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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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गणपतिखण्ड ३४१

निषेककर्ता, संहर्ताके भी संहारक, पालकके भी पालक, परात्पर, परिपूर्णतम गोलोकनाथ हैं। हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस पुरुषकी कलाएँ हैं, महाविराट् जिसका अंश है, जिसके रोम-विवरमें जगत् भरे हैं, कोई-कोई उनके कलांश हैं और कोई-कोई कलांशके भी अंश हैं और जो सम्पूर्ण चराचर जगत्-स्वरूप हैं, उन्हीं श्रीकृष्णमें विनायक स्थित हैं।

इस प्रकार श्रीविष्णुका कथन सुनकर पार्वतीका मन संतुष्ट हो गया। तब वे उन गदाधर भगवान्को प्रणाम करके शिशुको दूध पिलाने लगीं। तदनन्तर प्रसन्न हुई पार्वतीने शंकरजीकी प्रेरणासे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन कमलापति भगवान् विष्णुकी स्तुति की। तब विष्णुने शिशुको तथा शिशुकी माताको आशीर्वाद दिया और अपने आभूषण कौस्तुभमणिको बालकके गलेमें डाल दिया। ब्रह्माने अपना मुकुट और धर्मने रत्नका आभूषण दिया। फिर क्रमशः देवियोंने तथा उपस्थित सभी देवताओं, मुनियों, पर्वतों, गन्धर्वों और समस्त महिलाओंने यथोचितरूपसे रत्न प्रदान किये। उस समय महादेवजीका हृदय अत्यन्त हर्षमग्न था। वे विष्णुका स्तवन करने लगे। नारद! वहाँ मरकर जीवित हुए बालकको देखकर शिव-पार्वतीने ब्राह्मणोंको असंख्य रत्न दान किये। मरे हुए बालकके जी उठनेपर हर्षगद्गद हुए हिमालयने वन्दियोंको एक सौ हाथी और एक सहस्र घोड़े प्रदान किये तथा देवगण हर्षित होकर ब्राह्मणोंको और सभी नारियोंने वन्दियोंको दान दिया। लक्ष्मीपति विष्णुने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न कराया, ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया और वेदों तथा पुराणोंका पाठ कराया। तत्पश्चात् शनैश्चरको लज्जायुक्त देखकर पार्वतीको क्रोध आ गया और उन्होंने उस सभाके बीच शनैश्चरको यों शाप देते हुए कहा—'तुम अङ्गहीन हो जाओ।' (अध्याय १२)


विष्णु आदि देवताओंद्वारा गणेशकी अग्रपूजा, पार्वतीकृत विशेषोपचारसहित गणेशपूजन, विष्णुकृत गणेशस्तवन और 'संसारमोहन' नामक कवचका वर्णन

**श्रीनारायणजी कहते हैं—**नारद! तदनन्तर विष्णुने शुभ समय आनेपर देवों तथा मुनियोंके साथ सर्वश्रेष्ठ उपहारोंसे उस बालकका पूजन किया और उससे यों कहा—'सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा की है; अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र होओ।' यों कहकर श्रीहरिने उसके गलेमें वनमाला डाल दी और उसे मुक्तिदायक ब्रह्मज्ञान तथा सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करके अपने समान बना दिया। फिर षोडशोपचारकी सुन्दर वस्तुएँ दीं और मुनियों तथा देवोंके साथ उसका इस प्रकार नामकरण किया—विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, शूर्पकर्ण और विनायक—उसके ये आठ नाम रखे गये। पुनः सनातन श्रीहरिने उन मुनियोंको बुलवाकर उसे आशीर्वाद दिलाया। तदनन्तर सभी देव-देवियोंने तथा मुनियों आदिने अनेक प्रकारके उपहार गणेशको दिये और फिर क्रमशः उन्होंने भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की।

