ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५१- श्रीकृष्णको व्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर व्रजमें जाना
| ६४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके हाथमें क्रीड़ा-कमल शोभा पा रहा था और भालदेश सिन्दूर-बिन्दुसे सुशोभित था। वह रुष्ट हो मुझे शाप देकर चली गयी। मुझे अपने नगरमें कुछ ऐसे पुरुष प्रवेश करते दिखायी दिये, जिनके हाथोंमें फंदा था। उनके केश खुले हुए थे। वे अत्यन्त रूखे और भयंकर जान पड़ते थे। घर-घरमें एक नंगी स्त्री मन्द मुसकानके साथ नाचती दिखायी देती है, जिसके केश खुले हैं और आकार बड़ा विकट है। एक नंगी विधवा महाशूद्री, जिसकी नाक कटी हुई है और जो अत्यन्त भयंकर है, मेरे अङ्गोंमें तेल लगा रही है। अतिशय प्रातःकालमें मैंने कुछ ऐसी विचित्र स्त्रियाँ देखीं, जो बुझे हुए अङ्गार (कोयले) लिये हुए थीं। उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था तथा वे सम्पूर्ण अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए मुस्करा रही थीं। सपनेमें मुझे नृत्य-गीतसे मनोहर लगनेवाला विवाहोत्सव दिखायी दिया। कुछ ऐसे पुरुष भी दृष्टिगोचर हुए, जिनके कपड़े और केश भी लाल थे। एक नंगा पुरुष दीखा, जो देखनेमें भयंकर था, जो कभी रक्त-वमन करता, कभी नाचता, कभी दौड़ता और कभी सो जाता था। उसके मुखपर सदा मुस्कराहट दिखायी देती थी। बन्धुओ! एक ही समय आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके मण्डलपर सर्वग्रास ग्रहण लगा दृष्टिगोचर हुआ है। पुरोहितजी! मैंने स्वप्नमें उल्कापात, धूमकेतु, भूकम्प, राष्ट्र-विप्लव, झंझावात और महान् उत्पात देखा है। वायुके वेगसे वृक्ष झोंके खा रहे थे। उनकी डालियाँ टूट-टूटकर गिर रही थीं। पर्वत भी भूमिपर ढहे दिखायी देते थे। घर-घरमें ऊँचे कदका एक नंगा पुरुष नाच रहा था, जिसका सिर कटा हुआ था। उस भयानक पुरुषके हाथमें नरमुण्डोंकी माला दिखायी देती थी। सारे आश्रम जलकर अङ्गारके भस्मसे भर गये थे और सब लोग चारों ओर हाहाकार करते दिखायी देते थे।
नारद! यों कहकर राजा कंस सभामें चुप हो गया। वह स्वप्न सुनकर सब भाई-बन्धु सिर नीचा किये लंबी साँस खींचने लगे। अपने यजमान कंसके शीघ्र होनेवाले विनाशको जानकर पुरोहित सत्यक तत्काल अचेत-से हो गये। राजभवनकी स्त्रियाँ तथा कंसके माता-पिता शोकसे रोने लगे। सबको यह विश्वास हो गया कि अब शीघ्र ही कंसका विनाशकाल स्वयं उपस्थित होनेवाला है।
**श्रीनारायण कहते हैं—**मुने! बुद्धिमान् पुरोहित सत्यक शुक्राचार्यके शिष्य थे। उन्होंने सब बातोंपर विचार करके कंसके लिये हितकी बात बतायी।
**सत्यक बोले—**महाभाग! भय छोड़ो। मेरे रहते तुम्हें भय किस बातका है? महेश्वरका यज्ञ करो, जो समस्त अरिष्टोंका विनाश करनेवाला है। इस महेश्वर-यागका नाम है—धनुर्यज्ञ, जिसमें बहुत-सा अन्न खर्च होता है और बहुत दक्षिणा बाँटी जाती है। वह यज्ञ दुःस्वप्नोंका विनाश तथा शत्रुभयका निवारण करनेवाला है। उस यज्ञसे आध्यात्मिक, आधिदैविक और उत्कट आधिभौतिक—इन तीन तरहके उत्पातोंका खण्डन होता है। साथ ही वह ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है। यज्ञ समाप्त होनेपर समस्त सम्पदाओंके दाता भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देते और ऐसा वर प्रदान करते हैं, जिससे जरा और मृत्युका निवारण हो जाता है। पूर्वकालमें महाबली बाण, नन्दी, परशुराम तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ भल्लने इस यज्ञका अनुष्ठान किया था। पहले भगवान् शिवने इस यज्ञसे संतुष्ट होकर यह दिव्य धनुष नन्दीश्वरको दिया था। धर्मात्मा नन्दीश्वरने बाणासुरको दिया। फिर यज्ञ करके महासिद्ध हुए बाणासुरने पुष्करतीर्थमें यह धनुष परशुरामजीको अर्पित कर दिया। कृपानिधान परशुरामजीने कृपापूर्वक अब तुमको यह धनुष दे दिया है। नरेश्वर! यह धनुष
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६४७
बड़ा ही कठोर (मजबूत) है। इसकी लंबाई एक सहस्र हाथकी है। खींचनेपर यह दस हाथतक फैलता है। इसका भगवान् शंकरकी इच्छासे निर्माण हुआ है। पशुपतिका यह पाशुपत धनुष जुते हुए रथके द्वारा भी कठिनाईसे ही ढोया जाता है। भगवान् नारायणदेवको छोड़कर अन्य सब लोग कभी इसे तोड़ नहीं सकते। भगवान् शंकरके इस कल्याणकारी यज्ञमें तुम शीघ्र ही इस धनुषकी पूजा करो और शुभ कर्ममें भेजनेयोग्य निमन्त्रण सबके पास भेज दो। नरेश्वर! इस यज्ञमें यदि धनुष टूट जायगा तो यजमानका नाश होगा, इसमें संशय नहीं है। धनुष टूटनेपर निश्चय ही यज्ञ भी भङ्ग हो जाता है। जब यज्ञ-कर्म सम्पन्न ही नहीं होगा तो उसका फल कौन देगा? महामते! इस धनुषके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें स्वयं नारायण और अग्रभागमें उग्र प्रतापशाली महादेवजी प्रतिष्ठित हैं। इस धनुषमें तीन विकार हैं तथा यह श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा जटिल है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड मार्तण्डकी प्रभाको यह धनुष अपनी दिव्य दीप्तिसे दबा देता है। राजन्! महाबली अनन्त, सूर्य तथा कार्तिकेय भी इस धनुषको झुकानेमें समर्थ नहीं हैं; फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? पूर्वकालमें त्रिपुरारि शिवने इसीके द्वारा त्रिपुरासुरका वध किया था। तुम इस महोत्सवके लिये बिना किसी भयके स्वेच्छापूर्वक माङ्गलिक कार्य आरम्भ करो।
सत्यककी यह बात सुनकर चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले कंसने सभी कार्योंमें सदा यजमानका हित चाहनेवाले पुरोहितजीसे कहा।
**कंस बोला—**पुरोहितजी! वसुदेवके घरमें मेरा वध करनेवाला एक कुलनाशक पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो नन्दके भवनमें नन्दनन्दन होकर स्वच्छन्दतापूर्वक पालित-पोषित हो रहा है। उस बलवान् बालकने मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियों, शूरवीर बान्धवों तथा पवित्र बहिन पूतनाको मार डाला है। वह इच्छानुसार अपने बलको बढ़ा लेता है। उसने गोवर्द्धन पर्वतको एक हाथपर ही धारण कर लिया था और शूरवीर महेन्द्रको भी पराजित कर दिया था। उसने ब्रह्माजीको समस्त चराचर जगत्का ब्रह्मरूपमें दर्शन कराया था तथा बालकों और बछड़ोंके कृत्रिम समुदायकी रचना कर ली थी। सत्यकजी! उस बलवान् बालकका वध करनेके लिये