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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५

सर्ग ९] यात्राकाण्डम् २०५

ददौ जनकनन्दिन्यै पार्वती तोषपूरिता। ततः शम्भुस्तदा प्राह राघव पूज्य वैभवैः ॥१८॥
राम त्वन्नाभिकमले ब्रह्माऽभूच्चतुराननः। ततो जातो विषंश्चाहं रुदनाद्रुद्रसंज्ञकः ॥१९॥
पौत्रस्तव रघूश्रेष्ठ तवाज्ञापरिपालकः। संहारः क्रियते राम आज्ञया तव चादरात् ॥२०॥
यदा मया तु प्रलये तदा शापं क्व ते मनम्। यत्प्रशस्यवधाच्चापि स्तीर्णश्चाश्वारथां करोषि हि। २१।
क्रीडेयं तव राजेन्द्र सुखं कांडस्व सीतया। क्रियत लोकाङ्गुष्ठार्थे जानामि तव चेष्टितम् ॥२२॥
एवं नानाविधैस्तस्य चारित्रैर्गह्वरस्य राघवम्। ददौ सिंहासनं छत्रं चामरे चंपकप्रभम् ॥२३॥
पानपात्रं भोजनस्य पात्रं ह्येवं मनोरमम्। कण्ठे कुण्डले बाहुभूषणे मुकुटोत्तमम् ॥२४॥
राम प्रस्थापयामास बद्धात्वा चिन्तामणिं हृदि। हृदि चिन्तामणिं दृष्ट्वा राघवस्य विदेहजा ॥२५॥
प्राहातिलज्जिता रामं गौर्ये चिन्तामणिस्तव। तथेति राघवोऽप्युक्त्वा विमानेन जनैः सह ।२६।
ययौ नत्वा शङ्करं हि कृत्वा यज्ञाधेश्चचनात्। आकाशे विम्वारुह्य विधिं मार्गेकेनाभवत् हि ।२७।
भागीरथ्यास्तटेनैव हरिद्वारं ययौ जवात्। कुरुक्षेत्रं विगाद्याथ इन्द्रप्रस्थं ततो ययौ ॥२८॥
दृष्ट्वा मधुवनं रम्यं ययौ वृन्दावनं ततः। गोकुलं वीक्ष्य रामस्तु गोवर्धनमगाच्छनैः ॥२९॥
गत्वाऽथावन्तिकां पुण्यां क्षिप्रातीरेविराजिताम्। महाकाल पुरस्कृत्य पश्यंस्तीर्थान्यनेकशः ॥३०॥
दृष्ट्वा गजद्वयं क्षेत्रं सागरं कूपमेव च। ययौ स नैमिषारण्ये गोमत्यां स विगाह्य च ॥३१॥
सूतं पौराणिकं दृष्ट्वा शौनकादीन् प्रपूज्य च। स्नात्वा तद्रत्नतीर्थेऽसौ रघूत्तमः ॥३२॥
तमसां तां विगाद्याथ ददर्श नगरीं निजाम्। रम्यामागतमाज्ञाय सुमंत्रो वेगवत्तरः ॥३३॥

दो कर्णफूल, दो सुन्दर चूड़िएं, छाट-छाट घुंघरुवाले शब्दसे युक्त करधनी, चन्द्रमाके समान कान्ति-
मान दो सीमन्तभूषण और मणि तथा मोतियोंके हार भी दिये । पश्चात् शिवजीने भी अनेक विधियोंसे
रामका पूजन करके उनसे प्रश्न किया ॥ १८-१९॥ हे राम ! आपके नाभिकमलसे चतुरानन ब्रह्मा हुए।
उन ब्रह्मासे मैं पैदा हुआ और रोदन करनेके कारण मेरा नाम रुद्र पड़ा ॥ १९ ॥ हे रघुनाथ ! इस प्रकार मैं आप-
का पौत्र हुआ। हे राम ! आपकी आज्ञाका पालन करते हुए आपके सांकेतिक अनुमार मैं प्रलयकालमें तीनों
लोकोंका संहार करता हूँ । तब क्या यह पाप आपका नहीं लगता, जो आज आप साक्षात्परब्रह्म होकर
भी रावणवधरूप ब्रह्महत्यारूपी लोकापवादके भयसे प्रायश्चित्तरूपी अश्वमेध यज्ञ करते हैं ? ॥ २० । २१ ॥ अथवा ठीक ही
है, मैं समझ गया। हे प्रभो ! आप यह सब लोकशिक्षाके लिये क्रीड़ा मात्र कर रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप धन्य
हैं! सीताके सहित क्रीड़ा करें। लोकमर्यादाको स्थापित करनेके अतिरिक्त और कुछ भी आपकी क्रीड़ाका प्रयो-
जन नहीं है ॥ २२ ॥ इस प्रकार अनेक रामचरित्रोंका थोराभका स्तुति करनेके बाद शिवजीने उन्हें सिंहासन,
एक छत्र, दो चमर, एक उत्तम शय्या, पानका डिब्बा, भोजन करनेके लिये सुन्दर सोनेका थाल, कंकण, कुण्डल,
बाहे और मुकुट दिये ॥ २३।२४ ॥ तदनन्तर रामने गलय चिन्तामणि बाँधकर उन्हें विदा किया। सीताने रामके
हृदयपर चिन्तामणि देखकर उनसे कुछ लज्जापूर्वक कहा- अच्य, यह चिन्तामणि आपका रही
और यह कामधेनु मेरी । श्रीराम भी 'बहुत अच्छा' कहकर वहांसे सब लोगोंके साथ विमानपर सवार हो शंकर
भगवान्‌को नमस्कार करके चल दिये । चलते समय वे शंकर भगवान्‌को भावी यज्ञकी सूचना देत गये। ब्रह्माका
भी एक मासके बाद होनेवाले यज्ञमें अयोध्या आनेके लिए कहा ॥ २४-२७॥ वहाँसे भागीरथीके किनारे-
किनारे हरिद्वार गये । वहाँसे शीघ्र ही कुरुक्षेत्रमें स्नान करके इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) गये ॥ २८ ॥ यहाँसे मनोहर
मधुपुरीपुरी देखकर वृन्दावन पधारे । गोकुल देखकर वे गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ २९ ॥ बादमें क्षिप्रा नदीके
परम पवित्र अवन्तिका (उज्जैन) नगरीको गये, जो कि क्षिप्रा नदीके किनारेपर विद्यमान है। वहाँ महा-
कालेश्वरका दर्शन-पूजन करके अनेक शुभ तीर्थ देखते हुए गजद्वय (हस्तिनापुर) क्षेत्र तथा सागर कूपको
देखे। पश्चात् नैमिषारण्य गये। वहाँ गोमतीमें स्नान किया ॥ ३० ॥ ३१ । फिर पौराणिक सूतका दर्शन करके

