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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३३- सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन

३८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
राजाको युद्धके लिये उद्यत देख मनोरमाका योगद्वारा शरीर-त्याग, राजाका विलाप
और आकाशवाणी सुनकर उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया करना, युद्धयात्राके समय
नाना प्रकारके अपशकुन देखना, कार्तवीर्य और परशुरामका युद्ध तथा
कार्तवीर्यका वध, नारायणद्वारा शिव-कवचका वर्णन
नारायण कहते हैं— मुने ! मनोरमाने अपने
स्वामीके मुखसे भविष्यकी जो-जो बातें सुनीं,
उन्हें मनमें धारण कर लिया और यह समझ
लिया कि ये बातें अवश्य सत्य होंगी; अतः उसने
उसी क्षण अपने प्राणनाथको अपनी छातीसे लगा
लिया और पुत्रों, बान्धवों तथा अपने भृत्योंको आगे
करके वह भगवच्चरणोंका ध्यान करने लगी। फिर
उसने योगद्वारा षट्चक्रका भेदन करके वायुको
मूर्धामें स्थापित किया और चञ्चल मनको जलके
बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर विषयोंसे खींचकर,
ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सहस्रदलसंयुक्त कमलपर स्थापित
करके उसे ज्ञानद्वारा निष्कल ब्रह्ममें बाँध दिया।
तत्पश्चात् निर्मूल एवं पुनर्जन्मरहित द्विविध कर्मका
परित्याग करके उसने वहीं प्राण त्याग दिये; परंतु
प्राणोंसे अधिक प्रिय राजाको नहीं छोड़ा।
तदनन्तर राजा विविध भाँतिसे करुण विलाप
करके फूट-फूटकर रोने लगे। राजाके विलापको
सुनकर इस प्रकार आकाशवाणी हुई—'महाराज !
शान्त हो जाओ, क्यों रो रहे हो? तुम तो
दत्तात्रेयकी कृपासे बड़े-बड़े ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो;
अतः सारे संसारको, जो रमणीय दीख रहा है,
जलके बुलबुलेके सदृश क्षणभङ्गुर समझो। वह
साध्वी मनोरमा तो लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न हुई
थी, अतः वह लक्ष्मीके वासस्थानको चली गयी।
अब तुम भी रणभूमिमें युद्ध करके वैकुण्ठमें
जाओ।' आकाशवाणीके इस वचनको सुनकर
नरेशने शोकका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात्
चन्दनकी लकड़ीसे दिव्य चिता तैयार की और
पुत्रद्वारा अग्निसंस्कार कराकर उसका दाह
कराया। फिर मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक
ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, भाँति-भाँतिके
वस्त्र और अनेक तरहके अन्यान्य दान दिये।
मुने ! उस अवसरपर कार्तवीर्यके आश्रममें सर्वत्र
निरन्तर यही शब्द होता था कि 'दान दो, दान
दो और खाओ, खाओ'। उस समय राजाद्वारा
अधिकृत कोषोंमें जो-जो धन मौजूद था, उसे
उसने मनोरमाके पुण्यके निमित्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको
दान कर दिया। तदनन्तर असंख्य बाजों तथा
सैन्यसमूहोंको साथ लेकर राजा दुःखी हृदयसे
समरभूमिके लिये प्रस्थित हुआ। आगे बढ़नेपर
यद्यपि राजाको प्रत्येक मार्गमें अमङ्गलके ही
दर्शन हुए तथापि वह रणक्षेत्रकी ओर ही बढ़ता
गया; पुनः राजधानीको नहीं लौटा। राजाको
मार्गमें एक नग्न स्त्री मिली, जिसके बाल बिखरे
थे, नाक कटी थी और वह रो रही थी। दूसरी
विधवा भी मिली, जो काला वस्त्र पहने थी।
आगे मुखदुष्टा, योनिदुष्टा, रोगिणी, कुट्टनी, पति-
पुत्रसे विहीन, डाकिनी, कुलटा, कुम्हार, तेली,
व्याघ्र, सर्पद्वारा जीविका चलानेवाला (सँपेरा),
कुत्सित वस्त्र, अत्यन्त रूखा शरीर, नंगा, काषाय-
वस्त्रधारी, चरबी बेचनेवाला, कन्या-विक्रयी,
चितामें जलता हुआ शव, बुझे हुए अङ्गारोंवाली
राख, सर्पसे डँसा हुआ मनुष्य, साँप, गोह,
खरगोश, विष, श्राद्धके लिये पकाया हुआ पाक,
पिण्ड, मोटक, तिल, देवमूर्तियोंपर चढ़े हुए धनसे
जीवन-निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण, वृषवाह (बैलपर
सवारी करनेवाला अथवा बैलको जोतनेवाला),
शूद्रके श्राद्धान्नका भोजी, शूद्रका रसोइया, शूद्रका
पुरोहित, गाँवका पुरोहित, कुशकी पुत्तलिका, मुर्दा
जलानेवाला, खाली घड़ा, फूटा घड़ा, तेल, नमक,