नारद! तदनन्तर जगज्जननी पार्वतीने, जिनका मुखकमल हर्षके कारण विकसित हो रहा था, अपने पुत्रको रत्ननिर्मित सिंहासनपर बैठाया। फिर उन्होंने आनन्दपूर्वक समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सौ कलशोंसे मुनियोंद्वारा वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे स्नान कराया और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो वस्त्र दिये। फिर पाद्यके लिये गोदावरीका जल, अर्घ्यके निमित्त गङ्गाजल और आचमनके हेतु दूर्वा, अक्षत, पुष्प और चन्दनसे युक्त पुष्करका जल लाकर दिया। रत्नपात्रमें रखे हुए

३४२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शर्करायुक्त द्रवका मधुपर्क प्रदान किया। पुनः स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारद्वारा निर्मित स्नानोपयोगी विष्णुतैल, बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए सुन्दर आभूषण, पारिजातके पुष्पोंकी सौ मालाएँ, मालती, चम्पक आदि अनेक प्रकारके पुष्प, तुलसीके अतिरिक्त पूजोपयोगी तरह-तरहके पत्र, चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, ढेर-के-ढेर रत्नप्रदीप और धूप सादर समर्पित किये। तत्पश्चात् उसे प्रिय लगनेवाले नैवेद्यों—तिलके लड्डू, जौ और गेहूँके चूर्ण, पूड़ी, अत्यन्त स्वादिष्ट तथा मनोहर पक्वान्न, शर्करामिश्रित स्वादिष्ट स्वस्तिकके आकारका बना हुआ त्रिकोण पकवानविशेष, गुड़युक्त खील, चिउड़ा और अगहनीके चावलके आटेके बने हुए पदार्थके नाना प्रकारके व्यंजनोंके साथ पहाड़ लगा दिया। नारद! फिर उस पूजनमें सुन्दरी पार्वतीने हर्षमें भरकर एक लाख घड़े, दूध, एक लाख घड़े दही, तीन लाख घड़े मधु और पाँच लाख घड़े घी सादर अर्पित किया। नारद! फिर अनार और बेलके असंख्य फल, भाँति-भाँतिके खजूर, कैथ, जामुन, आम, कटहल, केला और नारियलके असंख्य फल दिये। इनके सिवा और भी जो ऋतुके अनुसार विभिन्न देशोंमें उत्पन्न हुए स्वादिष्ट एवं मधुर पके हुए फल थे, उन्हें भी महामायाने समर्पित किया। पुनः आचमन और पान करनेके लिये अत्यन्त निर्मल कर्पूर आदिसे सुवासित स्वच्छ गङ्गाजल दिया। नारद! इसके बाद उसी प्रकार सुवासित उत्तम रमणीय पानके बीड़े और बायनसे परिपूर्ण सैकड़ों स्वर्णपात्र दिये।

तदनन्तर मेनका, हिमालय, हिमालयके पुत्र और प्रिय अमात्योंने गिरिजाके पुत्रका पूजन किया। वहाँ उपस्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता—

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मरूपाय चारवे।
सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः॥'

—इसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक वस्तुएँ समर्पित करके परमानन्दमें मग्न थे। इस मन्त्रमें बत्तीस अक्षर हैं। यह सम्पूर्ण कामनाओंका दाता, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षका फल देनेवाला और सर्वसिद्धिप्रद है। इसके पाँच लाख जपसे ही जापकको मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो जाती है। भारतवर्षमें जिसे मन्त्रसिद्धि हो जाती है, वह विष्णु-तुल्य हो जाता है। उसके नाम-स्मरणसे सारे विघ्न भाग जाते हैं। निश्चय ही वह महान् वक्ता, महासिद्ध, सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ कवियोंमें भी श्रेष्ठ गुणवान्, विद्वानोंके गुरुका गुरु तथा जगत्‌के लिये साक्षात् वाक्पति हो जाता है। उस उत्सवके अवसरपर आनन्दमग्न हुए देवताओंने इस मन्त्रसे शिशुकी पूजा करके अनेक प्रकारके बाजे बजवाये, उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया; फिर उन ब्राह्मणोंको तथा विशेषतया वन्दियोंको दान दिया।

