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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

५०- पार्वतीजीके कहनेपर शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना तथा शिशुके मस्तकका धड़से अलग हो जाना

गणपतिखण्ड ३३१

उन्होंने उन उमारहित दिगम्बर शिवको प्रसन्नचित्तवाली पार्वतीको लौटा दिया। फिर तो विश्वको आनन्दित करनेवाली दुर्गाने ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके रत्न तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको सुवर्ण दान किये। ब्राह्मणों, देवताओं तथा पर्वतोंको भोजन कराया। सर्वोत्तम उपहारोंद्वारा शंकरजीकी पूजा की, बाजा बजवाया, माङ्गलिक कार्य कराये और श्रीहरिसे सम्बन्ध रखनेवाले सुन्दर गीत गवाये। इस प्रकार दुर्गाने व्रतको समाप्त करके परम उल्लासके साथ दान देकर सबको भोजन कराया। तत्पश्चात् अपने स्वामी शिवजीके साथ स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद उत्तम पानके सुन्दर बीड़े, जो कपूर आदिसे सुवासित थे, क्रमशः सबको देकर कौतुकवश शिवजीके साथ स्वयं भी खाया। तदनन्तर पार्वतीदेवी एकान्तमें भगवान् शंकरके साथ विहार करने लगीं। इसी बीचमें एक ब्राह्मण दरवाजेपर आया। मुने! उस भिक्षुक ब्राह्मणका रूप तैलाभावके कारण रूखा था, शरीर मैले वस्त्रसे आच्छादित था, उसके दाँत अत्यन्त स्वच्छ थे, वह तृष्णासे पूर्णतया पीड़ित था, उसका शरीर कृश था, वह उज्ज्वल वर्णका तिलक धारण किये हुए था, उसका स्वर बहुत दीन था और दीनताके कारण उसकी मूर्ति कुत्सित थी। इस प्रकारके उस अत्यन्त वृद्ध तथा दुर्बल ब्राह्मणने अन्नकी याचना करनेके लिये दरवाजेपर डंडेके सहारे खड़े होकर महादेवजीको पुकारा।

ब्राह्मणने कहा—महादेव! आप क्या कर रहे हैं? मैं सात राततक चलनेवाले व्रतके समाप्त होनेपर भूखसे व्याकुल होकर भोजनकी इच्छासे आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। हे तात! आप तो करुणाके सागर हैं, अतः मुझ जराग्रस्त तथा तृष्णासे अत्यन्त पीड़ित वृद्धकी ओर दृष्टि डालिये। अरे ओ महादेव! आप क्या कर रहे हैं ? माता पार्वती! उठो और मुझे सुवासित जल तथा अन्न प्रदान करो। गिरिराजकुमारी! मुझ शरणागतकी रक्षा करो। माता! ओ माता! तुम तो जगत्की माता हो, फिर मैं जगत्से बाहर थोड़े ही हूँ; अतः शीघ्र आओ। भला, अपनी माताके रहते हुए मैं किस कारण तृष्णासे पीड़ित हो रहा हूँ? ब्राह्मणकी दीन वाणी सुनकर शिव-पार्वती उठे। इसी समय शिवजीका शुक्रपात हो गया। वे पार्वतीके साथ द्वारपर आये। वहाँ उन्होंने उस वृद्ध तथा दीन ब्राह्मणको देखा जो वृद्ध-अवस्थासे अत्यन्त पीड़ित था। उसके शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं। वह डंडा लिये हुए था और उसकी कमर झुक गयी थी। वह तपस्वी होते हुए भी अशान्त था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे और वह बड़ी शक्ति लगाकर उन दोनोंको प्रणाम तथा उनका स्तवन कर रहा था। उसके अमृतसे भी उत्तम वचन सुनकर नीलकण्ठ महादेवजी प्रसन्न हो गये। तब वे मुस्कराकर परम प्रेमके साथ उससे बोले।

शंकरजीने कहा—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! इस समय मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपका घर कहाँ है और आपका नाम क्या है? इसे शीघ्र बतलाइये।

पार्वतीजी बोलीं—विप्रवर! कहाँसे आपका आगमन हुआ है? मेरा परम सौभाग्य था जो आप यहाँ पधारे। आप ब्राह्मण अतिथि होकर मेरे घरपर आये हैं, अतः आज मेरा जन्म सफल हो गया। द्विजश्रेष्ठ! अतिथिके शरीरमें देवता, ब्राह्मण और गुरु निवास करते हैं; अतः जिसने अतिथिका आदर-सत्कार कर लिया, उसने मानो तीनों लोकोंकी पूजा कर ली। अतिथिके चरणोंमें सभी तीर्थ सदा वर्तमान रहते हैं, अतः अतिथिके चरण-प्रक्षालनके जलसे निश्चय ही गृहस्थको तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। जिसने अपनी शक्तिके अनुसार यथोचितरूपसे अतिथिकी पूजा कर ली, उसने मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया तथा सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली। जिसने

३३२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक अतिथिका पूजन कर लिया, उसके द्वारा मानो भूतलपर सम्पूर्ण महादान कर लिये गये; क्योंकि वेदोंमें वर्णित जो नाना प्रकारके पुण्य हैं, वे तथा उनके अतिरिक्त अन्य पुण्यकर्म भी अतिथि-सेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इसलिये जिसके घरसे अतिथि अनादृत होकर लौट जाता है, उस गृहस्थके पितर, देवता, अग्नि और गुरुजन भी तिरस्कृत हो उस अतिथिके पीछे चले जाते हैं। जो अपने अभीष्ट अतिथिकी अर्चना नहीं करता, वह बड़े-बड़े पापोंको प्राप्त करता है।

