहते हैं। पापियोंके रक्तसे वह कभी खाली नहीं हो पाता। जिसमें सूईके समान नोकवाले अस्त्र भरे रहते हैं तथा जो पापियोंके रक्तसे सदा परिपूर्ण रहता है, पचास धनुष-जितना लंबा-चौड़ा वह नरक 'सूचीमुख' कहलाता है। वहाँ नारकी प्राणी अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। किसी एक जन्तुविशेषका नाम गोधा है; उसके मुखके समान जिसकी आकृति है, उसका नाम 'गोधामुखकुण्ड' है। उसकी गहराई कुएँके समान है और उसका प्रमाण बीस धनुष है। वह नरक घोर पापियोंके लिये अत्यन्त कष्टप्रद है। उन गोधासंज्ञक कीड़ोंके काटनेसे नारकी जीवोंका मुख सदा नीचेको लटकता रहता है। नाक (जलजन्तुविशेष)-के मुखके समान जिसकी आकृति है, उसे 'नक्रकुण्ड' कहते हैं। वह सोलह धनुषके विस्तारमें स्थित है। उसकी गहराई कुएँ-जितनी है। उस कुण्डमें सदा पापी भरे रहते हैं। 'गजदंशकुण्ड' को सौ धनुष लंबा-चौड़ा बतलाया गया है। तीस धनुष-जितना विस्तृत तथा गौके मुखकी आकृतिवाला एवं पापियोंके लिये अत्यन्त दुःखद जो नरक है, उसे 'गोमुखकुण्ड' कहा गया है। कालचक्रसे युक्त सदा चक्कर काटनेवाला भयानक नरक, जिसकी आकृति घड़ेके समान है, 'कुम्भीपाक' कहलाता है। चार कोसके परिमाणवाला वह नरक महान् अन्धकारमय है। साध्वि! उसकी गहराई एक लाख पोरसा* है। उस कुण्डके अन्तर्गत तप्ततैल एवं ताम्रकुण्ड आदि बहुसंख्यक कुण्ड हैं। उस नरकमें बड़े-बड़े पापी अचेत होकर पड़े रहते हैं। भयंकर कीड़ोंके काटनेपर चिल्लाते हुए नारकी जीव परस्पर एक-दूसरेको देखनेमें असमर्थ रहते हैं। उन्हें क्षण-क्षणमें मूर्च्छा आती है और वे पृथ्वीपर लोट-पोट हो जाते हैं। पतिव्रते! उन सभी कुण्डोंमें जितने पापी पड़े हुए हैं, उन सबकी ऐसी ही दुर्दशा है। मेरे दूतोंकी मार पड़नेपर वे क्षणमें गिरते और क्षणभरमें चिल्लाहट मचाने लगते हैं।
* पुरुषकी लंबाईको 'पोरसा' कहते हैं।
२२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुम्भीपाकके अन्तर्गत जो नरककुण्ड हैं, वे उससे कहीं चौगुने कष्टप्रद हैं। सुदीर्घ कालतक मार पड़नेपर भी यातना भोगनेवाले उन शरीरोंका अन्त नहीं होता। कुम्भीपाकको सम्पूर्ण नरक-कुण्डोंमें प्रधान बताया गया है। कालनिर्मित सुदृढ़ सूत्रसे बँधे हुए पापी जीव जहाँ निवास करते हैं, उसे ‘कालसूत्र’ नामक नरककुण्ड कहा गया है। मेरे दूतोंके प्रयाससे प्राणी कभी ऊपर उठते हैं और कभी डूब जाते हैं। बहुत देरतक उनकी साँस बंद हो जाती है। वे अचेत-से हो जाते हैं। साध्वि ! उसका जल सदा खौलता रहता है। नरकभोगी प्राणियोंके लिये वह बड़ा ही कष्टप्रद है। ‘अवटकुण्ड’ और ‘मत्स्योदकुण्ड’ एक ही है। ‘अवट’ संज्ञक एक कूप है। अतः कोई उसे अवटकुण्ड कहा करते हैं। संतप्त जलसे वह परिपूर्ण रहता है। चौबीस धनुष-जितना वह लंबा-चौड़ा है। जलते हुए शरीरवाले घोर पापी जीव उसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। मेरे दूतोंकी कठिन मार उन्हें सहनी पड़ती है। उस कुण्डकी ‘अवटोद’ संज्ञा है। उसके जलका स्पर्श होते ही सम्पूर्ण व्याधियाँ पापियोंको अनायास घेर लेती हैं। उसकी गहराई सौ धनुष है। जिसमें पड़े हुए प्राणियोंको अरुन्तुद नामक कीड़े काटते रहते हैं, उसे ‘अरुन्तुदकुण्ड’ कहा जाता है। दुःखी जीव सदा हाहाकार मचाया करते हैं। अत्यन्त तपी हुई धूलोंसे व्याप्त नरकको ‘पांशुकुण्ड’ कहते हैं। वह सौ धनुष-जितना विस्तृत है। उसमें पड़े नारकी जीवोंके चमड़े जलते रहते हैं। खानेके लिये उसे जलती हुई धूल ही उपलब्ध होती है। जिसमें गिरते ही पापी पाशोंसे आवेष्टित हो जाता है, उसे विज्ञ पुरुषोंने ‘पाशवेष्टनकुण्ड’ कहा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। जहाँ पापी ज्यों ही गिरते हैं, त्यों ही शूलसे जकड़ उठते हैं, उसे ‘शूलप्रोतकुण्ड’ कहा जाता है। उसका परिमाण बीस धनुष है। ‘प्रकम्पनकुण्ड’ आधे कोसके विस्तारमें है। उसका जल बर्फके समान गलता रहता है। उसमें पड़ते ही प्राणियोंके शरीरमें कँपकँपी मच जाती है। जिसमें पापियोंके मुखोंमें जलती हुई लुआठी घुसा दी जाती है, उसे ‘उल्कामुखकुण्ड’ कहा गया है। वह भी बीस धनुष-जितना लम्बा-चौड़ा है।
