ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४२- धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन
| ६१६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके बिदा हुए। भगवान् नारायण और ब्रह्माको शंकरजीने स्वयं ही प्रणाम किया। वे दोनों उन्हें हृदयसे लगाकर आशीर्वाद दे अपने-अपने स्थानको चले गये।
इसके बाद हिमवान् और मेनाने मैनाकको बुलाया और कहा— 'बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शिव और पार्वतीको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।' उनकी बात सुनकर मैनाक शीघ्र ही शिवधाममें गया और पार्वती एवं परमेश्वरको लिवाकर आ गया। पार्वतीका आगमन सुनकर बालक-बालिका, वृद्धा तथा युवती स्त्रियाँ भी उन्हें देखनेके लिये दौड़ी आयीं। पर्वतगण भी सानन्द भागे आये। मेना अपने पुत्रों और बहूके साथ मुस्कराती हुई दौड़ीं। हिमालय भी प्रसन्नतापूर्वक पुत्रीकी अगवानीके लिये दौड़े आये। देवी पार्वतीने रथसे उतरकर बड़े हर्षके साथ माता-पिता तथा गुरुजनोंको प्रणाम किया। उस समय वे आनन्दके समुद्रमें गोते लगा रही थीं। हर्ष-विह्वल मेना और मोदमग्न हिमालयने पार्वतीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें ऐसा लगा, मानो गये हुए प्राण वापस आ गये हों। पुत्रीको घरमें रखकर गिरिराजने उसके लिये रत्नसिंहासन दिया और शूलपाणि शिव तथा उनके पार्षदगणोंको मधुपर्क आदि दे सहर्ष उनका सत्कार किया। पार्षदोंसहित भगवान् चन्द्रशेखर अपने ससुरालके घरमें रहने लगे। वहाँ प्रतिदिन पत्नीसहित उनकी सोलह उपचारोंसे पूजा होने लगी। राधे ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् शंकरके मङ्गल-परिणयकी कथा कह सुनायी, जो हर्ष बढ़ानेवाली तथा शोकका नाश करनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहती हो ?
(अध्याय ४५-४६)
इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतममुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विज-बालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमशमुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना
श्रीराधिकाने पूछा— जगद्गुरो ! मैंने शूलपाणि शिवके यश तथा दैववश उनके दर्प-भङ्गकी बात सुनी। पार्वतीके गर्वभंजनका और शिव-पार्वतीके विवाहका भी वर्णन सुना। अब इन्द्रके तथा अन्य लोगोंके भी अभिमानके चूर्ण होनेके प्रसङ्गोंको क्रमशः सुनना चाहती हूँ; कृपया विस्तारपूर्वक कहें।
श्रीकृष्ण बोले— सुन्दरि ! इन्द्रके दर्प-भङ्गकी बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह प्रसङ्ग सुन्दर, अनुपम तथा कानोंके लिये अमृतके समान मधुर है। प्राचीन कालकी बात है। इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके समस्त देवताओंके स्वामी तथा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गये। तपस्याके फलसे प्रतिदिन उनके ऐश्वर्यकी वृद्धि होने लगी। बृहस्पतिजीने उन्हें सिद्ध-मन्त्रकी दीक्षा दी। उन्होंने पुष्करमें सौ वर्षोंतक उस महामन्त्रका जप किया। जपसे वह मन्त्र सिद्ध हो गया और इनका मनोरथ पूरा हुआ। मनुष्य सम्पत्तिसे मोहित हुआ ब्रह्मस्वरूपा प्रकृतिका आदर नहीं करता; अतः
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१७
प्रकृतिने इन्द्रको शाप दे दिया। इसीलिये उन्हें
अपने गुरुकी ओरसे भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप
मिला। एक दिन इन्द्र अपनी सभामें बैठे थे।
प्रकृतिके शापसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी;
अतः वे गुरुको आते देखकर भी न तो उठे और
न प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम ही किया। यह देख
बृहस्पतिजी क्रोधसे युक्त हो उस सभामें नहीं
बैठे, उलटे पाँव घर लौट आये। वहाँ भी वे