ब्राह्मणने कहा— वेदज्ञे! आप तो वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं, अतः वेदोक्त विधिसे पूजन कीजिये। माता! मैं भूख-प्याससे पीड़ित हूँ। मैंने श्रुतियोंमें ऐसा वचन भी सुना है कि जब मनुष्य व्याधियुक्त, आहाररहित अथवा उपवास-व्रती होता है, तब वह स्वेच्छानुसार भोजन करना चाहता है।

पार्वतीजीने पूछा— विप्रवर! आप क्या भोजन करना चाहते हैं? वह यदि त्रिलोकीमें परम दुर्लभ होगा तो भी आज मैं आपको खिलाऊँगी। आप मेरा जन्म सफल कीजिये।

ब्राह्मणने कहा— सुव्रते! मैंने सुना है कि उत्तम व्रतपरायणा आपने पुण्यक-व्रतमें सभी प्रकारका भोजन एकत्रित किया है, अतः उन्हीं अनेक प्रकारके मिष्ठान्नोंको खानेके लिये मैं आया हूँ। मैं आपका पुत्र हूँ। जो मिष्ठान्न तीनों लोकोंमें दुर्लभ हैं, उन पदार्थोंको मुझे देकर आप सबसे पहले मेरी पूजा करें। साध्वि! वेदवादियोंका कथन है कि पिता पाँच प्रकारके होते हैं। माताएँ अनेक तरहकी कही जाती हैं और पुत्रके पाँच भेद हैं। विद्यादाता (गुरु), अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला, जन्मदाता (पिता) और कन्यादाता (श्वशुर)—ये मनुष्योंके वेदोक्त पिता कहे गये हैं। गुरुपत्नी, गर्भधात्री (जननी), स्तनदात्री (धाय), पिताकी बहिन (बुआ), माताकी बहिन (मौसी), माताकी सपत्नी (सौतेली माता), अन्न प्रदान करनेवाली (पाचिका) और पुत्रवधू—ये माताएँ कहलाती हैं। भृत्य, शिष्य, दत्तक, वीर्यसे उत्पन्न (औरस) और शरणागत—ये पाँच प्रकारके पुत्र हैं। इनमें चार धर्मपुत्र कहलाते हैं और पाँचवाँ औरस पुत्र धनका भागी होता है*। माता! मैं आप पुत्रहीनाका ही अनाथ पुत्र हूँ, वृद्धावस्थासे ग्रस्त हूँ और इस समय भूख-प्याससे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। गिरिराजकिशोरी! अन्नोंमें श्रेष्ठ पूड़ी, उत्तम-उत्तम पके फल, आटेके बने हुए नाना प्रकारके पदार्थ, काल-देशानुसार उत्पन्न हुई वस्तुएँ, पक्वान्न, चावलके आटेका बना हुआ तिकोना पदार्थविशेष, दूध, गन्ना, गुड़के बने हुए द्रव्य, घी, दही, अगहनीका भात, घृतमें पका हुआ व्यञ्जन, गुड़मिश्रित तिलोंके लड्डू, मेरी जानकारीसे बाहर सुधा-तुल्य अन्य वस्तुएँ, कर्पूर आदिसे सुवासित सुन्दर श्रेष्ठ ताम्बूल, अत्यन्त निर्मल तथा स्वादिष्ट जल—इन सभी सुवासित पदार्थोंको, जिन्हें खाकर मेरी सुन्दर तोंद हो जाय, मुझे प्रदान कीजिये।

आपके स्वामी सारी सम्पत्तियोंके दाता तथा त्रिलोकीके सृष्टिकर्ता हैं और आप सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाली महालक्ष्मीस्वरूपा हैं; अतः आप मुझे रमणीय रत्नसिंहासन, अमूल्य रत्नोंके आभूषण, अग्निशुद्ध सुन्दर वस्त्र, अत्यन्त दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति,


* विद्यादातान्नदाता च भयत्राता च जन्मदः। कन्यादाता च वेदोक्ता नराणां पितरः स्मृताः॥
गुरुपत्नी गर्भधात्री स्तनदात्री पितुः स्वसा। स्वसा मातुः सपत्नी च पुत्रभार्यान्नदायिका॥
भृत्यः शिष्यश्च पोष्यश्च वीर्यजः शरणागतः। धर्मपुत्राश्च चत्वारो वीर्यजो धनभागिति॥
(गणपतिखण्ड ८। ४७–४९)

गणपतिखण्ड

३३३


मृत्युञ्जय नामक ज्ञान, सुखप्रदायिनी दानशक्ति और सर्वसिद्धि दीजिये। सतीमाता! आप ही सदा श्रीहरिकी प्रिया तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली शक्ति हैं; अतः अपने पुत्रके लिये आपको कौन-सी वस्तु अदेय है? मैं उत्तम धर्म और तपस्यामें लगे हुए मनको अत्यन्त निर्मल करके सारा कार्य करूँगा, परंतु जन्महेतुक कामनाओंमें नहीं लगूँगा; क्योंकि मनुष्य अपनी इच्छासे कर्म करता है, कर्मसे भोगकी प्राप्ति होती है। वे भोग शुभ और अशुभ दो प्रकारके होते हैं और वे ही दोनों सुख-दुःखके हेतु हैं। जगदम्बिके! न किसीसे दुःख होता है न सुख, सब अपने कर्मका ही भोग है; इसलिये विद्वान् पुरुष कर्मसे विरत हो जाते हैं। सत्पुरुष निरन्तर आनन्दपूर्वक बुद्धिद्वारा हरिका स्मरण करनेसे, तपस्यासे तथा भक्तोंके सङ्गसे कर्मको ही निर्मूल कर देते हैं; क्योंकि इन्द्रिय और उनके विषयोंके संयोगसे उत्पन्न हुआ सुख तभीतक रहता है, जबतक उनका नाश नहीं हो जाता, परंतु हरिकीर्तनरूप सुख सब कालमें वर्तमान रहता है।