जिसकी गहराई लाख पोरसा है तथा सौ धनुष-जितना जो विस्तृत है, उस भयानक कुण्डको ‘अन्धकूप नरक’ कहते हैं। उसमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले कीड़े रहते हैं। वह सदा अन्धकारसे व्याप्त रहता है। कूपके समान उसकी गोलाई है। कीड़ोंके काटनेपर प्राणी आतुर होकर परस्पर एक-दूसरेको चबाने लगते हैं। उन्हें खौलता हुआ जल ही पीनेको मिलता है। एक तो वे खौलते हुए जलसे जलते हैं, दूसरे कीड़े भी काटते रहते हैं। वहाँ इतना अन्धकार रहता है कि वे आँखोंसे कुछ भी देख नहीं सकते।
जहाँ जानेपर पापी अनेक प्रकारसे शस्त्रोंसे बिंध जाते हैं, वह ‘वेधनकुण्ड’ कहलाता है। उसकी लंबाई-चौड़ाई बीस धनुष है। जहाँ डंडोंसे मारा जाता है, उस सोलह धनुषके प्रमाणवाले नरकको ‘दण्डताडनकुण्ड’ कहते हैं। जहाँ जाते ही पापी जीव मछलियोंकी भाँति महाजालमें फँस जाते हैं तथा जो बीस धनुष-जितना विस्तृत है, वह ‘जालरन्ध्रकुण्ड’ कहलाता है। जहाँ गिरे हुए पापियोंके शरीर चूर्ण-चूर्ण हो जाते हैं, वह नरक ‘देहचूर्णकुण्ड’ नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ गये हुए पापियोंके पैरमें लोहेकी बेड़ी पड़ी रहती है। असंख्य पोरसा वह गहरा है। लंबाई और चौड़ाई बीस धनुष है। प्रकाशका तो वहाँ कहीं नाम ही नहीं रहता। उसमें प्राणी मूर्च्छित होकर जड़की भाँति पड़े रहते हैं। जहाँ गये पापी मेरे दूतोंद्वारा दलित और ताड़ित होते रहते हैं, उसको ‘दलनकुण्ड’ कहा गया है। वह सोलह धनुषके विस्तारमें है।
तपी हुई बालूसे व्याप्त होनेके कारण जहाँ गिरते ही पापीके कण्ठ, ओठ और तालू सूख
प्रकृतिखण्ड २२१
जाते हैं तथा जो तीस धनुष-जितना परिमाणमें है और जिसकी गहराई सौ पोरसा है एवं जो सदा अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, उन पापियोंके लिये अतिशय दुःखप्रद नरकको 'शोषणकुण्ड' कहते हैं। विविध धर्मसम्बन्धी कषाय जलसे जो लबालब भरा रहता है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई सौ धनुष है और जहाँ सदा दुर्गन्ध फैली रहती है तथा जहाँ उस अमेध्य वस्तुके आहारपर ही रहकर पापी जीव यातना भोगते हैं, वह नरक 'कषकुण्ड' कहलाता है। साध्वि ! जिस कुण्डका आकार शूर्पके सदृश है तथा जो बारह धनुषके बराबर लंबा-चौड़ा है एवं जहाँ सर्वत्र संतप्त बालुका बिछी रहती है और पातकियोंसे कोई स्थल खाली नहीं रहता, उस नरकको 'शूर्पकुण्ड' कहते हैं। वहाँ सदा दुर्गन्ध भरी रहती है। वही खाकर पापी जीव वहाँ यातना भोगते हैं। पतिव्रते ! जहाँकी रेणुका अत्यन्त संतप्त रहती है तथा जो घोर पापी जीवोंसे युक्त रहता है एवं जिसके भीतर आगकी लपटें उठा करती हैं, ऐसी ज्वालासे भरे हुए मुखवाले नरकको 'ज्वालामुखकुण्ड' कहा जाता है। वह बीस धनुषमें विस्तृत है। ज्वालासे दग्ध पापी उसके कोने-कोनेमें भरे रहते हैं। उस कुण्डमें प्राणियोंको असीम कष्ट भोगना पड़ता है।
जहाँ गिरते ही मानव मूर्च्छित हो जाता है तथा जिसके भीतरकी ईंटें अत्यन्त संतप्त रहती हैं एवं जो आधी बावड़ी-जितना परिमाणवाला है, वह 'जिम्भकुण्ड' कहलाता है। जो धूममय अन्धकारसे संयुक्त रहता है तथा जहाँ गये हुए पापी धूमोंके कारण नेत्रहीन हो जाते हैं और जिसमें साँस लेनेके लिये बहुत-से छिद्र बने हैं, उस नरकको 'धूम्प्रान्धकुण्ड' कहा गया है। वह सौ धनुषके बराबर परिमाणमें है। जहाँ जानेपर पापीको तुरंत नाग बाँध लेते हैं तथा जो सौ धनुष-जितना लंबा-चौड़ा है और जिसमें सदा नाग भरे रहते हैं, उसे 'नागवेष्टनकुण्ड' कहा गया है। इन सभी कुण्डोंमें मेरे दूत प्राणियोंको मारते, जलाते तथा भाँति-भाँतिसे भयानक कष्ट देते रहते हैं।