ही कोई सलाह दीजिये। निश्चय ही इस भूतलपर, स्वर्ग और पातालमें एवं तीनों लोकोंमें उसके सिवा दूसरा कोई मेरा शत्रु नहीं है। सर्वत्र जो श्रेष्ठ राजा हैं, वे मेरे प्रति बान्धवभाव रखते हैं। ब्रह्माजी और भगवान् शंकर तो तपस्वी हैं। उन्हें तपस्यासे ही छुट्टी नहीं है। रह गये सनातन भगवान् विष्णु; परंतु वे भी सबके आत्मा हैं और सबपर समान दृष्टि रखते हैं। यदि नन्दपुत्रको मार डालूँ तो तीनों लोकोंमें मेरा सम्मान बढ़ जायगा। मैं सार्वभौम सम्राट् एवं सातों द्वीपोंका महाराज हो जाऊँगा। स्वर्गमें जो इन्द्र हैं, वे भी दैत्योंसे परास्त होनेके कारण दुर्बल ही रहते हैं; अतः उनका वध करके मैं महेन्द्र हो जाऊँगा। इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होकर मैं सूर्यको, राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुए अपने ही पूर्वपुरुष चन्द्रमाको तथा वायु, कुबेर और यमको भी निश्चय ही जीत लूँगा; अतः आप शीघ्र ही नन्द-व्रजमें जाइये और नन्द, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा उसके बलवान् भाई बलरामको भी अभी बुला लाइये।
कंसकी बात सुनकर सत्यकने हितकर, सत्य, नीतिका सारभूत, उत्तम एवं समयोचित वचन कहा।
**सत्यक बोले—**महाभाग! तुम नन्द-व्रजके अभीष्ट स्थानमें अक्रूर, उद्धव अथवा वसुदेवजीको भेजो।
सत्यककी बात सुनकर उसी सभामें स्वर्णसिंहासनपर बैठे हुए वसुदेवजीसे उसने कहा।
**राजेन्द्र कंस बोला—**मेरे प्रिय बन्धु
६४८
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वसुदेवजी ! आप नीतिशास्त्रके तत्त्वज्ञ और उपाय
ढूँढ़ निकालनेमें चतुर हैं; अतः नन्द-व्रजमें अपने
पुत्रके घर आप ही जाइये। वृषभानु, नन्दराय,
बलराम, नन्दनन्दन श्रीकृष्ण तथा समस्त गोकुल-
वासियोंको यज्ञमें यहाँ शीघ्र बुला लाइये। मेरे दूत
समस्त राजाओं तथा मुनियोंको इसकी सूचना
देनेके लिये चिट्ठी लेकर चारों दिशाओंमें जायँ।
ब्रह्मन् ! राजाकी बात सुनकर वसुदेवजीके
ओठ, तालु और कण्ठ सूख गये; वे व्यथित-
हृदयसे बोले।
वसुदेवजीने कहा-राजेन्द्र ! इस कार्यके
लिये इस समय नन्द-व्रजमें मेरा जाना उचित
नहीं होगा। मुझ वसुदेवके पुत्र अथवा नन्दनन्दनको
इस यज्ञका समाचार मैं दूँ और अपने साथ
बुलाकर लाऊँ-यह किसी दृष्टिसे उचित नहीं
कहा जा सकता। यदि तुम्हारे यज्ञ-महोत्सवमें
नन्दपुत्रका आगमन हुआ तो अवश्य ही तुम्हारे
साथ उसका विरोध होगा; अतः मैं उस बालकको
बुलाकर यहाँ युद्ध करवाऊँ - यह मेरी दृष्टिमें
श्रेयस्कर नहीं है। इसमें उस बालककी और
तुम्हारी भी हानि हो सकती है। यदि वह बालक
मारा गया तो सब लोग यही कहेंगे कि पिताने
ही साथ ले जाकर कृष्णको मरवा दिया और
यदि तुम्हें कुछ हो गया, तब लोग कहने लगेंगे
कि वसुदेवने अपने पुत्रके द्वारा राजाको ही
मौतके घाट उतार दिया। दोमेंसे एककी तत्काल
मृत्यु होगी; यह निश्चित है। इसके सिवा और भी
बहुत-से शूरवीर धराशायी होंगे; क्योंकि युद्ध
कभी निरापद नहीं होता।
मुने ! वसुदेवजीकी यह बात सुनकर राजेन्द्र
कंसके नेत्र रोषसे लाल हो गये। वह तलवार
लेकर उन्हें मार डालनेके लिये आगे बढ़ा। यह
देख अत्यन्त बलवान् उग्रसेनने 'हाय! हाय!'