**श्रीनारायणजी कहते हैं—**नारद! तदनन्तर उस सभाके बीच विष्णु परमभक्तिपूर्वक सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाशक उन गणेश्वरकी भलीभाँति पूजा करके उनकी स्तुति करने लगे।

**श्रीविष्णुने कहा—**ईश! मैं सनातन ब्रह्मज्योतिःस्वरूप आपका स्तवन करना चाहता हूँ, परंतु आपके अनुरूप निरूपण करनेमें मैं सर्वथा असमर्थ हूँ; क्योंकि आप इच्छारहित, सम्पूर्ण देवोंमें श्रेष्ठ, सिद्धों और योगियोंके गुरु, सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानराशिस্বরূপ, अव्यक्त, अविनाशी, नित्य, सत्य, आत्मस्वरूप, वायुके समान अत्यन्त निर्लेप, क्षतरहित, सबके साक्षी, संसार-सागरसे पार होनेके लिये परम दुर्लभ मायारूपी नौकाके कर्णधारस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले, श्रेष्ठ, वरणीय, वरदाता, वरदानियोंके भी ईश्वर, सिद्ध, सिद्धस्वरूप, सिद्धिदाता, सिद्धिके साधन, ध्यानसे अतिरिक्त ध्येय, ध्यानद्वारा असाध्य, धार्मिक, धर्मस्वरूप, धर्मके ज्ञाता, धर्म और अधर्मका फल प्रदान करनेवाले, संसार-वृक्षके

गणपतिखण्ड ३४३

बीज, अंकुर और उसके आश्रय, स्त्री-पुरुष और नपुंसकके स्वरूपमें विराजमान तथा इनकी इन्द्रियोंसे परे, सबके आदि, अग्रपूज्य, सर्वपूज्य, गुणके सागर, स्वेच्छासे सगुण ब्रह्म तथा स्वेच्छासे ही निर्गुण ब्रह्मका रूप धारण करनेवाले, स्वयं प्रकृतिरूप और प्रकृतिसे परे प्राकृतरूप हैं। शेष अपने सहस्रों मुखोंसे भी आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। आपके स्तवनमें न पञ्चमुख महेश्वर समर्थ हैं न चतुर्मुख ब्रह्मा ही; न सरस्वतीकी शक्ति है और न मैं ही कर सकता हूँ। न चारों वेदोंकी ही शक्ति है, फिर उन वेदवादियोंकी क्या गणना ?

इस प्रकार देवसभामें देवताओंके साथ सुरेश्वर गणेशकी स्तुति करके सुराधीश रमापति मौन हो गये। मुने! जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल इस विष्णुकृत गणेशस्तोत्रका सतत पाठ करता है, विघ्नेश्वर उसके समस्त विघ्नोंका विनाश कर देते हैं, सदा उसके सब कल्याणोंकी वृद्धि होती है और वह स्वयं कल्याणजनक हो जाता है। जो यात्राकालमें भक्तिपूर्वक इसका पाठ करके यात्रा करता है, निस्संदेह उसकी सभी अभीप्सित कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। उसके द्वारा देखा गया दुःस्वप्न सुस्वप्नमें परिणत हो जाता है। उसे कभी दारुण ग्रहपीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। उसके शत्रुओंका विनाश और बन्धुओंका विशेष उत्कर्ष होता है। निरन्तर विघ्नोंका क्षय और सदा सम्पत्तिकी वृद्धि होती रहती है। उसके घरमें पुत्र-पौत्रको बढ़ानेवाली लक्ष्मी स्थिररूपसे वास करती हैं। वह इस लोकमें सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका भागी होकर अन्तमें विष्णु-पदको प्राप्त हो जाता है। तीर्थों, यज्ञों और सम्पूर्ण महादानोंसे जो फल मिलता है, वह उसे श्रीगणेशकी कृपासे प्राप्त हो जाता है—यह ध्रुव सत्य है।