सावित्री ! सुनो, मैंने ये छियासी नरककुण्ड और इनके लक्षण भी बतला दिये। अब फिर तुम क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३२-३३)
भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूप, महत्त्व और गुणोंकी अनिर्वचनीयता
सावित्रीने कहा—देव ! अब आप मुझे सारभूत एवं परम दुर्लभ हरिभक्तिका उपदेश दीजिये। अन्य सब बातें मैंने आपसे सुन ली हैं। इस समय और किसी विषयको सुनना शेष नहीं है। अब तो मुझे भगवान् श्रीकृष्णके गुण-कीर्तनरूप कुछ धर्मकी बात बताइये। वही लाखों मनुष्योंके उद्धारका बीज है। वही नरकके समुद्रसे पार उतारनेवाला है। श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन मुक्तिके सारभूत तत्त्वकी प्राप्तिका कारण तथा समस्त अमङ्गलोंका निवारण करनेवाला है। वह कर्ममय वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाला तथा किये हुए पापसमूहोंको हरनेवाला है। प्रभो! मुक्तियाँ कितने प्रकारकी हैं? उनके लक्षण क्या हैं? हरिभक्तिका स्वरूप क्या है? उसके भेद कितने हैं? तथा निषेकका भी क्या लक्षण है? वह सारभूत तत्त्वज्ञान क्या है? यह आप बताइये। अपना सर्वस्व दान कर देना, उपवास-व्रत करना, तीर्थोंमें नहाना, व्रत रखना और तप करना—ये सब-के-सब ज्ञानहीनको ज्ञान देनेसे जो पुण्य होता है, उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। भगवन् ! यह निश्चय है कि गौरवकी दृष्टिसे पिताकी अपेक्षा माताका स्थान
२२२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सौगुना ऊँचा है। परंतु ज्ञानदाता गुरु मातासे भी सौगुना अधिक पूजनीय होता है।
**यम बोले—**बेटी! मैं पहले ही तुम्हें यह वर दे चुका हूँ कि तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट प्रश्न होगा, वह सब मैं बताऊँगा—तुम जो कुछ जानना चाहोगी, उसका ज्ञान कराऊँगा। अतः इस समय मेरे वरसे तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णकी भक्ति प्राप्त हो। कल्याणि! तुम जो भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका कीर्तन सुनना चाहती हो, वह बहुत ही उत्तम है। यह प्रश्न प्रश्नकर्ताके, उत्तर देनेवालेके और श्रोताओंके कुलका भी उद्धार करनेवाला है। परंतु है यह बहुत कठिन। सहस्र मुखवाले शेष भी इसे कहनेमें असमर्थ हैं। मृत्युञ्जय भगवान् शंकर यदि अपने पाँच मुखोंसे कहने लगें तो वे भी पार नहीं पा सकते। ब्रह्माजी चारों वेदों तथा अखिल जगत्के स्रष्टा हैं। चार मुखोंसे उनकी परम शोभा होती है। भगवान् विष्णु सर्वज्ञ हैं, परंतु ये दोनों प्रधान देव भी श्रीकृष्णके गुणोंका सम्यक् प्रकारसे वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। स्वामी कार्तिकेय अपने छः मुखोंसे वर्णन करते रहें तो भी अन्त नहीं पा सकते। महाभाग गणेशजीको योगीन्द्रोंके गुरु-का-गुरु कहा जाता है; किंतु भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन कर पाना उनके लिये भी असम्भव है। सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारतत्त्व चार वेद हैं। ये वेद तथा इनसे परिचित विद्वान् भी श्रीकृष्णके गुणोंकी एक कला भी जाननेमें असमर्थ सिद्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णकी महिमाके वर्णनमें साक्षात् सरस्वती भी जड़के समान होकर असमर्थता प्रकट करने लगती हैं। सनत्कुमार, धर्म, सनक, सनातन सनन्द, कपिल तथा सूर्य—ये तथा श्रीब्रह्माजीके अन्यान्य सुयोग्य पुत्र भी उनके महत्त्वका वर्णन करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके, तब फिर अन्य व्यक्तियोंसे क्या आशा की जा सकती है? श्रीकृष्णके जिन गुणोंकी व्याख्या सिद्ध, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र भी नहीं कर सकते, उनका वर्णन अन्य पुरुष कैसे कर सकते हैं? तथा मैं ही कैसे कर सकता हूँ?
ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति देवता जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते हैं, वे भक्तोंके लिये जितने सुगम हैं, उतने ही भक्तहीन जनोंके लिये दुर्लभ भी हैं। श्रीकृष्णका गुणानुवाद परम पवित्र है। कुछ लोग किंचिन्मात्र उसे जानते हैं। परम ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा तथा उनके पुत्र आदि अधिक परिचित हैं। ज्ञानियोंके गुरु गणेशजी उनसे भी अधिक जानते हैं। सबसे अधिक सर्वज्ञ भगवान् शंकर ही जानते हैं; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णने पूर्वकालमें इनको ज्ञान प्रदान किया था। गोलोकके अत्यन्त निर्जन रमणीय रासमण्डलमें श्रीकृष्णने जो शिवको अपने गुणोंके कीर्तनका महत्त्व बताया था, उसका स्वयं शिवजीने अपनी पुरीमें धर्मके प्रति उपदेश किया था। महाभाग सूर्यके पूछनेपर धर्मने पुष्करमें उनके सामने इसकी व्याख्या की थी। साध्वि! मेरे पिता भगवान् सूर्यने तपस्याद्वारा धर्मकी आराधना करके मुझे प्राप्त किया था। सुव्रते! पूर्व समयमें मेरे पिताजी यत्नपूर्वक मुझे यमपुरीका राज्य दे रहे थे; किंतु मैं लेना नहीं चाहता था। वैराग्य हो जानेके कारण मेरे मनमें तपस्या करनेकी बात आती थी। तब पिताजीने मेरे सामने भगवान्के गुणोंका जो वर्णन किया था, वह अत्यन्त दुर्गम है। मैं आगमके अनुसार उसे कुछ कहता हूँ, सुनो।
वरानने! श्रीकृष्णके इतने अमित गुण हैं कि उन्हें वे स्वयं ही पूरा नहीं जानते; तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है? जैसे आकाश स्वयं ही अपना अन्त नहीं जानता, उसी तरह भगवान् भी अपने गुणोंका अन्त नहीं जानते। भगवान् सबके अन्तरात्मा एवं सम्पूर्ण कारणोंके कारण हैं; वे सर्वेश्वर, सर्वाद्य, सर्ववित् और सर्वरूपधारी हैं, वे नित्यस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्यानन्द, निराकार, निरङ्कुश,
प्रकृतिखण्ड
२२३
निःशङ्क, निर्गुण (प्राकृतगुणरहित), निरामय, निर्लिप्त, सर्वसाक्षी, सर्वाधार एवं परात्पर हैं। प्रकृति उन्हींसे उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ प्रकृतिके कार्य हैं। स्वयं परमपुरुष श्रीकृष्ण ही प्रकृति हैं और वे प्रकृतिसे परे भी हैं। रूपहीन होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे नाना प्रकारके रूप धारण करते हैं। उनका दिव्य चिन्मय स्वरूप अत्यन्त कमनीय, सुन्दर और परम मनोहर है। वे नवीन मेघमालाके समान श्याम कान्ति धारण करते हैं। उनकी किशोर अवस्था है। वे गोपवेषमें सुशोभित होते हैं। कोटि-कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाके धाम हैं। उनकी मोहिनी झाँकी मनको मोहे लेती है। उनके नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें पूर्णतः विकसित हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनका मुख शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित दिव्य आभूषण उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। मन्द मुस्कानसे सुशोभित मुख एवं सर्वाङ्ग बहुमूल्य पीताम्बरसे सतत शोभायमान है। वे परब्रह्मस्वरूप हैं और ब्रह्मतेजसे उद्भासित होते हैं। भक्तजनोंको सुखपूर्वक उनका दर्शन सुलभ होता है। वे शान्तस्वरूप राधा-वल्लभ अनन्त गुण और महिमासे सम्पन्न हैं। प्रेममयी गोपियाँ सब ओरसे घेरकर उन्हें मन्द मुस्कराहटके साथ निहारती रहती हैं। वे रासमण्डलके मध्यभागमें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे वनमालासे विभूषित हैं और मुरली बजा रहे हैं। मणिराज कौस्तुभ सदा ही उनके वक्षःस्थलको उद्भासित करता रहता है। केसर, रोली, अबीर, कस्तूरी तथा चन्दनसे उनका श्रीविग्रह चर्चित है। वे मनोहर चम्पा, कमल और मालतीकी मालाओंसे अलंकृत हैं। चारु चम्पाके फूलोंसे सुशोभित चूड़ामणि (मुकुट)-की बंकिमा (लटक) उनके मनोहर सौन्दर्यकी वृद्धि कर रही है।