करके अपने पुत्र महाराज कंसको तत्काल रोक
दिया। रोषसे भरे हुए वसुदेव अपने आसनसे
उठकर घरको चले गये। तब राजा कंसने
अक्रूरको नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहा और
शीघ्र ही प्रत्येक दिशामें दूत भेजे। कंसका
निमन्त्रण पाकर समस्त मुनि और नरेश आवश्यक
सामानोंके साथ वहाँ आये। समस्त दिक्पाल,
देवता, तपस्वी ब्राह्मण, सनकादि मुनि, पुलस्त्य,
भृगु, प्रचेता, जाबालि और मार्कण्डेय आदि
बहुत-से महान् ऋषिगण अपने शिष्योंसहित
पधारे। हम दोनों भाई (नर और नारायण) भी
वहाँ पहुँचे थे। राजाओंमें जरासंध, दन्तवक्र,
द्रविड़-नरेश दाम्भिक, शिशुपाल, भीष्मक, भगदत्त,
मुद्गल, धृतराष्ट्र, धूमकेश, धूमकेतु, शंबर, शल्य,
सत्राजित, शंकु तथा अन्यान्य महाबली नरेश
आये थे। इनके सिवा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य,
महाबली अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शाल्व, कैकेय तथा
कौशल भी पधारे थे। महाराज कंसने सबके साथ
यथोचित सम्भाषण किया और पुरोहित सत्यकने
यज्ञके दिन शुभ कृत्यका सम्पादन किया।
(अध्याय ६३-६४)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६४९
भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षोल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन
श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! कंसकी
बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ शान्तस्वरूप
अक्रूरके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे शान्तस्वभाव
उद्धवसे बोले ।
अक्रूरने कहा- उद्धव ! आजकी रातका
बड़ा सुन्दर प्रभात हुआ। आज मेरे लिये शुभ
दिन प्राप्त हुआ है। निश्चय ही देवता, ब्राह्मण और
गुरु मुझपर संतुष्ट हैं। करोड़ों जन्मोंके पुण्य आज
स्वयं मुझे फल देनेको उपस्थित हैं। मेरा जो-जो
शुभाशुभ कर्म था, वह सब मेरे लिये सुखद हो
गया। कर्मसे बँधे हुए मुझ अक्रूरका बन्धन आज
कर्मने ही काट दिया। मैं संसाररूपी कारागारसे
मुक्त होकर श्रीहरिके धामको जा रहा हूँ। विद्वान्
कंसने आज रोषवश मुझे मित्रार्थी बना दिया। इस
नरदेवका क्रोध मेरे लिये वरदान-तुल्य हो गया।
इस समय व्रजराजको लानेके लिये मैं व्रजमें
जाऊँगा और वहाँ भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले
परमपूज्य परमात्मा श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा।
नूतन जलधरके समान श्यामकान्ति, नीलकमलके
सदृश नेत्र तथा कटिप्रदेशमें पीताम्बर धारण
करनेवाले वे भगवान् या तो व्रजकी धूलिसे
धूसरित होंगे या चन्दनसे चर्चित होंगे अथवा
उनके अङ्गोंमें नवनीत लगा होगा और वे मुस्करा
रहे होंगे। इस झाँकीमें मैं उनके दर्शन करूँगा।
विनोदके लिये मुरली बजाते अथवा इधर-उधर
झुंड-की-झुंड गौएँ चराते हुए या कहीं बैठे,
चलते-फिरते अथवा सोते हुए उन मनोहर
नन्दनन्दनको मैं देखूँगा; यह पूर्णतः निश्चित है।
शुभ बेलामें आज भगवान्का भलीभाँति दर्शन