गणपतिखण्ड

३८९

हड्डी, रुई, कछुआ, धूल, भौंकता हुआ कुत्ता, दाहिनी ओर भयंकर शब्द करता हुआ सियार, जटा, हजामत, कटा हुआ बाल, नख, मल, कलह, विलाप करता हुआ मनुष्य, अमङ्गलसूचक विलाप करनेवाला तथा शोककारक रुदन करनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, चोर मनुष्य, हत्यारा, कुलटाका पति और पुत्र, कुलटाका अन्न खानेवाला, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी वस्तुओं तथा धनका अपहरण करनेवाला, दान देकर छीन लेनेवाला, डाकू, हिंसक, चुगलखोर, दुष्ट, पिता-मातासे विरक्त, ब्राह्मण और पीपलका विघातक, सत्यका हनन करनेवाला, कृतघ्न, धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य, विप्रद्रोही, मित्रद्रोही, घायल, विश्वासघातक, गुरु, देवता और ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाला, अपने अङ्गोंको काटनेवाला, जीवहिंसक, अपने अङ्गसे हीन, निर्दयी, व्रत-उपवाससे रहित, दीक्षाहीन, नपुंसक, कुष्ठरोगी, काना, बहरा, पुक्कस (जातिविशेष), कटे हुए लिङ्गवाला (नागा), मदिरासे मतवाला, मदिरा, पागल, खून उगलनेवाला, भैंसा, गदहा, मूत्र, विष्ठा, कफ, मनुष्यकी सूखी खोपड़ी, प्रचण्ड आँधी, रक्तकी वृष्टि, बाजा, वृक्षका गिराया जाना, भेड़िया, सूअर, गीध, बाज, कङ्क (एक मांसाहारी पक्षी), भालू, पाश, सूखी लकड़ी, कौआ, गन्धक, पहले-पहल दान लेनेवाला ब्राह्मण (महापात्र), तन्त्र-मन्त्रसे जीविका चलानेवाला, वैद्य, रक्त-पुष्प, औषध, भूसी, दूषित समाचार, मृतककी बातचीत, ब्राह्मणका दारुण शाप, दुर्गन्धयुक्त वायु और दुःशब्द आदि राजाके सामने आये। राजाका मन दूषित हो गया, प्राण निरन्तर क्षुब्ध रहने लगे, बायाँ अङ्ग फड़कने लगा और शरीरमें जडता आ गयी तथापि राजाको युद्धमें ही अपना मङ्गल दीख रहा था; अतः वह निःशङ्क हो सारी सेनाओंको साथ लेकर युद्धक्षेत्रमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ भृगुवंशी परशुरामको सामने देखकर वह तुरंत रथसे उतर पड़ा और भक्तिपूर्वक बड़े-बड़े राजाओंके साथ दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया। तब परशुरामने 'तुम स्वर्गमें जाओ' ऐसा राजाको उसका अभीष्ट आशीर्वाद दिया। वह उनके मनोऽनुकूल ही हुआ; क्योंकि ब्राह्मणके आशीर्वचन दुर्लङ्घ्य होते हैं। तदनन्तर राजराजेश्वर कार्तवीर्य उसी क्षण राजाओंसहित परशुरामको नमस्कार करके तुरंत ही रथपर, जो नाना प्रकारकी युद्ध-सामग्रीसे सम्पन्न था, सवार हुआ। फिर उसने सहसा दुन्दुभि, मुरज आदि तरह-तरहके बाजे बजवाये और ब्राह्मणोंको धन दान किया। तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परशुराम राजाओंकी उस सभामें राजाधिराज कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतियुक्त वचन बोले।

**परशुरामने कहा—**अये धर्मिष्ठ राजेन्द्र! तुम तो चन्द्रवंशमें उत्पन्न हुए हो और विष्णुके अंशभूत बुद्धिमान् दत्तात्रेयके शिष्य हो। तुम स्वयं विद्वान् हो और वेदज्ञोंके मुखसे तुमने वेदोंका श्रवण भी किया है; फिर भी तुम्हें इस समय सज्जनोंको विडम्बित करनेवाली दुर्बुद्धि कैसे उत्पन्न हो गयी? तुमने पहले लोभवश निरीह ब्राह्मणकी हत्या कैसे कर डाली? जिसके कारण सती-साध्वी ब्राह्मणी शोक-संतप्त होकर पतिके

