ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७५- बलरामसहित श्रीकृष्णका विद्या पढ़नेके लिये महर्षि सांदीपतिके निकट जाना, गुरु और गुरुपत्नीद्वारा उनका स्वागत और विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुदक्षिणारूपमें गुरुके मृतक पुत्रको उन्हें वापस देकर घर लौटना
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
इच्छारहित, परमात्मा, ईश्वर, अविनाशी, सत्य,
परब्रह्म, प्रकृतिसे परे, परमेश्वर, परिपूर्णतम, शुद्ध,
भक्तानुग्रहमूर्ति, कर्मियोंके कर्मोंके साक्षी, निर्लिप्त,
ज्योतिःस्वरूप, कारणोंके भी परम कारण, सर्वस्वरूप,
सर्वेश्वर, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, शुभदायक,
अपने भक्तोंको भक्ति, दास्य और अपनी सम्पत्ति
प्रदान करनेवाले हैं; अतः अशुभकारक मात्सर्य
तथा ज्ञाति-बुद्धिको छोड़कर आनन्दपूर्वक उन
परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दनका भजन करो। वेदकी
कौथुमि-शाखामें उनका सहस्रनाम नन्दनन्दन
नामसे वर्णित है।
नारद ! यह सब सुनकर उद्धव परम विस्मित
हुए और उस सम्पूर्ण ज्ञानको पाकर ज्ञानसे
परिपूर्ण हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने वस्त्रको
गलेमें लपेट लिया और दण्डकी भाँति भूतलपर
लेटकर मस्तकके बालोंसे राधिकाके चरणका
स्पर्श करते हुए वे बारंबार उन्हें प्रणाम करने
लगे। उस समय भक्तिके कारण उनके सारे
शरीरमें रोमाञ्च हो आया था और नेत्रोंमें आँसू
छलक आये थे। वे प्रेमवश तथा राधाके वियोगजन्य
शोकसे व्यथित होकर उच्चस्वरसे रुदन करने
लगे। तब उद्धवके प्रति प्रेम होनेके कारण राधा
और गोपियाँ भी रोने लगीं। फिर उन्होंने उद्धवका
गला पकड़कर बैठाया; परंतु उद्धवकी चेतना लुप्त
हो गयी थी; अतः वे जँभाई लेते हुए मूर्च्छित हो
गये। उनकी यह दशा देखकर राधिकाने शीघ्र ही
उन कृष्णगतप्राण उद्धवको उठाकर बैठाया और
उनके मुखकमलपर जलके छींटे देकर उन्हें
चैतन्य कराया। नारद ! तत्पश्चात् उन्होंने 'वत्स !
चिरञ्जीव'—यों शुभाशीर्वाद दिया। तब उद्धव
होशमें आकर उस उत्तम सभाके मध्य रोती हुई
गोपियोंके सामने राधासे परमार्थप्रद वचन बोले।
उद्धवने कहा—परम दुर्लभ जम्बूद्वीप सभी
द्वीपोंमें धन्य और प्रशंसनीय है; क्योंकि उसमें
श्रेष्ठ भारतवर्ष है, जिसकी सभी लोग कामना
करते हैं। अहो ! उस भारतवर्षमें वृन्दावन नामक
पुण्यवन है; जो श्रीराधाके चरणकमलके स्पर्शसे
गिरी हुई रजसे पावन है और जिसके लिये
देवगण भी लालायित रहते हैं। तीर्थपावनी
राधाके चरणकमलकी रजसे पावन हुई वहाँकी
भूमि तीनों लोकोंमें धन्य, मान्य, श्रेष्ठ और
पूजनीय मानी जाती है। पूर्वकालमें ब्रह्माने
गोलोकमें राधिका और श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसासे
पुष्करक्षेत्रमें वेदोक्त विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक
साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया; परंतु उस
समय स्वप्नमें भी उन्हें गोलोकमें राधिका और
श्रीकृष्णके दर्शन नहीं प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्हें
लीलापूर्वक सत्यरूपा आकाशवाणी सुनायी पड़ी,
जो इस प्रकार थी— 'ब्रह्मन् ! वाराहकल्पके आनेपर
भारतवर्षमें पुण्य वृन्दावनके मध्य जब परम
रमणीय रासोत्सव प्रारम्भ होगा, तब वहीं रासमण्डलमें
देवताओंके बीच बैठे हुए तुम्हें राधिका और
श्रीकृष्णके दर्शन होंगे; इसमें संदेह नहीं है।' उस
आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मा तपस्यासे विरत हो
अपने लोकको लौट गये। समय आनेपर उन्हें
श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त हुए, जिससे उनका हृदय
प्रसन्न और चिरकालीन मनोरथ परिपूर्ण हो गया।
अतः इन गोपों और गोपिकाओंका जन्म एवं
जीवन सफल हो गया; क्योंकि ये नित्य श्रीराधाके
चरणकमलको—जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये
दुर्लभ है—देखती रहती हैं। योगीन्द्र, मुनीन्द्र,
सिद्धेन्द्र तथा वैष्णव संत सती राधिकाकी—जो