करके जो सुख मिलेगा, उसके सामने राजाका
आदेश क्या महत्त्व रखता है? ब्रह्मा, विष्णु और
शिव आदि जिनके चरणकमलोंका निरन्तर ध्यान
करते हैं तथा अनन्तविग्रह भगवान् अनन्त भी
जिनका अन्त नहीं जानते हैं, देवता और संत
भी जिनके प्रभावको सदा नहीं समझ पाते हैं,
जिनकी स्तुति करनेमें देवी सरस्वती भी भयभीत
एवं जडवत् हो जाती हैं, जिनकी सेवाके लिये
महालक्ष्मी भी दासी नियुक्त की गयी हैं तथा
जिनके चरणकमलोंसे उन सत्त्वरूपिणी गङ्गाका
प्रादुर्भाव हुआ है, जो तीनों लोकोंसे उत्कृष्ट,
जन्म-मृत्यु एवं जरारूप व्याधिको हर लेनेवाली
और दर्शन एवं स्पर्शमात्रसे मनुष्योंके समस्त
पातकोंको नष्ट कर देनेवाली हैं, त्रैलोक्यजननी,
मूलप्रकृति ईश्वरी दुर्गतिनाशिनी देवी दुर्गा भी
जिनके चरणकमलोंका ध्यान करती हैं, जिन
स्थूलसे भी स्थूलतर महाविष्णुके रोमकूपोंमें असंख्य
विचित्र ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, वे भी जिन
सर्वेश्वरके सोलहवें अंशरूप हैं, उन माया-
मानवरूपधारी श्रीकृष्णको देखनेके लिये मैं
व्रजमें जाता हूँ। बन्धु उद्धव! वे नन्दनन्दन
सर्वरूप, सबके अन्तरात्मा, सर्वज्ञ, प्रकृतिसे परे,
ब्रह्मज्योतिःस्वरूप, भक्तजनोंपर अनुग्रहके लिये
दिव्य विग्रह धारण करनेवाले, निर्गुण, निरीह,
निरानन्द, सानन्द, निराश्रय एवं परम परमानन्दस्वरूप
हैं। उन्हीं स्वेच्छामय, सबसे परे विराजमान,
सबके सनातन बीजरूप बालमुकुन्दका योगीजन
नित्य-निरन्तर अहर्निश ध्यान करते रहते हैं।
पहले पाद्मकल्पमें कमलजन्मा ब्रह्माजीने
कमलपर बैठकर एक सहस्र मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण-
दर्शनके लिये तपस्या की थी। उन दिनों सर्वथा
उपवासके कारण उनका पेट पीठमें सट गया
था। सहस्र मन्वन्तर पूर्ण होनेपर उन्हें आदेश
मिला कि 'फिर तपस्या करो, तब मुझे
देखोगे।' उन्हें एक बार यह शब्दमात्र सुनायी
दिया। इतनी बड़ी तपस्या करनेपर भी वे
भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन न पा सके। तब उन्होंने
पुनः उतने ही समयतक तपस्या करके श्रीहरिका
दर्शन और वरदान पाया। उद्धव ! ऐसे परमेश्वरको
६५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मैं आज अपनी आँखोंसे देखूँगा। पूर्वकालमें
भगवान् शंकरने ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त तप किया।
तब ज्योतिर्मण्डलके बीच गोलोकमें परमात्मा
श्रीकृष्णके उन्हें दर्शन हुए। वे श्रीकृष्ण सर्वतत्त्व-
स्वरूप और सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न हैं। वे
सबके अपने तथा सर्वश्रेष्ठ परमतत्त्व हैं। भगवान्
शिवने उनके चरणारविन्दोंकी परम निर्मल भक्ति
पायी। उद्धव! जिन भक्तवत्सलने अपने भक्त
शिवको अपने समान ही बना दिया, ऐसे
प्रभावशाली उन परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा।
जितने समयमें सहस्र इन्द्रोंका पतन हो जाता है,
उतने कालतक निराहार रहकर कृशोदर हुए
