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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६६- श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
७०५

साध्य नहीं होते, तब दूसरेकी क्या बात है? वृन्दे! जो सर्वशक्तिस्वरूपा, दुर्गतिनाशिनी, परमब्रह्म-स्वरूपिणी, ईश्वरी, मूलप्रकृति, नारायणी, विष्णुमाया, वैष्णवी और सनातनी हैं, जिनकी मायासे भ्रमणशील जगत् सदा चक्कर काटता रहता है, वे दुर्गा भी जिन देवकी भक्तिपूर्वक रात-दिन स्तुति करती रहती हैं। गजानन गणेश और छः मुखवाले स्वामीकार्तिक भी भक्तिसहित यथाशक्ति जिनका स्तवन करते हैं। जिनकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी और ज्ञानियोंके गुरुके गुरु हैं, जिन गणेशसे बढ़कर सिद्धेन्द्र, देवेन्द्र, योगीन्द्र और ज्ञानियोंके गुरुओंमें कोई विद्वान् नहीं है, जो गणोंके स्वामी और देवताओंके अधिपति हैं; वे भगवान् गणेश जिनका ध्यान करते हैं। परमेश्वरी सरस्वती जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं। लक्ष्मी रात-दिन जिनके चरणकमलकी सेवा करती हैं। जिनके कटाक्षसे सारा जगत् परिपूर्णतम एवं कल्याणमय है। जिनके भयसे वायु चलती है; जिनके भयसे सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं, अग्नि जलाती है और मृत्यु प्राणियोंमें विचरण करती है। जिनकी सेवा करनेसे पृथ्वी सबकी आधार-स्वरूपा तथा धनकी भण्डार हो गयी है। सुन्दरि! जिनसे भयभीत होकर समुद्र और पर्वत निश्चलरूपसे अपनी-अपनी मर्यादामें स्थित रहते हैं। जिनके चरणकमलकी सेवासे गङ्गादेवी तीर्थोंकी साररूपा, पवित्र, मुक्तिदायिनी और लोकोंको पावन करनेवाली हो गयी हैं। जिनके स्मरण और सेवनसे तुलसीदेवी पवित्र हो गयी हैं तथा नवग्रह और दिक्पाल जिनके प्रतापसे डरते रहते हैं। सारे ब्रह्माण्डोंमें जो-जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा अन्यान्य सुरेश्वर, शेष आदि तथा मुनिगण हैं; उनमेंसे कुछ परमात्मा श्रीकृष्णके कलास्वरूप, कुछ अंशरूप और कुछ कलांशरूप हैं। कल्याणि! तुम उन्हीं परमेश्वरको, जो प्रकृतिसे परे हैं, अपना पति बनाना चाहती हो, परंतु वे गोलोकमें केवल राधिकाद्वारा साध्य हैं; दूसरा कोई कभी भी उन्हें सिद्ध नहीं कर सकता। इतना कहकर छद्मवेषधारी धर्मने उसकी परीक्षाके लिये प्रचुर भोगसुखका प्रलोभन दिया और अपनेको ही पतिरूपमें स्वीकार करनेका अनुरोध किया। फिर धर्म उसकी ओर बढ़े। व्रजेश! उनका विचार केवल उसके सतीत्वको जानना था। उनकी यह चेष्टा देखकर उस राजकन्याके मुख और नेत्र क्रोधसे वक्र हो गये। तब वह हितकारक, सत्य, योगयुक्त, यशस्कर एवं धर्मार्थ वचन बोली।

श्रीवृन्दाने कहा— महाभाग! धैर्य धारण कीजिये। आप तो जातियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणोंका स्वभाव तपोमूलक, सत्यपरक, वेदव्रती और धैर्यशाली होता है। परायी स्त्रियोंके प्रति आकर्षित होना तो अधर्मियोंका स्वभाव है। विप्रवर! अधर्मसे ही दुष्टको अमङ्गलका दर्शन होता है। तत्पश्चात् वह शत्रुपर विजय-लाभ करता है और फिर समूल नष्ट हो जाता है। जो बलपूर्वक पतिव्रताओंके साथ व्यभिचार करता है, वह मातृगामी कहलाता है और उसे तुरंत ही सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है—यह निश्चित है। जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति है, तबतक वह कुम्भीपाकमें यातना भोगता है। यमदूत उसके मस्तकपर लोहेके डंडेसे प्रहार करते हैं; वह खौलते हुए तेलमें जलाया जाता है; परंतु उसकी सूक्ष्मदेहसे प्राण विलग नहीं होते। यह क्षणिक सुख चिरकालिक दुःखका दाता और सर्वविनाशका कारण है। इसीलिये धर्मात्मा पुरुष अगम्याके गमनजन्य दुःखकी इच्छा नहीं करते; अतः ज्ञानदुर्बल ब्राह्मण! आपका कल्याण हो, मुझे क्षमा कीजिये और अपने रास्ते जाइये। जैसे दीपककी लौ देखकर पतिङ्गा निश्चय ही उसपर टूट पड़ता है; लोभी मीन और मृग काँटेके अग्रभागमें मिष्टान्नको देखकर उसे निगलना चाहता है; भूखा