सतीदेवि! हरिध्यानपरायण भक्तोंकी आयु नष्ट नहीं होती; क्योंकि काल तथा मृत्युञ्जय उनपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते—यह ध्रुव है। वे चिरजीवी भक्त भारतवर्षमें चिरकालतक जीवित रहते हैं और सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञान प्राप्त करके स्वच्छन्दतापूर्वक सर्वत्रगामी होते हैं। हरिभक्तोंको पूर्वजन्मका स्मरण बना रहता है। वे अपने करोड़ों जन्मोंको जानते हैं और उनकी कथाएँ कहते हैं; फिर आनन्दके साथ स्वेच्छानुसार जन्म धारण करते हैं। वे स्वयं तो पवित्र होते ही हैं, अपनी लीलासे दूसरोंको तथा तीर्थोंको पवित्र कर देते हैं। इस पुण्यक्षेत्र भारतमें वे परोपकार और सेवाके लिये भ्रमण करते रहते हैं। वे वैष्णव जिस तीर्थमें गोदोहन-कालमात्र भी ठहर जाते हैं तो उनके चरणस्पर्शसे वसुन्धरा तत्काल ही पवित्र हो जाती है। जिन मनुष्योंको भक्तोंका दर्शन अथवा आलिङ्गन प्राप्त हो जाता है, वे मानो समस्त तीर्थोंमें भ्रमण कर चुके और उन्हें सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा मिल चुकी। जैसे सब कुछ भक्षण करनेपर भी अग्नि और समस्त पदार्थोंका स्पर्श करनेपर भी वायु दूषित नहीं कहे जाते, उसी प्रकार निरन्तर हरिमें चित्त लगानेवाले भक्त पापोंसे लिप्त नहीं होते। करोड़ों जन्मोंके अन्तमें मनुष्य-जन्म मिलता है। फिर मनुष्य-योनिमें बहुत-से जन्मोंके बाद उसे भक्तोंका सङ्ग प्राप्त होता है।

सती पार्वति! भक्तोंके सङ्गसे प्राणियोंके हृदयमें भक्तिका अंकुर उत्पन्न होता है और भक्तिहीनोंके दर्शनसे वह सूख जाता है। पुनः वैष्णवोंके साथ वार्तालाप करनेसे वह प्रफुल्लित हो उठता है। तत्पश्चात् वह अविनाशी अंकुर प्रत्येक जन्ममें बढ़ता रहता है। सती! वृद्धिको प्राप्त होते हुए उस वृक्षका फल हरिकी दासता है। इस प्रकार भक्तिके परिपक्व हो जानेपर परिणाममें वह श्रीहरिका पार्षद हो जाता है। फिर तो महाप्रलयके अवसरपर ब्रह्मा, ब्रह्मलोक तथा सम्पूर्ण सृष्टिका संहार हो जानेपर भी निश्चय ही उसका नाश नहीं होता। अम्बिके! इसलिये मुझे सदा नारायणके चरणोंमें भक्ति प्रदान कीजिये; क्योंकि विष्णुमाये! आपके बिना विष्णुमें भक्ति नहीं प्राप्त होती। आपकी तपस्या और पूजन तो लोकशिक्षाके लिये हैं; क्योंकि आप नित्यस्वरूपा सनातनी देवी हैं और समस्त कर्मोंका फल प्रदान करनेवाली हैं। प्रत्येक कल्पमें श्रीकृष्ण गणेशरूपसे आपके पुत्र बनकर आपकी गोदमें आते हैं।

यों कहकर वे ब्राह्मण तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। वे परमेश्वर इस प्रकार अन्तर्हित होकर बालरूप धारण करके महलके भीतर स्थित पार्वतीकी शय्यापर जा पहुँचे और जन्मे हुए बालककी भाँति घरकी छतके भीतरी भागकी ओर देखने लगे। उस बालकके शरीरकी आभा

३३४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शुद्ध चम्पकके समान थी। उसका प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंकी भाँति उद्दीप्त था। सब लोग सुखपूर्वक उसकी ओर देख सकते थे। वह नेत्रोंकी ज्योति बढ़ानेवाला था। कामदेवको विमोहित करनेवाला उसका अत्यन्त सुन्दर शरीर था। उसका अनुपम मुख शारदीय पूर्णिमाका उपहास कर रहा था। सुन्दर कमलको तिरस्कृत करनेवाले उसके सुन्दर नेत्र थे। ओष्ठ और अधरपुट ऐसे लाल थे कि उसे देखकर पका हुआ बिम्बाफल भी लज्जित हो जाता था। कपाल और कपोल परम मनोहर थे। गरुड़के चोंचकी भी निन्दा करनेवाली रुचिर नासिका थी। उसके सभी अङ्ग उत्तम थे। त्रिलोकीमें कहीं उसकी उपमा नहीं थी। इस प्रकार वह रमणीय शय्यापर सोया हुआ शिशु हाथ-पैर उछाल रहा था।

(अध्याय ८)


श्रीहरिके अन्तर्धान हो जानेपर शिव-पार्वतीद्वारा ब्राह्मणकी खोज, आकाशवाणीके सूचित करनेपर पार्वतीका महलमें जाकर पुत्रको देखना और शिवजीको बुलाकर दिखाना, शिव-पार्वतीका पुत्रको गोदमें लेकर आनन्द मनाना

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! इस प्रकार जब श्रीहरि अन्तर्धान हो गये, तब दुर्गा और शंकर ब्राह्मणकी खोज करते हुए चारों ओर घूमने लगे।