भगवान् अनन्तने उन परमात्माकी प्रसन्नताके
लिये भक्तिभावसे तपस्या की। तब उन्होंने उन
अनन्त देवको अपने समान ज्ञान प्रदान किया।
उद्धव ! उन्हीं परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा।
उद्धवजी ! अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर
ब्रह्माजीका एक दिन-रात होता है। इसी क्रमसे
तीस दिनोंका मास और बारह मासोंका वर्ष
मानकर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजीकी आयु
पूरी होती है। अहो ! ऐसे ब्रह्माका पतन जिनके
एक निमेषमें हो जाता है, उन परमात्माको आज
मैं प्रत्यक्ष देखूँगा। भाई उद्धव! जैसे भूतलके
धूलि-कणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी
प्रकार ब्रह्माओं तथा ब्रह्माण्डोंकी गणना भी
असम्भव है। उन अखिल ब्रह्माण्डोंके आधार हैं
महाविराट्, जो श्रीकृष्णके षोडशांशमात्र हैं। प्रत्येक
ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता,
मुनि, मनु, सिद्ध तथा मानव आदि चराचर प्राणी
वास करते हैं। ब्रह्माण्डोंके आधारभूत वे महाविराट्
भी, जिनका सोलहवाँ अंश हैं और जिनकी
लीलामात्रसे आविर्भूत एवं तिरोभूत होते हैं; ऐसे
सर्वशासक परमेश्वरके आज मैं दर्शन करूँगा।
ऐसा कहकर अक्रूरजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित
हो गये। उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा और
वे नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए भगवच्चरणारविन्दोंका
ध्यान करने लगे। उनका हृदय भक्तिसे भर गया।
वे परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका स्मरण
करते हुए भावनासे ही उनकी परिक्रमा करने
लगे। उद्धवने अक्रूरको हृदयसे लगा लिया और
बारंबार उनकी प्रशंसा की। तत्पश्चात् अक्रूरजी भी
शीघ्र ही अपने घरको चले गये। (अध्याय ६५)
श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय
स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और
आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना
श्रीनारायण कहते हैं- उसी दिन राधाने
रात्रिमें बड़े बुरे सपने देखे। उन्होंने उठकर
श्रीकृष्णसे कहा।
राधिका बोलीं- प्रभो ! मैं रत्नसिंहासनपर
रत्नमय छत्र धारण किये बैठी थी। उसी समय
रोषसे भरे हुए एक ब्राह्मणने आकर मेरा वह छत्र
ले लिया और मुझ अबलाको ही महाघोर कज्जलाकार
दुस्तर गम्भीर सागरमें फेंक दिया। मैं शोकसे
पीड़ित हो वहाँ जलके प्रवाहमें बारंबार चक्कर
काटने लगी। घड़ियालोंसे भरे उस समुद्रमें बड़ी-
बड़ी लहरोंके वेगसे टकराकर मैं व्याकुल हो गयी
और बारंबार तुम्हें पुकारने लगी- 'हे नाथ ! मेरी
रक्षा करो, रक्षा करो।' तुम्हें न देखकर मैं महान्
भयमें पड़ गयी और देवतासे प्रार्थना करने लगी।
श्रीकृष्ण ! समुद्रमें डूबती हुई मैंने देखा, चन्द्रमण्डलके
सैकड़ों टुकड़े हो गये हैं और वह आकाशसे
भूतलपर गिर रहा है। दूसरे ही क्षण मुझे दिखायी
दिया कि सूर्यमण्डल भी आकाशसे पृथ्वीपर गिर