नारदजीने कहा—प्रभो! गणेशके स्तोत्र तथा उनके मनोहर पूजनको तो मैंने सुन लिया, अब मुझे जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले कवचके सुननेकी इच्छा है।

श्रीनारायणने कहा—नारद! उस देवसभाके मध्य जब गणेशकी पूजा समाप्त हुई, तब शनैश्चरने सबके तारक जगद्गुरु विष्णुसे कहा।

शनैश्चर बोले—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! सम्पूर्ण दुःखोंके विनाश और दुःखकी पूर्णतया शान्तिके लिये विघ्नहन्ता गणेशके कवचका वर्णन कीजिये। प्रभो! हमारा मायाशक्तिके साथ विवाद हो गया है; अतः उस विघ्नके प्रशमनके लिये मैं उस कवचको धारण करूँगा।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने कवचकी गोपनीयता और महिमा बतलाते हुए कहा—सूर्यनन्दन! दस लाख जप करनेसे कवच सिद्ध हो जाता है। जो मनुष्य कवच सिद्ध कर लेता है, वह मृत्युको जीतनेमें समर्थ हो जाता है। सिद्ध-कवचवाला मनुष्य उसके ग्रहणमात्रसे भूतलपर वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है। इस मालामन्त्रको तथा इस पुण्यकवचको धारण करनेवाले मनुष्योंके सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, बेताल आदि, बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि कवचके शब्दमात्रके श्रवणसे भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं। जैसे गरुड़के निकट सर्प नहीं जाते, उसी तरह कवचधारी पुरुषोंके संनिकट आधि (मानसिक रोग), व्याधि (शारीरिक रोग) और भयदायक शोक नहीं फटकते। इसे अपने सरल स्वभाववाले गुरुभक्त शिष्यको ही बतलाना चाहिये।

शनैश्चर! इस 'संसारमोहन' नामक कवचके प्रजापति ऋषि हैं, बृहती छन्द है और स्वयं लम्बोदर गणेश देवता हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें इसका विनियोग कहा गया है। मुने! यह सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत है। 'ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा' यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। बत्तीस

३४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षरोंवाला मन्त्र सदा मेरे ललाटको बचाये। ‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गम्’ यह निरन्तर मेरे नेत्रोंकी रक्षा करे। विघ्नेश भूतलपर सदा मेरे तालुकी रक्षा करें। ‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं’ यह निरन्तर मेरी नासिकाकी रक्षा करे तथा ‘ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा’ यह मेरे ओठको सुरक्षित रखे। षोडशाक्षर-मन्त्र मेरे दाँत, तालु और जीभको बचावे। ‘ॐ लं श्रीं लम्बोदराय स्वाहा’ सदा गण्डस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा’ सदा कानोंकी रक्षा करे। ‘ॐ श्रीं गं गजाननाय स्वाहा’ सदा कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं विनायकाय स्वाहा’ सदा पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं ह्रीं’ कंकालकी और ‘गं’ वक्षःस्थलकी रक्षा करे। विघ्ननिहन्ता हाथ, पैर तथा सर्वाङ्गको सुरक्षित रखे। पूर्वदिशामें लम्बोदर और अग्निकोणमें विघ्ननायक रक्षा करें। दक्षिणमें विघ्नेश और नैर्ऋत्यकोणमें गजानन रक्षा करें। पश्चिममें पार्वतीपुत्र, वायव्यकोणमें शंकरात्मज, उत्तरमें परिपूर्णतम श्रीकृष्णका अंश, ईशानकोणमें एकदन्त और ऊर्ध्वभागमें हेरम्ब रक्षा करें। अधोभागमें सर्वपूज्य गणाधिप सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