उस समय पार्वतीजी कहने लगीं—हे विप्रवर! आप तो अत्यन्त वृद्ध और भूखसे व्याकुल थे। हे तात! आप कहाँ चले गये? विभो! मुझे दर्शन दीजिये और मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये। शिवजी! शीघ्र उठिये और उन ब्राह्मणदेवकी खोज कीजिये। वे क्षणमात्रके लिये उदास मनवाले हमलोगोंके सामने आये थे। परमेश्वर! यदि भूखसे पीड़ित अतिथि गृहस्थके घरसे अपूजित होकर चला जाता है तो क्या उस गृहस्थका जीवन व्यर्थ नहीं हो जाता? यहाँतक कि उसके पितर उसके द्वारा दिये गये पिण्डदान और तर्पणको नहीं ग्रहण करते तथा अग्नि उसकी दी हुई आहुति और देवगण उसके द्वारा निवेदित पुष्प एवं जल नहीं स्वीकार करते। उस अपवित्रका हव्य, पुष्प, जल और द्रव्य—सभी मदिराके तुल्य हो जाता है। उसका शरीर मल-सदृश और स्पर्श पुण्यनाशक हो जाता है।

इसी बीच वहाँ आकाशवाणी हुई, जिसे शोकसे आतुर तथा विकलतासे युक्त दुर्गाने सुना। (आकाशवाणीने कहा—) जगन्माता! शान्त हो जाओ और मन्दिरमें अपने पुत्रकी ओर दृष्टिपात करो। वह साक्षात् गोलोकाधिपति परिपूर्णतम परात्पर श्रीकृष्ण है तथा सुपुण्यक-व्रतरूपी वृक्षका सनातन फल है। योगी लोग जिस अविनाशी तेजका प्रसन्नमनसे निरन्तर ध्यान करते हैं; वैष्णवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता जिसके ध्यानमें लीन रहते हैं; प्रत्येक कल्पमें जिस पूजनीयकी सर्वप्रथम पूजा होती है, जिसके स्मरणमात्रसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं, तथा जो पुण्यकी राशिस্বরূপ है, मन्दिरमें विराजमान अपने उस पुत्रकी ओर तो दृष्टि डालो। प्रत्येक कल्पमें तुम जिस सनातन ज्योति रूपका ध्यान करती हो, वही तुम्हारा पुत्र है। यह मुक्तिदाता तथा भक्तोंके अनुग्रहका मूर्त रूप है। जरा उसकी ओर तो निहारो। जो तुम्हारी कामनापूर्तिका बीज, तपरूपी कल्पवृक्षका फल और लावण्यतामें करोड़ों कामदेवोंकी निन्दा करनेवाला है, अपने उस सुन्दर पुत्रको देखो। दुर्गे! तुम क्यों विलाप कर रही हो? अरे, यह क्षुधातुर ब्राह्मण नहीं है, यह तो विप्रवेषमें जनार्दन

गणपतिखण्ड
३३५


हैं। अब कहाँ वह वृद्ध और कहाँ वह अतिथि ? नारद! यों कहकर सरस्वती चुप हो गयीं।

तब उस आकाशवाणीको सुनकर सती पार्वती भयभीत हो अपने महलमें गयीं। वहाँ उन्होंने पलंगपर सोये हुए बालकको देखा। वह आनन्दपूर्वक मुस्कराते हुए महलकी छतके भीतरी भागको निहार रहा था। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य थी। वह अपने प्रकाशसमूहसे भूतलको प्रकाशित कर रहा था। हर्षपूर्वक स्वेच्छानुसार इधर-उधर देखते हुए शय्यापर उछल-कूद रहा था और स्तनपानकी इच्छासे रोते हुए ‘उमा’ ऐसा शब्द कर रहा था। उस अद्भुत रूपको देखकर सर्वमङ्गला पार्वती त्रस्त हो शंकरजीके संनिकट गयीं और उन प्राणेश्वरसे मङ्गल-वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा—प्राणपति! घर चलिये और मन्दिरके भीतर चलकर प्रत्येक कल्पमें आप जिसका ध्यान करते हैं तथा जो तपस्याका फलदाता है, उसे देखिये। जो पुण्यका बीज, महोत्सवस्वरूप, ‘पुत्’ नामक नरकसे रक्षा करनेका कारण और भवसागरसे पार करनेवाला है, शीघ्र ही उस पुत्रके मुखका अवलोकन कीजिये; क्योंकि समस्त तीर्थोंमें स्नान तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा-ग्रहणका पुण्य इस पुत्रदर्शनके पुण्यकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। सर्वस्व दान कर देनेसे जो पुण्य होता है तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वे सभी इस पुत्रदर्शन जन्य पुण्यके सोलहवें अंशके भी बराबर नहीं हैं।

पार्वतीके ये वचन सुनकर शिवजीका मन हर्षमग्न हो गया। वे तुरंत ही अपनी प्रियतमाके साथ अपने घर आये। वहाँ उन्होंने शय्यापर अपने पुत्रको देखा। उसकी कान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान उद्दीप्त थी। (फिर सोचने लगे—) मेरे हृदयमें जो अत्यन्त मनोहर रूप विद्यमान था, यह तो वही है। तत्पश्चात् दुर्गाने उस पुत्रको शय्यापरसे उठा लिया और उसे छातीसे लगाकर वे उसका चुम्बन करने लगीं। उस समय वे आनन्द-सागरमें निमग्न होकर यों कहने लगीं—‘बेटा! जैसे दरिद्रका मन सहसा उत्तम धन पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह तुझ सनातन अमूल्य रत्नकी प्राप्तिसे मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। जैसे चिरकालसे प्रवासी हुए प्रियतमके घर लौटनेपर स्त्रीका मन पूर्णतया हर्षमग्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी हो रही है। वत्स! जैसे एक पुत्रवाली माता चिरकालसे बाहर गये हुए अपने इकलौते पुत्रको आया हुआ देखकर परितुष्ट होती है, वैसे ही इस समय मैं भी संतुष्ट हो रही हूँ। जैसे मनुष्य चिरकालसे नष्ट हुए उत्तम रत्नको तथा अनावृष्टिके समय उत्तम वृष्टिको पाकर हर्षसे फूल उठता है, उसी प्रकार तुझ पुत्रको पाकर मैं भी हर्ष-गद्गद हो रही हूँ। जैसे चिरकालके पश्चात् आश्रयहीन अंधेका मन परम निर्मल नेत्रकी प्राप्तिसे प्रसन्न हो जाता है, वही अवस्था (तुझे पाकर) मेरे मनकी भी हो रही है। जैसे दुस्तर अगाध सागरमें गिरे हुए अथवा विपत्तिमें फँसे हुए नौका आदि

