ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३०- गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा
५६८ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुई वहाँ राधिकाकी वेश-भूषा सँवारकर बड़े हर्षके साथ आगे बढ़ीं। मार्गमें बारंबार वे हरि-नामका जप करती थीं। वृन्दावनमें पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँका दृश्य स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमाकी किरणें उस वनप्रान्तको अनुरञ्जित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमोंसे अलंकृत तथा फूलोंको छूकर प्रवाहित होनेवाली मलयवायुसे सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियोंके प्रेमभावको जगानेवाला और मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाला था। उन सबको वहाँ कोकिलोंकी मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरोंका अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुञ्जारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियोंके साथ रह फूलोंका मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे।
तदनन्तर शुभ वेलामें सम्पूर्ण सखियोंके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करके श्रीराधिकाने रासमण्डलमें प्रवेश किया। राधाको अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेमसे मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेमसे आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियोंके बीचमें रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर दिव्य वस्त्रोंके परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवनसे श्यामसुन्दरकी ओर देखती हुई गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेश-भूषा, नयी अवस्था तथा रूपसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं। वे मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। उनकी अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे सिरपर मालतीकी मालासे युक्त वेणीका भार वहन करती थीं।
श्रीराधाने भी किशोर अवस्थासे युक्त श्यामसुन्दरकी ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थे। करोड़ों कामदेवोंकी लावण्यलीलाके मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनोंसे उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिकाको देख रहे थे। उनके परम अद्भुत रूपकी कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रोंके कोणसे बार-बार प्रीतमकी ओर देख-देखकर सती राधाने लज्जावश मुखको आँचलसे ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभावका उद्दीपन होनेसे उनके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिकाका परस्पर प्रेम-शृङ्गार हुआ।
मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप-विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण—ये अठारह लाख गोपी-कृष्ण रासमण्डलमें परस्पर मिले। नारद! वहाँ कङ्कणों, किङ्किणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्न-निर्मित नूपुरोंकी सम्मिलित झनकार कुछ कालतक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थलमें रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जलमें उतरे और वहाँ जल-क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँसे निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पणमें अपना-अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी मधुर-मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे।
फिर पवित्र उद्यानके निर्जन प्रदेशमें सरोवरके रमणीय तटपर जहाँ बाहर चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा था, जहाँकी भूमि पुष्प और चन्दनसे चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दनसे सम्पृक्त मलय-समीरद्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ नर-कोकिलोंकी मधुर काकली कानोंमें पड़ रही थी; योगियोंके परम गुरु
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१
श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण करके स्थल-प्रदेशमें मधुर लीला-विलास किये। इसके बाद राधाके साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णने यमुनाजीके जलमें प्रवेश किया। श्रीकृष्णके जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियोंके साथ जलमें उतरे। यमुनाजीमें परम रसमयी क्रीड़ा करनेके पश्चात् सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं।