२०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


अयोध्यां धूपयामास प्रोच्छ्रितानांविधध्वजैः। तोरणैश्च पताकाभिः पुष्पहारैर्मनोरमैः ॥३४॥
शोधयित्वा राजमार्गांन् सेचयित्वा तु चन्दनैः । विकीर्णकुसुमं दैव्यैर्बलिदीपैर्विराजितान् ॥३५॥
वप्रणेंद्रं पुरस्कृत्य सेनया परिवेष्टितः । प्रत्युज्जगाम राजेंद्रं पुष्पकस्थं त्वरान्वितः । ३६ ।
दण्डवत्प्रणिपत्याथ दत्त्वा चोपायनानि तन् । आलिङ्गितो राघवेण मेने स कृतकृत्यताम् ।३७।
ततो वाद्यनिनादैश्च नर्तनैर्वारयोषिताम् । वेदघोषैर्द्विजानां च रामतीर्थं ययौ शनैः ॥३८॥
स्नात्वा तन्मग्ग्नयोये यत्न तीर्थे सुपपुण्यदम् । स्वयमेव कृतं पूर्वं नित्यकर्मार्थमादरात् ॥३९॥
वसिष्ठोक्तविधानेन कृत्वा चैकमुपोषणम् । दधिश्राद्धं विधायाथ दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥४० ।
तृतीये दिवसे रामो विमानेन विहायसा । पुर्यां विलोक्य प्राकारम् हेमरत्नविनिर्मितान् ॥४१ ।
अयोध्यां शोभितां रम्यां गोपुराट्टालमंडिताम् । वीथीहट्टप्रभायुक्तां चतुष्पथविराजिताम् ॥४२॥
पश्यन् स्वकीयं राजसभाद्वारं प्राप रघूत्तमः । यानं भूमंडल प्राप्य सुखमासीत्स्थिरं तदा ॥४३॥
ततः सुमंत्रपत्नीभिर्दध्योदनविनिर्मिताः । बलयः कांस्यपात्रस्था जलनैर्घटास्तथा ॥४४॥
सीताराघवयोर्देहादुत्तार्य घृतकम्बदा । नीत्वा व्यक्त्वा विदूरे तु स्नात्वा रामगृहं ययुः ॥४५॥
ततो रामो विमानाऽथादवरुह्य स बन्धुभिः । नागरैर्नरभूपैर्नृपतिभिः सभायां सविवेश ह ॥४६॥
तस्थौ सिंहासने रम्येचिन्तामणिविराजितः । तस्यूर्नृपाः सभायां श्रीराघवेणातिमानिताः ॥४७॥
सीताऽपि निजगेह सा विचित्ररत्ननिर्मितम् । कामधेनुं पुरस्कृत्य प्रविष्टज्ञातिहर्षिता ॥४८॥
ततो रामः कामधेनुप्रभूनैस्तपस्तितैः । परमान्नैः षड्रसेश्च भोजयामास भूसुरान् ॥४९॥


शौनकादि ऋषियोंका पूजन और वह्नितीर्थ नामके सरोवरमें स्नान किया ॥ ३२ । तमसा नदीमें अवगाहन करके राम अपनी नगरीको चल पड़े। उधर श्रीरामको आते सुनकर सुमंत्रने झटपट अनेक प्रकारकी बड़ी बड़ी पताकाओं तथा ध्वजाओंसे अयोध्या नगरीको सजवा दिया। अनेक तोरण बँधवा दिये । ३३ ॥ ३४ ॥ राजमार्गोंको साफ कराकर चन्दनके जलसे छिड़काव करा दिया। उनपर दिव्य और नाना रंगके फल बिछवा दिये । जगह-जगह चौराहोंपर दीपक तथा पूजाकी सामग्री रखवा दी । ३५ । पश्चात् सुमन्त्रजी बाणेन्द्र (हाथी) को आगे करके सेनासहित स्वयं पुष्पकस्थित राजा रामकी अगवानी करने गये ॥ ३६ । उन्होंने उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके अनेक उपहार दिये। बादमे मंत्री सुमंत्र रामसे आलिङ्गित होकर अपने आपको कृतकृत्य समझने लगे ॥ ३७। तदनन्तर बाजे-गाजे करांगनाओंके नृत्य तथा ब्राह्मणोंके वेदघोषके साथ राम धीरे-धीरे रामतीर्थपर गये ॥३८ वहाँ जाकर उन्होंने सरयूके जलमें स्नान किया। वह बड़ा पवित्र तथा उत्तम तीर्थ स्वयं रामके ही नित्यकर्मके लिये निर्मित हुआ था ॥ ३९ ॥ वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके कथनानुसार विधिवत् एक उपवास किया, दधिश्राद्ध किया तथा अनेक दान दिये ॥ ४० ॥ तीसरे दिन श्रीराम विमानके द्वारा आकाशमार्गसे नगरके सुवर्णनिर्मित प्राकारोंको देखकर पुरद्वार तथा सुन्दर अटारियोंसे सुशोभित मनोहारिणी अयोध्यामें पधारे। जो गलियों, सड़कों, बाजारों तथा चौराहोंसे बढ़ी ही भली लग रही थी ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ बहुत दिनों बाद आज उन्हें अपनी राजसभाके द्वारका दर्शन प्राप्त हुआ। वहाँ आकर वे यानपरसे उतर पड़े। विमान भी भूतलपर उतरकर सुखपूर्वक खड़ा हो गया ॥ ४३ ॥ तब सुमंत्रकी स्त्रियें दधि-ओदन-से युक्त काँसेके पात्रमें रक्खी हुई बलिर्ग तथा जल-तेलसे पूर्ण सैकड़ों घट सीता तथा रामके देहपरसे उतार तथा दूर ले जाकर छोड़ आयीं और स्नान करके रामके महलमें गयीं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ श्रीराम भी विमानपरसे उतरनेके बाद नागरिकों तथा अन्य राजाओंके साथ सभाभवनमें पधारे ॥ ४६ ॥ चिन्तामणिसे सुशोभित होनेवाले राम सिंहासनपर जा विराजे तथा उनसे सम्मानित होकर अन्य राजे भी यथास्थान बैठ गये ॥ ४७ ॥ महारानी सीता भी कामधेनुको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चित्र-विचित्र रत्नोंसे निर्मित अपने महलमें गयीं ॥ ४८ ॥ पश्चात् श्रीरामने कामधेनुसे प्राप्त घृतसे निर्मित षड्समय उत्तम पक्वानों द्वारा

सर्गः ९ ] यात्राकाण्डम् २०७


अचाण्डालांस्तर्पयित्वा स्वयं कृत्वाऽशनं तदा ।
निद्रार्थं नृपतीन् याने स्थलमाज्ञापयत्तदा ॥ ५० ॥

पञ्चरात्रं नृपान् प्रीत्या स्थापयित्वा स्ववेश्मनि ।
वस्त्रालङ्कारतुष्टैस्तोष्ययित्वा भटैस्ततम् ॥ ५१ ॥

तान् प्रोवाच रमानाथः प्रवृद्धकलशपुरान् ।
मम यज्ञानुगं दृष्ट्वा सन्तृप्तैर्गोः पुनः ॥ ५२ ॥

आगन्तव्यं जनपदैः स्वसैन्यैर्नागरैः सह ।
इत्यज्ञां नृपतीगम्य संगीकृत्य नृपोत्तमाः ॥

ययुः स्वं स्वं पुरं देशं स्वबलैः परिवेष्टिताः ॥ ५३ ॥

सुग्रीवाद्यान्वानरांश्च परिवारसमन्वितान्
आज्ञापयित्वा नद्यानि स्थापयामास स्वानिके ॥ ५४ ॥