७०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मनुष्य विषमिश्रित भोजनको खा जाता है और
दुष्ट मुखपर छलछलाते हुए दूधवाले दूषित
विषकुम्भको ग्रहण कर लेता है; उसी तरह लम्पट
पुरुष परायी स्त्रियोंके मनोहर मुखकमलको, जो
विनाशका कारण है, देखकर मोहवश भ्रान्त हो
जाता है। स्त्रियोंका सुन्दर मुख, दोनों नितम्ब
तथा स्तन काम-वासनाके आधार, नाशके कारण
और अधर्मके स्थान हैं। जो लार और मूत्रसे
संयुक्त है, जिसमेंसे दुर्गन्ध निकलती है, जो पाप
तथा यमदण्डका कारण है, स्त्रियोंका वह
मूत्रस्थान (योनि) नरककुण्डके सदृश है। ब्राह्मण !
एकान्त देखकर जो तुम मेरी धर्षणा करना चाहते
हो तो यहीं समस्त देवता, लोकपाल, कर्मोंके
शासक तथा साक्षी जाज्वल्यमान धर्म, स्वयं
श्रीहरिद्वारा नियुक्त दण्डकर्ता यमराज, स्वयं धर्मात्मा
श्रीकृष्ण, ज्ञानरूपी महेश्वर, दुर्गा, बुद्धि, मन,
ब्रह्मा, इन्द्रियाँ तथा देवगण उपस्थित हैं। ये
सम्पूर्ण प्राणियोंमें उनके कर्मोंके साक्षीरूपसे वर्तमान
रहते हैं; अतः अज्ञानी ब्राह्मण ! कौन-सा स्थान
गुप्त है और कौन-सा रहस्यमय ? विप्र ! तुम्हारा
कल्याण हो। मुझे क्षमा कर दो और जाओ। मैं
तुम्हें भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ; परंतु ब्राह्मण
अवध्य होते हैं। अतः वत्स ! तुम सुखपूर्वक
यहाँसे चले जाओ। द्विज ! तपस्या करते हुए मुझे
एक सौ आठ युग बीत गये। अब न तो मेरे
पिताका गोत्र ही रह गया है और न मेरे माता-
पिता ही हैं। सबके अन्तरात्मास्वरूप भगवान्
श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णद्वारा स्थापित
धर्म नित्य मेरी रक्षामें तत्पर है। सूर्य, चन्द्रमा,
पवन, अग्नि, ब्रह्मा, शम्भु, भगवती दुर्गा-ये
सभी सदा मेरी देख-भाल करते हैं। जिन्होंने
हंसोंको श्वेत, शुकोंको हरा और मयूरोंको
रंग-बिरंगा बनाया है; वे ही मेरी रक्षा करेंगे।
सभी देवता अनाथों, बालकों तथा वृद्धोंकी सर्वदा
रक्षा करते हैं, अतः नारी समझकर धर्म मेरा
परित्याग करके नहीं जा सकते।
इसके बाद श्रीवृन्दाने पतिव्रत-धर्मकी महिमा
और दुराचारकी निन्दा करके कोपप्रकाशपूर्वक
शाप दे दिया—'दुराचार ! तुम्हारा नाश हो जाय।
पापिष्ठ ! तुम नष्ट हो जाओ।' इतना कहकर जब
पुनः शाप देनेको उद्यत हुई तब स्वयं सूर्यने उसे
यत्न करके रोक दिया। इसी बीच वहाँ ब्रह्मा,
शिव, सूर्य और इन्द्र आदि देवता आ पहुँचे।
सबने उससे क्षमा माँगी और 'धर्म तुम्हारी
परीक्षाके लिये आया था। उसमें तनिक भी
पापबुद्धि नहीं थी। धर्मके नाशसे जगत्के सनातनधर्म-
रूप जीवनका नाश हो जायगा' यह कहकर
धर्मको जीवनदान देनेकी प्रार्थना की।
तब वृन्दाने कहा—देव! मैं नहीं जानती
थी कि ये ब्राह्मणवेषधारी धर्म हैं और मेरी
परीक्षा करनेके लिये आये हैं। इसी कारण मैंने
क्रोधवश इनका नाश किया है। अब आप
लोगोंकी कृपासे मैं अवश्य धर्मको जीवन-दान
दूँगी। ब्रजेश्वर ! यों कहकर वह वृन्दा पुनः
बोली—'यदि मेरी तपस्या सत्य हो तथा मेरा
विष्णुपूजन सत्य हो तो उस पुण्यके प्रभावसे ये
विप्रवर यहाँ शीघ्र ही दुःखरहित हो जायें। यदि
मुझमें सत्य वर्तमान हो और मेरा व्रत सत्य तथा
तप शुद्ध हो तो उस पुण्य तथा सत्यके प्रभावसे
ये ब्राह्मण कष्टरहित हो जायें। यदि नित्यमूर्ति
सर्वात्मा नारायण तथा ज्ञानात्मक शिव सत्य हैं तो
ये द्विजवर संतापरहित हो जायें। यदि ब्रह्म सत्य
हो, सभी देवता और परमा प्रकृति सत्य हों, यज्ञ
सत्य हो और तप सत्य हो तो इन ब्राह्मणका कष्ट
दूर हो जाय।'-इतना कहकर सती वृन्दाने
धर्मको अपनी गोदमें कर लिया और उन
कलारूपको देखकर वह कृपापरवश हो रुदन
करने लगी। इसी बीच धर्मकी भार्या मूर्ति, जो
शोकसे व्याकुल थी, सिरके बल विष्णुके चरणपर
गिर पड़ी और यों बोली।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०७