ताराके निकट नहीं ठहरे, तपस्याके लिये वनमें
चले गये। उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर
कहा—'इन्द्रकी सम्पत्ति चली जाय।' तदनन्तर
इन्द्रको सुबुद्धि प्राप्त हुई और वे बोले—'मेरे
स्वामी यहाँसे कहाँ चले गये।'
यों कहकर वे वेगपूर्वक सिंहासनसे उठे और
ताराके पास गये। वहाँ उन्होंने भक्तिभावसे मस्तक
झुका दोनों हाथ जोड़कर माता ताराको प्रणाम
किया और सारी बातें बतायीं। फिर वे उच्चस्वरसे
बारंबार रोदन करने लगे। पुत्रको रोते देख माता
तारा भी बहुत रोयीं और बोलीं—'बेटा! तू घर
जा। इस समय तुझे गुरुदेवके दर्शन नहीं
होंगे। जब दुर्दिनका अन्त होगा, तभी तुझे गुरुजी
मिलेंगे और उनकी कृपासे पुनः लक्ष्मीकी प्राप्ति
होगी। मूढ़! तेरा अन्तःकरण दूषित है; अतः अब
अपने कर्मोंका फल भोग। दुर्दिनमें अपने गुरुपर
दोषारोपण करता है और अच्छे दिनोंमें अपने-
आपको ही संतुष्ट करनेमें लगा रहता है। (गुरुकी
परवा नहीं करता।) इन्द्र! सुदिन और दुर्दिन ही
सुख और दुःखके कारण हैं।'
यों कहकर पतिव्रता तारादेवी चुप हो गयीं।
तदनन्तर इन्द्र वहाँसे लौट आये और एक दिन
मन्दाकिनीके तटपर स्नानके लिये गये। वहाँ
उन्होंने स्नान करती हुई गौतमपत्नी अहल्याको
देखा। इन्द्रकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने
गौतमका रूप धारण करके अहल्याका शील भङ्ग
कर दिया। इसी बीच गौतमजी भी वहाँ आ गये।
इन्द्रने भयभीत होकर मुनिके चरण पकड़ लिये।
तब गौतमजीने कुपित होकर उनसे कहा।
गौतम बोले—इन्द्र! तुझे धिक्कार है। तू
देवताओंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। कश्यपजीका पुत्र
है; ज्ञानी है और जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीका प्रपौत्र है
तो भी तेरी ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? जिसके
नाना साक्षात् प्रजापति दक्ष हैं और माता पतिव्रता
अदिति देवी हैं, उसका इतना पतन आश्चर्यकी
बात है! तू वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी
कहलाता है; किंतु कर्मसे योनि-लम्पट है; अतः
तेरे शरीरमें एक सहस्र योनियाँ प्रकट हो जायँ ।
पूरे एक वर्षतक तुझे सदा योनिकी ही दुर्गन्ध
प्राप्त होती रहेगी। तत्पश्चात् सूर्यकी आराधना
करनेपर तेरे शरीरकी योनियाँ नेत्रोंके रूपमें
परिणत हो जायँगी। मेरे शाप और गुरुके क्रोधसे
इस समय तू राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो जा। ओ मूढ़!
तेरे गुरु बड़े तेजस्वी और मेरे अत्यन्त प्रेमी बन्धु
हैं। हम दोनों बन्धुओंमें फूट न पड़ जाय; इस
भयसे तेरे गुरुका ही खयाल करके मैंने इस समय
तेरे प्राण नहीं लिये हैं।
तदनन्तर पैरोंमें पड़ी हुई अहल्याको लक्ष्य
करके मुनिवर गौतमने कहा—'प्रिये ! अब तू
वनमें जा अपने शरीरको पत्थर बनाकर चिरकाल-
तक उसी अवस्थामें रह। इस बातको मैं अच्छी
तरह जानता हूँ कि तेरे मनमें कोई कामना नहीं
थी। इन्द्रने स्वयं आसक्त होकर तेरे साथ छल
किया है।'
स्वामीकी ऐसी आज्ञा होनेपर अहल्या बहुत
डर गयी और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती तथा
रोती हुई वनमें चली गयी। साठ हजार वर्षोंतक
कर्मफलका भोग करनेके बाद मुनिप्रिया अहल्या
श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका स्पर्श पाकर तत्काल शुद्ध
हो गयी। फिर वह अत्यन्त सुन्दर रूप धारण
करके गौतमजीके पास गयी। मुनिने सुन्दरी
अहल्याको पाकर प्रसन्नताका अनुभव किया।