३३६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साधनविहीन मनुष्यका मन नौकाको पाकर आनन्दसे भर जाता है, वैसे ही मेरा मन भी आनन्दित हो रहा है। जैसे प्याससे सूखे हुए कण्ठवाले मनुष्योंका मन चिरकालके पश्चात् अत्यन्त शीतल एवं सुवासित जलको पाकर प्रसन्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी है। जैसे दावाग्निसे घिरे हुएको अग्निरहित स्थान और आश्रयहीनको आश्रय मिल जानेसे मनकी इच्छा पूरी हो जाती है, उसी प्रकार मेरी भी इच्छापूर्ति हो रही है। चिरकालसे व्रतोपवास करनेवाले भूखे मनुष्योंका मन जैसे सामने उत्तम अन्न देखकर प्रसन्न हो उठता है, उसी तरह मेरा मन भी हर्षित हो रहा है।' यों कहकर पार्वती ने अपने बालकको गोदमें लेकर प्रेमके साथ उसके मुखमें अपना स्तन दे दिया। उस समय उनका मन परमानन्दमें निमग्न हो रहा था। तत्पश्चात् भगवान् शंकरने भी प्रसन्नमनसे उस बालकको अपनी गोदमें उठा लिया।

(अध्याय ९)


शिव, पार्वती तथा देवताओंद्वारा अनेक प्रकारका दान दिया जाना, बालकको देवताओं एवं देवियोंका शुभाशीर्वाद और इस मङ्गलाध्यायके श्रवणका फल

श्रीनारायणजी कहते हैं—नारद ! तदनन्तर उन दोनों पति-पत्नी—शिव-पार्वती ने बाहर जाकर पुत्रकी मङ्गलकामनासे हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न दान किये तथा भिक्षुओं और वन्दियोंको विभिन्न प्रकारकी वस्तुएँ बाँटीं। उस अवसरपर शंकरजीने अनेक प्रकारके बाजे बजवाये। हिमालयने ब्राह्मणोंको एक लाख रत्न, एक हजार श्रेष्ठ हाथी, तीन लाख घोड़े, दस लाख गौएँ, पाँच लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा और भी जो मुक्ता, हीरे और रत्न आदि श्रेष्ठ मणियाँ थीं, वे सभी दान कीं। इसके अतिरिक्त दूसरे प्रकारके भी दान—जैसे वस्त्र, आभूषण और क्षीरसागरसे उत्पन्न सभी तरहके अमूल्य रत्न आदि दिये। कौतुकी विष्णुने ब्राह्मणोंको कौस्तुभमणिका दान दिया। ब्रह्माने हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको ऐसी विशिष्ट वस्तुएँ दान कीं जो सृष्टिमें परम दुर्लभ थीं तथा वे ब्राह्मण जिन्हें पाना चाहते थे। इसी तरह धर्म, सूर्य, इन्द्र, देवगण, मुनिगण, गन्धर्व, पर्वत तथा देवियोंने क्रमशः दान दिये। ब्रह्मन् ! उस अवसरपर क्षीरसागरने हर्षित होकर कौतुकवश एक हजार माणिक्य, एक सौ कौस्तुभमणि, एक सौ हीरक, एक सहस्र हरे रंगकी श्रेष्ठ मणियाँ, एक लाख गो-रत्न, एक सहस्र गज-रत्न, श्वेतवर्णके अन्यान्य अमूल्य रत्न, एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए वस्त्र ब्राह्मणोंको प्रदान किये। सरस्वतीदेवीने अमूल्य रत्नोंका बना हुआ एक ऐसा हार दिया, जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ था। वह अत्यन्त निर्मल, साररूप और अपनी प्रभासे सूर्यके प्रकाशकी निन्दा करनेवाला, मणिजटित और हीरेके नगोंसे सुशोभित था। उस रमणीय हारके मध्यमें कौस्तुभमणि पिरोयी हुई थी। सावित्रीने हर्षित होकर एक बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित त्रिलोकीका साररूप हार और सब तरहके आभूषण प्रदान किये। आनन्दमग्न कुबेरने एक लाख सोनेकी सिलें, अनेक प्रकारके धन और एक सौ अमूल्य रत्न दान किये। मुने ! शिवपुत्रके जन्मोत्सवमें उपस्थित सभी लोगोंने इस प्रकार ब्राह्मणोंको दान देकर तत्पश्चात् उस शिशुका दर्शन किया। उस समय वे सब परमानन्दमें निमग्न थे। मुने ! उस दानमें ब्राह्मणों तथा वन्दियोंको इतना धन मिला था कि वे उसका भार ढोनेमें असमर्थ थे, इसलिये बोझसे घबराकर मार्गमें ठहर-ठहरकर चलते थे। वे सभी विश्राम कर चुकनेपर पूर्वकालके दाताओंकी कथाएँ कहते थे, जिसे वृद्ध एवं युवा भिक्षुक प्रेमपूर्वक सुनते थे।

गणपतिखण्ड ३३७

नारद! उस अवसरपर विष्णुने आनन्दमग्न होकर दुन्दुभिका शब्द कराया, गीत गवाया, नाच कराया, वेदों और पुराणोंका पाठ कराया। फिर मुनिवरोंको बुलवाकर हर्षपूर्वक उनका पूजन किया, माङ्गलिक कार्य कराया और उनसे आशीर्वाद दिलाया। तत्पश्चात् देवी तथा देवगणोंके साथ वे स्वयं भी उस बालकको शुभाशीर्वाद देने लगे।