मूर्तिने कहा—हे नाथ! आप तो करुणासागर हैं। दीनबन्धो! मुझपर कृपा कीजिये। कृपामूर्ति जगन्नाथ! मेरे पतिदेवको शीघ्र जीवित कर दीजिये; क्योंकि जो नारी पतिसे हीन हो जाती है, वह इस भवसागरमें पापिनी समझी जाती है। उसकी दशा नेत्रहीन मुख और प्राणरहित शरीरके समान हो जाती है। माता-पिता, भाई-बन्धु और पुत्र तो परिमित सुख देनेवाले होते हैं, सर्वस्व प्रदान करनेवाला तो सामर्थ्यशाली पति ही होता है। इतना कहकर मूर्ति देवी वहाँ खड़ी हो गयीं और विलाप करने लगीं। तब भगवान् जो सर्वात्मा एवं प्रकृतिसे परे हैं; वृन्दासे बोले।

श्रीभगवान्ने कहा—सुन्दरि! तुमने तपस्याद्वारा ब्रह्माकी आयुके समान आयु प्राप्त की है। वह अपनी आयु तुम धर्मको दे दो और स्वयं गोलोकको चली जाओ। वहाँ तुम तपस्याके प्रभावसे इसी शरीरद्वारा मुझे प्राप्त करोगी। सुमुखि! गोलोकमें आनेके पश्चात् वाराहकल्पमें तुम राधाकी छायाभूता वृषभानुकी कन्या होओगी। उस समय मेरे कलांशसे उत्पन्न हुए रायाण गोप तुम्हारा पाणिग्रहण करेंगे। फिर रासक्रीड़ाके अवसरपर तुम गोपियों तथा राधाके साथ मुझे प्राप्त करोगी। जब राधा श्रीदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट होंगी, उस समय वे ही वास्तविक राधा रहेंगी। तुम तो उनकी छायास्वरूपा होओगी। विवाहके समय वास्तविक राधा तुम्हें प्रकट करके स्वयं अन्तर्धान हो जायँगी और रायाण गोप तुम छायाको ही ग्रहण करेंगे; परंतु गोकुलमें मोहाच्छन्न लोग तुम्हें 'यह राधा ही है'—ऐसा समझेंगे। उन गोपोंको तो स्वप्नमें भी वास्तविक राधाके चरणकमलका दर्शन नहीं होता; क्योंकि स्वयं राधा मेरी गोदमें रहती हैं और उनकी छाया रायाणकी भार्या होती है।

इस प्रकार भगवान् विष्णुके वचनको सुनकर सुन्दरी वृन्दाने धर्मको अपनी आयु प्रदान कर दी। फिर तो धर्म पूर्णरूपसे उठकर खड़े हो गये। उनके शरीरकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णकी भाँति चमक रही थी और उनका सौन्दर्य पहलेकी अपेक्षा बढ़ गया था। तब उन श्रीमान्ने परात्पर परमेश्वरको प्रणाम किया।

पुनः वृन्दाने कहा—देवगण मेरे वचनको, जिसका उल्लङ्घन करना कठिन है, सावधानतया श्रवण करें। मेरा वाक्य मिथ्या नहीं हो सकता। मैंने क्रोधावेशमें जो तीन बार 'क्षयो भव', 'तुम्हारा नाश हो जाय'—ऐसा वचन कहा है और पुनः कहनेके लिये उद्यत होनेपर सूर्यने मना कर दिया था, उसका फल यों होगा—यह धर्म सत्ययुगमें जैसे पहले परिपूर्ण था, उसी तरह इस समय भी रहेगा; परंतु त्रेतामें इसके तीन पैर, द्वापरमें दो पैर और कलियुगके प्रथमांशमें एक पैर रह जायगा। कलियुगके शेष भागमें यह कलाका षोडशांशमात्र रह जायगा। सत्ययुग आनेपर यह पुनः परिपूर्ण हो जायगा। मेरे मुखसे तीन बार 'क्षय' शब्द निकला है; इसलिये उसी क्रमसे क्षय भी होगा। मनमें पुनः कहनेका विचार करनेपर