राजिमेधानन्तरं हि प्रेषयिष्याम्ब्यहं त्विति ।
अतो दुन्दुभिनिर्घोषं स्वपुर्यां घोषयत्तदा ॥ ५५ ॥

मन्नारम्य जनैः सर्वैरयोग्यमानगर्गस्खिनैः ।
यैः कैश्चिदत्र पथिकैर्भिक्षापार्कर्न युज्यताम् ॥ ५६ ॥

यावत्कण्डम्यहं भूम्यां राज्यं सीतासमन्वितः ।
निजगार्हस्थ्यमालम्ब्य ये वर्तन्ते नरोत्तमाः ॥ ५७ ॥

ते कुर्वन्तु सुखं पार्क स्वस्वगेहेषु भक्तितः
निबंधो मम न ह्येयो वर्तितव्य यथासुखम् ॥ ५८ ॥

इत्याज्ञाप्य जनान् रामः सुखं तस्थौ त सीतया ।
अयोध्यायां तु सर्वत्र वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ५९ ॥

मङ्गलानि समुत्साहा नर्तनं वारयोषिताम् ।
बभूवुश्च पुराणानि कीर्तनानि हरेः कथाः ॥ ६० ॥

एवमासीत्सुसंतुष्टा साकेतनगरी शुभा ।
एवं प्रोक्तं मया शिष्य यत्राकाण्डमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥

ये शृण्वंति नरा भक्त्या तेषां यात्राफलं भवेत् ।
यात्रार्थनार्थनोयोगे यात्राकाण्डमिदं वरम् ॥ ६२ ॥

पठित्वा ये तु गच्छंति सुखनायांति ते गृहम् ।
ब्रह्महत्यादिपापानि कृतानि भनवैः सकृद् ॥ ६३ ॥

यात्राकाडमिदं जप्त्वा शुद्धिस्तेभ्यो भविष्यति ।
सर्वतीर्थावगाहेन यत्फलं परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥

यात्राकाण्डमिदं श्रुत्वा तत्फलं प्रतिपद्यते ।
धनार्थी धनमाप्नोति कामी कामानवाप्नुयात् ॥ ६५ ॥


ब्राह्मणोंसे लेकर चाण्डाल तकको यथोचित भोजन कराके तृप्त किया । बादम राजाओक हाथ स्वयं भोजन करके राजाओको अपनेपने विश्रामके तथा अन्यान्य महलोंमे जानेकी आज्ञा दी ॥ ५० ॥ इस प्रकार पाँच दिन तक उन लोगोंको बड़े ही प्रेम तथा सत्कारसे रामने अपने भवनमें रक्खा । बादम वस्त्र, अलंकार तथा अश्व आदि दे और उन्हें भलीभाँति प्रसन्न करके अपने-अपने स्थानको आनकी आज्ञा दी । जब वे हाथ जोड़कर जानेके लिए सम्मुख खड़े हुए, तब रमानाथ रामने फिरसे उन यज्ञके मुख्यमुख्यगणपर मस्तक संभूत अश्वके पीछे-पीछे चलनेके लिए ससैन्य और प्रजा सहित आनिक लिये कहा । वे उन इस आज्ञाक स्वीकार करक अपनी-अपनी सेन के साथ अपने-अपन देश तथा नगरकी ओर चल दिये । परिवार सहित सुग्रीव आदि वानरोको रहनेके वास्ते बहुतसे भवन देकर अरने यहाँ रक्खा और कहा कि अश्वमेध यज्ञके पश्चात् तुम लोगोंको विदा करेंगे। बादमें श्रीरामने अपने नगरमें डिंडोरा पिटवाकर कहला दिया कि आजसे लेकर मेरे नगरवासियों तथा अन्य यान्नी लोगोको अल्य भोजन बनाकर नहीं खाना चाहिये। सब लोग तबतक हमारे भोजनालयम भोजन करें, जब तक कि मै भूमिपर राज्य करूँ । हाँ, जो गृहस्थाश्रमी हों, वे भले ही अपने-अपने घरोंमें भक्तिपूर्वक सुखसे भोजन बनाएँ । उनके लिय मेरा आग्रह नहीं है। ५१-५८ ॥ यह आज्ञा देकर राम सीताके साथ सुख-पूर्वक रहने लगे । तबसे अयोध्या नगरीमे घर-घर वेदध्वनि होने लगी । ५९॥ मङ्गलगान होने लगे, सोत्साह वारंगनाओंका नृत्य होने लगा तथा पुराणपाठ और हरिकथाएं होने लगीं ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह समस्त पुरी आनन्दित हो उठी । हे शिष्य मैंने तुमको भली भाँति उत्तम यात्राकांड सुनाया ॥ ६१ ॥ जो मनुष्य इस यात्रा-काण्डको भक्तिपूर्वक श्रवण करेगा, उसे समस्त यात्रायें करनेका फल प्राप्त होगा। यदि मनुष्य यात्रामे जानेके समय अथवा धन कमानेके लिये जाते समय इसको सुनकर जाय तो वह सुखपूर्वक और कृतार्थ होकर लौटेगा। यदि मनुष्यने ब्रह्महत्यादि जैसे घोर पाप किये हों तो वे भी इसकी मुजन्स दूर हो जाते हैं और प्राणी शुद्ध हो जाता है। सब तीर्थोंकी यात्रा करनेसे जो फल होता है, वह इस यात्राकाण्डको पढ़ने तथा सुननेसे प्राप्त हो जाता है । धनकी इच्छावालेको धन और कामकी इच्छावालेको काम मिलता है ॥ ६२-६५ ॥ इस

२०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


पापी पूतो भवेत्सद्यो यात्राकाण्डश्रवादिना । यः कश्चित्प्रातरुत्थाय कृतशौचविधिर्नरः ॥ ६६ ॥
तीर्थांशं च वरं काण्डमिदं पुण्यं पठिष्यति । तस्य रामश्च संतुष्टः पूरयिष्यति वांछितम् ॥ ६७ ॥
सर्वतीर्थावगाहस्य फल तस्य भवेद्ध्रुवम् । यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च ॥ ६८ ॥
तानि सर्वाणि नश्यन्ति यात्राकाण्डश्रवादिना ॥ ६९ ॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे
रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥

यात्राकांडे च सर्गा वै नव प्रोक्ता मनीषिभिः ।
पंचत्रिंशोत्तराः सप्तशतश्लोका भवापहाः ॥ १ ॥


कांडको सुननेसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है । जो प्राणी प्रातःकाल उठ तथा स्नानादि करके इस पवित्र यात्राकाण्डको पढ़ेगा तो श्रीरामकी अनुकम्पासे उसके सब मनोरथ पूरे होंगे ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उसे सब तीर्थोंकी यात्राका फल मिलेगा जन्म-जन्मान्तरके जो कुछ पाप होंगे वे सब इस यात्राकाण्डको सुननेसे अवश्य नष्ट हो जायेंगे ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकांडे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामोत्तरयात्रा-नगरप्रवेशो नाम नवमः सर्गः ॥ ६ ॥

इस यात्राकांडमें नौ सर्ग और भवभयको दूर करनेवाले ७३५ सात सौ पैंतीस श्लोक कहे गये हैं ॥ १ ॥