विष्णुने कहा—बालक! तुम दीर्घायु, ज्ञानमें शिवके सदृश, पराक्रममें मेरे तुल्य और सम्पूर्ण सिद्धियोंके ईश्वर होओ।

ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारे यशसे जगत् पूर्ण हो जाय, तुम शीघ्र ही सर्वपूज्य हो जाओ और सबसे पहले तुम्हारी परम दुर्लभ पूजा हो।

धर्मने कहा—पार्वतीनन्दन! तुम मेरे समान परम धार्मिक, सर्वज्ञ, दयालु, हरिभक्त और श्रीहरिके समान परम दुर्लभ होओ।

महादेवने कहा—प्राणप्रिय पुत्र! तुम मेरी भाँति दाता, हरिभक्त, बुद्धिमान्, विद्यावान्, पुण्यवान्, शान्त और जितेन्द्रिय होओ।

लक्ष्मीने कहा—बेटा! तुम्हारे घरमें तथा शरीरमें मेरी सनातनी स्थिति बनी रहे और मेरी ही तरह तुम्हें शान्त एवं मनोहर रूपवाली पतिव्रता पत्नी प्राप्त हो।

सरस्वतीने कहा—पुत्र! मेरे ही तुल्य तुम्हें परमोत्कृष्ट कवित्वशक्ति, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति और विवेचनशक्तिकी प्राप्ति हो।

सावित्रीने कहा—वत्स! मैं वेदमाता हूँ, अतः तुम मेरे मन्त्रजपमें तत्पर होकर शीघ्र ही वेदवादियोंमें श्रेष्ठ तथा वेदज्ञानी हो जाओ।

हिमालयने कहा—बेटा! तुम्हारी बुद्धि सदा श्रीकृष्णमें लगी रहे, श्रीकृष्णमें ही तुम्हारी सनातनी भक्ति हो, तुम श्रीकृष्णके समान गुणवान् होओ और सदा श्रीकृष्णपरायण बने रहो।

मेनकाने कहा—वत्स! तुम गम्भीरतामें समुद्रके समान, सुन्दरतामें कामदेवके सदृश, लक्ष्मीवानोंमें श्रीपतिके तुल्य और धर्ममें धर्मकी तरह होओ।

वसुन्धराने कहा—वत्स! तुम मेरी तरह क्षमाशील, शरणदाता, सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न, विघ्नरहित, विघ्नविनाशक और शुभके आश्रयस्थान होओ।

पार्वतीने कहा—बेटा! तुम अपने पिताके समान महान् योगी, सिद्ध, सिद्धियोंके प्रदाता, शुभकारक, मृत्युञ्जय, ऐश्वर्यशाली और अत्यन्त निपुण होओ।

तदनन्तर समागत सभी ऋषियों, मुनियों और सिद्धोंने आशीर्वाद दिया और ब्राह्मणों तथा वन्दियोंने सब प्रकारकी मङ्गल-कामना की। वत्स नारद! इस प्रकार मैंने गणेशका जन्मवृत्तान्त, जो सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला तथा समस्त विघ्नोंका विनाशक है, पूर्णतया तुमसे वर्णन कर दिया। जो मनुष्य अत्यन्त समाहित होकर इस सुमङ्गलाध्यायको सुनता है, वह सम्पूर्ण मङ्गलोंसे युक्त होकर मङ्गलोंका आवासस्थान हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र, निर्धनको धन, कृपणको निरन्तर धन प्रदान करनेकी शक्ति, भार्यार्थीको भार्या, प्रजाकामीको प्रजा और रोगीको आरोग्य प्राप्त होता है। दुर्भगा स्त्रीको सौभाग्य, भ्रष्ट हुआ पुत्र, नष्ट हुआ धन और प्रवासी पति मिल जाता है तथा शोकग्रस्तको सदा आनन्दकी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। मुने! गणेशाख्यानके श्रवणसे मनुष्यको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वह फल निश्चय ही इस अध्यायके श्रवणसे मिल जाता है। यह मङ्गलाध्याय जिसके घरमें विद्यमान रहता है, वह सदा मङ्गलयुक्त रहता है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यात्राकालमें अथवा पुण्यपर्वपर जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे इसका श्रवण करता है, वह श्रीगणेशकी कृपासे अपने सभी मनोरथोंको पा जाता है।

(अध्याय १०)

३३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


गणेशको देखनेके लिये शनैश्चरका आना और पार्वतीके पूछनेपर अपने द्वारा किसी वस्तुके न देखनेका कारण बताना

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद ! इस प्रकार उस बालकको आशीर्वाद देकर श्रीहरि उस सभामें देवताओं और मुनियोंके साथ एक रत्ननिर्मित श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हुए। उनके दक्षिणभागमें शंकर, वामभागमें प्रजापति ब्रह्मा और आगे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा जगत्‌के साक्षी धर्मने आसन ग्रहण किया। ब्रह्मन् ! फिर धर्मके समीप सूर्य, इन्द्र, चन्द्रमा, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतसमूह सुखपूर्वक आसनोंपर बैठे। इसी बीच महायोगी सूर्यपुत्र शनैश्चर शंकरनन्दन गणेशको देखनेके लिये वहाँ आये। उनका मुख अत्यन्त नम्र था, आँखें कुछ मुँदी हुई थीं और मन एकमात्र श्रीकृष्णमें लगा हुआ था; अतः वे बाहर-भीतर श्रीकृष्णका स्मरण कर रहे थे। वे तपःफलको खानेवाले, तेजस्वी, धधकती हुई अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान, अत्यन्त सुन्दर, श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी और श्रेष्ठ थे। उन्होंने वहाँ पहले विष्णु, ब्रह्मा, शिव, धर्म, सूर्य, देवगणों और मुनिवरोंको प्रणाम किया। फिर उनकी आज्ञासे वे उस बालकको देखनेके लिये गये। भीतर जाकर शनैश्चरने सिर झुकाकर पार्वतीदेवीको नमस्कार किया। उस समय वे पुत्रको छातीसे चिपटाये रत्नसिंहासनपर विराजमान हो आनन्दपूर्वक मुस्करा रही थीं। पाँच सखियाँ निरन्तर उनपर श्वेत चँवर डुलाती जाती थीं। वे सखीद्वारा दिये गये सुवासित ताम्बूलको चबा रही थीं। उनके शरीरपर अग्निसे तपाकर शुद्ध की हुई सुन्दर साड़ी शोभायमान थी। रत्नोंके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। सहसा सूर्यनन्दन शनैश्चरको सिर झुकाये देखकर दुर्गाने उन्हें शीघ्र ही शुभाशीर्वाद दिया और फिर उनसे वार्तालाप करके उनका कुशल-मङ्गल पूछा।

