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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 692, कुल 810 में से

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पृष्ठ 692

६८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हो उठा है। तुम्हारा जो चरणकमल सम्पूर्ण
मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है तथा ब्रह्मा
आदि देवता स्वप्नमें भी जिसका दर्शन नहीं कर
पाते हैं; वही आज मेरी आँखोंके सामने है।
आजके बाद मुझ पातकीको तुम्हारे चरणारविन्दोंका
दर्शन कहाँ मिलेगा ? मेरा यह मलमूत्रधारी शरीर
अपने कर्मबन्धनसे बँधा हुआ है। बेटा! अब
ऐसा दिन कब प्राप्त होगा, जब कि ब्रह्मा आदि
देवताओंके भी स्वामी तुमसे बातचीत करनेका
शुभ अवसर मुझ-जैसे पापीको सुलभ होगा ?
महेश्वर ! कृपानाथ ! मुझपर कृपा करो। मैंने अपना
बेटा समझकर तुम्हारे साथ जो दुर्नीतिपूर्ण व्यवहार
किया है; मेरे उस अपराधको क्षमा कर दो।
ब्रह्मा, शिव, शेषनाग और मुनि भी तुम्हारे
चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं। सरस्वती और
श्रुति भी तुम्हारी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाती
हैं; फिर मेरी क्या बिसात है?
यों कहकर नन्दजी दुःख और शोकसे
व्याकुल हो गये। पुत्रवियोगसे विह्वल हो रोते-
रोते उन्हें मूर्च्छा आ गयी। यह देख जगत्पति
भगवान् श्रीकृष्ण संत्रस्त हो उन्हें यत्नपूर्वक
समझाने-बुझाने लगे। उन्होंने नन्दको परम उत्तम
आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।
श्रीभगवान्ने कहा- पिताजी ! लोकमें जितने
जन्मदाता पिता हैं, उन सबमें तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान
है। सर्वश्रेष्ठ ब्रजेश्वर ! होशमें आओ और उत्तम
कल्याणमय ज्ञान सुनो। यह श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान
ज्ञानियोंके लिये भी परम दुर्लभ है। वेद-शास्त्रमें
भी गोपनीय कहा गया है। केवल तुम्हींको इसका
उपदेश दे रहा हूँ। तात! एकाग्रचित्त हो प्रसन्नतापूर्वक
इस ज्ञानको सुनो और इसका मनन करो। इसके
अभ्याससे जन्म, मृत्यु और जरारूपी रोगसे
छुटकारा मिल जाता है। महाराज ब्रजराज !
सुस्थिर होओ और इस ज्ञानको पाकर शोक-
मोहसे रहित एवं परमानन्दमें निमग्न हो अपने
व्रजको पधारो। यह समस्त चराचर जगत् जलके
बुलबुलेकी भाँति नश्वर है; प्रातःकालिक स्वप्नकी
भाँति मिथ्या और मोहका ही कारण है। पाञ्चभौतिक
शरीर एवं संसारके निर्माणका हेतु भी मिथ्या एवं
अनित्य है। मायासे ही मनुष्य इसे सत्य मान रहा
है। वह समस्त कर्मोंमें काम, क्रोध, लोभ और
मोहसे वेष्टित है और मायासे सदा मोहित,
ज्ञानहीन एवं दुर्बल है। निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा,
पिपासा, क्षमा, श्रद्धा, दया, लज्जा, शान्ति, धृति,
पुष्टि और तुष्टि आदिसे भी वह आवृत है। जैसे
वृक्ष काक आदि पक्षियोंका आश्रय है; उसी
प्रकार मन, बुद्धि, चेतना, प्राण, ज्ञान और
आत्मासहित सम्पूर्ण देवता शरीरका आश्रय लेकर
रहते हैं। मैं सर्वेश्वर ही पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा
हूँ। ब्रह्मा मन हैं, सनातनी प्रकृति बुद्धि हैं, प्राण
विष्णु हैं तथा चेतना और उसकी अधिष्ठात्री देवी
लक्ष्मी हैं। शरीरमें मेरे रहनेसे ही सबकी स्थिति
है। मेरे चले जानेपर वे भी सब-के-सब चले
जाते हैं। हम सबके त्याग देनेपर शरीर तत्काल
गिर जाता है; इसमें संशय नहीं है। उसके पाँचों
भूत उसी क्षण समष्टिगत पाँचों भूतोंमें विलीन हो
जाते हैं। नाम केवल संकेतरूप है। वह निष्फल
और मोहका कारण है। तात ! अज्ञानियोंको ही
शरीरके लिये शोक होता है; ज्ञानियोंको किञ्चिन्मात्र
भी दुःख नहीं होता। निद्रा आदि जो शक्तियाँ हैं;
वे सब प्रकृतिकी कलाएँ हैं। काम, क्रोध लोभ
और मोहके साथ जो पाँचवाँ अहंकार है; वे सब
अधर्मके अंश हैं। सत्त्व आदि तीन गुण क्रमशः
विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्रके अंश हैं। ज्योतिर्मय शिव
ज्ञानस्वरूप हैं और मैं निर्गुण आत्मा हूँ। जब
प्रकृतिमें प्रवेश करता हूँ तो मैं सगुण कहा जाता
हूँ। विष्णु, ब्रह्मा तथा रुद्र आदि सगुण विषय हैं।
मेरे अंशभूत धर्म, शेषनाग, सूर्य और चन्द्रमा
आदि विषयी कहे गये हैं। इसी प्रकार समस्त
मुनि, मनु तथा देवता आदि मेरे कलांशरूप हैं।