शयन और जागरणकालमें योगियोंके गुरु मेरा पालन करें। वत्स! इस प्रकार जो सम्पूर्ण मन्त्रसमूहोंका विग्रहस्वरूप है, उस परम अद्भुत संसारमोहन नामक कवचका तुमसे वर्णन कर दिया। सूर्यनन्दन! इसे प्राचीनकालमें गोलोकके वृन्दावनमें रासमण्डलके अवसरपर श्रीकृष्णने मुझ विनीतको दिया था। वही मैंने तुम्हें प्रदान किया है। तुम इसे जिस-किसीको मत दे डालना। यह परम श्रेष्ठ, सर्वपूज्य और सम्पूर्ण संकटोंसे उबारनेवाला है। जो मनुष्य विधिपूर्वक गुरुकी अभ्यर्थना करके इस कवचको गलेमें अथवा दक्षिण भुजापर धारण करता है, वह निस्संदेह विष्णु ही है। ग्रहेन्द्र! हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय-यज्ञ इस कवचकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। जो मनुष्य इस कवचको जाने बिना शंकर-सुवन गणेशकी भक्ति करता है, उसके लिये सौ लाख जपनेपर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।* इस प्रकार सूर्यपुत्र शनैश्चरको यह कवच प्रदान करके सुरेश्वर विष्णु चुप हो गये। तब समीपमें स्थित परमानन्दमें निमग्न हुए देवताओंने कहा। (अध्याय १३)


* संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः। ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवो लम्बोदरः स्वयम्॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः॥
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने। ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटो मे सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गमिति च सततं पातु लोचनम्। तालुकं पातु विघ्नेशः सततं धरणीतले॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति च सततं पातु नासिकाम्। ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम॥
दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः॥
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदाऽवतु। ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा कर्णं सदाऽवतु॥
ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ क्लीं ह्रीमिति कङ्कालं पातु वक्षःस्थलं च गम्। करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघ्ननिघ्नकृत्॥
प्राच्यां लम्बोदरः पातु आग्नेय्यां विघ्ननायकः। दक्षिणे पातु विघ्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः॥
पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शङ्करात्मजः। कृष्णांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च॥
ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्बः पातु चोर्ध्वतः। अधो गणाधिपः पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः॥
स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले। वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज॥

गणपतिखण्ड ३४५

पार्वतीको देवताओंद्वारा कार्तिकेयका समाचार प्राप्त होना, शिवजीका कृत्तिकाओंके पास दूतोंको भेजना, वहाँ कार्तिकेय और नन्दीका संवाद

तदनन्तर, पहले शंकरका वीर्य पृथ्वीपर गिरनेसे कार्तिकेयके उत्पन्न होनेकी बात आयी थी, उसीके सम्बन्धमें बात छिड़नेपर—

श्रीधर्मने कहा— भगवन्! प्रकोपके कारण रतिसे उठते हुए शंकरजीका वह अमोघ वीर्य भूतलपर गिरा था, यह मुझे ज्ञात है।

भूमिने कहा— ब्रह्मन्! उस वीर्यका वहन करना अत्यन्त कठिन था, इसलिये जब मैं उसका भार सहन न कर सकी, तब मैंने उसे अग्निमें डाल दिया; अतः मुझ अबलाको क्षमा कीजिये।

अग्निने कहा— जगन्नाथ! मैंने भी उस वीर्यका भार उठानेमें असमर्थ होकर उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। भला, दुर्बलका पुरुषार्थ ही क्या और उसका यश ही कैसा?

वायुने कहा— विष्णो! स्वर्णरेखा नदीके तटपर सरकंडोंमें गिरा हुआ वह वीर्य तुरंत ही अत्यन्त सुन्दर बालक हो गया।

श्रीसूर्यने कहा— भगवन्! कालचक्रसे प्रेरित हुआ मैं उस रोते हुए बालकको देखकर अस्ताचलकी ओर चला गया; क्योंकि मैं रातमें ठहरनेके लिये असमर्थ हूँ।

चन्द्रमाने कहा— विष्णो! उसी समय कृत्तिकाओंका समुदाय बदरिकाश्रमसे आ रहा था। उन्होंने उस रुदन करते हुए बालकको देखा और उसे उठाकर वे अपने भवनको चली गयीं।

