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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६४- सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जन्मतक गन्धक होता है। फिर गलितकुष्ठवाला
तथा वह कुलटा रौरवकी यातना भोगकर सात
शूद्र होता है। तत्पश्चात् अवशिष्ट रोगसे युक्त
जन्मोंतक क्रमशः विधवा, वन्ध्या, अस्पृश्या,
दुर्बल ब्राह्मण होता है, वहाँ वह छः पल सोना
जातिहीना और नकटी होती है। लाल पदार्थकी
दान करनेसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है। धान्यकी
चोरी करनेवाला रक्तदोषसे युक्त होता है। आचारहीन
चोरी करनेवाला सात जन्मोंतक दुःखी और
मनुष्य यवन, हिंसक, लँगड़ा, दीक्षाहीन वङ्खर,
कृपण होता है। वह सौ वर्षोंतक विष्ठाके कुण्डमें
कुदृष्टि डालनेवाला काना, अहंकारी कर्णहीन,
यातना भोगकर उस भयसे मुक्त होता है। स्वर्णका
वेदकी निन्दा करनेवाला बहरा, बात काटनेवाला
अपहरण करनेवाला मानव कोढ़ी और पतित
गूँगा, हिंसक केशहीन, मिथ्यावादी दाढ़ीरहित,
होता है तथा स्वर्ण-दान ग्रहण करनेवाला विष्ठाके
दुष्ट वचन बोलनेवाला दन्तहीन, सत्यको छिपानेवाला
कुण्डमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रात-दिन
जिह्वाहीन, दुष्ट अंगुलिरहित तथा ग्रन्थकी चोरी
विष्ठा खानेके बाद व्याध होता है, फिर रक्तविकारयुक्त
करनेवाला मूर्ख एवं रोगी होता है। घोड़ेका दान
शूद्र होता है। उस जन्ममें पापका उपभोग करके
लेनेवाला तथा घोड़ा चुरानेवाला लालामूत्र नामक
वह पुनः अवशिष्ट रोगयुक्त ब्राह्मण होता है और
नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक रहकर फिर
स्वर्ण-दान करनेसे मुक्त हो जाता है।
घोड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। हाथीका दान
अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेवाला पापी
लेनेवाला तथा हाथी-चोर एक हजार वर्षोंतक
असंख्य वर्षोंतक पूर्वोक्त रौरव तथा महाभयंकर
विष्ठाके कुण्डमें रहकर फिर हाथी होता है।
कुम्भीपाकमें जाता है। इसके बाद हजार वर्षोंतक
तत्पश्चात् शूद्रके घर जन्म लेता है। छागका
वह कुलटा स्त्रियोंकी योनिका कीड़ा और लाख
प्रतिग्रही और चोर मनुष्य सौ वर्षोंतक पूयकुण्डमें
वर्षोंतक विष्ठाका कीट होता है। उससे पशुयोनिमें
वास करके फिर चाण्डाल होता है। तत्पश्चात्
और पशुयोनिसे क्षुद्र जन्तुओंमें जन्म लेता है।
एक वर्षतक छागकी योनिमें पैदा होता है। वहाँ
तत्पश्चात् म्लेच्छ और फिर नीच शूद्र होता है।
शत्रुके शस्त्रद्वारा काटे जानेसे मुक्त होकर ब्राह्मण
इसके बाद वह व्याधिग्रस्त ब्राह्मण होता है और
होता है। जो दान की हुई वस्तुका अपहरण
पुनः ब्राह्मण होकर क्रमशः तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे
करता है तथा वाग्दान करके पुनः उस बातको
शुद्ध हो जाता है; परंतु पापके कारण उसका वंश
पलट देता है; वह म्लेच्छयोनिमें जन्म लेता है
नहीं चलता। फिर एक लाख ब्राह्मणोंको भोजन
और वहाँ कष्ट भोगकर नरकमें जाता है।
कराकर वह पवित्र हो जाता है और पुत्र प्राप्त कर
ब्रजेश ! जो (दूसरेको न देकर) अकेले ही
लेता है। क्रोधी मनुष्य सात जन्मोंतक गदहा होता
मिठाइयाँ गप कर जाता है, वह निश्चय ही
है और जो मानव झगड़ालू होता है, उसे सात
कालसूत्र नरकमें जाता है। वहाँ सौ वर्षोंतक
जन्मोंतक कौआ होना पड़ता है। लोहेकी चोरी
यातना भोगकर फिर हजार वर्षोंकी आयुवाला
करनेवाला संतानहीन, मषी चुरानेवाला कोकिल,
प्रेत होता है। इसके बाद वह एक जन्मतक
अञ्जनका चोर शुक और मिठाई चुरानेवाला
मक्खी, एक जन्ममें चींटी, एक जन्ममें भ्रमर,
कीड़ा होता है। तात! ब्राह्मण और गुरुसे द्वेष
एक जन्ममें मधुमक्खी, एक जन्ममें बर्रै, एक
करनेवाला सिरका कीट-जूँ होता है। पुंश्चली
जन्ममें डाँस, एक जन्ममें मच्छर, एक जन्ममें
स्त्रीका भोग करके पुरुष रौरव नरकमें जाता है
दुर्गन्धयुक्त कीट और एक जन्ममें खटमल होनेके
और फिर सौ वर्षोंतक निरर्थक कीट होता है
बाद दुर्बुद्धि एवं रोगग्रस्त शूद्र होता है। फिर