* इति श्रीमदानन्दरामायणे यात्राकाण्डं समाप्तम् *

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु

श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम्

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्

यागकाण्डम्

प्रथमः सर्गः

(अश्वमेध यज्ञके लिए सामग्री एकत्र करनेका निर्देश)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः सभाध्ये एकदा गुरुमब्रवीत् । कुम्भोदरमुनेर्वाक्यात्तीर्थयात्रा मया कृता ॥ १ ॥
इदानीं तस्य वाक्येन वाजिमेधं करोम्यहम् । यज्ञोपकरणानि त्वं लक्ष्मणाय वदस्व हि ॥ २ ॥
सुमुहूर्ते शुभे लग्ने श्यामकर्णस्त्रिपुच्छकः । तुरङ्गो दिव्यवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा विमुच्यताम् ॥ ३ ॥
पृथ्वीप्रदक्षिणार्थं हि तत्पृष्ठेऽयुतसंख्यया । सेनया सह शत्रुघ्नः सुमंत्रेण महाद्युतिः ॥ ४ ॥
तद्राघववचं श्रुत्वा वसिष्ठो मुनिसत्तमः । ज्योतिर्विद्भिःसहितो दृष्ट्वा सुमुहूर्तं शुभोदयम् ॥ ५ ॥
आज्ञापयत्स सौमित्रिं सभायां राजसन्निधौ । सौमित्रेऽद्यदिनात्सप्तमेऽह्नो मुहूर्त्तः सप्तमेऽहनि ॥ ६ ॥
दीक्षार्थं रामचन्द्रस्य वाजिमेधाख्यकर्मणि । रामतीर्थे यज्ञभूमिः शोधनीया हलादिभिः ॥ ७ ॥
सुवर्णनिर्मितैर्दिव्यैर्ब्राह्मणैः सह सत्वरम् । दशक्रोशमिताऽयोध्याबहिः सर्वत्र लक्ष्मण ॥ ८ ॥
समा कंकरहीना तु लिप्ता चन्दनजातिभिः । मण्डपश्च विधातव्यः सर्वदोषखण्डितः शुभः ॥ ९ ॥


श्रीरामदासने कहा इसके अनन्तर एक दिन सभामें रामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठसे कहने लगे—हे गुरो ! कुम्भोदर ऋषिके कथनानुसार मैंने तीर्थयात्रा की । अब उन्हींकी बातसे मैं अश्वमेध यज्ञ भी करना चाहता हूँ । यज्ञकी जो-जो आवश्यक वस्तुएँ हों, कृपया आप लक्ष्मणको बतला दीजिए ॥ १ ॥ २ ॥ किसी अच्छे मुहूर्त और शुभ लग्नमें श्याम रङ्गवाले जिसके कान, पैर और पूँछ हों, ऐसे घोड़ेको सुन्दर वस्त्रों और आभूषणोंसे सुसज्जित करके पृथ्वीप्रदक्षिणाके लिए छोड़ा जाय ॥ ३ ॥ तदनन्तर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए दस हजार सेनाके साथ सुमन्त्र और शत्रुघ्न प्रस्थान करें ॥ ४ ॥ रामचन्द्रजी की इन बातोंको सुनकर वसिष्ठजीने ज्योतिषियोंके साथ अच्छे लग्न तथा अच्छे नक्षत्रसे संयुक्त एक बढ़िया मुहूर्त देखा और सभामें ही रामचन्द्रजीके सामने लक्ष्मणजीसे बोले—हे लक्ष्मण ! रामचन्द्रके यज्ञकी दीक्षा लेनेका शुभ मुहूर्त आजसे ठीक सातवें दिन है ॥ ५ ॥ ६ ॥ सबसे पहला काम यह है कि इस अश्वमेध यज्ञके लिए रामतीर्थकी भूमि सुवर्णके बने हुए हलों द्वारा ब्राह्मणोंके साथ जोतकर शुद्ध की जाय । अयोध्याके चारों ओर दस कोस तककी जमीन पटवाकर बराबर कर दी जाय और ऐसी साफ की जाय कि उसमे कहीं कुछ भी कङ्कड़-पत्थर न रहने

२१० आनन्दरामायणे [ सर्गः १

जम्बाम्रादिद्रुमाणां च शाखाभिः कुसुमैरपि । पल्लवैश्च विचित्रैश्च कदलीस्तम्भमण्डितः ॥१०॥
समन्तस्तोरणानि बन्धनीयानि यत्नतः । पुष्पहाराः फलादीनां मालाश्च विविधाः शुभाः ॥११॥
वेद्यः सहस्रशः कार्याः सुधया चेटकादिभिः । करणीयं महत्कुण्डं सप्ताब्धिध्येन मृन्मयम् ॥१२॥
इंटोपरि महत् कार्यं गोमुखं च मनोरमम् । खदिरस्य विचित्रं हि वसोर्धारार्थमुत्तमम् ॥१३॥
सितरक्तासिनेश्चैत्र नीलपीतादिभिः शुभैः । नानावर्षदचूर्णैश्च रूपधातुविनिर्मितैः ॥१४।
नानावर्णैर्विलेख्यानि स्वस्तिकानि समन्ततः । कमलानि विचित्राणि तथा चाष्टदलानि च ।१५।
शङ्खचक्रगदापद्मवल्ल्यश्च सहस्रशः । कुसुमानि विचित्राणि यज्ञभूम्यां समन्ततः ॥१६॥
चतुर्विंशत्युच्छ्राः कार्या यत्नस्तम्भा महोच्छ्रिताः । विनिर्मिताः सुवर्णेन मुक्ताहारविगुम्फिताः ॥१७॥
त्रितयं सर्वतोभद्रं कुण्डमध्येऽष्टदैवतम् । लेखनीयं तथा कुडं नानावर्णैर्विचित्रितम् ॥१८।
दूत कार्याणि पात्राणि यज्ञार्थं मम पश्यतः । हैमाः किलोपकरणा वरुणस्य यथाऽध्वरे ॥१९।
आसनानि शूर्याणां च निद्रार्थं च सहस्रशः । वासोगेहानि कार्याणि तृणैः पर्णैश्च खर्परैः ॥२०॥
पाकशाला विधातव्या कार्या शालाऽन्ननस्य च । ऋषिशाला विधातव्याः स्त्रीशालाश्च शुभावहाः ॥२१।
यज्ञोपकरणानां च शाला परमसुन्दरी । सभाः कार्या नृपाणां च वस्त्ररत्नैर्विचित्रिताः ॥२२।
आसनार्थं महार्हाणि वस्त्राणि च समन्ततः । आस्तीर्याणि तथा राज्ञामुपशाखाश्रयाणि च ॥२३॥
पक्षिपिछैः सुकार्पासभेदैः सम्पूरितानि हि । कश्चिदुपबर्हणानि विचित्राणि महान्ति च ॥२४।
स्थापनीयानि सदसि महार्हाणि तु लक्ष्मण । स्थापनीयानि पानार्थं पात्राणि विविधानि च ॥२५।
नानारसैः पूरितानि तथा पक्वफलादिभिः । नानासुगन्धद्रव्यैश्च रागैर्नानाविधैरपि ।२६।