जलने कहा— प्रभो! कृत्तिकाओंने उस रोते हुए शिशुको अपने घर लाकर और उसके भूखे होनेपर उसे अपने स्तनोंका दूध पिलाकर बढ़ाया। वह शिव-पुत्र सूर्यसे भी अधिक प्रभावशाली था।

दोनों संध्याओंने कहा— भगवन्! इस समय वह बालक छहों कृत्तिकाओंका पोष्य पुत्र है। उन्होंने स्वयं ही प्रेमपूर्वक उसका 'कार्तिकेय' ऐसा नाम रखा है।

रात्रिने कहा— प्रभो! वे कृत्तिकाएँ उस बालकको आँखोंसे ओझल नहीं करती हैं। उनके लिये वह प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेमपात्र है; क्योंकि जो पालन करनेवाला होता है, उसीका वह पुत्र कहलाता है।

दिनने कहा— देव! जो-जो वस्तुएँ त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं और अपने स्वादके लिये प्रशंसित हैं, उन्हींको वे उस बालकको खिलाती हैं।

जब उस सभामें उन सब लोगोंने प्रसन्नमनसे श्रीहरिसे यों कहा, तब उनके उस कथनको सुनकर मधुसूदन संतुष्ट हो गये। पुत्रका पूरा समाचार पाकर पार्वतीका मन हर्षसे खिल उठा। उन्होंने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न, बहुत-सा धन और विभिन्न प्रकारके सभी वस्त्र दिये। तत्पश्चात् लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, मेना आदि सभी महिलाओंने तथा विष्णु आदि सभी देवताओंने ब्राह्मणोंको धन दिया।

श्रीनारायण कहते हैं— मुने! पुत्रका समाचार मिल जानेपर जब विष्णु, देवगण, मुनिसमुदाय और पर्वतोंने पार्वतीसहित शंकरको प्रेरित किया, तब उन्होंने लाखों क्षेत्रपाल, भूत, बेताल, यक्ष, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी और भैरवोंके साथ महान् बल-पराक्रमसम्पन्न वीरभद्र,


मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि। परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसंकटतारणम्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥
अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च। ग्रहेन्द्र कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छङ्करात्मजम्। शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

( १३ । ७८-९७ )

३४६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

विशालाक्ष, शंकुकर्ण, कबन्ध, नन्दीश्वर, महाकाल,
वज्रदन्त, भगन्दर, गोधामुख, दधिमुख आदि
दूतोंको, जो धधकती हुई आगकी लपटके समान
उद्दीप्त हो रहे थे, भेजा। उन सभी शिव-दूतोंने,
जो नाना प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित थे, शीघ्र
ही जाकर कृत्तिकाओंके भवनको चारों ओरसे घेर
लिया। उन्हें देखकर सभी कृत्तिकाओंका मन
भयसे व्याकुल हो गया। तब वे ब्रह्मतेजसे उद्दीप्त
होते हुए कार्तिकेयके पास जाकर कहने लगीं।

कृत्तिकाओंने कहा— बेटा कार्तिकेय! असंख्यों
कराल सेनाओंने भवनको चारों ओरसे घेर लिया
है और हमें पता भी नहीं है कि ये किसकी हैं।

तब कार्तिकेय बोले— माताओ! आपलोगोंका
भय दूर हो जाना चाहिये। मेरे रहते आपको भय
कैसा? यह कर्मभोग दुर्निवार्य है, इसे कौन हटा
सकता है। इसी बीच सेनापति नन्दिकेश्वर भी
वहाँ कार्तिकेयके समक्ष उपस्थित हुए और
कृत्तिकाओंसे बोले।