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०१

उससे मुक्त होकर ब्राह्मण हो जाता है। तेलकी चोरी करनेवाला तेली तीन जन्मोंतक सिरका कीट-जूँ होता है। जो दुष्ट क्षेत्रकी सीमा-मेड़को नष्ट करनेवाला, भूमिचोर, हिंसक तथा दान की हुई भूमिको वापस ले लेनेवाला है, वह अवश्यमेव कालसूत्र नरकमें जाता है। वहाँ भूख-प्याससे पीड़ित होकर साठ हजार वर्षोंतक कष्ट भोगता है। तत्पश्चात् विष्ठाका कीड़ा होकर उत्पन्न होता है। इसके बाद एक जन्ममें असत् शूद्र होता है और उसके बाद शुद्ध हो जाता है। इसलिये विद्वान्को चाहिये कि वह यह सब जानकर यत्नपूर्वक इनसे सावधान रहे। लाल वस्त्रको चुरानेवाला एक जन्ममें लाल रंगका कीड़ा होता है। फिर एक जन्ममें शूद्र होता है; इसके बाद शुद्ध होकर ब्राह्मण हो जाता है। जो ब्राह्मण तीनों कालकी संध्याओंसे हीन है तथा जो मनुष्य प्रातःकाल, संध्या-समय और दिनमें सोता है, यज्ञोपवीतकी चोरी करता है, अशुद्ध संध्या करता है और वेद-वेदाङ्गका निन्दक है; उसके लिये स्वर्गका मार्ग निरुद्ध हो जाता है अर्थात् वह नरकगामी होता है और तीन जन्मोंतक पतित होता है। जो शूद्र होकर ब्राह्मणीके साथ व्यभिचार करता है; वह निश्चय ही कुम्भीपाकमें जाता है। वहाँ कष्ट झेलता हुआ तीन लाख वर्षोंतक यातना भोगता है। वह रात-दिन भयंकर खौलते हुए तेलमें जलता रहता है। तत्पश्चात् वह पापी कुलटा नारियोंकी योनिका कीड़ा होता है। वहाँ साठ हजार वर्षोंतक उस योनिका मल ही उसका आहार होता है। फिर क्रमशः एक लाख जन्मोंतक वह चाण्डाल होता है। फिर एक जन्ममें घावयुक्त कोढ़वाला शूद्र होता है। इसके बाद शुद्ध होकर व्याधियुक्त ब्राह्मण होता है; फिर तीर्थोंमें भ्रमण करनेसे शुद्ध हो जाता है। जो मानव देवताकी उचित पूजा न करके उन्हें अपवित्र नैवेद्य समर्पित करता है, वह असत् शूद्र होता है।

ब्रजेश्वर! जो मिट्टी, भस्म और गोबरके पिण्डोंसे अथवा बालुकासे शिवलिङ्गका निर्माण करके एक बार भी उसका पूजन करता है, वह कल्पपर्यन्त स्वर्गमें निवास करता है। तत्पश्चात् वह भूमिका स्वामी एवं महाविद्वान् ब्राह्मण होता है। सौ लिङ्गोंका पूजन करनेसे मनुष्य भारतवर्षमें राजा होता है। एक हजार लिङ्गपूजनसे उसे निश्चित फलकी प्राप्ति होती है। वह चिरकालतक स्वर्गमें निवास करके अन्तमें भारतभूमिपर राजेन्द्र होता है। दस हजार लिङ्ग-पूजनसे राजाधिराज और एक लाख लिङ्ग-पूजनसे चक्रवर्ती सम्राट् हो जाता है। अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन करनेसे उसका अतिरिक्त फल मिलता है। तीर्थस्नान, दान, ब्रह्मभोज, नारायणार्चन आदि कर्मसे वह ब्राह्मणवंशमें पैदा होता है, फिर अतिरिक्त तपस्याके प्रभावसे वह ब्राह्मण विद्वान् तथा जितेन्द्रिय वैष्णव हो जाता है। फिर अनेक जन्मोंके पुण्यफलसे वह भारतभूमिपर जन्म लेता है। उसके चरण-स्पर्शसे ही वसुन्धरा तत्काल पवित्र हो जाती है। ऐसे जीवन्मुक्त वैष्णव तीर्थोंको तीर्थत्व प्रदान करते हैं और अपने हजारों पूर्वजोंको पावन बना देते हैं। ऐसा श्रुतिमें सुना गया है। जो अत्यन्त क्रूर, दुराचारी तथा देव-ब्राह्मणका द्वेषी होता है; वह हजार वर्षोंतक जहरीला साँप होता है। व्रजनाथ! जो नारी कुलटा स्त्रियोंके लम्पटोंकी दूती होती है; वह सौ वर्षोंतक कालसूत्र नरकमें रहकर फिर छिपकली होती है। एक जन्मतक छिपकली होनेके बाद तीन जन्मोंतक हरिण, एक जन्ममें भैंसा, एक जन्ममें भालू, एक जन्ममें गैंडा और तीन जन्मोंतक सियारकी योनिमें उत्पन्न होती है। जो दूसरेके तड़ागका तथा भलीभाँति बोयी हुई दूसरेकी खेतीका दान करता है, वह मगरकी जातिमें उत्पन्न होकर तीन जन्मोंतक कछुआ होता है। एकादशी-व्रतको न रखनेवाला ब्राह्मण पतित हो जाता है। फिर अपने आहारसे दूना भोजन