| ६१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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सुन्दरि राधिके! अब इन्द्रका उत्तम वृत्तान्त सुनो, जो पुण्यका बीज तथा पापका नाशक है। मैं विस्तारपूर्वक उसका वर्णन करता हूँ। गुरुके कोप और प्रकृतिकी अवहेलनासे वज्रधारी इन्द्रकी विवेक-शक्ति नष्ट हो गयी थी; अतः उनसे एक दिन ब्रह्महत्याका पाप बन गया। गुरुको तो वे छोड़ ही चुके थे; दैवने भी उन्हें अपना ग्रास बनाया। दैत्योंका आक्रमण हुआ और वे उनसे पीड़ित एवं भयभीत हो जगद्गुरु ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन्होंने विश्वरूपको अपना पुरोहित बनाया। दैवसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये इन्द्रने विश्वरूपपर पूरा-पूरा विश्वास कर लिया। विश्वरूपकी माता दैत्यवंशकी कन्या थी; अतः उनके मनमें दैत्योंके प्रति भी पक्षपात था। बुद्धिमान् इन्द्र उनके इस मनोभावको ताड़ गये; अतः उन्होंने अनायास ही तीखे बाण मारकर पुरोहित विश्वरूपका सिर काट लिया। विश्वरूपके पिता त्वष्टाने जब यह बात सुनी तो वे तत्क्षण रोषके वशीभूत हो गये और ‘इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व’ (इन्द्रके शत्रु ! तुम बढ़ो) ऐसा कहकर यज्ञका अनुष्ठान करने लगे, उस यज्ञके कुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर प्रकट हुआ, जिसने अनायास ही समस्त देवताओंको क्रोधपूर्वक कुचल डाला। तब दैत्यमर्दन इन्द्रने महामुनि दधीचिकी हड्डियोंसे अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करके देवकण्टक वृत्रासुरका वध कर डाला। फिर तो इन्द्रपर ब्रह्महत्याने धावा बोल दिया। वे अचेत-से हो रहे थे। ब्रह्महत्या बूढ़ी स्त्रीका वेष धारण करके आयी थी। वह लाल कपड़े पहन रखी थी। उसके शरीरकी ऊँचाई सात ताड़ोंके बराबर थी तथा कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसके दाँत हरिसके समान लंबे थे। उसने इन्द्रको बहुत डरा दिया। वे जब दौड़ते थे तो उनके पीछे-पीछे वह भी दौड़ती थी। ब्रह्महत्या बलिष्ठ थी और इन्द्र अपनी चेतनातक खो बैठे थे। उसका स्वभाव निर्दय था और वह हाथमें तलवार लेकर बड़े वेगसे दौड़ रही थी। उस घोर ब्रह्महत्याको देखकर गुरुके चरणोंका स्मरण करते हुए वे कमलके नालके सूक्ष्म सूत्रके सहारे मानसरोवरमें प्रविष्ट हो गये। ब्रह्महत्या ब्रह्माजीके शापके कारण वहाँ पहुँचनेमें असमर्थ थी; अतः सरोवरके तटके निकट बरगदकी एक शाखापर जा बैठी। उन दिनों राजा नहुष इन्द्रकी जगह त्रिभुवनके स्वामी बनाये गये। नहुष बलिष्ठ थे और देवता दुर्बल। अतः इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए नहुषने देवताओंसे यह माँग की कि इन्द्राणी शची मुझ इन्द्रकी सेवाके लिये उपस्थित हों। यह समाचार सुनकर शचीको बड़ा भय हुआ। वे तारादेवीकी शरणमें गयीं। ताराने अपने पतिको बहुत फटकारा और शिष्य-पत्नीकी रक्षा की। तब शचीको आश्वासन दे गुरु बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक मानसरोवरको गये और वहाँ कातर एवं अचेत हुए देवेन्द्रको सम्बोधित करके बोले।
बृहस्पतिने कहा— बेटा! उठो, उठो। मेरे रहते हुए तुम्हें क्या भय हो सकता है? मैं तुम्हारा स्वामी एवं गुरु हूँ। मेरे स्वरसे ही मुझे पहचानो और भय छोड़ो।
बृहस्पतिके स्वरको पहचानकर सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी इन्द्रने सूक्ष्म रूपको त्याग अपना रूप धारण कर लिया और तत्काल उठकर वेगपूर्वक उन सूर्यतुल्य तेजस्वी गुरुको देखा और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। गुरुजी उस समय प्रसन्न थे और क्रोधका परित्याग कर चुके थे। पैरोंमें पड़कर भयविह्वल हो रोते हुए इन्द्रको खींचकर उन्होंने प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया और स्वयं भी प्रेमाकुल होकर रो पड़े! बृहस्पतिजीको संतुष्ट तथा रोते देख देवेश्वर इन्द्रका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। भक्तिभावसे उनका मस्तक झुक गया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।