मानिनी, पुण्यमयी, तीर्थोंको पावन बनानेवाली
स्वतः शुद्ध और अत्यन्त दुर्लभ हैं—नित्य निरन्तर
सेवा करते रहते हैं। जिससे उनको राधाका वह
चरणकमल सुलभ हो जाता है, जिसका मिलना
ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन
है। सर्वेश्वरेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णने जिनके
चरणकमलोंके नखोंको महावरसे सुशोभित किया
था; गोलोकमें स्थित शतशृङ्ग पर्वतपर रासमण्डलमें
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७३१
स्वयं श्रीकृष्णने सुदुर्लभ स्तोत्रराजद्वारा जिनकी
पूजा की थी तथा जिनके चरणकमलोंमें कोमल
दूर्वाङ्कुर, अक्षत, गन्ध और चन्दन निवेदित करके
पारिजात-पुष्पोंकी पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी;
जो छत्तीस सखियोंकी स्वामिनी और तीस हजार
करोड़ गोपियोंकी अधीश्वरी हैं; जिनका राधिका
नाम है, जो श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया और देवताओंकी
भी पूजनीया हैं; उन सर्वश्रेष्ठ राधिकासे जो पापी
द्वेष करते हैं अथवा उनकी निन्दा और हँसी
उड़ाते हैं, उन्हें सौ ब्रह्महत्याका पाप लगता है;
इसमें तनिक भी संशय नहीं है। उस पापके
फलस्वरूप वे तप्त तैल, महाभयंकर अन्धकार,
कीट और पीड़ा-यन्त्रोंसे युक्त कुम्भीपाक और
रौरवनरकमें अपनी सात पीढ़ियोंके साथ चौदह
इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त यातना भोगते हैं। तत्पश्चात्
लोकजन्मानुसार वे एक जन्ममें उस पापके कारण
एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक विष्ठाके कीट होकर
उत्पन्न होते हैं। इसके बाद उतने ही वर्षोंतक
कुलटाओंकी योनिके रक्त और मलको खानेवाले
योनि-कीट तथा मवाद चाटनेवाले मलकीट होते
हैं। यों कहकर जब उद्धव रोने लगे और जानेके
लिये उद्यत हुए, तब उनसे श्रीकृष्णके वियोगसे
कातर हुई राधिका आँसू बहाती हुई पुनः बोलीं।
श्रीराधिकाजीने कहा - वत्स! अब तुम
मथुरापुरीको जाओ और यह सब माधवको
बतलाओ। बेटा! मैं जिस प्रकार गोविन्दके शीघ्र
दर्शन कर सकूँ, तुम्हें प्रयत्नपूर्वक वैसा ही करना
चाहिये। अच्छा अब जाओ, मेरा जन्म तो मिथ्या
दुराशासे निष्फल ही बीत गया; क्योंकि आशा ही
परम दुःख है और निराशा परम सुख है।
तत्पश्चात् गोविन्दका ध्यान करके राधिका जीवन्मुक्त
हो गयीं। तदनन्तर राधिका पुनः वहाँ डाह
मारकर रोने लगीं। तब रोती हुई राधाको प्रणाम
करके उद्धव यशोदाके भवनकी ओर चले गये।
नारद ! उद्धवके चले जानेपर राधा मूच्छित
हो गयीं। उनकी चेतना लुप्त हो गयी और वे
निरन्तर ध्यानमें तत्पर हो गयीं। मुने! तब श्रेष्ठ
गोपियोंने कमल-सदृश नेत्रोंमें आँसू भरकर राधिकाको
गीली भूमिपर बिछे हुए जलयुक्त कमलदलकी
शय्यापर लिटाया; परंतु राधाके गात्रस्पर्शमात्रसे
ही वह शय्या भस्म हो गयी। तब सखियोंने
विरह-तापसे संतप्त हुई राधाको पुनः एक ऐसे
कोमल स्थानपर सुलाया, जिसपर मुलायम चद्दर
बिछी हुई थी और चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव
किया गया था; परंतु वह सुगन्धित चन्दनयुक्त
जल भी सहसा सूख गया। उस समय उद्धवके
बिना राधाको एक निमेष सौ युगके समान प्रतीत
होने लगा। वे कहने लगीं- 'हा उद्धव ! हा
उद्धव ! तुम जल्दी जाकर श्रीहरिको मेरी दशा
बतलाओ और जो मेरे प्राणेश्वर हैं उन श्रीहरिको
शीघ्र यहाँ ले आओ।' तब संतापके कारण
जिनकी चेतना नष्ट हो गयी थी; उन राधाको ऐसे
दीन वचन कहते देखकर सभी गोपियाँ उन्हें
अपनी छातीसे लगाकर रुदन करने लगीं; फिर
राधाको होशमें लाकर उन्हें ढाढ़स बँधाने लगीं।
(अध्याय ९७)
श्रीकृष्णद्वारा गोकुलका वृत्तान्त पूछे जानेपर उद्धवका उसे कहते हुए राधाकी
दशाका विशेषरूपसे वर्णन करना
श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! तदनन्तर
उद्धव यशोदाको प्रणामकर उतावलीके साथ
हर्षपूर्वक खर्जूर-काननको बाँयें करके यमुना-
तटपर गये। वहीं स्नान-भोजन करके वे पुनः
मथुराको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर एकान्तमें
वटकी छायामें बैठे हुए गोविन्दको देखा। उस