पार्वतीने पुनः पूछा— ग्रहेश्वर ! इस समय तुम्हारा मुख नीचेकी ओर क्यों झुका हुआ है तथा तुम मुझे अथवा इस बालककी ओर देख क्यों नहीं रहे हो? साधो ! मैं इसका कारण सुनना चाहती हूँ।

शनैश्चरने कहा— साध्वि ! सारे जीव स्वकर्मानुसार अपनी करनीका फल भोगते हैं; क्योंकि जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, उसका करोड़ों कल्पोंमें भी नाश नहीं होता। जीव कर्मानुसार ब्रह्मा, इन्द्र और सूर्यके भवनमें जन्म लेता है। कर्मसे ही वह मनुष्यके घरमें और कर्मसे ही पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है। कर्मसे वह नरकमें जाता है और कर्मसे ही उसे वैकुण्ठकी प्राप्ति होती है। स्वकर्मानुसार वह चक्रवर्ती राजा हो जाता है और अपने ही कर्मसे वही नौकर भी होता है। माता ! कर्मसे ही वह सुन्दर होता है और अपने कर्मके फलस्वरूप वह सदा रोगग्रस्त बना रहता है। कर्मानुसार ही वह विषयप्रेमी और अपने कर्मसे ही विषयोंसे निर्लिप्त रहता है। कर्मसे ही वह लोकमें धनवान्, कर्मसे ही दरिद्र, कर्मसे ही उत्तम कुटुम्बवाला और कर्मसे ही बन्धुओंके लिये कण्टकरूप हो जाता है। अपने कर्मसे ही जीवको उत्तम पत्नी, उत्तम पुत्र और निरन्तर सुखकी प्राप्ति होती है तथा स्वकर्मसे ही वह पुत्रहीन, दुष्ट स्वभावा स्त्रीका स्वामी अथवा स्त्रीहीन होता है।

शंकरवल्लभे ! मैं एक परम गोपनीय इतिहास, यद्यपि वह लज्जाजनक तथा माताके समक्ष कहने योग्य नहीं है, कहता हूँ, सुनिये। मैं बचपनसे ही श्रीकृष्णका भक्त था। मेरा मन सदा एकमात्र श्रीकृष्णके ध्यानमें ही लगा रहता था। मैं विषयोंसे विरक्त होकर निरन्तर तपस्यामें रत रहता था।

गणपतिखण्ड ३३९

पिताजीने चित्ररथकी कन्यासे मेरा विवाह कर दिया। वह सती-साध्वी नारी अत्यन्त तेजस्विनी तथा सतत तपस्यामें रत रहनेवाली थी। एक दिन ऋतुस्नान करके वह मेरे पास आयी। उस समय मैं भगवच्चरणोंका ध्यान कर रहा था। मुझे बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं था। पत्नीने अपना ऋतुकाल निष्फल जानकर मुझे शाप दे दिया कि 'तुम अब जिसकी ओर दृष्टि करोगे, वही नष्ट हो जायगा'। तदनन्तर जब मैं ध्यानसे विरत हुआ, तब मैंने उस सतीको संतुष्ट किया; परंतु अब तो वह शापसे मुक्त करानेमें असमर्थ थी; अतः पश्चात्ताप करने लगी। माता! इसी कारण मैं किसी वस्तुको अपने नेत्रोंसे नहीं देखता और तभीसे मैं जीवहिंसाके भयसे स्वाभाविक ही अपने मुखको नीचे किये रहता हूँ। मुने! शनैश्चरकी बात सुनकर पार्वती हँसने लगीं और नर्तकियों तथा किन्नरियोंका सारा समुदाय ठहाका मारकर हँस पड़ा। (अध्याय ११)


पार्वतीके कहनेसे शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना, गणेशके सिरका कटकर गोलोकमें चला जाना, पार्वतीकी मूर्च्छा, श्रीहरिका आगमन और गणेशके धड़पर हस्तीका सिर जोड़कर जीवित करना, फिर पार्वतीको होशमें लाकर बालकको आशीर्वाद देना, पार्वतीद्वारा शनैश्चरको शाप