पायें । फिर केशर-चन्दन से लीपकर वह भूमि पवित्र करनी होगी । उस भूमिपर ऐसे मण्डप बनाये जायें, जो सुन्दर हों और कहींसे कटे-फटे न हों ॥ ७-९ ॥ जामुन-आम आदि वृक्षोंकी शाखाओं तथा फूलों-पत्तोंसे खूब अच्छी तरह सजाकर केलके खम्भोंके फाटक बनाये जायें और मण्डपके चारों ओर फूलों और फलोंकी मालाएं लटकाई जायें ॥ १० ॥ ११ ॥ मण्डपके भीतर ईंट और चूनेकी पक्की जोड़ाई करके एक हजार वेदियां बनवायी जायें । वहीं ही मिट्टीका एक बड़ा भारी कुण्ड बनाया जाय । लेकिन वह मे अपने सामने बनवाऊंगा । कुण्डके ऊपर खैरकी लकड़ीका एक सुन्दर गोमुख बनाया जाय, जो वसोर्धाराके कामम आयेगा । सफेद लाल, काले, नीले और पीले पत्थरोंका चूर्ण तथा उपधातु (गेरू-मंचक आदि) के चूर्णसे जगह-जगह रङ्ग-बिरङ्गे स्वस्तिक लिखे जायें और अष्टदल कमल बनाये जायें ॥ १२-१५ ॥ जहां तहां शंख चक्र, गदा पद्म तथा फूल-पत्तियोंकी चित्रकारी की जाय ॥ १६ ॥ सोनेके चौबीस यज्ञस्तम्भ बनाये जायें, जो खूब ऊँचे हों और उनपर मोती-माणिक आदिका काम किया गया हो । कुण्डके पास अष्टदेवताके निर्मित सर्वतोभद्र बनाया जाय और वेदीके चारों ओर अच्छे-अच्छे चित्र बनाये जायें । यज्ञके लिए जितने पात्रोंकी आवश्यकता होगी, वे सब मेरे सामने बनाये जायेंगे । प्रायः वे सब पात्र सोनेके होंगे, जैसे वरुणदेवके यज्ञम थे ॥ १७-१९ । ब्राह्मणोंको बैठने और सोनेके लिए उनके, कपडोंके अथवा छप्परोंके हजार घर तैयार करने होंगे ॥ २० ॥ मण्डपकी एक ओर पाकशाला ( रसोईघर ) रहेगी, दूसरी ओर अशनशाला ( भोजनभवन ), तीसरी ओर ऋषि-शाला ( मुनियोंके ठहरनेकी जगह ) और एक ओर सुन्दर स्त्रीशाला ( स्त्रियोंके रहनेकी जगह ) बनेगी ॥ २१ । एक बड़ा सा और सुन्दर मकान यज्ञकी सब सामग्रियें रखनेके लिए बनेगा । अच्छे-अच्छे कपड़ोंसे सजाकर राजाओंके लिए कई महफ़िलें बनायी जायेंगी । बैठनेके लिए बढ़िया बढ़िया कालीन-गलीचे आदि मँगाकर बिछाये जायेंगे । पक्षियोंके पखों या रूईसे भरी कितनी ही सुन्दर तकियें राजाओंको लगानेके लिए रक्खी जायेंगी । सबको जल पीनेके लिए विविध प्रकारके पात्र रक्खे जायेंगे ॥ २२-२४ ॥ सभामवनमें जल पीनेके लिए सुन्दर तथा बहुमूल्य बर्तन रक्खे जायेंगे । कितने ही पके हुए फलोंके शरबतसे भरे

सर्गः १ ] उत्तरकाण्डम् २११


मदैर्विचित्रैर्मधुरैस्तथा मादकवस्तुभिः । नानासुगंधतैलेश्च काचकुम्भाः सहस्रशः ॥२७॥
स्थापनीयाश्चन्दनैश्च सुगंधैर्गन्धवादिभिः नानोपकरणैर्युक्तानां ताम्बूलानां सहस्रशः ॥२८॥
स्थापनीयानि पात्राणि चामराणि सहस्रशः । व्यंजनानि विचित्राणि तथाऽऽदर्शा विचित्रिताः ॥२९॥
स्थापनीयाश्च क्रीडार्थं क्रीडोपकल्पणानि च । स्थापनीयानि महत्सु नृपाणां चित्राणि च ॥३०॥
मृत्पात्रसम्भराः कार्याः शतशः पुष्पवाटिकाः । जलप्रणालि कार्याणि सर्वत्र विविधानि च ॥३१॥
नानाविवित्रवर्णानां वयसां पंजराः शुभाः । हेमचूर्णमणिक्लैश्च प्रवालैर्नामरत्नैश्च ॥३२॥
कमनीयाश्च भूषास्तैस्तोषणाद्यैः प्रपूरिताः । वधनीया मंडपेषु नर्तितव्योऽप्सरोगणैः ॥३३॥
धूपयंतु सुधूपैश्च सुगायतु हि गायकाः । वादनीयानि वाद्यानि बहूनि विविधानि च ॥३४॥
पूजोपकरणाद्यैश्च शस्त्राणि संस्थितानि हि । पृथक् पृथक् मञ्चांश्चैव स्थापनीयानि लक्ष्मणः ३५॥
तथा ऋषिसभार्या तु दभांश्च समिधस्तथा । दण्डाः कमण्डलुयुताः स्थापनीयाः सहस्रशः ॥३६॥
परिधायांथ कौपीनान् वल्कलाश्चाजिनानि च । पूजाद्रव्याणि हव्यानि जलकुम्भाः सहस्रशः ॥३७॥
शौचार्थे मृत्तिकाः शुद्धा दंतकाष्ठानि पादुकाः । रोविष्ट मुखशुद्ध्यर्थे नानावस्तूनि कल्पप ॥३८॥
तथा नरासभार्या तु पूजकत्राण्यनेकशः । सौभाग्याद्रव्यरत्नानि सुगंधैः पूजितान्यपि ॥३९॥
वायनान् विचित्राणि स्थापजाय नि लक्ष्मण । कतर्यः कज्जाना च पात्राणि कुंकुमानि च ॥४०॥
करउस्थानि रम्याणि भूषणान्युज्ज्वलानि च । हरिद्रादीनि वस्तूनि कञ्चुक्यो वसनानि च ॥४१॥
धारनीयानि व्यञ्जनचमरादीनि सादयम् । सहृदा लेखनीणानि पत्राणि च सभामतः ॥४२॥