नन्दिकेश्वरने कहा— भ्राता! संहारकर्ता सुरश्रेष्ठ
शंकर और माता पार्वतीद्वारा भेजे गये शुभ
समाचारको मुझसे श्रवण करो। कैलासपर्वतपर
गणेशके माङ्गलिक जन्मोत्सवके अवसरपर सभामें
ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवता
उपस्थित हैं। वहाँ गिरिराजकिशोरीने जगत्का
पालन करनेवाले विष्णुको सम्बोधित करके उनसे
तुम्हारे अन्वेषणके लिये कहा। तब विष्णुने
तुम्हारी प्राप्तिके निमित्त क्रमशः उन सभी देवोंसे
पूछा। उनमेंसे प्रत्येकने यथोचित उत्तर भी दिया।
उन्हींमें धर्म-अधर्मके साक्षी धर्म आदि सभी
देवताओंने परमेश्वरको तुम्हारे यहाँ कृत्तिकाओंके
भवनमें रहनेकी सूचना दी। प्राचीनकालमें शिव-
पार्वतीकी जो एकान्त क्रीड़ा हुई थी, उसमें
देवताओंद्वारा देखे जानेपर शम्भुका शुक्र भूतलपर
गिर पड़ा था। भूमिने उस शुक्रको अग्निमें और
अग्निने उसे सरकंडोंके वनमें फेंक दिया। वहाँसे
इन कृत्तिकाओंने तुम्हें पाया है। अब तुम अपने
घर चलो। वहाँ तुम्हें सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंकी प्राप्ति
होगी, विष्णु देवताओंको साथ लेकर तुम्हारा
अभिषेक करेंगे और तब तुम तारकासुरका वध
करोगे। तुम विश्वसंहर्ता शंकरके पुत्र हो, अतः ये
कृत्तिकाएँ तुम्हें उसी तरह नहीं छिपा सकतीं,
जैसे शुष्क वृक्ष अपने कोटरमें अग्निको गुप्त नहीं
रख सकता। तुम तो विश्वमें दीप्तिमान् हो। इन
कृत्तिकाओंके घरमें तुम्हारी उसी प्रकार शोभा
नहीं हो रही है, जैसे महाकूपमें पड़े हुए चन्द्रमा
शोभित नहीं होते। जैसे सूर्य मनुष्यके हाथोंकी
ओटमें नहीं छिप सकते, उसी तरह तुम भी इनके
अङ्गतेजसे आच्छादित न होकर जगत्‌को प्रकाशित
कर रहे हो। शम्भुनन्दन! तुम तो जगद्व्यापी
विष्णु हो, अतः इन कृत्तिकाओंके व्याप्य नहीं
हो, जैसे आकाश किसीका व्याप्य नहीं है,
बल्कि वह स्वयं ही सबका व्यापक है। तुम
विषयोंसे निर्लिप्त योगीन्द्र हो तथा विश्वके आधार
और परमेश्वर हो। ऐसी दशामें कृत्तिकाओंके
भवनमें तुम सर्वेश्वरका निवास होना उसी प्रकार
सम्भव नहीं है, जैसे क्षुद्र गौरैयाके उदरमें
गरुड़का रहना असम्भव है। तुम भक्तोंके लिये
मूर्तिमान् अनुग्रह तथा गुणों और तेजोंकी राशि
हो। देवगण तुम्हें उसी तरह नहीं जानते जैसे
योगहीन पुरुष ज्ञानसे अनभिज्ञ होता है। जैसे
मोहितचित्तवाले भक्तिहीन मनुष्योंको हरिकी उत्कृष्ट
भक्तिका ज्ञान नहीं होता, उसी तरह ये कृत्तिकाएँ
तुम्हें कैसे जान सकती हैं; क्योंकि तुम अनिर्वचनीय
हो। भ्राता! जो लोग जिसके गुणको नहीं जानते,
वे उसका अनादर ही करते हैं; जैसे मेढक एक
साथ रहनेवाले कमलोंका आदर नहीं करते।

कार्तिकेयने कहा— भ्राता! जो भूत, भविष्यत्,
वर्तमान—तीनों कालोंका ज्ञान है, वह सब मुझे
ज्ञात है। तुम भी तो ज्ञानी हो; क्योंकि मृत्युञ्जयके
आश्रित हो। ऐसी दशामें तुम्हारी क्या प्रशंसा की