भक्ति-रससे ओतप्रोत भक्तजन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे ही स्वरूपका ध्यान करते हैं। जगद्धाता ब्रह्मा उन्हींका भय मानकर सृष्टिका विधान तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके भाग्यका उनके कर्मके अनुसार लेखन करते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार सबको तपस्याओं तथा कर्मोंका फल देते हैं। उन्हींके भयसे पालक भगवान् विष्णु सदा सबका पालन करते हैं। उनसे भीत रहनेवाले कालाग्निरुद्रद्वारा अखिल जगत्का संहार होता है। जो ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु एवं मृत्युञ्जय नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव हैं, वे भी उन्हींको जानने तथा उनका ज्ञान प्रदान करनेसे सिद्धेश, योगीश तथा सर्वज्ञ हुए हैं। भक्ति एवं ज्ञानसे युक्त तथा परमानन्दसे सम्पन्न हैं। साध्वि! उन्हींके कृपा-प्रसादसे शीघ्रगामियोंमें श्रेष्ठ पवनदेवता चलते तथा सूर्य उन्हींके भयसे निरन्तर तपते हैं। उन्हींकी आज्ञाके अनुसार इन्द्र वर्षा करते, मृत्यु समस्त प्राणियोंपर प्रभाव डालती, अग्नि जलाती एवं जल शीतल रहता तथा अत्यन्त भयभीत दिक्पाल दिशाओंकी रक्षा करते हैं। उन्हींके भयसे ग्रह राशिचक्रोंपर भ्रमण करते हैं। वृक्ष जो फूलते और फलते हैं, इसमें भी उनका भय ही कारण है। उन्हींकी आज्ञासे फल पकते हैं तथा बहुत-से वृक्ष फलहीन रह जाते हैं। उनकी आज्ञासे ही जलचर जीव स्थलमें और स्थलचर प्राणी जलमें जीवित नहीं रह पाते हैं। उन्हींके भयसे मैं (यमराज) धर्माधर्मके विषयमें नियन्त्रण करता हूँ। उनकी आज्ञासे ही काल सबको अपना ग्रास बनाता और सर्वत्र चक्कर लगाता ही रहता है। उन्हींके भयसे मृत्यु तथा काल किसीको असमयमें नहीं मार सकते। कोई जलती हुई आगमें या गहरे जलाशय अथवा समुद्रमें गिर जाय, वृक्षके ऊपरसे नीचे पड़ जाय, तीखी तलवारपर गिर पड़े, सर्प आदिके मुँहमें पड़ जाय, संग्राममें तथा अन्य विषम संकटोंमें फँसकर नाना प्रकारके अस्त्र-
२२४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो जाय तो भी जिनका भय मानकर काल उसे अकालमें नहीं ले जा सकता तथा जिनकी आज्ञा मिल जानेपर फूल और चन्दनसे सजी हुई सेजपर तन्त्र-मन्त्र तथा भाई-बन्धुओंसे सुरक्षित होकर सोते हुए मनुष्यको भी काल समय आनेपर अवश्य उठा ले जाता है, वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं। उनके भयसे ही काल सब कुछ करता है। उन्हींकी आज्ञासे वायु जलराशिको, जलराशि कच्छपको, कच्छप शेषनागको, शेषनाग पृथ्वीको तथा क्षमारूप पृथ्वी समुद्रों, सातों पर्वतों तथा नाना प्रकारके रूपवाले चराचर जगत्को धारण करती है। उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूत प्रकट होते और अन्तमें उन्हींके भीतर लीन हो जाते हैं।
पतिव्रते ! इकहत्तर दिव्य युगोंकी इन्द्रकी आयु होती है। ऐसे अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माका एक दिन-रात होता है। इसी प्रकार तीस दिनोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु तथा छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षकी ब्रह्माकी आयु होती है। जबतक ब्रह्माका पतन नहीं होता तबतक श्रीहरिकी आँखें खुली रहती हैं—उनकी पलक उठी रहती है। जब वे आँख मूँदते या पलक गिराते हैं, तब ब्रह्माजीका पतन एवं प्रलय होता है। उसीको 'प्राकृतिक प्रलय' कहते हैं। उस प्राकृतिक प्रलयके समय सम्पूर्ण प्राकृत पदार्थ एवं देवता आदि चराचर प्राणी ब्रह्मामें लीन हो जाते हैं और ब्रह्मा भगवान् श्रीकृष्णके नाभिकमलमें लीन हो जाते हैं। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु तथा वैकुण्ठवासी चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वमें लीन हो जाते हैं। रुद्र और भैरव आदि जितने भी शिवके अनुगामी हैं, वे मङ्गलाधार सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप शिवमें लीन होते हैं। ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शिव उन परमात्मा महादेव श्रीकृष्णके ज्ञानमें विलीन हो जाते हैं। सम्पूर्ण शक्तियाँ विष्णुमाया दुर्गामें तिरोहित हो जाती हैं। विष्णुमाया दुर्गा भगवान् श्रीकृष्णकी बुद्धिमें स्थान ग्रहण कर लेती हैं; क्योंकि वे उनकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। नारायणके अंश स्वामिकार्तिकेय उनके वक्षःस्थलमें लीन हो जाते हैं। सुव्रते ! गणोंके स्वामी देवेश्वर गणेशको भगवान् श्रीकृष्णका अंश माना गया है। वे उनकी दोनों भुजाओंमें प्रविष्ट हो जाते हैं। लक्ष्मीकी अंशभूता देवियाँ लक्ष्मीमें तथा लक्ष्मी श्रीराधामें लीन हो जाती हैं। गोपियाँ तथा सम्पूर्ण देवपत्नियां भी श्रीराधामें ही लीन हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधीश्वरी देवी श्रीराधा उनके प्राणोंमें निवास कर जाती हैं। सावित्री, वेद एवं सम्पूर्ण शास्त्र सरस्वतीमें प्रवेश कर जाते हैं। सरस्वती परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णकी जिह्वामें विलीन हो जाती हैं। गोलोकके सम्पूर्ण गोप भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपोंमें लीन हो जाते हैं। उन प्रभुके प्राणोंमें सम्पूर्ण प्राणियोंके प्राणस्वरूप वायुका, उनकी जठराग्निमें समस्त अग्नियोंका तथा उनकी जिह्वाके अग्रभागमें जलका लय हो जाता है। जो सारसे भी सारतर हैं तथा भक्तिरसामृतका पान करते हैं, वे भक्त वैष्णवजन अत्यन्त आनन्दित हो उन भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें विलीन हो जाते हैं। क्षुद्र विराट् महान् विराट्में और महान् विराट् परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। श्रीकृष्णके ही रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उन्हींके आँख मीचनेपर महाप्रलय होता है तथा उनकी आँख खुलते ही पुनः सृष्टिका कार्य आरम्भ हो जाता है। भगवान्की पलक जितनी देर उठी या खुली रहती है, उतनी ही देरतक बंद भी रहती है। दोनोंमें बराबर ही समय लगता है। ब्रह्माके सौ वर्षोंतक सृष्टि चालू रहती है, फिर उतने ही समयके लिये प्रलय हो जाता है। सुव्रते!
प्रकृतिखण्ड २२५
ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयकी कोई गिनती ही नहीं है। ठीक उसी तरह, जैसे भूमिके धूलिकणोंकी कोई गणना नहीं की जा सकती। जिन सर्वान्तरात्मा श्रीकृष्णके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्का प्रलय हो जाता है और पलकके उठते ही उन परमेश्वरकी इच्छासे सृष्टि आरम्भ हो जाती है, उनके गुणोंका कीर्तन करनेमें कौन समर्थ है? मैंने पिताजीके मुखसे जैसा-जैसा सुना है, वैसा-वैसा आगमोंके अनुसार वर्णन किया है।
चारों वेदोंने मुक्तिके चार भेद बतलाये हैं। उन सबसे प्रभुकी भक्तिको श्रेष्ठ माना गया है; क्योंकि इसके सामने सभी तुच्छ हैं। भक्ति मुक्तिसे भी बड़ी है। एक मुक्ति 'सालोक्य' प्रदान करनेवाली, दूसरी 'सारूप्य' देनेमें निपुण, तीसरी 'सामीप्य' प्रदान करनेवाली है और चौथी 'निर्वाणपद' पर पहुँचानेवाली कही जाती है। भक्त पुरुष परमप्रभु परमात्माकी सेवा छोड़कर इन मुक्तियोंकी इच्छा नहीं करते। वे सिद्धत्व, अमरत्व और ब्रह्मत्वकी भी अवहेलना करते हैं। मुक्ति सेवारहित होती है और भक्तिमें निरन्तर सेवाभावका उत्कर्ष होता रहता है। यही भक्ति और मुक्तिका भेद है। अब निषेकका लक्षण सुनो। विद्वान् पुरुष कहते हैं कि किये हुए कर्मोंका भोग ही निषेक है। उस कर्मभोग या प्रारब्धका भी खण्डन करके कल्याण प्रदान करनेवाली है—श्रीकृष्णकी उत्तम सेवा। साध्वि! यह तत्त्वज्ञान लोक और वेदका सार है। यह विघ्नोंका नाशक तथा शुभदायक है। बेटी! अब तुम सुखपूर्वक अपने घरको जाओ।
इस प्रकार कहकर सूर्यपुत्र यमराजने सावित्रीके पति सत्यवान्को जीवन प्रदान करके सावित्रीको शुभ आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेके लिये उद्यत हो गये। उन्हें जाते देख सावित्री उनके चरणोंमें मस्तक झुका दोनों पैर पकड़कर रोने लगी। सच है, सत्पुरुषोंका बिछोह बड़ा ही दुःखदायक होता है। नारद! सावित्रीको रोती देख कृपानिधान यम भी रो पड़े और मन-ही-मन संतुष्ट हो उससे इस प्रकार बोले।
यमने कहा—सावित्री! तुम पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें लाख वर्षोंतक सुख भोगनेके अनन्तर भगवान् श्रीकृष्णके गोलोकधाममें जाओगी। भद्रे! अब तुम अपने घर जाओ और भगवती सावित्रीका व्रत करो। चौदह वर्षोंतक करनेपर यह व्रत नारियोंको मोक्ष प्रदान करता है। ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथिको यह व्रत करना चाहिये। भाद्रपद-मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिके दिन महालक्ष्मीका शुभ व्रत होता है। यह व्रत सोलह वर्षोंतक प्रत्येक वर्षके प्रतिमासके शुक्लपक्षमें करना चाहिये। जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे भगवान् श्रीहरिका परमपद प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक मङ्गलवारको मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती मङ्गलचण्डिकाकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक मासके शुक्लपक्षमें षष्ठीके दिन मङ्गलप्रदा भगवती षष्ठी (देवसेना)-की उपासना करनेका विधान है। इसी प्रकार आषाढ़की संक्रान्तिके अवसरपर सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली भगवती मनसाकी पूजा होती है। कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रासमण्डलमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णकी प्राणाधिका श्रीराधाकी उपासना करनी चाहिये तथा प्रत्येक मासकी शुक्ला अष्टमीके दिन दुर्गतिनाशिनी, विष्णुमाया भगवती दुर्गाका व्रत करना चाहिये। जो नारी विशुद्ध पतिव्रताओंमें, श्रीयन्त्र आदिमें तथा प्रतिमाओंमें पतिपुत्रवती सती प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती जगदम्बाकी भावना करके धन और संततिकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक पूजा करती है, वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होती है।