के सह कडाव वहाँ उपस्थित रहें। अनेक प्रकारके इत्र, गुलाबजल, केवड़ाजल, कस्तूरी और केसरका चन्दन सबको लगानेके लिए तैयार रहना चाहिए ॥२५, २६। विविध प्रकारके स्वादिष्ट मद्य तथा अनेक मदकर वस्तुएं जुटाई जायें। बहुत किस्मके सुगन्धित तेलोंसे भरे हुए काँचके हजारों घड़े सदा तैयार रहें। बहुतसे बर्तनोंमें सुगन्धित चन्दन और अत्तर रक्खे रहें। विविध सामग्रियोंके साथ हजारों ताम्बूलोंके थालके बीड़े लगा-लगाकर रक्खे जायें ॥२७॥२८॥ हजारों चँवर हाँकनेके लिए मँगा लेने चाहिये। स्नानके लिए तरह तरहके पक्वान्न सर्वथा तैयार रहें। मुँह देखनेके लिए अच्छे अच्छे दर्पण मँगवा लिये जायें खेलनेके लिए जितनी भी सामग्रियां हो सकें मँगवाकर रख ली जावें। देश विदेशके राजाओंके चित्र मँगवाकर सभाभवनमें आगे और टाँग दिये जावें ॥२९॥३०॥ बहुतसे फूलोंके गमले मँगवाकर वहाँ-पर रक्खे जावें। छोटी-छोटी दूरपर हजारों फौहारे बनाये जायें, जिनसे सदा जलकी धारा बहता रहे तोता, पोले, हरे तथा मैनादि आदि सुहावने पक्षियोंके पिंजड़े लाकर मण्डपमें चारों ओर लटका दिये जावें और हीरा, मोती पन्ना और मूंगा आदिके जड़ाऊ वस्त्रों द्वारा वे सजाये जावें। ३१॥३२॥ जिससव इन पक्षियोंक भोजन करनकी सब सामग्री भरी रहे। वहाँपर नाचनेके लिए सुन्दर सुन्दर वेश्याव बुलायी जायें। धूप देनेवाले लोग सुगन्धित धूप देनके लिए नियुक्त किये जावें। गानवाले लोग गाय और बजानेवाले विविध प्रकारके बाज बजावें ॥३३॥३४। सब राजमण्डलाने अलग-अलग पूजन करनकी सामग्रियोंसे पूर्ण बर्तन रक्खे रहें। ऋषिसभाओंके लिए कुशा, दण्ड, कमण्डलु तथा समिधाका विशेष प्रबन्ध रहे। ऊपर पहननेके लिये वस्त्र और नीचे पहननेके लिये कौपीन, वल्कल वस्त्र, मृगचर्म, पूजनकी सब सामग्रियां, हवन करनकी सब वस्तुएं, जलसे भरे हुए हजारो घड़े बादि वहाँपर ला-लाकर रक्खे जायें। हाथ पवित्र करनेके लिए शुद्ध मृत्तिका, दातौन, खड़ाऊं तथा मुखशुद्धिके लिये बहुतसे मंजन आदि वहींपर रक्खे रहें ॥३५-३८॥ इसी तरह नारीसभाके या पूजाके बहुतसे पात्र रहने चाहिये। सोहागके लिये शुभसूचक रोली-सेंदुर आदि सुगन्धित वस्तुयें भी रक्खी रहें। सुन्दर दर्पण लाकर रख्य जायें। काजलके कुमकुमभरे बर्तन आदि भी वहाँ उपस्थित रहें ॥३९॥४०॥ बहुत-सी बाँसकी बनी हुई सन्दूकोंमें सुन्दर और चमकवाते हुए आभूषण रक्खे रहें। हल्दी-रोली आदि चीजें और कंचुकी आदि वस्त्र लाकर रक्खे जायें। पंखे और चमरादिक

७१२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

...समुद्रान्तानथ तथा दूता महाजवाः। जनकाय प्रेषणीयाः केकटाद्यनृपेष्वथौ ॥४३॥
...सख्यायाः सुमंत्राद्याः प्रिनंगं प्रति लक्ष्मण। श्यामांध्रिः श्यामकर्णश्च श्यामपुच्छः सितः शुभः ॥४४॥
महादामार्घ्यवस्त्रैर्दव्यैरागमनेन च शोभनीयाचापवर्गमुक्तादार्ममनागमः । ॥४५॥
हर्म्यभिः शुक्लवस्त्रैश्च वर्णगन्धविभूषणैः । तस्य भाले हेमपत्रे लेखनाय स्फुटाक्षरैः ॥४६॥
कोमलेन्द्रस्य रामस्य यज्ञांगतुरंगमो ह्ययम् । ज्ञेयः सर्वैर्नृपैर्मुक्तः कृतै भुम्पाः प्रदक्षिणाम् ॥४७॥
यस्यास्ति बलं तेनासौ बंधनीयोऽद्यसुत्तमः । नोचेत् क्रोधाच्च मित्राप्त पुरस्कृत्य बलैः सह ॥४८॥
स्वकुटुम्बैर्नागरैश्च तथा जानपदैः सह। आगन्तव्यं नृपतिभिर्यज्ञांगाश्वानुवर्तिभिः ॥४९॥
यज्ञभूमिमवोध्यायां युद्धेर्जित्वा महोद्धतान्। एवं पत्रं बंधयित्वा मुक्तामणिर्विचित्रितैः ॥५०॥
अनन्तरंः साभयित्वा सिद्धः कार्यश्च मण्डपे सिद्धः कार्यः स शत्रुघ्नः सैन्येन परिवेष्टितः ॥५१॥
रथाऽश्वोष्ट्रगजाक्षार्थ सुमन्त्रेण समन्वितः नानापुष्पनदीनां च जलकुभान् सहस्त्रशः । ५२॥
नानादृष्टामृत्तश्चापि शत्रुघ्नेनानयस्व हि। शोभनीया पुरी रम्या पताकाध्वजतोरणैः ॥२३॥
दत्त्वा सुधा देया तथा प्रासादमस्तके । देवालयाभ्यन्तरेऽथ चित्रशाला मनोरमाः ॥५४।
लेखनाया विधातव्या रत्नदीपाः सदैव हि। पूजोपकरणादीनि प्रतिदेवालयेष्वपि ॥५५॥
स्यापयस्व समस्तानि वायन्त्याज्ञापयस्व भोः । राजमार्गः शोधनीयाः सेचनीयाश्च चन्दनैः ॥५६॥
वीथीगोषु मयंत्र चित्राणि विविधानि च। लेखनीयानि रम्याणि मुक्ताहाराः समन्ततः ॥५७॥
प्रवालमणिवैदूर्यकाश्मीरस्फटिकादिभिः नानाविधाश्च कुसुमंहाराः पक्वफलादिभिः ॥५८॥
बधनीयाश्च सर्वत्र जालश्चैविंशेषतः। एवं यच्चन्मया प्रोक्तं तत्कुरुष्वाधिघावरतः ॥५९॥


