ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३९- सुतपाके द्वारा सुयज्ञको शिवप्रदत्त परम दुर्लभ महाज्ञानका उपदेश
| .. प्रकृतिखण्ड | २७१ |
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श्रीराधा और श्रीकृष्णके चरित्र तथा श्रीराधाकी पूजा-परम्पराका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय
**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**पार्वति! एक समयकी बात है, श्रीकृष्ण विरजा नामवाली सखीके यहाँ उसके पास थे। इससे श्रीराधाजीको क्षोभ हुआ। इस कारण विरजा वहाँ नदीरूप होकर प्रवाहित हो गयी। विरजाकी सखियाँ भी छोटी-छोटी नदियाँ बनीं। पृथ्वीकी बहुत-सी नदियाँ और सातों समुद्र विरजासे ही उत्पन्न हैं। राधाने प्रणयकोपसे श्रीकृष्णके पास जाकर उनसे कुछ कठोर शब्द कहे। सुदामाने इसका विरोध किया। इसपर लीलामयी श्रीराधाने उसे असुर होनेका शाप दे दिया। सुदामाने भी लीलाक्रमसे ही श्रीराधाको मानवीरूपमें प्रकट होनेकी बात कह दी। सुदामा माता राधा तथा पिता श्रीहरिको प्रणाम करके जब जानेको उद्यत हुआ तब श्रीराधा पुत्रविरहसे कातर हो आँसू बहाने लगीं। श्रीकृष्णने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और शीघ्र उसके लौट आनेका विश्वास दिलाया। सुदामा ही तुलसीका स्वामी शङ्खचूड़ नामक असुर हुआ था, जो मेरे शूलसे विदीर्ण एवं शापमुक्त हो पुनः गोलोक चला गया। सती राधा इसी वाराहकल्पमें गोकुलमें अवतीर्ण हुई थीं। वे व्रजमें वृषभानु वैश्यकी कन्या हुईं। वे देवी अयोनिजा थीं, माताके पेटसे नहीं पैदा हुई थीं। उनकी माता कलावतीने अपने गर्भमें ‘वायु’ को धारण कर रखा था। उसने योगमायाकी प्रेरणासे वायुको ही जन्म दिया; परंतु वहाँ स्वेच्छासे श्रीराधा प्रकट हो गयीं। बारह वर्ष बीतनेपर उन्हें नूतन यौवनमें प्रवेश करती देख माता-पिताने ‘रायाण’ वैश्यके साथ उसका सम्बन्ध निश्चित कर दिया। उस समय श्रीराधा घरमें अपनी छायाको स्थापित करके स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। उस छायाके साथ ही उक्त रायाणका विवाह हुआ।
‘जगत्पति श्रीकृष्ण कंसके भयसे रक्षाके बहाने शैशवावस्थामें ही गोकुल पहुँचा दिये गये थे। वहाँ श्रीकृष्णकी माता जो यशोदा थीं, उनका सहोदर भाई ‘रायाण’ था। गोलोकमें तो वह श्रीकृष्णका अंशभूत गोप था, पर इस अवतारके समय भूतलपर वह श्रीकृष्णका मामा लगता था। जगत्स्रष्टा विधाताने पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ साक्षात् श्रीराधाका विधिपूर्वक विवाहकर्म सम्पन्न कराया था। गोपगण स्वप्नमें भी श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन नहीं कर पाते थे। साक्षात् राधा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें वास करती थीं और छायाराधा रायाणके घरमें। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन पानेके लिये पुष्करमें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी; उसी तपस्याके फलस्वरूप इस समय उन्हें श्रीराधा-चरणोंका दर्शन प्राप्त हुआ था। गोकुलनाथ श्रीकृष्ण कुछ कालतक वृन्दावनमें श्रीराधाके साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। तदनन्तर सुदामाके शापसे उनका श्रीराधाके साथ वियोग हो गया। इसी बीचमें श्रीकृष्णने पृथ्वीका भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जानेपर तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे श्रीराधाने श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णने श्रीराधाका दर्शन प्राप्त किया। तदनन्तर तत्त्वज्ञ श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गोलोकधाम पधारे। कलावती (कीर्तिदा) और यशोदा भी श्रीराधाके साथ ही गोलोक चली गयीं।
प्रजापति द्रोण नन्द हुए। उनकी पत्नी धरा यशोदा हुईं। उन दोनोंने पहले की हुई तपस्याके प्रभावसे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। महर्षि कश्यप वसुदेव हुए थे। उनकी पत्नी सती साध्वी अदिति अंशतः देवकीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। प्रत्येक कल्पमें जब भगवान् अवतार लेते हैं, देवमाता अदिति तथा देवपिता कश्यप उनके माता-पिताका स्थान ग्रहण करते हैं। श्रीराधाकी माता कलावती (कीर्तिदा)