इस प्रकार कहकर धर्मराज अपने स्थानपर पधार गये। सावित्री भी पतिदेवको लेकर अपने घर लौट गयी। नारद! यों सावित्री और सत्यवान्
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दोनों जब घरपर चले आये, तब सावित्रीने सत्यवान्से तथा अन्य बान्धवोंसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। फिर वरके प्रभावसे सावित्रीके पिता क्रमशः सौ पुत्रवाले हो गये। उसके श्वशुरकी आँखें ठीक हो गयीं और वे अपना राज्य पा गये। सावित्री स्वयं भी बहुत-से पुत्रोंकी जननी बन गयी। उस पतिव्रता सावित्रीने पुण्यभूमि भारतवर्षमें अनेक वर्षोंतक सुख-भोग किया। तत्पश्चात् वह अपने पतिके साथ गोलोकधाममें चली गयी। जो सविताकी अधिदेवी, सवितृदेवताके मन्त्रोंकी अधिष्ठात्री तथा वेदोंकी सावित्री (जननी) हैं, वे देवी इन्हीं गुणोंके कारण ‘सावित्री’ कही गयी हैं।
वत्स! इस प्रकार सावित्रीका श्रेष्ठ उपाख्यान तथा प्राणियोंके कर्मविपाक—ये प्रसङ्ग तुम्हें बता दिये। अब पुनः क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ३४)
भगवती महालक्ष्मीके प्राकट्य तथा विभिन्न व्यक्तियोंसे उनके पूजित होनेका तथा दुर्वासाके शापसे महालक्ष्मीके देवलोक-त्याग और इन्द्रके दुःखी होकर बृहस्पतिके पास जानेका वर्णन
नारदजीने कहा— भगवन्! मैं धर्मराज और सावित्रीके संवादमें निर्गुण-निराकार परमात्मा श्रीकृष्णका निर्मल यश सुन चुका। वास्तवमें उनके गुणोंका कीर्तन मङ्गलोंका भी मङ्गल है। प्रभो! अब मैं भगवती लक्ष्मीका उपाख्यान सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सर्वप्रथम भगवती लक्ष्मीकी किसने पूजा की? इन देवीका कैसा स्वरूप है और किस मन्त्रसे इनकी पूजा होती है? आप मुझे इनका गुणानुवाद सुनानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले— ब्रह्मन्! प्राचीन समयकी बात है। सृष्टिके आदिमें परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके वामभागसे रासमण्डलमें भगवती श्रीराधा प्रकट हुईं। उन परम सुन्दरी श्रीराधाके चारों ओर वटवृक्ष शोभा दे रहे थे। उनकी अवस्था ऐसी थी, मानो द्वादशवर्षीया देवी हों। निरन्तर रहनेवाला तारुण्य उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनका दिव्य विग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो श्वेत चम्पकका पुष्प हो। उन मनोहारिणी देवीके दर्शन परम सुखी बनानेवाले थे। उनका प्रसन्नमुख शरत्पूर्णिमाके कोटि-कोटि चन्द्रमाओंकी प्रभासे पूर्ण था। उनके विकसित नेत्रोंके सामने शरत्कालके मध्याह्नकालिक कमलोंकी शोभा छिप जाती थी। परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ विराजमान रहनेवाली वे देवी उनकी इच्छाके अनुसार दो रूप हो गयीं। रूप, वर्ण, तेज, अवस्था, कान्ति, यश, वस्त्र, आकृति, आभूषण, गुण, मुस्कान, अवलोकन, वाणी, गति, मधुर-स्वर, नीति तथा अनुनय-विनयमें दोनों (राधा तथा लक्ष्मी) समान थीं। श्रीराधाके बाँयें अंशसे लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ और अपने दाहिने अंशमें श्रीराधा स्वयं ही विद्यमान रहीं। श्रीराधाने प्रथम परात्पर प्रभु द्विभुज भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपसे स्वीकार कर लिया। भगवान्का वह विग्रह अत्यन्त कमनीय था। महालक्ष्मीने भी श्रीराधाके वर लेनेके पश्चात् उन्हींको पति बनानेकी इच्छा की। तब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें गौरव प्रदान करनेके विचारसे ही स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हो गये। अपने दक्षिण अंशसे वे दो भुजाधारी श्रीकृष्ण ही बने रहे और वाम अंशसे चतुर्भुज विष्णुके रूपमें परिणत हो गये। उन्होंने महालक्ष्मीको भगवान् विष्णुकी सेवामें समर्पित कर दिया। जो देवी अपनी स्नेहभरी दृष्टिसे विश्वको माताकी भाँति निरन्तर देखती-भालती