जाकर रख आयें और अपने मित्रोंके आगे हुई विटिंवां अपना यहाँ खर्चा रह ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ आज ही रामचन्द्रजीका मुहर लगा हुआ पत्र लेकर दूत मिथिलेश जनक, काश्मौर तथा केकय आदि राजाओंके पास जायें । तदनन्तर श्याम पुच्छ तथा श्याम रेंगवाला घोडेका । ४३ । ४४ ॥ बहुमूल्य वस्त्रों और आभूषणोंसे सजाये जाय, उसे म नवां अङ्गार और वस्त्राभूषण आदि पहन पहने जाय । एक सुवर्णपत्रपर ये व से साफ़ अक्षरामे लिखकर उसके माथेपर बाँध दिया जाय-॥ ४५ । ४६ । "कौसल्यादे पह राज गगारन्दन। यह यज्ञीय घाउ भूमिपे प्रदक्षिणा करनेके लिए छोड़ा गया है। सब देश-देशान्तरके राजाओको ज्ञात हो कि जिसमें बल हो, वह इस सुन्दर घोड़ेको बाँध ले, नहीं तो अपने देशवासियां, अपनी सेना तथा कुटुम्बिदाके साथ इस प्र हक पीछे-पीछे चलता हुआ हमारी यज्ञभूमि अयोध्या अगोध्यम आकर मुझसे मिल" ॥ ४७-४९ ॥ इस आशयका पत्र लटकाया जाय । रास्तेमें जो जो उद्दण्ड राज मिले उनसे युद्ध कर-करके उन्हें परास्त कि । जाय अनेक प्रकारके झाड़-फानूस आदिस सजा करके कि सिद्धमंडप बनाया जाय । इसके अनन्तर अपनी पूरी सेनाके साथ शत्रुघ्नजी सुमन्त्रको साथ लिये हुए घोड़ेपर सवार होकर उस यज्ञीय घोड़ेकी रक्षा करनेके लिए प्रस्थान कर । उसके पश्चात् बहुत-सी पवित्र नदियोंकी मृत्तिका और हजारो घड़ोमे जल भर-भरकर शत्रुघ्नजीके द्वारा मँगाया जाय ॥ ५०-५२ ॥ अयोध्यामें जितने भी देवालय हो, उन सबको चुनेसे पुतवाया जाय । सब मकानोंकी भी सफाई की जाय । देवालयोंके भीतर नाना प्रकारके चित्रकारियों की जायँ । हर एक देवालयम हर रोज पूजन करनेकी सामग्रियाँ भेजी जायँ ॥ ५३-५५ ॥ हे लक्ष्मणजी ! आज ही आप सब प्रकारके बाज मँगाकर रखनेकी आज्ञा दे दीजिए अयोध्याके सब राजमार्ग खूब अच्छी तरह साफ किये जायें और उनपर चन्दनका छिड़काव किया जाय । राजमार्गके सब बड़े-बड़े महलोंकी दीवारोंपर विविध प्रकारके चित्र बनानेकी आज्ञा दे दी जाय । जगह जगहपर मोतियोंका मालायें लटकार्या जायं ॥ ५६ । ५७ ॥ प्रवालमणि, वैदूर्यमणि, काश्मीर और स्फटिकादि मणियांकी मालायें, फूलोंकी मालायें तथा पके फलोंकी मालाय हर एक मकानोपर लटकाई जायें । इस प्रकार मैंने जो कुछ बतलाया है, उसे कर

सर्गः १] | सारकाण्डम् | २१३


तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा मूर्ध्नाऽऽकृत्वा स लक्ष्मणः। काम्यं यस्य तन्मर्त्यं गुरोर्वाक्याच्छताधिकम् ॥ ६०।
इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीयः सर्गः

(यज्ञमें सावधानी रखनेके लिए रामका लक्ष्मणको आदेश)

श्रीरामदास उवाच
अथ रामः समीतस्तु मुहूर्ते सप्तमेऽहनि । मज्जनोद्वर्तनाद्यैः स्नान्त्वा कुर्व्वांजनादिकम् ॥ १ ॥
तूर्यनादैर्द्विजानां च वेदघोषैर्विशेषतः। पौरस्त्रीणां गायनश्च पौराणां च जयस्वनैः ॥ २ ॥
आगत्य मण्डपे रम्ये तस्यां चित्रासनोपरि। ददौ कौशेयवस्त्राणि गुरुं रामस्स्वयम्भवीम् ॥ ३ ॥
पौराँश्च पौरपत्नीश्च मातृश्चाथ स्नुषांस्तथा । शश्रूश्चापि द्विजान् सर्वान् जनकं सुहृदस्तथा ॥ ४ ॥
बंधूंश्च बंधुपत्नीश्च स्वस्थांश्च जनः परम् । मंत्रिणांश्चाथ वीरांश्च दामदास्रींर्जनांस्तथा ॥ ५ ॥
नटनर्तकवद्यादीन् वारस्त्रींश्च ततः परम्। अचंडालादिकान् दत्त्वा ततः सीतां ददौ वरम् ॥ ६ ॥
हेमतन्तुसमुद्धृतं मुक्तामाणिक्यगुंफितम् । रत्नकान्त्याऽऽनीलार्थमध्ये मध्ये विचित्रितम् ॥ ७।
मुक्ताप्रवालपोपार्थमणिभिः सरंतो वृतम्। आदर्शबिम्बसदृशं विद्युत्तेजौपमं महत् ॥ ८ ॥
वतः स्वयं रामचन्द्रः पतकौशेयमुत्तमम्। हेमतत्त्वाऽऽवृतं नानावल्लीपुष्पादिचित्रितम् ॥ ९॥
दधारण्यत्तुत्तरीयं वामोंऽसलकारमंडितः । व्यजिनाक्षेपमात्रार्थमणिङ्कपविराजितः ॥१०॥
केयूरकुण्डलैर्मुक्ताहारैश्च कटकैर्युतः। ततो वसिष्ठर्द्धर्मस्तं मुक्तानां स्वस्तिकोपरि ॥११॥
निवेश्य राघवः सीतामाहूय बटुकैर्निजैः। निवेश्य रामवामांगे मुनिभिः परिवेष्टितः ॥१२।
रमेश कारयामास विघ्नशादिषूजनम् । पुण्याहादित्रयं चापि ददौ दीक्षा ततस्तयोः ॥१३॥


आओ। तुम उनके विषयमे कुछ मत सोचो विचारो। मैंने स्वयं सब सोच लिया है। इस प्रकार गुरुवरकी आज्ञा पाकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर स्वीकार किया और सब काम उससे भी सौगुना बढ़-चढ़कर किया, जैसा कि गुरु वसिष्ठजीने कहा था ॥ ५८-६० ॥ इति श्रीमत्काटारामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे भाषा-टीकायां यागोपकरणनिवेदनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

श्रीरामदासने कहा — इसके बाद सातवें दिन सीताजीके साथ-साथ रामचन्द्रने मज्जन आदिका उबटन लगाकर स्नान किया, अंजन लगाया और तुरही आदि बाजो, वेदमंत्रों, नगरकी स्त्रियोंके गीतों और पुरवासियोका जयध्वनिके साथ ॥ १।२॥ आकर उस सुन्दर मंडपमें एक चित्रासनपर बैठे। तब गुरु वसिष्ठतथा अरुन्धतीको उन्होने सुन्दर-सुन्दर रेशमी वस्त्र दिये। इसके अनन्तर पुरवासियोंको, पुरवासिनी नारियोंको, माताओंकोको, बहुओंको, साधुओंको, नगरनिवासी सब विप्रोंको, मित्रोंका, बान्धवोंको, परिवारके लोगोंको, बान्धवोंकी भारियाको, समवयस्क मित्रोंको, मत्रियोंको, सेन पतियोंको, सैनिकोको, दास-दासियाको, ॥ ३-५ ॥ नटो, नतकोंको, बन्दीजनोंको, वेश्याओंको और चाण्डालसे लेकर ऊँच जाति तकके प्रत्येक मनुष्यको अच्छे-अच्छे कपड़े देकर जिसमे सुनहले तारका काम बना हुआ था, मोतियों-माणिक आदिके झुम्बे चारो ओर लटक रहे थे, ऐसे नीलम तथा पुखराज आदि मणियोंसे सुसज्जित एक सुन्दर वस्त्र सीताजीको दिया ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब दर्पणकी तरह चमकती हुई एवं बिजलीकी तरह जिसमें तेज था और सुवर्णके तारका जगह-जगह बेल-बूटा बना हुआ था, ऐसे एक वस्त्रको लेकर रामचन्द्रजीने स्वयं पहिना ॥ ८ ॥ ९॥ ऊपरसे एक उपरना धारण किया। तरह-तरहके आभूषण पहने। जब रामचन्द्रन के कानोंम कुण्डल झूकने लगे, मोतियोंकी मालाएं गलेमें पड़ गयीं और हाथोंके सब गहने हाथोंमें पहन लिये गये। तब वसिष्ठजीने मोतियोंके चौरुके ऊपर रामचन्द्रजी तथा