| २७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पितरोंकी मानसी कन्या थी। गोलोकसे वसुदाम गोप ही वृषभानु होकर इस भूतलपर आये थे।
दुर्गे! इस प्रकार मैंने श्रीराधाका उत्तम उपाख्यान सुनाया। यह सम्पत्ति प्रदान करनेवाला, पापहारी तथा पुत्र और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला है। श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्ण गोलोकधाममें। चतुर्भुजकी पत्नी महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी हैं। ये चारों देवियाँ चतुर्भुज नारायणदेवकी प्रिया हैं। श्रीकृष्णकी पत्नी श्रीराधा हैं, जो उनके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं। वे तेज, अवस्था, रूप तथा गुण सभी दृष्टियोंसे उनके अनुरूप हैं। विद्वान् पुरुषको पहले ‘राधा’ नामका उच्चारण करके पश्चात् ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करना चाहिये। इस क्रमसे उलट-फेर करनेपर वह पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है।
कार्तिककी पूर्णिमाको गोलोकके रासमण्डलमें श्रीकृष्णने श्रीराधाका पूजन किया और तत्सम्बन्धी महोत्सव रचाया। उत्तम रत्नोंकी गुटिकामें राधा-कवच रखकर गोपोंसहित श्रीहरिने उसे अपने कण्ठ और दाहिनी बाँहमें धारण किया। भक्तिभावसे उनका ध्यान करके स्तवन किया। फिर मधुसूदनने राधाके चबाये हुए ताम्बूलको लेकर स्वयं खाया। राधा श्रीकृष्णकी पूजनीया हैं और भगवान् श्रीकृष्ण राधाके पूजनीय हैं। वे दोनों एक-दूसरेके इष्ट देवता हैं। उनमें भेदभाव करनेवाला पुरुष नरकमें पड़ता है।* श्रीकृष्णके बाद धर्मने, ब्रह्माजीने, मैंने, अनन्तने, वासुकिने तथा सूर्य और चन्द्रमाने श्रीराधाका पूजन किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्र, रुद्रगण, मनु, मनुपुत्र, देवेन्द्रगण, मुनीन्द्रगण तथा सम्पूर्ण विश्वके लोगोंने श्रीराधाकी पूजा की। ये सब द्वितीय आवरणके पूजक हैं। तृतीय आवरणमें सातों द्वीपोंके सम्राट् सुयज्ञने तथा उनके पुत्र-पौत्रों एवं मित्रोंने भारतवर्षमें प्रसन्नतापूर्वक श्रीराधिकाका पूजन किया। उन महाराजको दैववश किसी ब्राह्मणने शाप दे दिया था, जिससे उनका हाथ रोगग्रस्त हो गया था। इस कारण वे मन-ही-मन बहुत दुःखी रहते थे। उनकी राज्यलक्ष्मी छिन गयी थी; परंतु श्रीराधाके वरसे उन्होंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। ब्रह्माजीके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वरी श्रीराधाकी स्तुति करके राजाने उनके अभेद्य कवचको कण्ठ और बाँहमें धारण किया तथा पुष्करतीर्थमें सौ वर्षोंतक ध्यानपूर्वक उनकी पूजा की। अन्तमें वे महाराज रत्नमय विमानपर सवार होकर गोलोकधाममें चले गये। पार्वति! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ४९)
राजा सुयज्ञकी यज्ञशीलता और उन्हें ब्राह्मणके शापकी प्राप्ति, ऋषियोंद्वारा ब्राह्मणको क्षमाके लिये प्रेरित करते हुए कृतघ्नोंके भेद तथा विभिन्न पापोंके फलका प्रतिपादन
**पार्वतीने पूछा—**प्रभो! राजा सुयज्ञ कौन थे? किस वंशमें उनका जन्म हुआ था? उन्हें ब्राह्मणका शाप कैसे प्राप्त हुआ था और किस तरह श्रीराधाजीको वे पा सके? जो सर्वात्मा श्रीकृष्णकी पत्नी हैं तथा साक्षात् श्रीकृष्णने जिनका पूजन किया है, उन्हीं परमेश्वरी श्रीराधाकी सेवाका सौभाग्य एक मल-मूत्रधारी मनुष्यको कैसे मिल सका? जिनके चरणारविन्दोंकी रजको पानेके लिये ब्रह्माजीने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थके भीतर साठ हजार वर्षोंतक तप किया तथा जिनका
* राधा पूज्या च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान् प्रभुः। परस्पराभीष्टदेवो भेदकृन्नरकं व्रजेत्॥
(प्रकृतिखण्ड ४९। ६४)
प्रकृतिखण्ड २७३
दर्शन पाना आपके लिये भी अत्यन्त कठिन है,
उन्हीं पुरातनी महालक्ष्मी श्रीराधादेवीका दर्शन
राजा सुयज्ञने कैसे किया ? वे मनुष्योंके दृष्टिपथमें
कैसे आयीं ? तीनों लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माने राजा
सुयज्ञको श्रीराधाका कवच किस प्रकार दिया ?