श्रीनारायणजी कहते हैं— नारद! शनैश्चरका वचन सुनकर दुर्गाने परमेश्वर श्रीहरिका स्मरण किया और 'सारा जगत् ईश्वरकी इच्छाके वशीभूत ही है' यों कहा। फिर दैववशीभूता पार्वतीदेवीने कौतूहलवश शनैश्चरसे कहा—'तुम मेरी तथा मेरे बालककी ओर देखो। भला, इस निषेक (कर्मफलभोग)-को कौन हटा सकता है?' तब पार्वतीका वचन सुनकर शनैश्चर स्वयं मन-ही-मन यों विचार करने लगे—'अहो! क्या मैं इस पार्वतीनन्दनपर दृष्टिपात करूँ अथवा न करूँ? क्योंकि यदि मैं बालकको देख लूँगा तो निश्चय ही उसका अनिष्ट हो जायगा।' यों कहकर धर्मात्मा शनैश्चरने धर्मको साक्षी बनाकर बालकको तो देखनेका विचार किया, परंतु बालककी माताको नहीं। शनैश्चरका मन तो पहलेसे ही खिन्न था। उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु भी सूख गये थे; फिर भी उन्होंने अपने बायें नेत्रके कोनेसे शिशुके मुखकी ओर निहारा। मुने! शनिकी दृष्टि पड़ते ही शिशुका मस्तक धड़से अलग हो गया। तब शनैश्चरने अपनी आँख फेर ली और फिर वे नीचे मुख करके खड़े हो गये। इसके बाद उस बालकका खूनसे लथपथ हुआ सारा शरीर तो पार्वतीकी गोदमें पड़ा रह गया, परंतु मस्तक अपने अभीष्ट गोलोकमें जाकर श्रीकृष्णमें प्रविष्ट हो गया। यह देखकर पार्वतीदेवी बालकको छातीसे चिपटाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगीं और उन्मत्तकी

३४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भाँति भूमिपर गिरकर मूर्च्छित हो गयीं। तब वहाँ उपस्थित सभी देवता, देवियाँ, पर्वत, गन्धर्व, शिव तथा कैलासवासी जन यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उस समय उनकी दशा चित्रलिखित पुत्तलिकाके समान जड़ हो गयी।

इस प्रकार उन सबको मूर्च्छित देखकर श्रीहरि गरुड़पर सवार हुए और उत्तरदिशामें स्थित पुष्पभद्राके निकट गये। वहाँ पुष्पभद्रा नदीके तटपर वनमें स्थित एक गजेन्द्रको देखा, जो निद्राके वशीभूत हो बच्चोंसे घिरकर हथिनीके साथ सो रहा था। उसका सिर उत्तर दिशाकी ओर था, मन परमानन्दसे पूर्ण था और वह सुरतके परिश्रमसे थका हुआ था। फिर तो श्रीहरिने शीघ्र ही सुदर्शनचक्रसे उसका सिर काट लिया और रक्तसे भीगे हुए उस मनोहर मस्तकको बड़े हर्षके साथ गरुड़पर रख लिया। गजके कटे हुए अङ्गके गिरनेसे हथिनीकी नींद टूट गयी। तब अमङ्गल शब्द करती हुई उसने अपने शावकोंको भी जगाया। फिर वह शोकसे विह्वल हो शावकोंके साथ बिलख-बिलखकर चीत्कार करने लगी। तत्पश्चात् जो लक्ष्मीके स्वामी हैं, जिनका स्वरूप परम शान्त है; जिनके करकमलोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते हैं; जो पीताम्बरधारी, परात्पर, जगत्के स्वामी, निषेकका खण्डन करनेमें समर्थ, निषेकको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापक, निषेकके भोगके दाता और भोगके निस्तारके कारणस्वरूप हैं तथा जो गरुड़पर आरूढ़ हो मुस्कराते हुए सुदर्शनचक्रको घुमा रहे हैं—उन परमेश्वरका उसने स्तवन किया। विप्रवर! उसकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उसे वर दिया और दूसरे गजका मस्तक काटकर इसके धड़से जोड़ दिया। फिर उन ब्रह्मवेत्ताने ब्रह्मज्ञानसे उसे जीवित कर दिया और उस गजेन्द्रके सर्वाङ्गमें अपने चरणकमलका स्पर्श कराते हुए कहा—'गज! तू अपने कुटुम्बके साथ एक कल्पपर्यन्त जीवित रह।' यों कहकर मनके समान वेगशाली भगवान् कैलासपर आ पहुँचे। वहाँ पार्वतीके वासस्थानपर आकर उन्होंने उस बालकको अपनी छातीसे चिपटा लिया और उस हाथीके मस्तकको सुन्दर बनाकर बालकके धड़से जोड़ दिया। फिर ब्रह्मस्वरूप भगवान्‌ने ब्रह्मज्ञानसे हुंकारोच्चारण किया और खेल-खेलमें ही उसे जीवित कर दिया। पुनः श्रीकृष्णने पार्वतीको सचेत करके उस शिशुको उनकी गोदमें रख दिया और आध्यात्मिक ज्ञानद्वारा पार्वतीको समझाना आरम्भ किया।

**विष्णुने कहा—**शिवे! तुम तो जगत्की बुद्धिस्वरूपा हो। क्या तुम नहीं जानतीं कि ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् अपने कर्मानुसार फल भोगता है। प्राणियोंका जो स्वकर्मार्जित भोग है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक प्रत्येक योनिमें शुभ-अशुभ फलरूपसे नित्य प्राप्त होता रहता है। सती! इन्द्र अपने कर्मवश कीड़ेकी योनिमें जन्म ले सकते हैं और कीड़ा पूर्वकर्मफलानुसार इन्द्र भी हो सकता है। पूर्वजन्मार्जित कर्मफलके बिना सिंह मक्खीको भी मारनेमें असमर्थ है और मच्छर अपने प्राक्तन कर्मके बलसे हाथीको भी मार डालनेकी शक्ति रखता है। सुख-दुःख, भय-शोक, आनन्द—ये कर्मके ही फल हैं। इनमें सुख और हर्ष उत्तम कर्मके और अन्य पापकर्मके परिणाम हैं*। कर्मका भोग शुभ-अशुभ-रूपसे इहलोक अथवा परलोकमें प्राप्त होता है, परंतु कर्मोपार्जनके योग्य पुण्यक्षेत्र भारत ही है। स्वयं श्रीकृष्ण कर्मके फलदाता, विधिके विधाता, मृत्युके भी मृत्यु, कालके काल, निषेकके


*सुखं दुःखं भयं शोकमानन्दं कर्मणः फलम्। सुकर्मणः सुखं हर्षमितरे पापकर्मणः॥
(गणपतिखण्ड १२। २७)