तदनन्तर सब गोप-किशोरियाँ पुनः रासमण्डलमें गयीं। वहाँके उद्यानमें सब ओर तरह-तरहके फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधाने कौतुकपूर्वक गोपियोंको पुष्पचयनके लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियोंको उन्होंने माला गूँथनेके काममें लगाया। किन्हींको पानके बीड़े सुसज्जित करनेमें तथा किन्हींको चन्दन घिसनेमें लगा दिया। गोपियोंके दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पानको लेकर बाँके नेत्रोंसे देखती हुई सुन्दरी राधाने मन्द हास्यके साथ श्यामसुन्दरको प्रेमपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियोंको श्रीकृष्णकी लीलाओंके गानमें और कुछको मृदङ्ग, मुरज आदि बाजे बजानेमें उन्होंने लगाया। इस प्रकार रासमें लीला-विलास करके राधा निर्जन वनमें श्रीहरिके साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरोंके तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियोंके समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियोंके मनोवाञ्छित स्थान, तैंतीस वन—भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसीवन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दारवन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन—इन सभी स्थानोंमें तीस दिन-राततक कौतूहलपूर्वक शृङ्गार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घीकी धारा पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शनके लिये पधारे थे, अपने-अपने घरको लौट गये। उन सबने रास-रसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्षका अनुभव करते हुए वे वहाँसे विदा हुए। बहुत-सी देवाङ्गनाओंने श्रीहरिके साथ प्रेम-मिलनकी लालसा लेकर भारतवर्षके श्रेष्ठ नरेशोंके घर-घरमें जन्म लिया।
(अध्याय २८)
श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद ! तदनन्तर प्रेम-विह्वला गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने विविध भाँतिसे रास-क्रीड़ा की। गोपियाँ उन्मत्ता-सी हो गयीं। तब श्रीकृष्ण राधिकाको लेकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा अनेक सुरम्य वनों, पर्वतों, सरोवरों एवं नदी-तटोंपर ले जाकर राधिकाको आनन्द प्रदान करते रहे। श्रीराधाके साथ भ्रमण करते हुए श्यामसुन्दरने अपने सामने एक वट-वृक्ष देखा, जिसकी शाखाओंका अग्रभाग बहुत ही ऊँचा था। उस वृक्षका विस्तार भी बहुत अधिक था। उसके नीचे एक योजनतकका भूभाग छायासे घिरा हुआ था। केतकीवन भी वहाँसे निकट ही था। श्रीकृष्ण राधाके साथ वहीं बैठे थे। शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस स्थानको सुवासित कर रही थी। हर्षसे भरे हुए श्रीकृष्णने वहाँ राधासे चिरकालतक पुरातन एवं विचित्र रहस्यको
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बतानेवाली कथाएँ कहीं। इसी समय उन्होंने वहाँ आते हुए एक श्रेष्ठ मुनिको देखा, जिनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे। परमात्मा श्रीहरिके जिस रूपका वे ध्यान करते थे, उसे हृदयमें न देखकर उनका ध्यान टूट गया था। अब वे अपने सामने बाहर ही उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करने लगे थे। उनका शरीर काला था। सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े थे और वे नाटे तथा दिगम्बर थे। उनका नाम था—अष्टावक्र। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका मस्तक जटाओंसे भरा था और वे अपने मुँहसे आग उगल रहे थे, मानो मुखद्वारसे उनकी तपस्याजनित तेजोराशि ही प्रकट हो रही हो अथवा वे ऐसे लगते थे, मानो उनके रूपमें स्वयं ब्रह्मतेज ही मूर्तिमान्-सा हो गया हो। उनके नख और मूँछ-दाढ़ीके बाल बढ़े हुए थे। वे तेजस्वी और परम शान्त थे तथा भयभीत हो भक्तिभावसे दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाये हुए थे। उन्हें देख राधा हँसने लगीं; परंतु माधवने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और उन महात्मा मुनीन्द्रके प्रभावका वर्णन किया। मुनिवर अष्टावक्रने गोविन्दको प्रणाम करके उनकी स्तुति की। पूर्वकालमें महात्मा भगवान् शंकरने उन्हें जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीको उन्होंने सुनाया।
अष्टावक्र बोले—प्रभो! आप तीनों गुणोंसे परे होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। गुणोंके कारण और गुणस्वरूप हैं। गुणियोंके स्वामी तथा उनके आदिकारण हैं। गुणनिधे! आपको नमस्कार है। आप सिद्धिस্বরূপ हैं। समस्त सिद्धियाँ आपकी अंशस्वरूपा हैं। आप सिद्धिके बीज और परात्पर हैं। सिद्धि और सिद्धगणोंके अधीश्वर हैं तथा समस्त सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके बीजस्वरूप परमात्मन्! आप वेदोंके ज्ञाता, वेदवान् और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। वेद भी आपको पूर्णतः नहीं जान सके हैं। रूपेश्वर! आप वेदज्ञोंके भी स्वामी हैं; आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मा, अनन्त, शिव, शेष, इन्द्र और धर्म आदिके अधिपति हैं। सर्वस्वरूप सर्वेश्वर! आप शर्व (महादेवजी)-के भी स्वामी हैं; सबके बीजरूप गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप ही प्रकृति और प्राकृत पदार्थ हैं। प्राज्ञ, प्रकृतिके स्वामी तथा परात्पर हैं। संसार-वृक्ष तथा उसके बीज और फलरूप हैं। आपको नमस्कार है। सृष्टि, पालन और संहारके बीजस्वरूप ब्रह्मा आदिके भी ईश्वर! आप ही सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। महाविराट् (नारायण)-रूपी वृक्षके बीज राधावल्लभ! आपको नमस्कार है। अहो! आप जिसके बीज हैं, उस महाविराट्रूपी वृक्षके तीन स्कन्ध (तने) हैं—ब्रह्मा, विष्णु और शिव। वेदादि शास्त्र उसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं और तपस्या पुष्प हैं। जिसका फल संसार है, वह वृक्ष प्रकृतिका कार्य है। आप ही उसके भी आधार हैं, पर आपका आधार कोई नहीं है। सर्वाधार! आपको नमस्कार है। तेजःस्वरूप! निराकार! आपतक प्रत्यक्ष प्रमाणकी पहुँच नहीं है। सर्वरूप! प्रत्यक्षके अविषय! स्वेच्छामय परमेश्वर! आपको नमस्कार है।
यों कहकर मुनिश्रेष्ठ अष्टावक्र श्रीकृष्णके