उनके ध्यान, पूजन-विधि तथा स्तोत्रका उपदेश
कैसे दिया ? यह सब बतानेकी कृपा कीजिये।
श्रीमहादेवजी बोले- देवि ! चौदह मनुओँमें
जो सबसे प्रथम हैं, उन्हें स्वायम्भुव मनु कहते हैं।
वे ब्रह्माजीके पुत्र और तपस्वी कहे गये हैं।
उन्होंने शतरूपासे विवाह किया था। मनु और
शतरूपाके पुत्र उत्तानपाद हुए। उत्तानपादके पुत्र
केवल ध्रुव हैं। गिरिराजनन्दिनि ! ध्रुवकी कीर्ति
तीनों लोकोंमें विख्यात है। ध्रुवके पुत्र उत्कल
हुए, जो भगवान् नारायणके अनन्य भक्त थे।
उन्होंने पुष्करतीर्थमें एक हजार राजसूय-यज्ञोंका
अनुष्ठान किया था, उस यज्ञमें सारे पात्र रत्नोंके
बने हुए थे। राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ वे
सब पात्र ब्राह्मणोंको दान कर दिये थे।
यज्ञान्तमहोत्सवमें राजाने बहुमूल्य वस्त्रोंकी सहस्रों
राशियाँ जो तेजःपुञ्जसे उद्भासित होती थीं,
ब्राह्मणोंको बाँट दीं। प्रिये ! उस सुन्दर यज्ञको
देखकर ब्रह्माजीने देवसभामें राजा उत्कलका नाम
सुयज्ञ रख दिया। राजा सुयज्ञ अन्न, रत्न तथा सब
प्रकारकी सम्पत्तियोंके दाता थे। वे प्रतिदिन
प्रसन्नतापूर्वक उचित दक्षिणाके साथ ब्राह्मणोंको
दस-बारह लाख गौएँ दानमें देते थे। उन गौओंके
सींग रत्नोंसे मढ़े होते थे तथा दुग्धपात्र आदि
सामग्री भी रत्नमयी ही होती थी। वे प्रतिदिन छः
करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन कराया करते थे। उन्हें
प्रतिदिन चूसने, चबाने, चाटने और पीनेयोग्य
भोजनसामग्री देकर तृप्त करते थे। नित्यप्रति एक
लाख रसोइयोंको भोजन दिया करते थे। पूआ,
रोटी-चावल आदि अन्न, दाल आदि व्यञ्जन
दहीके साथ परोसे जाते थे। उस भोजनसामग्रीमें
मांसका सर्वथा अभाव होता था। ब्राह्मणलोग
भोजनके समय मनुवंशी राजा सुयज्ञकी ही नहीं,
उनके पितरोंकी भी स्तुति करते थे। सुन्दरि !
यज्ञके दिनोंमें तथा उसकी समाप्तिके दिन कुल
मिलाकर छत्तीस लाख करोड़ ब्राह्मणोंने अत्यन्त
तृप्तिपूर्वक सु-अन्न भोजन किया था। उन्होंने
दक्षिणामें इतने रत्न ग्रहण किये थे कि उन सबको
अपने घरतक ढो ले जाना उनके लिये असम्भव
हो गया था। कुछ तो उन्होंने शूद्रोंको बाँट दिया
और कुछ रास्तेमें छोड़ दिया। ब्राह्मण-भोजनके
अन्तमें राजाने ब्राह्मणेतरोंको भी भोजन दिया
तथापि वहाँ अन्नकी सहस्रों राशियाँ शेष रह गयीं।
इस प्रकार यज्ञ करके महाबाहु राजा सुयज्ञ
अपनी राजसभामें रमणीय रत्न-सिंहासनपर बैठे
हुए थे। वह सिंहासन रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अनेक
छत्रोंसे सुशोभित था। उसे अच्छी तरह सजाया
गया था। उसपर चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुओंका
लेप हुआ था। चन्दनपल्लवोंसे उसकी रमणीयता
और बढ़ गयी थी। वहाँ वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र,
आदित्यगण, मुनिवर नारद तथा बड़े-बड़े देवता
विराजमान थे। इसी समय वहाँ एक ब्राह्मण आया,