७०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सूर्यने रोक दिया था; इसी कारण यह धर्म कलियुगकी समाप्तिमें कलामय ही रह जायगा।

नन्दजी! इसी बीच देवताओंने वेगपूर्वक गोलोकसे आये हुए एक अत्यन्त सुन्दर एवं शुभ रथको देखा। उस रथका निर्माण अमूल्य रत्नोंद्वारा हुआ था। उसमें हीरेके हार लटक रहे थे और वह मणि, माणिक्य, मुक्ता, वस्त्र, श्वेत चँवर, भूषण और सुन्दर रत्नजटित दर्पणोंसे विभूषित था। उस रथको देखकर वृन्दाने हरि, शंकर, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओंको नमस्कार किया और फिर उसपर सवार हो वह गोलोकको चली गयी। तत्पश्चात् सभी देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। अब तुम्हारी पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?

(अध्याय ८६)


सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना

नन्दजीने कहा— प्रभो! आप स्वयं वेदोंके अधीश्वर हैं; अतः वेद, ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा मुनि और सिद्ध आदि आपको जाननेमें असमर्थ हैं। आप कौन हैं—यह जाननेके लिये मेरे मनमें प्रबल उत्कण्ठा है; अतः इस निर्जन स्थानमें आप अपना सारा वृत्तान्त यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! इसी बीच वहाँ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये सहसा पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, प्रचेतागण, वसिष्ठ, दुर्वासा, कण्व, कात्यायन, पाणिनि, कणाद, गौतम, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, कपिल, आसुरि, वायु (वोढु), पञ्चशिख, विश्वामित्र, वाल्मीकि, कश्यप, पराशर, विभाण्डक, मरीचि, शुक्र, अत्रि, बृहस्पति, गार्ग्य, वात्स्य, व्यास, जैमिनि, परिमित वचन बोलनेवाले ऋष्यशृङ्ग, याज्ञवल्क्य, शुक, शुद्ध जटाधारी सौभरि, भरद्वाज, सुभद्रक, मार्कण्डेय, लोमश, आसुरि, विटंकण, अष्टावक्र, शतानन्द, वामदेव, भागुरि, संवर्त, उतथ्य, नर, मैं (नारायण), नारद, जाबालि, परशुराम, अगस्त्य, पैल, युधामन्यु, गौरमुख, उपमन्यु, श्रुतश्रवा, मैत्रेय, च्यवन, करथ और कर मुनीश्वर आ पहुँचे। वत्स! वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्हें आया देखकर श्रीकृष्ण सहसा उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर नमस्कार करनेके पश्चात् उन्हें आदरसहित रमणीय सिंहासनोंपर बैठाये। फिर श्रीकृष्णने कुशल-प्रश्नपूर्वक परस्पर वार्तालाप करके उनकी विधिवत् पूजा की और स्वयं भी उन्हींके मध्यमें आसनासीन हुए। इसी समय श्रीकृष्णको आकाशमें एक समुज्ज्वल तेजोराशि दीख पड़ी। उसे मुनियोंने भी देखा। वत्स नारद! उस तेजके अंदर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले, पञ्चवर्षीय नग्न-बालकके रूपमें सनत्कुमारजी थे। वे सहसा उस सभाके बीच प्रकट हो गये। उन्हें एकाएक सामने खड़े देखकर सभी मुनिवरोंने प्रणाम किया तथा श्रीकृष्णने भी मुस्कानयुक्त एवं स्निग्ध नेत्रोंवाले कुमारको युक्तिपूर्वक सादर सिर झुकाया। तब सनत्कुमारजी उन सबको आशीर्वाद देकर उस सभामें विराजमान हुए और उन ऋषियों तथा सनातन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले।

सनत्कुमारने कहा— मुनिवरो! आपलोगोंका सदा कल्याण हो और तपस्याओंका अभीष्ट फल प्राप्त हो; किंतु कल्याणके कारणस्वरूप इन श्रीकृष्णका कुशल-प्रश्न निष्फल है। इस समय तो आपलोगोंका सर्वथा कुशल है; क्योंकि आप-लोग उन परमात्माका दर्शन कर रहे हैं, जो प्रकृतिसे परे होनेपर भी भक्तोंके अनुरोधसे शरीर