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रहती हैं, वे ही देवियोंमें महती होनेके कारण महालक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं। इस प्रकार द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्राणपति बने और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु लक्ष्मीके। द्विभुज श्रीकृष्ण गोपों और गोपियोंसे आवृत हो गोलोकमें अत्यन्त शोभा पाने लगे और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु भगवती लक्ष्मीसहित वैकुण्ठधामको चले गये। ये भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों समस्त अंशोंमें एक समान ही हैं।
भगवती श्रीमहालक्ष्मी योगबलसे नाना रूपोंमें विराजमान हुईं। वे सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, परिपूर्णतमा 'महालक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हो वैकुण्ठधाममें निवास करने लगीं। प्रेमके कारण समस्त नारीसमुदायमें वे प्रधान हुईं। वे स्वर्गमें इन्द्रकी सम्पत्तिस्वरूपिणी होकर 'स्वर्गलक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। पातालमें तथा मर्त्यलोकमें राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' हुईं। गृहस्थोंके यहाँ 'गृह-लक्ष्मी' के नामसे पूजित हुईं। अपने कलांशसे ये ही गृहिणी भी कहलाती हैं। वे गृहस्थोंके लिये सम्पत्स्वरूपा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला हैं। गौओंकी जननी सुरभि तथा यज्ञपत्नी दक्षिणा भी वे ही हैं। क्षीरसागरके यहाँ उसकी कन्या हैं। कमलोंमें 'श्री' तथा चन्द्रमा और सूर्यमें 'शोभा' रूपसे उन्हींका निवास है। वे सूर्यमण्डलका अलंकार हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य नारी, गृह, सम्पूर्ण धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवताओंकी प्रतिमा, मङ्गल-कलश, माणिक्य, मोतियोंकी सुन्दर मालाएँ, बहुमूल्य हीरे, चन्दन-वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नूतन मेघ—इन सभी वस्तुओंमें भगवती श्रीलक्ष्मीका अंश विद्यमान है।
मुने! सर्वप्रथम भगवान् नारायणने वैकुण्ठधाममें इन महालक्ष्मीकी पूजा की। दूसरी बार ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक इनका अर्चन किया। तीसरी बार भगवान् श्रीशिवने इनकी आराधना की। मुने! फिर भगवान् विष्णुने क्षीरसागरमें इनकी पूजा की। तदनन्तर स्वायम्भुव मनु, मानवेन्द्र, ऋषीश्वर, मुनीश्वर तथा साधु गृहस्थ—इन लोगोंने महालक्ष्मीकी उपासना की है। गन्धर्व और नाग आदिने पाताललोकमें इनका पूजन किया। भाद्रपदमासकी शुक्ल अष्टमीके सुअवसरपर ब्रह्माद्वारा ये सुपूजित हुईं। नारद! फिर भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें पूरे पक्षतक त्रिलोकीमें इनकी भक्तिपूर्वक पूजा होने लगी। चैत्र, पौष तथा भाद्रपदमासके पवित्र मङ्गलवारको भगवान् विष्णुने भक्तिपूर्वक तीनों लोकोंमें इनकी पूजाका महोत्सव चालू किया। वर्षके अन्तमें पौषकी संक्रान्तिके दिन मनुने अपने प्राङ्गणमें इनकी प्रतिमाका आवाहन करके इनकी पूजा की। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें वह पूजा प्रचलित हो गयी। राजेन्द्र! मङ्गल, केदार, नील, नल, सुबल, उत्तानपाद-पुत्र ध्रुव, इन्द्र, बलि, कश्यप, दक्ष, मनु, विवस्वान् (सूर्य), प्रियव्रत, चन्द्रमा, कुबेर, वायु, यम, अग्नि और वरुणने मङ्गलमयी देवीकी उपासना की। इस प्रकार ये भगवती महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंसे सदा सुपूजित हुई हैं। ये सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। समस्त सम्पत्तियाँ इन्हींका स्वरूप हैं।
नारदजीने पूछा— भगवन्! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायणकी प्रिया होकर सदा वैकुण्ठमें विराजती हैं। उन सनातनीदेवीको वैकुण्ठकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी पृथ्वीपर सिन्धुकन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उनका ध्यान, कवच और पूजनसम्बन्धी सम्पूर्ण विधान क्या है? पूर्वकालमें सबसे पहले उन महालक्ष्मीका स्तवन किसने किया था? इन सब बातोंका मेरे लिये विशद विवेचन कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वसमयकी बात है। दुर्वासाके शापसे इन्द्र, देवसमुदाय तथा मर्त्यलोक—सभी श्रीहीन हो गये थे। रूठी हुई लक्ष्मी स्वर्ग आदिका त्याग करके