२१४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २

ध्वजारोपणविधानेन स्थापयित्वा ध्वजोत्तमम् । रामेण कारयामास गुरुः षोडश ऋत्विजः ॥१४॥
याज्ञवल्क्यं सराजऽध्वयुः सकलकर्मवित् । ब्रह्माऽभूच्च स्वयं ब्रह्मा होता गाधिसुतो बभूव ॥१५॥
उद्गाताऽभूच्छतानन्दो गुरुर्यो जनकस्य च । शमो बभूव शमिता कश्यपाद्या मुनीश्वराः ॥१६॥
दृष्टा राज्ञोऽश्वमेधं हि राघवेण महात्मना । ऋत्विजः षोडशैश्चक्रुरन्ये च नवकर्मसु । १७॥
पृथक् पृथक् संवृणानाः संवृणस्ते मुनीश्वरः कुण्डेऽग्निमथ संकृत्या पात्राण्यासाद्यविस्तरात्॥१८॥
दशमकर्णे जपित्वा मोक्षयामास भूतले । सव्यं प्रदक्षिणो कर्तुं तस्य संरक्षणाय हि ॥१९॥
न्यस्तं सुमंत्रेण सैन्यैनावृतमंशुपया शत्रुघ्नं प्रेषयित्वाऽथ तूष्णीं तस्थौ द्विजेर्गुरुः ॥२०॥
यज्ञवाटे मुनिगणैःपूर्णे नरपूतटै । समाऽपि सीतया तूष्णीं तस्थौ शृण्वन् कथाः शुभाः ॥ २१ ॥
कृष्णा जिनधरो दान्तः कुशपाणिः कृतान्वितः कोटिसूर्यप्रभाऽशश्वत्तथ्यो य गुरुसन्निधौ ॥२२॥
तदाज्ञायां प्रवृत्तायां भ्रातरः पुक्कन्ध्रजः । स्नाताः सुवासमः सर्वे रेजियरे सुष्टुवलकृताः ॥२३॥
कण्ठहिक्यश्च मुदिता निष्कवन्त्यः सुवाससः दीक्षाशालामुपाजग्मुर्हस्ताग्रा वस्तुपाणयः ॥२४॥
तदा विनेदुर्वादामि ननृतूश्चाप्सरोऽपिचः एवमस्मिन्नन्तर तत्र समाजग्मु मुनीश्वराः ॥२५॥
दिने दिनेऽश्वमेधस्य वार्ता श्रुत्वा, महर्षयः कश्यपोऽत्रिरथद्वाजौ विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥२६॥
मार्कण्डेयो मुकुण्डश्च च्यवनो मुङ्गलोऽसितः । जमदग्म्यो देवलश्च व्यासो नागपणः क्रतुः । २७ ।
विभाण्डको नारदश्च तुम्बुरुगालवो मुनिः । शिवदासो भानुदासो हरिदासो महानराः । २८ ।
शिवशर्मा रुद्रवर्मा शिवशर्मा मुनावधः । एकशृङ्गश्चतुः शृङ्गः मप्तशृङ्गस्त्रिशृङ्गकः । २९॥
तिलभांडो भृगुश्चैव भार्गवो राक्षपास्तस्तथा। धौम्यः दण्डश्चकपादश्चिपादश्चोर्ध्वबाहुकः । ३० ।


माताजीको बिठाया और अपने शिष्यों तथा ऋत्विजके साथ-साथ मन्त्रम पढके रामचन्द्रजीके द्वारा गणेश-गौरी आदिका पूजन तथा पुण्याहवाचन कराया और सीता तथा रामचन्द्रजीका यज्ञक दीक्षा दी। ध्वजारोपणको जो विधि होता है, उसके अनुसार ध्वजारोपण और रामचन्द्रजक द्वारा सोलह ऋत्विजोका वरण कराया ॥ १०-१४ ॥ सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता वसिष्ठ स्वयं अध्वर्यु बने । स्वयं ब्रह्माजी ब्रह्मा बने और होता का विश्वामित्रजी । सतानन्द उद्गाता बने, जो जनकके गुरु थे। इसके अनन्तर कश्यपादि मुनियोंका रामचन्द्रजीने ऋत्विक् बनाकर वरण किया ॥ १५-१७ ॥ इसके अतिरिक्त जो सैकडो ऋत्विजका रामचन्द्रजीने अन्यान्य कार्योंको करनेके लिए वरण किया। उन सबने यथासमय कुण्डमें अग्नि स्थापन करके यज्ञके पात्रोंको अपने-अपने स्थानपर रक्खा, विधियुवक श्यामकर्ण घोडका पूजन कराया और पृथ्वीकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करनेके लिए उसे छोड़ दिया ॥ १८, १९ ॥ उसकी रक्षाके लिए समन्तके साथ शत्रुघ्नको भेजकर भगवान् रामचन्द्रजी अपने गुरुजीके पास चुपचाप जा बैठे। उस यज्ञभूमिमें जहाँ हजारो ऋषि आकर बैठे हुए थे रामचन्द्रजी भी सीताजीके साथ एक किनारे बैठकर शुभ कथायें सुनने लगे उस समय रामचन्द्रजी केवल काले मृगका चर्म धारण किये और हाथमें कुशा लिये हुए एक साधारण वस्त्रमें थे फिर भी उनमें करोडो सूर्योका तेज था और वे गुरु वसिष्ठके पास बैठे थे ॥ २०-२२ । यज्ञकी दीक्षा हो जानेपर सब भ्राता फूलका मालायें तथा अच्छे-अच्छे कपडे पहिने बहुत ही सुन्दर दीख पडते थे । उनकी स्त्रियाँ भी गलेमें सोनेके कण्ठे और शरीरमें सुन्दर वस्त्र पहिन हंसती-खेलती अनेक वस्तुओंका उपहार लिये हुए उसी यज्ञशालामें आ पहुँची ॥ २३ । २४ । इसके अनन्तर बाजे बजे और अप्सराएँ नाचने लगीं । उसी समय बहुतसे ऋषिलोग आ पहुंचे अश्वमेध यज्ञका खबर पाकर हजारो महर्षिलोग आकर एकत्रित होते जा रहे थे। जैसे कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, मार्कण्डेय, मुकण्ड, च्यवन, मुद्गल, असित, जामदग्नि, देवल, व्यास, नारायण, क्रतु, विभाण्डक, नारद, तुम्बुरु, गालव, शिवदास, भानुदास, महातपस्वी हरिदास, शिवशर्मा, रववर्मा, मुनावराः शिवशर्मा, एकशृंग, द्विशृङ्ग, चतुःशृङ्ग, सप्तशृङ्ख ॥ २५-२६ ॥ विरूभाण्ड,