३९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साथ सती हो गयी। भूपाल! इन दोनोंके वधसे परलोकमें तुम्हारी क्या गति होगी? यह सारा संसार तो कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलकी बूँदकी तरह मिथ्या ही है। सुयश हो अथवा अपयश, इसकी तो कथामात्र अवशिष्ट रह जाती है। अहो! सत्पुरुषोंकी दुष्कीर्ति हो, इससे बढ़कर और क्या विडम्बना होगी? कपिला कहाँ गयी, तुम कहाँ गये, विवाद कहाँ गया और मुनि कहाँ चले गये; परंतु एक विद्वान् राजाने जो कर्म कर डाला, वह हलवाहा भी नहीं कर सकता। मेरे धर्मात्मा पिताने तो तुम-जैसे नरेशको उपवास करते देखकर भोजन कराया और तुमने उन्हें वैसा फल दिया! राजन्! तुमने शास्त्रोंका अध्ययन किया है, तुम प्रतिदिन ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक दान देते हो और तुम्हारे यशसे सारा जगत् व्याप्त है। फिर बुढ़ापेमें तुम्हारी अपकीर्ति कैसे हुई? प्राचीन कालके वन्दीगण ऐसा कहते हैं कि भूतलपर कार्तवीर्यार्जुनके समान दाता, सर्वश्रेष्ठ, धर्मात्मा, यशस्वी, पुण्यशाली और उत्तम बुद्धिसम्पन्न न कोई हुआ है और न आगे होगा। जो पुराणोंमें विख्यात है, उसकी ऐसी अपकीर्ति! आश्चर्य है। राजन्! प्राणियोंके लिये दुर्वाक्य तीखे अस्त्रसे भी बढ़कर दुस्सह होता है; इसीलिये संकट-कालमें भी सत्पुरुषोंके मुखसे दुर्वचन नहीं निकलते। राजेन्द्र! मैं तुमपर दोषारोपण नहीं कर रहा हूँ, बल्कि सच्ची बात कह रहा हूँ; अतः इस राजसभामें तुम मुझे उत्तर दो। इस सभामें सूर्य, चन्द्र और मनुके वंशज विद्यमान हैं; अतः सभामें तुम ठीक-ठीक बतलाओ, जिसे तुम्हारे पितर और देवगण भी सुनें। साथ ही सत्-असत्को कहनेमें समर्थ ये सारे नरेश भी श्रवण करें; क्योंकि समदृष्टि रखनेवाले सत्पुरुष लोग पक्षपातकी बात नहीं कहते। युद्धस्थलमें इतना कहकर परशुराम चुप हो गये। तब बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् राजाने कहना आरम्भ किया।

कार्तवीर्यार्जुनने कहा— हे राम! आप श्रीहरिके अंश, हरिके भक्त और जितेन्द्रिय हैं। मैंने जिनके मुखसे धर्म श्रवण किया है, आप उनके गुरुके भी गुरु हैं। जो कर्मवश ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म-चिन्तन करता है और अपने धर्ममें तत्पर एवं शुद्ध है, इसीलिये वह ब्राह्मण कहलाता है। जो मनन करनेके कारण नित्य बाहर-भीतर कर्म करता रहता है, सदा मौन धारण किये रहता है और समय आनेपर बोलता है, वह मुनि कहलाता है। जिसकी सुवर्ण और मिट्टीके ढेलेमें, घर और जंगलमें तथा कीचड़ और अत्यन्त चिकने चन्दनमें समताकी भावना है, वह योगी कहा जाता है। जो सम्पूर्ण जीवोंमें समत्व-बुद्धिसे विष्णुकी भावना करता है और श्रीहरिकी भक्ति करता है, वह हरिभक्त कहा जाता है*। ब्राह्मणोंका धन तप है। चूँकि तपस्या कल्पतरु और कामधेनुके समान है, इसीलिये उनकी निरन्तर तपमें इच्छा लगी रहती है। रजोगुणी पुरुष कर्मोंके रागवश राजसिक कार्य करता है और रागान्ध होकर रजोगुणी कार्योंमें लगा रहता है; इसी कारण वह राजा कहा जाता है। मुने! रागवश मैंने कामधेनुकी याचना की थी; अतः मुझ अनुरागी क्षत्रियका इसमें कौन-सा अपराध हुआ? फिर भी, आपके पिताने महान्


* कर्मणा ब्राह्मणो जातः करोति ब्रह्मभावनम्। स्वधर्मनिरतः शुद्धस्तस्माद् ब्राह्मण उच्यते॥
अन्तर्बहिश्च मननात् कुरुते कर्म नित्यशः। मौनी शश्वद् वदेत् काले यो हि स मुनिरुच्यते॥
स्वर्णे लोष्टे गृहेऽरण्ये पङ्के सुस्निग्धचन्दने। समता भावना यस्य स योगी परिकीर्तितः॥
सर्वजीवेषु यो विष्णुं भावयेत् समताधिया। हरौ करोति भक्तिं च हरिभक्तः स च स्मृतः॥
(३५।७०—७३)